Divya Gandha
(0)
₹
100
80 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
जैसे पानी तत्त्वत: दो हाइड्रोजन और एक ऑक्सीजन अणु का रासायनिक संयोजन है, उसी प्रकार दो नारियाँ गंगा और सत्यवती समान रूप से दिव्य हैं—एक पारलौकिक मिथकों के आधार पर और दूसरी लौकिक इतिवृत्त के आधार पर।</p> <p>( इसी पुस्तक की भूमिका से)
Read moreAbout the Book
जैसे पानी तत्त्वत: दो हाइड्रोजन और एक ऑक्सीजन अणु का रासायनिक संयोजन है, उसी प्रकार दो नारियाँ गंगा और सत्यवती समान रूप से दिव्य हैं—एक पारलौकिक मिथकों के आधार पर और दूसरी लौकिक इतिवृत्त के आधार पर।</p>
<p>( इसी पुस्तक की भूमिका से)
Book Details
-
ISBN9788180316876
-
Pages59
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Atikraman
- Author Name:
Kumar Ambuj
- Book Type:

-
Description:
हमारे दौर की कविता के बारे में कभी-कभी एक आलोचना यह भी सुन पड़ती है कि ज़्यादातर कवियों के पहले कविता-संग्रह ही उनके सबसे अच्छे संग्रह साबित होते हैं, दूसरे संग्रहों तक आते-आते उनका प्रकाश मन्द हो जाता है, यथार्थ की काली गहराइयों में जाकर उनकी लालटेनें बुझने लगती हैं। इस बात में अगर कोई सचाई है तो कुमार अंबुज को उसके अपवाद की तरह देखा जा सकता है। अंबुज का पहला कविता-संग्रह 1992 में प्रकाशित हुआ था और सिर्फ़ दस वर्ष के अन्तराल में उनके चौथे संग्रह का छपना सबसे पहले यह बतलाता है कि इस कवि के पास कहने के लिए बहुत कुछ है : निरवधि काल और विपुल पृथ्वी है, बल्कि एक पूरा सौरमंडल है, निर्वात और सघन पदार्थों में से गुज़रना उसका रोज़ का काम है। वायुमंडल की सैर करते-करते वह ग्रह-नक्षत्रों को खँगाल लेता है, मंगल ग्रह के लोहे को अपने शरीर और रक्त में महसूस करता है और अन्तत: अपनी पृथ्वी पर लौट आता है। इस अछोर कायनात को खोजने-जानने के लिए कुमार अंबुज के पास उतनी ही विस्तृत भाषा भी है जिस पर उन्हें इतना विश्वास है कि एक कविता में वे ‘भाषा से परे का यह दुर्गम पहाड़’ भी ‘भाषा की लाठी के सहारे ही’ पार करना चाहते हैं। इस संग्रह की पहली और बीज-कविता जैसी रचना में वे ख़ुद को एक ऐसे पुराने ताँबे के पात्र की तरह देखते हैं जिसे कोई ‘इतिहास की राख से माँजता है’ और ‘एक शब्द माँजता है मुझे/एक पंक्ति माँजती रहती है/अपने खुरदुरे तार से।’
जीवन और कविता की उदात्तता को कुमार अंबुज बार-बार रचते हैं, प्राय: उसका एक नया स्थापत्य बनाने की कोशिश करते हैं लेकिन इतना-भर इस कविता का अभीष्ट नहीं है, बल्कि एक महाविमर्श के छोटे-छोटे ब्योरों, उसके बारीक ताने-बाने में प्रवेश करते हुए उसके अर्थों को खोजना ही उसकी मूल प्रतिज्ञा है और इसीलिए अंबुज यह देख पाते हैं कि ‘एक तारा टूटने से भी वीरान होता है आकाश’ और ‘इस एक के लिए/इस एक के विश्वास से/लड़ता हूँ हज़ारों से/इस एक की परवाह करता हूँ।’ एक महाजीवन के इसी ‘एक’ को लेकर कुमार अंबुज के सरोकार इतने व्यापक हैं कि वे ‘अभी-अभी दर्ज हुई एक नई ऋतु’ को ‘एक कीड़े के अपूर्व राग में गाते हुए’ सुन पाते हैं और यह संकल्प भी व्यक्त कर सकते हैं कि ‘यह एक कमज़ोर इच्छा है जिसकी चहलक़दमी की आवाज़/एक तानाशाह की इच्छा की आवाज़ से टकराती है।’ दरअसल इस एक का हालचाल जानने की तड़प ही कुमार अंबुज को अनेकता के सौरमंडल तक ले जाती है। अनेक कविताओं में वे जीवन का एक रूपक खड़ा करते प्रतीत होते हैं लेकिन सहसा उस रूपक को भेदकर उसके दारुण यथार्थ में प्रवेश कर जाते हैं।
एक मूलभूत सरलता से संश्लिष्टता की ओर कुमार अंबुज की यह यात्रा एक उल्लेखनीय अनुभव है जिसका साक्ष्य उनकी इन कविताओं की संरचना, उनके ख़ास पैटर्न में भी मिलता है। वे शुरू में प्राय: एक शान्त-सुन्दर प्रवेश-द्वार की तरह दिखती हैं लेकिन उसके खुलते ही जैसे एक जटिल यथार्थ के आयाम प्रकट होने लगते हैं, जहाँ ‘ग़रीब की बुदबुदाहट का अनुवाद’ कुछ इस तरह होता है कि ‘लकड़ी का बुरादा भी जगा देता है मेरी भूख’ और ‘जीवन में एकदम ख़ाली’ एक दिन भी पूरे जीवन की गतिविधि में इतना स्पन्दित और स्मृति में इतना चिन्हित दिखता है कि उसे ‘न उम्र में से घटाया जा सकेगा/और जोड़कर देखने में होगा एक अपराध।’ यह एक लगभग सिनेमाई शिल्प है जिसमें एक सुन्दर शुरुआत एक विरूप विस्तार की ओर जा सकती है, एक प्रतीक, एक अमूर्तन हमें एक यथार्थपरक और ठोस संसार में ले जाता है, फिर सहसा अपने मूल बिम्ब में लौटता है और दूसरी वास्तविकता की ओर बढ़ने लगता है। इस संग्रह की एक कविता ‘रेखागणित’ अंबुज की इस काव्य-प्रविधि का उकृष्ट उदाहरण है जिसमें एक सीधी-सरल रेखा के गणित में एक पूरे जीवन को, उसके आश्चर्यों और रोमांचों, उसकी निश्छलता और ऐन्द्रियता को, उसके न्याय और अन्याय की परस्पर न मिलनेवाली समान्तर लकीरों को अन्तत: इस उम्मीद के साथ देखा गया है कि ‘वहीं कहीं छिपा हो सकता है/ज़िन्दगी को आसान कर सकनेवाला प्रमेय।’
किसी भी रचनाकार के लिए अपने शिल्प को लाँघना कठिन काम होता है, लेकिन अंबुज की संवेदना अपने कथ्य के अनुरूप शिल्प सहजता से उपलब्ध कर लेती है, क्योंकि एक समृद्ध काव्य-भाषा उनका सबसे कारगर औज़ार है। इसीलिए ‘रेखागणित’, ‘चुम्बक’, ‘जीवाश्म’, ‘मेढक’, ‘मुर्गी’, ‘हस्तलिपि’ जैसे नए अनुभवों की मार्मिक शक्लें निर्मित होती हैं और ‘एक कम है’, ‘अतिक्रमण’, ‘मानकीकरण’, ‘मैं एक आततायी को जानता हूँ’, ‘कवि व्याप्ति’, ‘कला का कोना’, ‘भाषा से परे’, ‘एक और शाम’ और ‘मध्यवर्गीय ओट’ जैसी किंचित् परिचित भावभूमि के अपरिचित आयाम खुलते हैं। करुणा और नैतिकता, जो कि कविता के स्थायी-अपरिवर्तनीय सुर हैं, जैसे अंबुज की कविताओं में ताने-बाने की तरह मौजूद हैं—इसीलिए ‘असाध्य रोग’ में सहज, गद्यात्मक लोकोक्ति जैसी बात को वे विचलित करनेवाले तरीक़े से लिख सकते हैं : ‘आँसुओं से कोई दवा तैयार हो सकती होती/तो कोई रोग असाध्य नहीं रह जाता।’ ‘पगडंडी’ कविता बताती है कि ‘जब सारी दुनिया चमकदार सड़कों से भर जाएगी, तब भी एक राह को दूसरी राह से जोड़ती पगडंडी बची रहेगी।’ कुमार अंबुज ख़ुद किसी राजमार्ग पर नहीं, बल्कि कविता की एक पगडंडी पर चलते उसी हाशिये, उसी किनारे से राजमार्गों के जाल को देखते आए हैं, क्योंकि न्याय और अन्याय की समान्तर रेखाएँ भले ही आपस में न मिलें, अन्याय का प्रतिरोध और न्याय की प्रतिष्ठा इसी राह से सम्भव है।
Raks Jaari Hai
- Author Name:
Zilani Bano
- Book Type:

- Description: अब्बास ताबिश की ग़ज़लों में एक साधा हुआ रूमान है, जिसकी हदें इंसानी रूह और इंसानों की दूर-दूर तक फैली हुई दुनिया के तमामतर मसलों पर निगाह डालती हैं। वे पाकिस्तान से हैं और उर्दू शायरी की उस रवायत में हैं जिससे पाकिस्तान के साथ-साथ हिन्दुस्तान के लोग भी बख़ूबी परिचित हैं, और जिसके दीवाने दोनों मुल्कों में बराबर पाए जाते हैं। अहसास के उनके यहाँ कई रंग हैं, यानी ये नहीं कहा जा सकता कि वे सिर्फ़ इश्क़ के शायर हैं, या सिर्फ़, फ़लसफ़े की गुत्थियों को ही अपने अशआर में खोलते हैं, या सिर्फ़ दुनियावी समझ और ज़िन्दगी को ही अपना विषय बनाते हैं। उनके यहाँ यह सब भी है—मसलन यह शेर, ‘हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस, जो तआल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं।’ इस शे’र में निहाँ विराग और लगाव हैरान कर देनेवाला है, उसको कहने का अन्दाज़ तो लाजवाब है ही। अपनी बात को कहने के लिए वे अपने अहसास को एक तस्वीर की शक्ल में हम तक पहुँचाते हैं जो पढ़ने-सुनने वाले के ज़ेहन में नक़्श हो जाता है। ‘मैं कैसे अपने तवाज़ुन को बरकरार रक्खूँ, क़दम जमाऊँ तो साँसें उखड़ने लगती हैं’। इस शे’र में क्या एक भरा-पूरा आदमी अपने वजूद की चुनौतियों को सँभालने की जद्दोजहद में हलकान हमारे सामने साकार नहीं हो जाता? अब्बास ताबिश की विशेषताओं में यह चित्रात्मकता सबसे ज़्यादा ध्यान आकर्षित करती है। मिसाल के लिए एक और शे’र, ‘ये जो मैं भागता हूँ वक़्त से आगे-आगे, मेरी वहशत के मुताबिक़ ये रवानी कम है’। अब्बास ताबिश की चुनिन्दा ग़ज़लों का यह संग्रह उनकी अब तक प्रकाशित सभी किताबों की नुमायंदगी करता है। उम्मीद है हिन्दी के शायरी-प्रेमी पाठक इस किताब से उर्दू ग़ज़ल के एक और ताक़तवर पहलू से परिचित होंगे।
Kahin Bahut Door Se Sun Raha Hoon
- Author Name:
Shamsher Bahadur Singh
- Book Type:

-
Description:
शमशेर की कविता का स्थायी मूल्य है, स्वच्छ और निर्मल कविता की परख। इसी नाते शमशेर रूपवादी आलोचकों की तरह, परम्परावादी या यथास्थितिशील नहीं हैं। आधुनिक कविता की स्थायी मूल्यदृष्टि की खोज वह कवि के अनुभव और काव्य के उपकरणों की ज़रूरत के अनुसार करते हैं। इस कसौटी पर वे बड़े कड़े हैं। वे परम्परा की श्रेष्ठतम कविता, कला और सौन्दर्य की ‘प्राचीन या आधुनिक’ हार्दिकताओं को विकसित करते हैं। विकास की उनकी ज़मीन व्यापक है। शमशेर हिन्दी-उर्दू के दोआब के कवि हैं।
ग़ालिब और निराला की मार्मिक भाषाओं के स्वरूप और नाद को शमशेर ने अपनी कविता में आत्मसात् कर लिया है। शमशेर का कलाकार कवि अपनी कला-प्रयोगशाला में तल्लीन रहनेवाला एक वैज्ञानिक कवि है। वह प्रयोगशाला में ‘अत्याधुनिक मर्म की सूचनाएँ’ खोजता रहता है। पतनशील आधुनिक सभ्यता के बाज़ार की चीख़-पुकार से असन्तुष्ट...शमशेर आत्मज्ञान से विकसित होती कविता या कला के विज्ञान को टटोलते चलते हैं।
शमशेर का खोजी सौन्दर्य संगीत की स्वच्छ और निर्मल ऊँचाइयों से कभी निराश नहीं होता। शमशेर के लिए नया रूप लेती मानवीय कला, ऊँची कला का आईना है। वे जानते हैं कि कब पूँजीपति या सत्ता उनकी कविता या कला को संरक्षण देते हैं। शमशेर की ख़ामोशी में एक एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग बनती है, जहाँ कलानुभव का इतिहास, भूले-बिसरे मित्रों की यादें, और अपनी मौत का विडम्बना-भरा प्रसंग घुल-मिल जाता है—कोलाज जैसा। घुल-मिल जाने के अनेक कलानुभवों को वे व्यंग्य की शैली में चित्रित करते हैं और कभी रंगमंच पर ‘जात्रा’ या ‘बाउल’ से लीला करते नज़र आते हैं।
‘काल से होड़ लेता शमशेर’ में
—विष्णुचन्द्र शर्मा
Mera Ujar Pados
- Author Name:
Dinesh Jugran
- Book Type:

- Description: ‘मेरा उजाड़ पड़ोस’ दिनेश जुगरान का चर्चित काव्य-संग्रह है। संग्रह की कविताएँ हमारे आज के आस्थाहीन समय के सत्य और संकट को, जिसमें जीवन-मूल्य पूरी तरह अपनी क़दरो-क़ीमत खो चुके हैं, एक अत्यन्त प्रभावशाली भाषा और मुहावरे में परिभाषित करती हैं। इनमें उस शफ़्फ़ाक़ और बेहिस दुनिया की परतें खुलकर सामने आती हैं जिसमें 'होशियार लम्हों' की 'साज़िश' के चलते, यह एहसास कि 'ज़हरीले बीज, टूटे फावड़े और/बिना धार की खुरपियों से/नई क्यारियाँ कैसे बनेंगी', एक गहरी उदासी और असहायता का बोध छोड़ जाता है। लेकिन यह हार मान लेनेवालों की कविताएँ नहीं हैं। इनका सरोकार ज़िन्दगी से है जहाँ हार-जीत साथ-साथ चलते हैं। दुनिया का बिगाड़, दिनेश जुगरान पर भी इस तरह असरअन्दाज़ होना चाहता है कि वह भीड़ का हिस्सा और ख़ुद अपना तमाशा हो जाएँ, लेकिन इससे उनकी ज़िन्दगी के लिए शिद्दत और गर्मजोशी कम नहीं होती। वह कहते हैं—'मैंने अभी तक/हार नहीं मानी है/जीना चाहता हूँ/अपना ही किरदार/धरती को रख लिया है/अपनी ज़बान पर/और पहाड़ों की धड़कनों को/पहन लिया है अपनी साँसों में।' दिनेश जुगरान की कविता हमें अपने अन्तराल तक देखने की शक्ति प्रदान करती है और लगता है हम किसी जादुई गोले में अपनी ज़िन्दगी के अन्तर्विरोधों से रू-ब-रू होते हुए उन रहस्यों तक पहुँच रहे हैं जिन पर किसी कारणवश अभी तक पर्दा पड़ा हुआ था। वे कविताओं के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की पड़ताल करते हुए, उसका अतिक्रमण करने का प्रयास भी करते हैं। कविता दिनेश जुगरान के लिए किसी बदलाव का नारा नहीं, व्यक्ति के स्वतंत्र होने का एहसास है। उनका लहज़ा, ख़ुद से बात करने का, और कविता का परिदृश्य एक बड़ी दुनिया के उजाड़ होने का ख़तरा और वह कुछ महत्त्वपूर्ण, जो उसके विरोध में किए जाने से रह गया, जिसका किया जाना अब पहले से भी ज़्यादा ज़रूरी मगर दुश्वार है। कविता तब होती है जब शब्द पहचाने अर्थ से बाहर जाकर नए जीवन-सत्यों को पारदर्शिता के साथ सामने रख पाएँ। दो वाक्यों के बीच की ख़ामोशी ही कभी-कभी वह रहस्यात्मकता होती है जिसे समझने में उम्रें बीत जाती हैं। जीवन की हर यात्रा दिनेश जुगरान के भीतर से गुज़रकर किसी बिम्ब, उपमा या प्रतीक में रूपान्तरित होती, ऐसे विरोधाभासों का सामना कराती है, जो लगता है किसी और तरह से व्यक्त कर पाना सम्भव नहीं हो सकता। जैसे मैं देख और समझ सकता हूँ, उस एक मछली को जो ‘पानी से ऊपर उठाकर मुँह’ किसी को पुकारना चाहती है; जान सकता हूँ, उस ‘अज्ञात भय’ के टुकड़े को जो ‘उन डरी हुई तितलियों में/शामिल हो गया है/जो पहाड़ों से/नीचे गिर रही हैं।’ ‘आने से पहले ही चुपचाप/गुज़र जाता है लम्हा’ के अनुभव का शरीक, मैं महसूस कर सकता हूँ—‘मेरी डूबी हुई नाव का/सबसे मज़बूत हिस्सा/मेरी हथेलियों में/अभी भी चिपका हुआ है।’ या ‘सूर्योदय और सूर्यास्त का/फ़ासला’ ‘किस प्रकार पिता के माथे की लकीरों में/नापा जा सकता है’, और कैसे ‘बचपन के रहस्य/अन्दर ही अन्दर जकड़ गए हैं/चेहरे और शब्दों के दायरे/अब मुझे बाँध नहीं पाते/मेरे अन्दर की शीशे की खान/चूर-चूर हो चुकी है।’ जब वह कहते हैं—‘उसके नन्हे आँसू/एक दरिया छीनकर ले गया है’ तो जो मर्म उत्पन्न होता है, वह किसी दूसरी शब्दावली में कल्पना कर पाना सम्भव नहीं लगता। इसे उनकी भाषा पर अद् भुत पकड़ भी कहा जा सकता है और ज़िन्दगी की असलियत की गहरी समझ भी। उनकी भाषा और मुहावरा आनेवाले समय में लिखी जानेवाली कविता पर, देर तक और दूर तक, असरअन्दाज़ होगा। दिनेश जुगरान अपनी कविता में जिस रूपक का प्रयोग करते हैं, वह उनके दुनिया के अनुभव और निजी सोच के द्वन्द्वात्मक संघर्ष का निचोड़ होता है। आपबीती के जगबीती बनने की प्रक्रिया में निजी जीवन-सत्य व्यक्तिगत सीमाओं का अतिक्रमण कर विराट जीवन-सत्य के विभिन्न रूप रच लेते हैं। संक्षेप में ‘मेरा उजाड़ पड़ोस’ एक ऐसा महत्त्वपूर्ण काव्य-संग्रह है, जो हमारे मुश्किल संकटग्रस्त समय को आईना दिखाते हुए, हमें अपने भीतर के उजाड़ तक देखने की सलाहियत देता है। लगता है—‘हवा के वजन की तरह/लम्हा चेहरे पर उतरता हुआ’ के अन्दाज़ में। —मंज़ूर एहतेशाम
Kammo Matiyarin
- Author Name:
Mukesh Dubey
- Book Type:

- Description: Book
Samay Aur Samay
- Author Name:
Durgaprasad Jhala
- Book Type:

- Description: collection of Poems
Dwandgeet
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
डॉ. नगेन्द्र दिनकर को द्वन्द्व का कवि मानते हैं। और सचमुच अपने द्वन्द्व की साधना में दिनकर जितने बड़े क्रान्ति के कवि दिखते हैं, उतने ही प्रेम, सौन्दर्य और करुणा के भी। यह विशेषता छायावादोत्तर युग में उनके अलावा अन्यत्र दुर्लभ है। ‘द्वन्द्वगीत’ में इन सबका सम्मिलित रूप देखने को मिलता है।
इस पुस्तक में दिनकर ने द्वन्द्वात्मकता की ज़मीन पर जो पद-सृजन किया है, वह उनकी अभिधा और व्यंजना-अभिव्यक्ति में एक अलग ही लोक की रचना करता है। संग्रह के कई पदों से पता चलता है कि वे शोषित जन की पीड़ा के वाचक नहीं, उसे संघर्ष और सरोकारों के रंग में रँगनेवाले चितेरे हैं। कहते हैं—‘चाहे जो भी फ़सल उगा ले/तू जलधार बहाता चल।’ जो क्रूर व्यवस्था के शिकार हैं, उन्हें वे झुकते, टूटते नहीं देख सकते। उनकी नज़र में वही असली निर्माणकर्ता हैं, जिनको कुचलकर कोई तंत्र क़ायम नहीं रह सकता। इसलिए हुंकार भरते हैं कि ‘उठने दे हुंकार हृदय से/जैसे वह उठना चाहे/किसका, कहाँ वक्ष फटता है/तू इसकी परवाह न कर।’
दिनकर संवेदना और विचारों के घनत्व में सृजन को जीनेवाले रचयिता हैं। उन्हें मालूम है कि आज जो मूक हैं, एक दिन समझेंगे कि व्याध के जाल में तड़प-तड़पकर रहने को जीवन नहीं कहते। तभी तो यह उम्मीद रचते हैं—‘उषा हँसती आएगी/युग-युग कली हँसेगी, युग-युग/कोयल गीत सुनाएगी/घुल-मिल चन्द्र-किरण में/बरसेगी भू पर आनन्द-सुधा।’
इस संग्रह में प्रेम-सम्बन्धित भी कई पद हैं जिनमें शृंगार, मिलन और वियोग का भावनात्मक और कलात्मक अंकन हुआ है। उनमें अलंकारों का विलक्षण प्रयोग देखने को मिलता है—'दो अधरों के बीच खड़ी थी/भय की एक तिमिर-रेखा/आज ओस के दिव्य कणों में/धुल उसको मिटते देखा।/जाग, प्रिये! निशि गई, चूमती/पलक उतरकर प्रात-विभा/जाग, लिखें चुम्बन से हम/जीवन का प्रथम मधुर लेखा।’
कहें तो यह एक ऐसा संग्रह है, जिसके पद पढ़े भी जा सकते हैं, गाए भी जा सकते हैं। हिन्दी काव्य-साहित्य में एक उच्च कोटि की पुस्तक है ‘द्वन्द्वगीत’।
Tolstoy Aur Saikil
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

-
Description:
‘ताल्स्ताय और साइकिल’ केदारनाथ सिंह की कविताओं का एक ऐसा संग्रह है, जो सबसे पहले कविता को देशज-नागर-वैश्विक इतिहास और भूगोल-विमर्श के बीच एक पुल बनाता है। केदारनाथ सिंह का काव्य-समय एक न होकर अनेक है और सांस्कृतिक बहुलता को अर्थ देता है। पहले की, पर लम्बे समय से बनी पहचान को यह छंद और छंद के बाहर नया विस्तार देनेवाला संग्रह है। एक कविता के शीर्षक के अनुसार ही कहें, यह एक ज़रूरी चिट्ठी का मसौदा है।
‘पानी की प्रार्थना‘, ‘त्रिनीदाद’, ‘पांडुलिपियाँ’, ‘घोंसलों का इतिहास’, ‘बुद्ध से’, ‘ईश्वर और प्याज’, ‘बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर’ ‘जे.एन.यू. में हिन्दी’ और ‘शहरबदल’ जैसी कविताएँ अपनी अन्तर्वस्तु में गहन और बनावट में अपूर्व हैं। लुखरी का आत्मव्यंग्य न दूसरों को बख़्शता है, न अपने को। फंतासी और अयथार्थ भी आज की जटिल सच्चाई के ही सगोतिया हैं।
केदारनाथ सिंह की हर कविता एक नया प्रस्थान है जो काव्यात्मक-अकाव्यात्मक, सहज-जटिल को एक साथ साधने की विलक्षण कला का साक्ष्य है। जो कवि ‘ताल्स्ताय और साइकिल’ जैसी कविता लिख सकता है, जो चींटियों की रुलाई सुन सकता है, जो इब्राहीम मियाँ ऊँटवाले को पहचान सकता है, उस कवि को गहरी समझ के साथ ही पढ़ा जा सकता है। यह कविता और मनुष्य को बचाने की ऐसी कोशिश है जो देह-देहान्तर के रिश्तों को पहचानने में सक्षम है।
‘ताल्स्ताय और साइकिल’ केदारनाथ सिंह की लम्बी काव्य-यात्रा का एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ समकालीन अनुभव के कई ऐसे धरातल उभरते दिखाई पड़ते हैं, जो उसके नए अनुषंगों को खोलते हैं और कई बार उसकी सुपरिचित परिधि को अतिक्रान्त भी करते हैं।
Subhadra Kumari Chauhan Ki 75 Kavitayen
- Author Name:
Anil Kumar
- Book Type:

- Description: सुभद्रा कुमारी चौहान आधुनिक हिंदी साहित्य की ऐसी लोकप्रिय कवयित्री हैं, जिनकी कविताओं ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान भारतीयों के होंठों का गीत बनकर गाँव-गाँव, गली-गली स्वाधीनता का अलख जगाया। उन्होंने ऐतिहासिक और राष्ट्रीय भावनाओं को समसामयिक व राजनीतिक जीवन के तात्कालिक संदर्भों से जोड़ा। उनकी कविता में राष्ट्रीयता 'प्रलयंकारी उच्च घोषणाएँ' बनकर नहीं आई, वरन उसने संघर्षमयी चेतना के रूप में आकार पाया। देशभक्ति की निर्भीक अभिव्यक्ति से साहित्य और राजनीति में उन्होंने अपना विशेष स्थान बनाया।
Yeh Unindi Raton Ka Samay Hai
- Author Name:
Jyoti Chawla
- Book Type:

-
Description:
ज्योति चावला के इस तीसरे कविता-संग्रह—‘यह उनींदी रातों का समय है’ की कविताएँ प्रमाण हैं कि उनका स्वर उत्तरोत्तर अधिक राजनीतिक होता गया है। इन कविताओं में अपने समय की भयावहता को बरीकी से दर्ज करती हुई वे उसका तीव्र प्रतिरोध करती हैं और स्त्री की आजादी के ख्वाब भी रचती हैं। उनके लिए स्त्रियों के हक की लड़ाई एक राजनीतिक मामला है, जिसके रास्ते के अवरोधों की शिनाख्त वे समाज के व्यवहार में बहुत गहरे पैठकर करती हैं। स्वाभाविक ही धर्म, संस्कृति, भाषा सहित समाज की तमाम बुनियादी सत्ता-संरचनाओं के अन्दर जड़ जमाए बैठी पितृसत्ता उनके निशाने पर है। उनके लिए प्रतिपक्ष पुरुष नहीं बल्कि समाज और संस्कृति के वे घटक हैं जिनसे पुरुष का पितृसत्तात्मक मनोविज्ञान निर्मित होता है। इसलिए वे अपने कवितालोक में स्वप्न-पुरुष से लेकर आदिम पुरुष तक की तलाश करती हैं और स्त्री-पुरुष अन्तर्सम्बन्धों का ऐसा पुनर्पाठ तैयार करती हैं जहाँ दोनों परस्पर पूरक हैं, विरोधी नहीं। इन कविताओं में एक ऐसी स्त्री दिखलाई पड़ती है जो अपने समय के संघर्षों से और उनके अन्तर्द्वन्द्वों से निर्मित हुई है; उसका सौन्दर्य आदिम, अकुंठ और संघर्ष की आभा से दीप्त है।
ज्योति की कविताओं की एक और विशेषता है—उनका मुहावरा। माँ और बेटी के संवाद को प्रतीक की तरह बरतते हुए निजता से शुरू कर वे अपनी कविताओं को समूची स्त्री जाति का आह्वान बना देती हैं। इन कविताओं में स्त्री-विमर्श की एक नई दिशा तब खुलती है जब ज्योति बेटी के साथ-साथ बेटे को भी गढ़ रही स्त्री को रेखांकित करती हैं।
प्रतिरोध के साथ-साथ अभिव्यक्ति के गहराते संकट को उजागर करती ये कविताएँ वस्तुत: अपने समय का समानान्तर इतिहास हैं और अपनी सूक्ष्म संवेदनशीलता में बेहतर भविष्य का स्वप्न भी।
Rekhta Ke Momin
- Author Name:
Momin Khan Momin
- Book Type:

- Description: "रेख़्ता क्लासिक्स" सीरीज़ उर्दू के क्लासिकी शायरों के प्रतिनिधि शायरी को नए पाठकों तक पहुँचाने के एक अनूठा प्रयास है। प्रस्तुत किताब में मोमिन ख़ान मोमिन की प्रतिनिधि शायरी है जिसका संकलन फ़रहत एहसास साहब ने किया है।
Mitti Ka Chand
- Author Name:
Dr.Abrar Multani
- Rating:
- Book Type:

- Description: क्या अन्याय तब शुरू हुआ होगा जब मनुष्यों ने अपना घर बनाने के लिए किया होगा गुफ़ाओं पर अतिक्रमण या फिर शुरू हुआ होगा तब जब उसने घर बनाने के लिए काटे होंगे पेड़ क्या अन्याय तब शुरू हुआ होगा जब मनुष्यों ने बाँटे होंगे स्त्री-पुरुष के काम या फिर शुरू हुआ होगा तब जब उसने खुद को शासक और शासित में बाँटा होगा क्या अन्याय तब शुरू हुआ होगा जब जनता को अपना शासक चुनने का मौक़ा मिला या फिर शुरू हुआ होगा तब जब शासक अपनी जनता चुनने लगे
Hajra Ka Burqa Dheela Hai
- Author Name:
Dr. Tabassum Jahan
- Book Type:

- Description: हाजरा का बुर्का ढीला है', डॉ. तबस्सुम जहान की एक आकर्षक हिंदी साहित्यिक कृति है। इस सोच-समझकर तैयार की गई किताब में एक कलात्मक आवरण है, जो शरद ऋतु के रंगों की एक गर्म, अलौकिक पृष्ठभूमि के खिलाफ एक सुंदर सिल्हूट को दर्शाता है। सुंदर हिंदी टाइपोग्राफी और सौंदर्यपूर्ण डिजाइन तत्व कथा विषयों के साथ सहजता से मिश्रित होते हैं। साहित्य के प्रति उत्साही और कविता प्रेमियों के लिए बिल्कुल सही, यह पुस्तक आपके संग्रह में एक सार्थक वृद्धि का वादा करती है।
Zameen Par Chand
- Author Name:
Hira Lal Mishr
- Book Type:

- Description: Book
Kuchh Kavitayen Va Kuchh Aur Kavitayen
- Author Name:
Shamsher Bahadur Singh
- Book Type:

-
Description:
शमशेर जी का पहला कविता-संग्रह ‘कुछ कविताएँ’ 1959 में आया था और दूसरा ‘कुछ और कविताएँ’ 1961 में—यानी उस समय जब वे पचास वर्ष के थे। और ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने कविताएँ तभी लिखना प्रारम्भ किया था—इन दोनों संग्रहों की कविताएँ पिछले बीसेक वर्षों में लिखी गई थीं।
अधिकांश कवि पचास तक पहुँचते-पहुँचते अपने उतार पर होते हैं, लेकिन शमशेर के बारे में यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि निराला के बाद और ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ के पहले किसी भी एक कवि के दो ऐसे छोटे-छोटे अत्यन्त संकोची एवं विनम्र, संग्रहों ने हिन्दी कविता और उसकी आलोचना पर इतना गहरा और दूरगामी असर नहीं डाला।
शमशेर के अनेक कट्टर प्रशंसक अब भी यह मानते पाए जा सकते हैं कि उनकी अधिकांश कालजयी कविताएँ इन्हीं में हैं।...इसमें सन्देह नहीं कि ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में शमशेरियत के सारे मौलिक रंग मौजूद हैं—स्वस्थ-वयस्क रूमान, सारे सौन्दर्य में ऐसी सूक्ष्म-ऐन्द्रिक दृष्टि जो सिर्फ़ उन्हीं की है, शिल्प के प्रतिबद्ध और नाजुक प्रयोग जिनमें प्रगल्भता और प्रदर्शन का नितान्त अभाव है, ‘उर्दू’ और ‘हिन्दी’ का कारगर मेल, छन्दों, ग़ज़लों और नज़्मों से बेपरहेज़गी, कई सांस्कृतिक परम्पराओं का अपनी रक्त-मज्जा में अहसास, ‘परम्परा’ और ‘आधुनिकता’ का सहज मेल और इस सबके साथ और सबके ऊपर सर्वहारा—भारतीय सर्वहारा—के साथ तादात्म्य।
शमशेर ने छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, भारतीय-अरबी-फ़ारसी, परम्परा, आधुनिकतावाद, सौन्दर्यानुभूति, संगीत, चित्रकला, विश्व-समाज तथा राजनीति और प्रतिबद्धता के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं को अपनी अद्वितीय प्रतिभा में ढालकर जो अपना—केवल शमशेर का—काव्य, काव्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र गढ़ा है वह ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में अपने पूरे टटकेपन और उत्कर्ष के साथ उपस्थित है—मूल्यांकन के सारे ‘शुद्ध’, ‘शाश्वत’, कूढ़मग्ज़ और संकीर्ण सिद्धान्तों को विकलांग बनाता हुआ और एक बिलकुल अलग, पूर्णतर और बलिष्ठ सौन्दर्यशास्त्र तथा समीक्षा की माँग करता हुआ।
—विष्णु खरे
Seven Leaves One Autumn
- Author Name:
Sukrita Paul Kumar
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Kavita Abhi Zinda Hai
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description: रमेशराज की मुक्तछंद कविताएँ
Beej Se Phool Tak
- Author Name:
Ekant Shrivastava
- Book Type:

-
Description:
‘बीज से फूल तक’ की कविताओं में एक ख़ास तरह की कशिश है। उसे एकान्त एक जगह ‘गुरुत्वाकर्षण’ कहते हैं जब समुद्र उन्हें अपनी तरफ़ खींचता है, और अपनी तरफ़ खींचती है पृथ्वी। ‘इस खींच-तान में समुद्र की अद्भुत छवियाँ छिटकी हैं।’ समुद्र पर सूर्योदय में श्याम जल में झड़ते हैं इंगुरी के फूल, क्षितिज की झुकी हुई टहनी से।’ और ‘एक बहुत बड़ा हवनकुंड है भोर का समुद्र, मंत्रपुष्ट उठता है जल, हाहाकार है जल का मंत्रोच्चार।’ फिर ‘ढलती धूप की धीमी आँच में, पिघलता है शाम का समुद्र।’ लेकिन इन दोनों घड़ियों के बीच दोपहर का समुद्र तो अद्वितीय है। वह ‘हल्दी-मिला दूध है’, ‘जल का उद्विग्न वाद्य है’ और है ‘पानी का महाकाव्य, पानी की लकीरों पर लिखा हुआ, पानी का लोकगीत, पानी के कंठ से उठता हुआ।’ हिन्दी में समुद्र पर पहली बार ऐसी कविताएँ दृष्टिगत हुई हैं सम्भवत:। समुद्र को ‘पानी का महाकाव्य’ कहने का गौरव एकान्त को ही प्राप्त हुआ है। ऐसा लगता है जैसे कोई पहले-पहल समुद्र को देख रहा हो : धरती पर पहला मनुष्य और हिन्दी का पहला कवि! इस प्रसंग की सबसे कल्पनाशील कविता सम्भवत: ‘जल पाँखी’ है : ‘वे पानी के फूल हैं, पानी में ही फूलते, महकते, और झड़ते हुए, वे रात भर पानी की आँखों में, रंगीन स्वप्न की तरह रहते हैं, और भोर के धुँधलके में उड़ते हैं, जैसे धरती के प्रार्थना गीत हों।’ लेकिन प्रबल गुरुत्वाकर्षण समुद्र से अधिक पृथ्वी का ही है। बड़ी कथा वही है जो छोटी कथा को अपनी तरफ़ खींचती है ‘जैसे पृथ्वी खींचती है हमें अपने गुरुत्वाकर्षण से, जब हम उससे दूर जाने लगते हैं, वह बचाए रखती है, हमारे पाँवों को विस्थापित होने से।’ इसलिए ‘बीज से फूल तक’ की अधिकांश कविताओं का बीज भाव यह ‘विस्थापन’ ही है जिसमें अपनी धरती और अपने लोगों के प्रति आकर्षण तीव्रतर हो जाता है।
एकान्त वस्तुत: छत्तीसगढ़ की ‘कन्हार’ के कवि हैं और ‘कन्हार केवल मिट्टी का नाम नहीं है’ और यह केवल एक छोटा-सा ‘अंचल’ भी नहीं है क्योंकि ‘देश के किसी भी हिस्से में मिल जाएगा छत्तीसगढ़।’ इस दृष्टि से एकान्त को कोरा ‘आंचलिक’ कवि कहना भी ठीक न होगा। फिर भी ‘बीज से फूल तक’ कविता का ऐसा विशिष्ट अंचल है ‘जहाँ शब्दों की महक से, गमकता है काग़ज़ का हृदय, और मनुष्य की महक से धरती।’ इस प्रसंग में एकान्त यह याद दिलाना नहीं भूलते कि ‘दिन-ब-दिन राख हो रही इस दुनिया में जो चीज़ हमें बचाए रखती है वह केवल मनुष्य की महक है।' इसीलिए उनकी इस उक्ति में सन्देह नहीं होता कि ‘मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ, कि उस सुगन्ध को—जो मिट्टी की देह और मनुष्य की साँस को सुवासित करती है—मैं बचाए रख सका हूँ? हालाँकि दिनों-दिन यह कठिन होता जा रहा है।‘ (बुख़ार)।
‘बीज से फूल तक' का काव्य-संसार एक ओर माँ-बाप, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है तो दूसरी ओर अन्धी लड़की, अपाहिज और बधिर जैसे असहाय लोगों का शरण्य भी और ‘कन्हार’ जैसी लम्बी कविता तो एक तरह से नख-दर्पण में आज के भारत का छाया-चित्र ही है। यदि वे साँस का नगाड़ा बजाते हैं तो उस स्पर्श से भी वाक़िफ़ हैं जिसमें किसी को छूने में उँगलियों के जल जाने की आशंका होती है। इस क्रम में दिवंगत भाई के लिए लिखी हुई कविताएँ सबसे मर्मस्पर्शी हैं, ख़ास तौर से ‘पाँचवें की याद’!
‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरम्भ करनेवाले एकान्त आज भी विश्वास करते हैं कि ‘जहाँ कोई नहीं रहता, वहाँ शब्द रहते हैं।’ आज जब चारों ओर से 'शब्द पर हमला' हो रहा है, एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ दे रहे हैं। निश्चय ही एकान्त का यह तीसरा काव्य-संकलन एक लम्बी छलाँग है और ऊँची उड़ान भी—कवि के ही शब्दों में एक भयानक शून्य की भरपाई।
—नामवर सिंह
Navajeevana Gamyam
- Author Name:
Navajeevan Reddy
- Rating:
- Book Type:

- Description: The book Navajeevana Gayam is about Telugu versus a poetry and is one of the best books of its kind. In this book the author talks about social responsibility, society about its role, life and inspirational talk for all ages, Shiva philosophy, love, life and how to live a successful life, old and new generations, Hinduism and its essence. And every thing is written in a book. Essentially the author used simple everyday language to reach many people.
Ye Ishq Nahi Aasan
- Author Name:
Jigar Moradabadi
- Book Type:

- Description: ये किताब बीसवीं सदी के बेहद लोकप्रिय शायर जिगर मुरादाबादी की ग़ज़लों का संग्रह है। उनकी शायरी ग़ज़ल कहने की पुरानी परम्परा और बीसवीं सदी के मध्य और अन्त की रंगीन-निगारी का ख़ूबसूरत सम्मिश्रण है। वो शायरी में नैतिकता की शिक्षा नहीं देते लेकिन उनकी शायरी का नैतिक स्तर बहुत बुलन्द है। वो ग़ज़ल कहने के पर्दे में इंसानी ख़ामियों पर वार करते गुज़र जाते हैं। उनका कलाम बनावट से रहित और आमद से भरा हुआ है, सरमस्ती और दिल-फ़िगारी, प्रभाव और सम्पूर्णता उनके कलाम की विशिष्टताएँ है। इस किताब में उनके बेहतरीन कलाम को इकठ्ठा किया गया है जो उर्दू ग़ज़ल के हुस्न को ब-ख़ूबी बयान करती हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book