Divya Gandha
Author:
Aadya Swaroop PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 80
₹
100
Unavailable
जैसे पानी तत्त्वत: दो हाइड्रोजन और एक ऑक्सीजन अणु का रासायनिक संयोजन है, उसी प्रकार दो नारियाँ गंगा और सत्यवती समान रूप से दिव्य हैं—एक पारलौकिक मिथकों के आधार पर और दूसरी लौकिक इतिवृत्त के आधार पर।</p>
<p>( इसी पुस्तक की भूमिका से)
ISBN: 9788180316876
Pages: 59
Avg Reading Time: 2 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: प्रेम में डूबा हर व्यक्ति विवाह को ही जीवन का अंतिम ध्येय समझता है। अन्य लोगों के विवाह देखने के बाद भी ऐसा ही सोचता है कि हमारा विवाह दूसरों की अपेक्षा अलग ही होगा! विवाह के बाद के सात वर्षो के दौरान अधिकतर विवाह सामान्य विवाहों जैसे ही हो जाते हैं। रोमांस और आदर्श विवाह की सारी कल्पनाएँ, सारे वचन और प्रतिज्ञाएँ धीरे-धीरे मंद पड़ती जाती हैं। विवाहित जीवन खंडित हो जाने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते पति-पली धीरे-धीरे एक-दूसरे से विपरीत दिशा में प्रवास करने लगते हैं। किसी भी रिश्ते को थोड़ा सँभालने की आवश्यकता होती है। विवाह जैसा नाजुक रिश्ता रख-रखाव एवं समभाव के अभाव में एकदम टूट जाता है। इसके बावजूद विवाह को सफल बनाकर दो व्यक्ति सुख व संतोष से जीवन भर साथ जी सकते हैं। टूट चुके और मृतप्राय हो चुके विवाह भी फिर से नवपल्लवित हो सकते हैं। जरूरत है थोड़ी समझदारी की, थोड़ा स्वीकार करने की, थोड़ी कोशिश और थोड़ा समझौता करने की। यह पुस्तक धीरे-धीरे आपको एक नई दुनिया में ले जाएगी और आपको आपकी गलतियाँ समझाएगी। आप कहाँ और किस प्रकार से गलत थे, यह भी आपके मन को समझाएगी।
Kuchh Rafoo Kuchh Thigare
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

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Description:
“यह तो अच्छा हुआ कि कविता मेरे साथ है/जो यह भरोसा दिलाती है कि/कोई भी पथ कभी समाप्त नहीं होता/और सब कुछ गँवा देने के बाद भी/कुछ बचा रहता है।”
अशोक वाजपेयी की अथक और अदम्य जिजीविषा इन कविताओं में उदास विवेक और आत्मस्वीकार के बीच गहरे संयम के साथ नाजुक ढंग से सन्तुलित है। कुल एक वर्ष की अवधि में लिखी गई ये कविताएँ कई बार उदासी से घिरी होने के बावजूद अपनी पारदर्शिता में उजली और निर्मल हैं। सारे ध्वंस और नाश के विरुद्ध कविता को अपने लिए एकमात्र बचाव माननेवाले इस कवि की भाषा, सयानापन और शिल्प पर सहज अधिकार एक बार फिर सत्यापित करते हैं कि हमारे समय में कविता मनुष्य की हालत, उसकी उलझनों और जीवट का सूक्ष्म बखान करती है और ऐसा करते हुए हमें सचाई में ऐन्द्रिय शिरकत का अवसर देती है।
अशोक वाजपेयी की आवाज़, हमेशा की तरह, निजी और समाजधर्मी एक साथ है और वे लगातार अपने को वेध्य और बेबाक बनाए हुए हैं। उनकी कविता के केन्द्र में साधारण जीवन की आभा और छवियाँ हैं जिन्हें उनकी भाषा अनूठे शब्दालोक और समयातीत आशयों से उद्दीप्त करती है।
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