Prapanchpanchshati
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प्रपंचपंचशती की परिकल्पना एवं रचना एक मुक्तक काव्य के रूप में की गई है। पाँच सौ पद्यों के विस्तार में रचित इस काव्य में प्रपंच रूप जगत् तथा उसके अंशभूत मानव समाज, विशेष रूप से भारतीय समाज की विविध सामयिक प्रवृत्तियों एवं सामान्य जनों के मनोभावों व विचारों का सार रूप में दिग्दर्शन व विवेचन किया गया है। काव्य में जिन विषयों का विचार किया गया है, वे हैं नीति, लोक, प्रकृति, नारी, राजनीति, शिक्षा, वाक्, धन, धर्म, जीवन व मृत्यु, काल आदि। मुक्तक काव्य होने के नाते इसके पद्यों में किसी भी विषय का सांगोपांग तथा शास्त्रीयता से पूर्ण विस्तृत विवेचन नहीं किया गया है। एक ही विषय को लेकर विभिन्न अवसरों पर रचित सभी पद्यों को एक ही विषयसूचक शीर्षक के अंतर्गत संकलित किया गया है। काव्य के नामकरण में प्रपंच शब्द का प्रयोग इसके शास्त्रीय अभिप्राय को लेकर नहीं, अपितु इसके लोक प्रचलित अर्थ को ही लेकर किया गया है। इसमें कहीं सामान्य रूप से वर्णनात्मक, कहीं व्याख्यात्मक तो कहीं व्यंग्यात्मक शैली का आश्रय लिया गया है। जिन विषयों व भावों को इसमें प्रकट किया गया है, वे लेखक की अपनी विचारणा, लोकदृष्टि व जीवनदृष्टि के सूचक हैं।
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प्रपंचपंचशती की परिकल्पना एवं रचना एक मुक्तक काव्य के रूप में की गई है। पाँच सौ पद्यों के विस्तार में रचित इस काव्य में प्रपंच रूप जगत् तथा उसके अंशभूत मानव समाज, विशेष रूप से भारतीय समाज की विविध सामयिक प्रवृत्तियों एवं सामान्य जनों के मनोभावों व विचारों का सार रूप में दिग्दर्शन व विवेचन किया गया है। काव्य में जिन विषयों का विचार किया गया है, वे हैं नीति, लोक, प्रकृति, नारी, राजनीति, शिक्षा, वाक्, धन, धर्म, जीवन व मृत्यु, काल आदि। मुक्तक काव्य होने के नाते इसके पद्यों में किसी भी विषय का सांगोपांग तथा शास्त्रीयता से पूर्ण विस्तृत विवेचन नहीं किया गया है। एक ही विषय को लेकर विभिन्न अवसरों पर रचित सभी पद्यों को एक ही विषयसूचक शीर्षक के अंतर्गत संकलित किया गया है। काव्य के नामकरण में प्रपंच शब्द का प्रयोग इसके शास्त्रीय अभिप्राय को लेकर नहीं, अपितु इसके लोक प्रचलित अर्थ को ही लेकर किया गया है। इसमें कहीं सामान्य रूप से वर्णनात्मक, कहीं व्याख्यात्मक तो कहीं व्यंग्यात्मक शैली का आश्रय लिया गया है। जिन विषयों व भावों को इसमें प्रकट किया गया है, वे लेखक की अपनी विचारणा, लोकदृष्टि व जीवनदृष्टि के सूचक हैं।
Book Details
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ISBN9789386054159
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Pages144
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main">कौतुकपूर्ण सृजन का अतिरेक आपको उन्मत्त कर सकता है, लेकिन सामूहिक चेतना में जो कुछ भी छिपा रहता है, उसे केवल अनछुए सच का इलाक़ा ही बाहर निकालता है। यह केवल सृजन का विवेक ही है जो इस अनछुए को चमकाता है। सुप्रसिद्ध अवधी कवि मलिक मुहम्मद जायसी पर लिखी अरुण देव की कविता इसी तरह आपको बाँध लेती है। अवधी कविता के इस महाचितेरे कवि जायसी की स्मृतियों को कवि नाना अर्थ छवियों से टहोकता चलता है और जायसी की काव्यात्मक शख़्सियत से जुड़े अनुत्तरित सवालों की तरफ़ हमारा ध्यान खींचता है। अपनी कविताओं—‘चाहत’, ‘रफ़ी के लिए’ और ‘विज्ञापन और औरत’—में अरुण देव समकालीन जीवन के तमाम घुमाव-पेचोख़म को एक साथ पकड़ने की कोशिश करते हैं। नरेटर चिर-परिचित यथार्थ से जूझते हुए उससे परे जाना चाहता है जिसे रोज़ बदलते सामाजिक मूल्यों ने जकड़ रखा है। अरुण देव उबाऊ क़िस्म के लम्बे विवरणों से बचते हैं और उस संवेदनशीलता का ध्रुवीकरण करते चलते हैं जो दमघोंटू नहीं है। कविताओं में कवि विषयासक्ति की चकाचौंध और निरी भावुकता से बचता चलता है। वह हाज़िर जवाब है। स्थिर उबाऊ टेकों के लिए उसके यहाँ कोई जगह नहीं। उसकी कविताएँ चाक्षुष बोध की कविताएँ हैं। विश्लेषी बोध की नहीं। ये कविताएँ हमें यथार्थ से रूबरू कराती चलती हैं और इनमें किसी भी तरह की भावोत्तेजना का घोल नहीं। उनकी तीखी व्यंजनाएँ आत्म-दया में तिरोहित नहीं होतीं और उनकी बहुत–सी कविताएँ प्रेम-बोध की कविताएँ हैं जिनमें शनै:-शनै: प्रेम का स्वर धीमा होता जाता है और मूलभाव उभरकर सामने आता है। अरुण देव की कविताएँ मानव मन की थाह लेती हैं और अपनी व्यंजनाओं में जीवन की विषमताओं को पचाती चलती हैं। उनके लिए कविता ही एकमात्र साधन है जो हमें मुक्त करता है। —शफी किदवई, द हिन्दू
Gungunati Nrityamay Kavitayen
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Pedon Ki Chhaon Mein
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Varuna Ka Hona
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Mirza Ghalib
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Mirza Ghalib
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- Description: हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है आख़िर इस दर्द की दवा क्या है इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’ कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे
Kavitayen : Vol. 1
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Sarveshwardayal Saxena
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