Zindan-Nama
Author:
Faiz Ahmed 'Faiz'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Unavailable
मुहब्बत और इनक़लाब की तरफ़दारी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शाइरी का बुनियादी स्वर है और रोमान इस शाइरी के तेवर का ख़ास पहलू। प्रगतिशील मूल्यों की तरफ़दारी करनेवाली इस शाइरी के असर का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि फ़ैज़ के जीते-जी यह उनके मुल्क और भाषा की सरहदों को पार कर दुनिया-भर के शोषित-पीड़ित अवाम की आवाज़ बन गई। और यह सिलसिला आज भी जारी है। ‘ज़िन्दाँनामा’ का इस सन्दर्भ में विशेष महत्त्व है।
यह फ़ैज़ का तीसरा कविता-संग्रह है, उनके दूसरे कविता-संग्रह ‘दस्ते-सबा’ की तरह उनके जेलख़ाने की यादगार। यह संग्रह इस बात का एक और साक्ष्य है कि फ़ैज़ जिन उसूलों की बात कर रहे थे, वे उनके लिए सिर्फ़ ख़याल तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनके लिए उन्होंने क़ैद भी काटी। और दमन के तमाम वार झेलते हुए भी उनकी आवाज़ की बुलन्दी क़ायम रही। इसमें शामिल अधिकतर चीज़ें जुलाई 1953 से मार्च 1955 के बीच की हैं, जिस दौरान फ़ैज़ मांटगुमरी सेंट्रल जेल और लाहौर सेंट्रल जेल में क़ैद थे। तब बाहरी दुनिया से दूर हो जाने के कारण चिन्तन-मनन के लिए जो मोहलत मिल गई थी, उसने उनके ख़यालों की सुर्ख़ी और बढ़ा दी। इस संग्रह की एक यादगार बात यह भी है, इसकी प्रस्तावना प्रगतिशील आन्दोलन की दिग्गज हस्ती और फ़ैज़ के मित्र सैयद सज्जाद ज़हीर ने लिखी है।
ISBN: 9789389598445
Pages: 112
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Samay Shabd Aur Main
- Author Name:
Krishnkant Nilose
- Book Type:

- Description: Book
Awara Tishnagi
- Author Name:
Purnendu Kumar Singh
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Rasoi Ki Khidki Mein
- Author Name:
Sunita Jain
- Book Type:

- Description: Poems by Sunita jain
Shrikant Verma Sanchayita
- Author Name:
Udyan Vajpeyi
- Book Type:

- Description: श्रीकान्त वर्मा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी के सम्भवत: सबसे ऊर्जस्वित लेखकों में हैं। वे मूर्धन्य कवि हैं, सटीक कहानीकार हैं, और अनोखे उपन्यासकार। वे उन विरले कवियों में हैं जिन्होंने अपने भीतर से होकर बहती पिघलते लोहे-सी काव्य-धारा को पूरे धीरज से सहा और उसे बिल्कुल नए काव्य-विन्यासों में ढाला। यह भी सच है कि कई बार इस पिघले लोहे के-से काव्य-आवेग ने उन्हें धीरज बरत सकने का अवकाश नहीं दिया या शायद अपने घुमड़ते काव्य-आवेग के आगे कवि का धीरज निष्फल हो गया लेकिन तब यह काव्य-आवेग या काव्य-संवेदन उन्हीं की कविताओं के सुघड़ विन्यासों में आसपास, यहाँ-वहाँ चिनगारियों की तरह बिखर गया। शायद इसीलिए उनकी कविताएँ उनके काव्य-संयम और काव्य-असंयम का विलक्षण साक्ष्य और फलन हैं। उनके धीरज और उनकी हड़बड़ी दोनों का पारदर्शी अंकन। ऊर्जस्वित कवि होने के साथ-साथ श्रीकान्त वर्मा पक्के गद्यकार भी हैं। उनका गद्य गद्य की सारी शर्तों पर खरा उतरता गद्य है। उसमें वाक्य-सौन्दर्य है पर ‘कवितायी’ नहीं, उसमें विवरण हैं पर फिजूल ढीलापन नहीं। शायद इतना कसा हुआ गद्य बहुत कम लेखकों ने लिखा होगा। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास, यात्रा-वृत्तान्त और निबन्ध लिखे हैं। श्रीकान्त वर्मा शायद हिन्दी में कविता के सर्वश्रेष्ठ अनुवादक भी रहे हैं। उन्होंने कई रूसी, जर्मन, जापानी, फ्रांसीसी, हंगारी और मैक्सिकन कविताओं के अनुवाद किए। इस संकलन में उनमें से कुछ अनुवादों को भी शामिल किया जा रहा है।
Kavi ka shahar
- Author Name:
Rakesh Mishra
- Book Type:

-
Description:
ग्राम, शहर, प्रकृति और प्रेम इन कविताओं में बराबर-बराबर मात्रा में है और उनकी अपनी-अपनी पीड़ाएँ भी। यानी कवि की आँख हर कहीं खुली है और कोई भी ऐसा दृश्य जो मानवीय विडम्बना को धारण किए हुए है—उनकी कलम से अछूता नहीं रहता। दुख हर कहीं है, देह में भी और धरती में भी। जितना खोदो, जहाँ तक खोदो, दुख ही दुख। ये कविताएँ इसी खुदाई में निकला खनिज हैं।
कवि अगर इस दुनिया में उन लोगों को देख पाता है जो ‘मरने के काम पर हैं’ तो कहना चाहिए कि उन्हें मौजूदा सभ्यता के बहुत भीतर की किसी व्याधि का भी पता है, जिसने जीवन और संसार को यातना और मृत्यु की एक मशीन-भर बना छोड़ा है। ‘पुताई वाले लड़के’ कविता में भी उनकी यह तीक्ष्ण दृष्टि दिखाई पड़ती है। बेहद चित्रात्मक इस कविता में वे जब बताते हैं कि ‘घड़ी किसी के पास नहीं/पुताई के क्षेत्रफल से नापते हैं/समय’ तो यह जैसे हमारे इस समय की तमाम विद्रूपताओं पर एक टिप्पणी मालूम पड़ती है।
‘जब तक हम जान पाते/क्यों हुआ था पिछला युद्ध/उससे पहले ही शुरू हो जाता है। अगला युद्ध’—‘युद्ध’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ सभ्यता-समीक्षा की इसी प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाती हैं जो राकेश मिश्र के इस नए संग्रह की लगभग सभी कविताओं का उद्देश्य है।
ये कविताएँ अपनी विषयवस्तु में जीवन और सभ्यता के एक बड़े फलक को समेटती हैं, और हर बिन्दु से मानवीय मूल्यों के अभाव को रेखांकित करती हुईं हमें आत्मनिरीक्षण के लिए उकसाती हैं। एक कविता में वे चेताते भी हैं कि ‘नहीं बोलने की आदत/धीमे से छीन लेती है/सुनने की शक्ति भी।’
Shrikant Verma Rachanawali : Vols. 1-8
- Author Name:
Shrikant Verma
- Book Type:

- Description: श्रीकान्त वर्मा मुक्तिबोध की पीढ़ी के बाद के कवियों में अन्यतम बेचैन और उत्तप्त कवि इस माने में ज़्यादा हैं कि उन्होंने अपनी कविता के ज़रिए न केवल अपने समय का सीधा, तीक्ष्ण और अन्दर तक तिलमिला देनेवाला भयावह साक्षात्कार किया, बल्कि हर अमानवीय ताक़त के विरुद्ध एक निर्मम और नंगी भिड़ंत की। इसीलिए उनकी कविता में नाराज़गी, असहमति और विरोध का स्वर सबसे मुखर है। उनकी कविता उस दर्पण की तरह है, जहाँ कोई झूठ छिप नहीं सकता। उनकी कविता हर झूठ के विरुद्ध कहीं प्रतिशोध है तो कहीं सार्थक वक्तव्य। शायद इसीलिए वे सन् 60 के बाद की कविता के हिन्दी के पहले नाराज़ कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। वे एक ओर मानवीय संवेदना के गहन ऐन्द्रिक प्रेम और क्षोभ के विरल कवि हैं तो दूसरी तरफ़ सामाजिक कर्म की कविता में नैतिक क्षोभ से उपजे सामाजिक हस्तक्षेप के दुर्लभ कवि हैं। वे उत्तर खोजने के बजाय प्रश्न खड़े करनेवाले कवि हैं। ‘भटका’ मेघ से शुरू हुई श्रीकान्त वर्मा की काव्य–यात्रा ‘माया दर्पण’, ‘दिनारंभ’ और ‘जलसाघर’ से गुज़रते हुए एक ऐसी कवि की दुनिया है जहाँ बीसवीं शताब्दी के मनुष्य की अपने समय से सीधी बहस है। कवि दूसरे से उलझने के बजाय स्वयं से प्रश्न करता है जहाँ उसके आत्माभियोग और आत्म–स्वीकार का स्वर सबसे मूल्यवान है। ‘मगध’ और ‘गरुड़ किसने देखा है’ एक ऐसे कवि की अथाह करुणा की पुकार है जो युग–संधि पर खड़ा अपने समय के मनुष्य, समाज, राजनीति, इतिहास और काल को बहुत निर्मम होकर बेचैनी के साथ देखते हुए मनुष्य और समाज की नियति को परिभाषित कर रहा है। इसीलिए ‘मगध’ समकालीन व्यवस्था का मर्सिया भर नहीं है बल्कि समय, समाज और व्यवस्था के विरुद्ध एक सीधा हस्तक्षेप है। इस खंड में पहली बार श्रीकान्त वर्मा की सम्पूर्ण प्रकाशित–अप्रकाशित, संकलित–असंकलित कविताओं का संचयन किया गया है जिसमें दर्ज है—एक कवि का सम्पूर्ण संसार जो अनेक संसारों में फैला हुआ है। इसके अतिरिक्त इस खंड में पुस्तकों की भूमिकाएँ, सम्पादकीय और अपने समकालीनों के साथ दो महत्त्वपूर्ण संवाद भी मौजूद हैं।
Band Raston Ka Safar
- Author Name:
Anamika
- Book Type:

-
Description:
अनामिका की कविताएँ कवि की प्रतिक्रियाओं से नहीं बनतीं, सदेह, चलते-फिरते-जीते लोगों के जीवन-संवाद से निकलती हैं। सड़कों-चौराहों-घरों-दफ़्तरों में जीवन की ज़िद में जुटी इच्छाओं और हताशाओं, उम्मीदों से रचा-बसा एक बड़ा मनुष्यरचित संसार उनकी कविताओं में सदेह दिखाई देता है।
इस संग्रह में भी बहुत कम ऐसी कविताएँ हैं जिनमें हमें साधारण लेकिन चेतना-समृद्ध पात्र नहीं मिलते। हर कविता का एक भौतिक संसार है जो हमें वापस अपने आसपास के जीवन की तरफ़ देखने को उकसाता है। नंगे पैरों भुट्टे बेचनेवाली बच्ची हो जिसके पीछे कवि का हृदय जूता होकर चलता है, महिषासुर के नाखून काटकर, नहला-धुलाकर, दफ़्तर भेजनेवाली ‘घरेलू दुर्गा’ स्त्री हो, फ़ोन पर बातचीत करतीं, अपने जीवन को थाहती वृद्धा बहनें हों, कोरोना के आइसोलेशन वार्ड के भीतर की दुनिया के लोग हों, पैदल घर जाते मज़दूर, आन्दोलन करते किसान हों, कश्मीर में अपनी विरासत को उजड़ते-सूखते देखते बच्चे-बूढ़े हों, हिंसक पौरुष के सम्मुख चीख़ती आसिफ़ा हो या रीतिकालीन काव्य-समयों से बहस करती आधुनिक स्त्रियाँ, यहाँ पात्रों की एक महाकाव्यात्मक मौजूदगी है।
आधुनिक संसार के वे बिम्ब जिन्हें हम अपने दैनन्दिन दृश्यों के नगण्य हिस्सों के रूप में अर्थहीन जानकर आगे बढ़ जाते हैं, अनामिका की करुणार्द्र काव्येषणा अपनी सूफ़ियाना छुअन से उनका उदात्तीकरण जीवन-प्रवाह के अनन्त में एक निर्णायक तत्त्व के रूप में कर देती है–शब्दों से ऐसे काम लेती हुई जैसे बिगड़ैल बच्चों को काम पर लगाती कोई माँ। दादियों, नानियों, पुरखा स्त्रियों की निष्कलुष चेतना के सातत्य में उनकी आज की स्त्री अपना पुनर्संधान करती है और स्त्रियों के बहुकेन्द्रिक दुख को सभ्यता परिवर्तक महाभाव में तब्दील कर देती है।
भाषा का व्यवहार अनामिका के यहाँ एक स्वतंत्र घटक के रूप में हमेशा मौजूद रहता है। वह इन कविताओं में और सधकर आया है। भाषा उनके लिए सिर्फ़ कहने का साधन-भर नहीं, स्वयं एक चरित्र भी है जिसकी एक भुजा लोक से जुड़ती है तो दूसरी कवि के अपने ध्वनि-बोध से। उनकी यह विशेषता इस संग्रह में और निखरकर आई है।
Gramya
- Author Name:
Sumitranandan Pant
- Book Type:

- Description: ‘ग्राम्या’ में मेरी ‘युगवाणी’ के बाद की रचनाएँ संगृहीत हैं। इनमें पाठकों को ग्रामीणों के प्रति केवल बौद्धिक सहानुभूति ही मिल सकती है। ग्राम जीवन में मिलकर, उसके भीतर से, ये अवश्य नहीं लिखी गई हैं। ग्रामों की वर्तमान दशा में वैसा करना केवल प्रतिक्रियात्मक साहित्य को जन्म देना होता। 'युग', 'संस्कृति' आदि शब्द इन रचनाओं में वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए प्रयुक्त हुए हैं, जिसे समझने में पाठकों को कठिनाई नहीं होगी; ‘ग्राम्या’ की पहली कविता 'स्वप्न पट' से यह बात स्पष्ट हो जाती है।
Teri Ankhon Mein Raat Doobi Hai
- Author Name:
Osho Nilanchal
- Book Type:

-
Description:
आम इंसान की नज़र संसार को देखती है तो उस घटनाओं, व्यक्तियों के प्रति नफ़रत, दुख, क्रोध जैसे विभिन्न भाव पैदा होते हैं मगर जब ये नज़र प्रेम की नज़र बन जाती है तो उसमें संसार की हर वस्तु के प्रति शुकराने का भाव पैदा होता है। और हर पदार्थ के पीछे उसी ऊर्जा, अनवारे-इलाही आदि शक्ति नज़र आने लगती है। फिर तो महबूब में, मुर्शिद में, दोस्त में, दुश्मन में जन्म में, मृत्यु में, उसी अनवारे-इलाही का जलवा नज़र आने लगता है। यही बात है कि मजन का प्यार किसी संत की इबादत से कम नहीं।"तेरी आँखों में रात डूबी है" की ये ग़जलें जहाँ आफिस में काम करने वाली प्रेमिका, संसार से उकताये हुए आदमी, बेटी के प्रति प्रेम में डूबे पिता, विश्व समाज के बदलते हुए परिवेश की मंज़रकशी करती हैं, वहीं इन ग़ज़लों में भाषा की सादगी के साथ जुबान की दिलकश पेशगोई है। ये ग़ज़लें और नज्में एक प्रेमी, एक कामगार, एक साधक की भावनाओं का आईना है साथ ही शरीर और मन के पार रुहानी संसार की तरफ़ भी इशारे करती हैं सूफ़ियाना नज़र देती हैं। निश्चित रूप से इन नज्मों में ऐसा बहुत कुछ है जहाँ से हर इंसान को कभी न कभी गुज़रना है, ठहरना है।
सुर्ख खंजर लिये पीछे है हुजूमे-कातिल
शहरे-जाना से मगर होते भी रुखसत न बनें
क्योंकि ये शहरे-जाना है, परमात्मा का नगर है ये जगत। हमें इसमें जीना है और आनन्दपूर्ण जीना है। ये ग़जलें सुख-दुख के दो किनारों से आगे नये जश्न के सफ़र की तरफ़ ले जा रहीं हैं और उत्सव में जीने का मंगल सन्देश हैं।
Rekhta ke Insha
- Author Name:
Inshallah Khan Insha
- Book Type:

- Description: "रेख़्ता क्लासिक्स" सीरीज़ उर्दू के क्लासिकी शायरों के प्रतिनिधि शायरी को नए पाठकों तक पहुँचाने के एक अनूठा प्रयास है। प्रस्तुत किताब में इंशाअल्लाह इंशा की प्रतिनिधि शायरी है जिसका संकलन फ़रहत एहसास साहब ने किया है।
Sipi Mein Shankhnad
- Author Name:
Sangeeta Mishra
- Book Type:

- Description: ‘सीपी में शंखनाद’ की कविताओं को आधुनिक स्त्री-विमर्श में एक भारतीय हस्तक्षेप की तरह देखा जा सकता है। इन कविताओं में उस स्त्री के दुःख और संघर्ष व्यक्त हुए हैं जो परम्परा से विच्छिन्न होकर नहीं, उसमें परिवर्तन करते हुए आगे बढ़ना चाहती है, पुरुष को एक नए रूप में ढालना चाहती है, एक ऐसी इकाई के रूप में जो स्त्री होने के अर्थ को समझ सके। अपने समय, समाज और परिवेश की देखी-जानी स्थितियों को नई दृष्टि से देखने की क्षमता प्रदान करने वाली ये कविताएँ उन स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो पुरुष द्वारा रचे गए भेद-विभेद को अपने सूक्ष्म प्रयासों से अनहुआ कर देना चाहती हैं। इन कविताओं से पाँच वर्ष की वह बच्ची भी झाँकती है जिसकी कटोरी में चावल का पानी और उसके भाई के सामने दूध का कटोरा है, वह किशोरी भी जिसकी पढ़ाई छुड़ाकर उसे किसी पुरुष को सौंप दिया जाता है, वह वयस्क स्त्री भी जिसकी कोख को पाँचवीं बेटी को जन्म देते ही कलुषित घोषित कर दिया जाता है, वह पचास वर्षीय प्रौढ़ा भी जिसके बच्चे बूढ़ी कहकर उसका मखौल उड़ाते हैं। यह काव्य-गाथा पूछती है कि क्या स्त्री होना दोयम दर्जे का मनुष्य होना है? स्त्री-विमर्श इस कविता का आधार है लेकिन थोड़ा भिन्न रूप में। स्त्री यहाँ प्रकृति है जो पुरुष के साथ अभिन्न होकर जुड़ी है। ये कविताएँ स्त्री की उस सोच को भी स्वर देती हैं जो बदल रही है, जो पुरुष जैसी होकर नहीं बल्कि स्त्री होकर ही उस अन्याय को ग़ैर-ज़रूरी बना देती है जो बरसों से ज़ारी है।
Ujar Mein Sangrahalaya
- Author Name:
Chandrakant Devtale
- Book Type:

-
Description:
चन्द्रकान्त देवताले की कविताएँ भवानीप्रसाद मिश्र के इस स्वर्णाक्षरों में उत्कीर्ण किए जाने योग्य वक्तव्य का अप्रतिम उदाहरण बनती नज़र आती हैं कि जो अभी की कविता नहीं है वह कभी की कविता नहीं हो पाएगी। चन्द्रकान्त देवताले जिस तरह हमारे समाज, देश और राजनीति ही नहीं, सारे वैश्विक परिदृश्य पर अपलक तथा पैनी निगाह रखे हुए कवि हैं, वह सिर्फ़ एक अद्वितीय जागरूकता ही नहीं, मुक्तिबोध, नागार्जुन और रघुवीर सहाय जैसी मानव–केन्द्रित नैतिकता से युक्त और ग़ैर–बराबरी तथा अन्याय से मुक्त दुनिया बनाने की आस्था और उसे पाने के संघर्ष की ईमानदार तथा साहसिक मिसाल भी है। कवि जानता है कि समय तारीख़ों से नहीं बदला करता हम एक ऐसी ‘सभ्यता’ में हैं जो उजाड़ में उस संग्रहालय की तरह है जिसकी प्रेक्षक–पुस्तिका में दर्ज़ टिप्पणियों से आप कभी यथार्थ को जान नहीं सकते, जहाँ चीज़ों पर वैधानिक चेतावनियाँ लिखकर सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्ति पा ली गई है और अन्त में हर अज्ञात व्यक्ति से सावधान रहने की हिदायत देकर आदमी को आदमी के ख़िलाफ़ तैनात कर दिया गया है।
इस कविता का केन्द्रीय शब्द है ‘हिंसा’ जैसी रचना हमें दो टूक आगाह करती है कि चन्द्रकान्त का कवि–कर्म क्या है, कवि कविता से कितना–क्या चाहता है और कविता तथा जीवन में काहे से गुरेज़ नहीं करता। ‘कवियों की छुट्टी’, ‘क्षमाप्रार्थी हों कविगण’, ‘तुका और नामदेव’ तथा ‘कविता पर रहम करो’ काव्य–कला पर कविताएँ नहीं हैं बल्कि चन्द्रकान्त के आत्मालोचन और व्यापक रचनाधर्मिता को लेकर उसकी अदम्य प्रतिबद्धता को अभिव्यक्ति देती हैं। जीवन–भर पढ़ने–पढ़ाने तथा साक्षरता एवं पुस्तकालय आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी का असर उसकी करिश्मे भी दिखा सकती हैं अब किताबें और किताबों की दुकान में जैसी रचनाओं में देखा जा सकता है जो पुस्तकों की मात्र उपस्थिति से हर्षित होनेवाली हिन्दी की शायद पहली अशाले कविताएँ हैं वे पुस्तकें जिन्हें आज़ादी के बाद से उत्तरोत्तर हमारे समाज से ग़ायब करने का राष्ट्रीय षड्यंत्र अब भी जारी है। इसी तरह शिक्षकों को लेकर लिखी गई नोटबुक से (एक) तथा (दो) कविताएँ हिन्दी में कदाचित् अपने ढंग की पहली ही होंगी। ये सब चन्द्रकान्त की कविता के नए आयाम हैं।
इस पर पहले भी ध्यान गया है कि चन्द्रकान्त देवताले ने स्त्रियों को लेकर हिन्दी में शायद सबसे ज़्यादा और सबसे अच्छी कविताएँ लिखी हैं लेकिन यहाँ उनकी कुछ ऐसी रचनाएँ हैं जो माँ और आजी की दुनियाओं और स्मृतियों में जाती हैं, किन्तु वहीं तक सीमित नहीं रहतीं—वहाँ एक कैंसर–पीड़ित ज़िलाबदर औरत है, बलात्कार के बाद तीन टुकड़ों में काटकर फेंकी गई युवती है, और चन्द्रकान्त अचानक एक विलक्षण परिहास–भावना का परिचय देते हुए मध्यवर्गीय ‘बहनजी–आंटीजी’ छाप प्यारी–प्यारी महिलाओं पर औसतपन और बुद्धिमत्ता के बीच, हिदायतें देने और निगरानी रखनेवाली बीवियाँ, कन्या महाविद्यालय की मैडमों से एक प्राचार्य की बातचीत, ‘मैं आपके काम का आदमी नहीं’ और ‘नींबू माँगकर’ जैसी अनूठी कविताएँ भी लिख डालते हैं—कवयित्रियों में सिर्फ़ निर्मला गर्ग ने ऐसा किया है। देवी–वध में चन्द्रकान्त ने दुस्साहसिकता से देवी–प्रतिमाओं को डायनों और बाज़ार में बैठनेवाली औरतों में बदलते देखा है जबकि ‘बाई! दरद ले’ जैसी मार्मिक कविता में मानो कवि स्वयं उन औरतों में शामिल हो गया है जो अपनी एक सहकर्मी श्रमजीवी आसन्नप्रसवा बहन से प्रसूति–पीड़ा उपजाने को कह रही हैं।
समाज की हर करवट, उसकी तमाम क्रूरताओं और विडम्बनाओं को पहचानने वाली चन्द्रकान्त देवताले की यह प्रतिबद्ध कविताएँ दरअसल भारतीय इनसान और भारतीय राष्ट्र के प्रति बहुत गहरे, यदि स्वयं विक्षिप्त नहीं तो विक्षिप्त कर देनेवाले प्रेम से विस्फोटित कविताएँ हैं। दरअसल कबीर से लेकर आज के युवतम उल्लेख्य हिन्दी कवि–कवयित्रियों की सर्जना के केन्द्र में यह समाज और यह देश ही रहा है। यह देश को खोकर प्राप्त की गई नकली आधुनिक या उत्तर–आधुनिक कविता नहीं है, एक सार्थक देश को पाने की कोशिश की तकलीफ़देह सच्ची कविता है। चन्द्रकान्त देवताले जैसे सर्जक अपनी कविताओं के ज़रिए वही काम करते नज़र आते हैं जो 1857–1947 के बीच और उसके बाद भी सारे असली वतनपरस्तों ने किया है।
यदि चन्द्रकान्त देवताले अपनी जन्मतिथि प्रकट न करें तो उनके किसी भी नए या पुराने पाठक को उनकी यह कविताएँ पढ़कर ऐसा लगेगा कि वे अधिकतम किसी चालीस–पैंतालीस की उम्र के सर्जक की रचनाएँ हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि (हमारे कुछ दूसरे कथित वरिष्ठ कवियों की तरह) उनका विकास अवरुद्ध हो गया है या वे अपनी श्लथ रचनात्मकता के एक लम्बे हाँफते हुए पठार पर पहुँच गए हैं, बल्कि यह कि अभी भी उनकी दृष्टि, अनुभूति तथा ऊर्जा में कोई कमी या छीजन आना तो दूर, उलटे उनके तज्रिबों और निगाह का दायरा और विस्तार पाता जा रहा है। कई कवि एक ख़ास आयु तक आते–आते सहिष्णु, समझौतावादी और परलोकोन्मुख हो जाते हैं क्योंकि हमारे यहाँ एक समन्वय एवं आशीर्वाद वाली सिद्ध मुद्रा प्रौढ़ता की पराकाष्ठा मानी गई है लेकिन चन्द्रकान्त के पास यह कहने की हिम्मत है : “मैं जानता हूँ कि मर रहा हूँ/फिर भी मुझे ईश्वर की ज़रूरत नहीं/क्योंकि धरती की गन्ध और समुद्र का नमक/हमेशा मेरे साथ हैं.../जब सीढ़ियाँ चढ़ता हूँ सबके सुख–दु:ख में शामिल/तो जीवन का संग्राम मेरी धड़कनों में झपट्टे मारने लगता है/पत्थरों के इसी संगीत में मुझे/कुछ भविष्यवाणियाँ सुनाई दे रही हैं...
—विष्णु खरे
Aahaten Aas Paas
- Author Name:
Pankaj Singh
- Book Type:

-
Description:
पंकज सिंह हैं। उनके एप्रोच से मतभेद हो सकता है : एक हद तक। लेकिन उनकी एक उत्कट आकांक्षा, कुछ यथार्थ को व्यक्त करने की, और उस यथार्थ से गुथने की—इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यह कुछ ऐसी है जैसी कि मुक्तिबोध ने की थी अपने ज़माने में बहुत मेहनत से। उस यथार्थ को व्यक्त करने की। यथार्थ को व्यक्त करना कलाकार का बहुत ही पहला और बहुत ही बुनियादी धर्म है, और उस धर्म में वह कामयाब ही हो, यह ज़रूरी नहीं है। लेकिन ऐसी कोशिश और उस कोशिश में किसी हद तक भी कामयाब होना मेरे लिए बड़ी आदरणीय चीज़ होती है। तो उसमें विभिन्न रूप से विभिन्न दृष्टियों से जो कवि संलग्न है और उसमें अगर काव्य के स्तर पर काव्याभिव्यक्ति के स्तर पर कुछ किया है उन्होंने तो उसका आदर होना चाहिए और मैं उनका आदर करता हूँ...
—शमशेर बहादुर सिंह
(‘पूर्वग्रह’, जनवरी-अप्रैल, 1976)
Boli Baat
- Author Name:
Shriprakash Shukla
- Book Type:

-
Description:
‘बोली बात’ युवा कवि श्रीप्रकाश शुक्ल का दूसरा काव्य-संकलन है जिसमें कवि ने न सिर्फ़ अपनी विकास यात्रा को रेखांकित किया है, बल्कि समाज और उसके जन-जीवन के प्रति अपनी सरोकारों को और भी गहरे ढंग से जताया है। संग्रह में शामिल ‘ग़ाज़ीपुर’ कविता की ये पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से बताती हैं कि कवि अपने आसपास को कितनी संवेदनशीलता के साथ ग्रहण कर रहा है: “यह एक ऐसा शहर है/जहाँ लोग धीरे-धीरे रहते हैं/और धीरे-धीरे रहने लगते हैं/यहाँ आनेवाला हर व्यक्ति कुछ सहमा-सहमा रहता है/कुछ-कुछ अलग-अलग रहता है/जैसे उमस-भरी गर्मी में दूसरे का स्पर्श/लेकिन धीरे-धीरे ससुराल गई महिला की तरह/जीना सीख लेता है।”
कवि का पहला संकलन कुछ वर्ष पहले आया था, जिसका नाम था—‘जहाँ सब शहर नहीं होता’। ‘बोली बात’ पिछले संग्रह के नाम से ध्वनित होनेवाली भाव-भूमि और दृष्टि-भंगिमा का ही अगला सोपान है, यह कहा जा सकता है। एक नए कवि का दूसरा संग्रह एक तरह से उसके विकास की कसौटी भी होता है और इस संग्रह की कविताओं को देखते हुए यह आश्वस्तिपूर्वक कहा जा सकता है कि इस संग्रह में काफ़ी कुछ ऐसा है जो कवि के रचनात्मक विकास की ओर ध्यान आकृष्ट करता है और कहें तो प्रमाणित भी। इस पूरे संग्रह को एक साथ पढ़ा जाए तो इसकी एक-एक कविता के भीतर से एक ऐसी दुनिया उभरती हुई दिखाई पड़ेगी, जिसे समकालीन विमर्श की भाषा में ‘सबाल्टर्न’ कहा जाता है। संग्रह की पहली कविता ‘हड़परौली’—इसका सबसे स्पष्ट और मूर्त्त उदाहरण है। इस प्रवृत्ति को सूचित करनेवाली एक साथ इतनी कविताएँ यहाँ मिल सकती हैं, जो कई बार एक पाठक को रोकती-टोकती-सी लगें। पर एक अच्छी बात यह है कि इसी के चलते अनेक नए देशज शब्द भी यहाँ मिलेंगे, जिन्हें पहली बार कविता की दुनिया की नागरिकता दी गई है।
कुल मिलाकर यह एक ऐसा संग्रह है जो अपने खाँटी देसीपन के कारण अलग से पहचाना जाएगा। कविता के एक पाठक के रूप में मैं यह निस्संकोच कह सकता हूँ कि इस विशिष्टता के अलावा भी यहाँ बहुत कुछ मिलेगा जो कविता-प्रेमियों को आकृष्ट करेगा और बेशक आश्वस्त भी।
—केदारनाथ सिंह
Koi To Jagah Ho
- Author Name:
Arun Dev
- Book Type:

-
Description:
अरुण देव अपने संयत स्वर और संवेदनशील वैचारिकता के नाते समकालीन हिन्दी कविता में अपनी जगह बना चुके हैं। यह संकलन उनकी काव्य-दक्षता और संवेदना के और प्रौढ़ तथा सघन होने का प्रमाण है। ये कविताएँ आशंका के बारे में हैं, उम्मीद के बारे में हैं। स्मरण-विस्मरण के बारे में, स्त्रियों के बारे में और प्रेम के बारे में हैं। स्त्रियों के बारे में अरुण देव की कविताएँ अपनी वैचारिक ऊर्जा और ईमानदार आत्मान्वेषण के कारण अलग से ध्यान खींचती हैं। उनकी कविताओं में, प्रेम आत्मान्वेषण करता दिखता है, ख़ुद के बारे में असुविधाजनक सवालों से कतराता नहीं।
अरुण देव की कविताओं में पूर्वज भी हैं, और किताबें भी, जो—‘नहीं चाहतीं कि उन्हें माना जाए अन्तिम सत्य’। ये कविताएँ उस सत्य के विभिन्न आख्यानों से गहरा संवाद करती कविताएँ हैं जो लाओत्जे और कन्फूशियस के संवाद में ‘झर रहा था/पतझर में जैसे पीले पत्ते बेआवाज’।
अरुण देव की कविताओं से गुज़र कर कहना ही होगा, ‘अब भी अगर शब्दों को सलीके से बरता जाए/उन पर विश्वास जमता है’।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Boond Boond Ghazal
- Author Name:
Dr. Vinod Prakash Gupta 'Shalabh'
- Book Type:

-
Description:
डॉ. विनोद प्रकाश गुप्ता 'शलभ' की ग़ज़लें इन अर्थों में विशिष्ट हैं कि इनका शाइर विस्तृत जीवन-अनुभव के साथ-साथ सूक्ष्म निरीक्षण और विश्लेषणात्मक विवेक से परिपूर्ण है। जहाँ एक तरफ़ वह विविधता के विराटत्व से विचलित न होकर उसमें निर्भीकतापूर्वक वास करते हुए उसी के सार से अपने सृजन को रूप-रंग देने की कला से परिचित है तो दूसरी तरफ़ वह सूक्ष्म से सूक्ष्म तथ्य की परख और उसके सम्पूर्ण सत्य के विभिन्न आयामों को भी उजागर करने में सक्षम है।
‘बूँद-बूँद ग़ज़ल’ के शाइर की मान्यताएँ, मंतव्य और सपने भी ठोस धरातल पर खड़े प्रतीत होते हैं, जहाँ संशय के लिए कोई स्थान नहीं है। वह पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ अपनी जीवन-दृष्टि का खुलासा करता है, पूरी शक्ति से अपने पक्ष का समर्थन करता है और विपक्ष को ललकारता है। इसी से शाइर का आत्मविश्वास पाठक का आत्मविश्वास बन जाता है।
खरापन इन ग़ज़लों का प्राण है। इस संग्रह के अश’आर समकालीन पीढ़ी के सरोकारों की दूर-दूर तक फैली ज़मीन पर हिरणों की तरह कुलाँचे मारकर आपका ध्यान कभी इस ओर तो कभी उस ओर खींचते हैं। जीवन्तता ‘शलभ’ जी के सम्पूर्ण साहित्य को तरंगित रखती है। इन ग़ज़लों में स्थायी आकर्षण उत्पन्न करने के पर्याप्त तत्त्व उपलब्ध हैं और इसी कारण पाठक अश’आर से जुड़ जाता है और जुड़ा रहता है।
‘शलभ’ जी की शब्दावली और संवेदनाओं के सूत्र जगह-जगह पाठक को चौंकाते हैं। ग़ज़ल कहने की उनकी शैली में अनोखे शब्दचयन और शब्दक्रम महती भूमिका निभाते हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे ग़ज़ल में नए प्रयोग करने से नहीं हिचकते।
‘शलभ’ जी के पहले ग़ज़ल-संग्रह ‘आओ नई सहर का नया शम्स रोक लें’ की तरह ही यह संग्रह भी अपने उल्लेखनीय और विशिष्ट योगदान के लिए प्रस्तुत है।
—विजय कुमार स्वर्णकार
Des
- Author Name:
Sanjay Chaturvedi
- Book Type:

- Description: संजय चतुर्वेदी लगभग चालीस वर्षों से हिंदी कविता के केंद्र में प्रखर हस्तक्षेप की तरह अडिग हैं। सच कहा जाय तो उनकी अद्वितीय कविताई आज हिंदी के आँगन में वह अकेला दिया है जो अपसंस्कृति के अंधकार और झंझावात से निडर जूझ रहा है। यह सचमुच हमारे देश के हृदय में बसे हुए 'देस' की कविता है जिसमें पाठक खुद अपना झिलमिलाता हुआ प्रतिबिम्ब भी देख पायेगा।अद्भुुत भाषा और कहन वाली यह औघड़ कविता अपने शब्द और बिम्ब धरती के कोने-कोने से चुन कर हमारे लिए लाई है। एकदम समसामयिक काव्यरूप के साथ-साथ भक्तिकालीन कविता का मर्मस्पर्शी संगीत और ओज आपको अचानक द्रवित कर देगा। कहीं पद, कहीं सवैया, कहीं घनाक्षरी, कहीं दोहे, कहीं निर्द्वंद्व निर्झर सा बहता हुआ गीत तो कहीं मुक्त छंद का तरंगित विस्तार। भाषा और काव्यसृष्टि पर ऐसा अधिकार दूर-दूर तक किसी समकालीन का नहीं। इसके पीछे तगड़ी साधना और सत्य की अविचल टेक है। इस कविता में हमारे अस्तित्व पर आक्रांता आततायी सांस्कृतिक पाखंड के खिलाफ सीधे-सीधे आमने-सामने की लड़ाई है। संजय चतुर्वेदी संभवत: अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी कविता इस देशव्यापी छल-छद्म का पर्दाफाश करती है।यह लड़ाई कविता में ही नहीं स्वयं अपने भीतर भी अपनी काहिली, गफलत और आत्मविस्मृति के विरुद्ध सतत चलने वाली लड़ाई है। बार-बार ऐसा लगता है जैसे हमारा सामना अपने समय की सबसे प्रतिभाशाली, जागृत और ईमानदार सृजनदृष्टि से है। यह संग्रह हिंदी कविता के आत्म के विस्तार और दुर्गम रास्तों की यात्रा है। और यह भी—कि जैसे बहुत दिनों बाद आप अपने घर लौटें।—दिनेश कुमार शुक्ल
Anamika
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

- Description: छायावाद के प्रवर्तकों में सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का नाम प्रमुख है। ‘मैं’ शैली अपना कर निराला ने हिन्दी कविता को नई दिशा प्रदान की और छन्दों के बन्धन से मुक्त कर उन्होंने हिन्दी कविता के लिए नई ज़मीन तैयार की। ‘अनामिका’ में संकलित कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं। ‘अनामिका’ नाम से निराला की कविताओं का संग्रह दो बार प्रकाशित हुआ। पहली बार ‘मतवाला’ के सम्पादक बाबू महादेव प्रसाद ने निराला की चौबीस कविताओं का संग्रह ‘अनामिका’ नाम से प्रकाशित किया था। इसमें निराला की प्रारम्भिक कविताएँ संकलित थीं। 1937 में पुन: ‘अनामिका’ नाम से ही निराला की कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ। इसे निराला की श्रेष्ठ कविताओं का संग्रह माना जाता है। ‘अनामिका’ को छायावाद का ‘गौरव-ग्रन्थ’ होने का श्रेय प्राप्त है।
Door Se Dikh Jati Hai Barish
- Author Name:
Vijay Rahi
- Book Type:

- Description: हिन्दी कविता के अत्यन्त विस्तृत देश में अब तक शामिल न हो सके ढूँढाड़-माड़ जीवन को पूरी गरिमा और रागी आत्मीयता के साथ लेकर आए विजय राही मूलतः वृत्तान्त के कवि हैं। वे त्रिलोचन, केदारनाथ सिंह, भगवत रावत, ऋतुराज, अरुण कमल, प्रभात आदि कवियों की धारा में अपना कवि-कर्म कर रहे हैं। साधारण वृत्तान्त का कविता में बदलना इस बात पर निर्भर है कि कवि को मर्म की कितनी पहचान है और वह आम भाषा की माटी को मार्मिकता के जल से कैसे मिलाता है। कहना न होगा ‘बहन’ आदि कविताओं में विजय यह काम किसी सिद्ध कलावंत की तरह कर पाए हैं। मार्मिकता मूलत: और अन्ततः करुणा है। करुणा सार्वभौमिक, सार्वदेशीय और सार्वकालिक नहीं होती। समय, देश, वर्गीय सामाजिक अवस्थिति के अनुसार ही करुणा मनुष्य को छूती है। इनके परिवर्तन से करुणा के प्रति मनुष्य का बर्ताव बदलता जाता है। विजय राही जैसे युवा कवि को अपने देशज जीवनानुभवों से इसकी गहरी समझ है। ‘बहन’ कविता में इसका जटिल विडम्बनात्मक प्रकटीकरण, अतिपरिचित दिखने के बावजूद अचरज में डालता है। पुरुषवाचक के मन में ससुराल में नाख़ुश बहन के प्रति आक्रोश-भरी करुणा है परन्तु माँ दुखी होने के बावजूद उसे छुपाने और उसका उलट दिखाने के लिए विवश है। दुखद वास्तविकताओं पर परदा सामंती पितृसत्तात्मक समाज में गँवई स्त्री-जीवन की विडम्बनाओं की एक झलक-भर है। विजय राही की इन कविताओं में वृत्तान्त दो जीवनवृतों—गँवई जीवन और स्त्री जीवन—को विस्तार से प्रकट करता है। दोनों वृत्तों में कविताएँ एक प्रकार की पृथक शृंखला भी हैं और परस्पर सम्बद्ध भी। जैसे किसी एक ही महाख्यान के दो स्वतंत्र परन्तु सम्बद्ध अध्याय। वृत्तान्त यानी यथार्थ के प्रकटीकरण का सबसे सहज और पारम्परिक अस्त्र। अति पुरातन और अति नवीन। —आशीष त्रिपाठी
Dehari Ka Man
- Author Name:
Prabha Thakur
- Book Type:

- Description: ‘देहरी का मन’ संवेदनशील व विचारप्रवण कविताओं के लिए चर्चित डॉ. प्रभा ठाकुर का महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह है। इन कविताओं में निष्करुण सामाजिक यथार्थ एवं व्यापक मानवतावाद से सम्बुद्ध मन का द्वन्द्व समाहित है। सभ्यता के चरण पार करते हुए समाज जिस पथ पर अग्रसर है, उसका लक्ष्य क्या है—इस नाभिक से छिटके प्रश्न ‘देहरी का मन’ में पाठक से संवाद करते हैं। इस संग्रह से यह भी आभास होता है कि प्रभा ठाकुर की रचनात्मक यात्रा कितनी वैविध्यपूर्ण है। ‘अपनी बात’ में वे कहती हैं, “कुछ फूल चुनकर भरे थे आँचल में, पता ही नहीं चला कैसे कुछ काँटे भी ख़ुद-ब-ख़ुद ही साथ चले आए। फूल तो मुरझाकर बिखर भी गए, किन्तु काँटे सूखकर और भी पैने और सख़्त हो गए हैं। वैसे भी इतने वर्षों की जीवन-यात्रा के बाद, उम्र के इस पड़ाव पर पहुँचकर, यही सोचती हूँ, कहाँ खड़ी हूँ मैं? किसी शिखर पर, ढलान पर या फिर हाशिए पर...!’’ आत्ममूल्यांकन की यह सघन प्रक्रिया सामाजिक विसंगतियों की पहचान का प्रखर माध्यम बनती है। गीतात्मक अभिव्यक्तियाँ स्मृतियों और अनुभूतियों के सम्मिश्रण से मोहक परिवेश रच देती हैं। इन पंक्तियों में जीवन का एक बड़ा सच झाँक रहा है : ‘रेत का बना था घर, बार-बार टूटा/कच्चा रंग रिश्तों का बार-बार छूटा/आँगन से पनघट तक, काई ही काई/माटी का घट भरकर, बार-बार फूटा/अपना ही हवन करें और एक बार।’ समकालीन हिन्दी कविता (विशेषकर गीत-कविता) में प्रभा ठाकुर की ये रचनाएँ उन्हें विशिष्ट सिद्ध करती हैं। भाषा, छन्द, संरचना और स्वभाव की दृष्टि से ‘देहरी का मन’ एक प्रीतिकर और संग्रहणीय संग्रह है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book