Tevar Saptak
About the book
तेवरी को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में श्री रमेशराज का नाम अनायास ही सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता। इसके लिए उनका अथक परिश्रम और संघर्ष का अनूठा इतिहास उनके द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका ' तेवरीपक्ष' से प्रारंभ होता है। “ तेवरी एक स्वतंत्र विधा है”, यह सिद्ध करने के लिए वे निरंतर अपने आलेखों के माध्यम से तेवरी के शिल्प पर प्रामाणिक चर्चा करते रहे हैं। तेवरी के पृथक रूप - रसरूप को समझाने के लिए एक नितांत मौलिक रस, ' विरोधरस ' की स्थापना भी उन्होंने की है। छंद के क्षेत्र में नए-नए छंदों के साथ तेवरियों का रचाव अंततः इस भ्रम को तोड़ने में सफल रहता है कि तेवरी ग़ज़ल की नक़ल न होकर अपना एक पृथक अस्तित्व रखती है। तेवरी को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान दिलाने में उनका सद्यः प्रकाशित लंबी-लंबी तेवरियों का संग्रह -तेवर सप्तक उन सारी खूबियों को समाहित किए है, जिनके माध्यम से आसानी से यह सिद्ध किया जा सकता है कि तेवरी का अपना एक अलग नया और मौलिक काव्यशास्त्र है। “सप्तक” साहित्य के क्षेत्र में कोई नया नाम नहीं है। रेख़्ता, हिंदवी शब्दकोशों के अनुसार, सप्तक शब्द के “एक ही प्रकार की सात वस्तुओं” या “कृतियों”, “संगीत में सात स्वरों” के समूह या सात कवियों के एक मंडल द्वारा संकलित कविता के संग्रह को “सप्तक” कहा जाता है। उपरोक्त विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए साहित्य के जाने माने कवि श्री अज्ञेय द्वारा 1943 ईस्वी में नयी कविता के प्रणयन हेतु सात कवियों का एक मंडल बनाकर संकलित किया गया था “तार सप्तक”। यह संग्रह नयी कविता का प्रस्थान बिंदु रेखांकित किया गया। इस “तार सप्तक” के बाद देखते ही देखते, गीत सप्तक, ग़ज़ल सप्तक, कविता सप्तक, ग़ज़ल कविता सप्तक, दोहा सप्तक, सजल सप्तक आदि अनेक सप्तक प्रकाश में आए। जिनमें “गजल कविता सप्तक”, संपादक -जितेंद्र चौहान पार्वती प्रकाशन, इंदौर, तथा “ग़ज़ल सप्तक”, संपादक-राम निहाल गुंजन एवं मथुरा में हिन्दी सजल सर्जना समिति के तत्वावधान में प्रथम हिन्दी सजल महोत्सव, 2017 में पद्मश्री गोपालदास नीरज के कर कमलों से ‘‘सजल सप्तक ’’ का लोकार्पण हुआ। “सप्तक” की इन्हीं मान्यताओं या विशेषताओं को को ध्यान में रखते हुए श्री रमेशराज के इस “तेवर सप्तक” में भी सौ-सौ तेवर वाली सात लंबी तेवरियों को सात शतकों के रूप में एक साथ प्रस्तुत किया है। “तेवर सप्तक” के अंतर्गत शतक के रूप में इन सात लंबी तेवरियों को निम्न नामों से इस प्रकार रखा गया है - 1.घड़ा पाप का भर रहा, 2. अंतर आह अनंत अति, 3. ककड़ी के चोरों को फांसी, 4. मन के घाव नये न ये, 5. रावण कुल के लोग, 6. धन का मद गदगद करे 7. मेरा हाल सोडियम-सा है। सात तेवर शतकों के बना रमेशराज का तेवर सप्तक भी सुधी पाठकों के बीच है। अन्य सप्तकों की तरह इस सप्तक का भी साहित्य जगत में स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है। ~विनोद भारती ' व्यग्र'
Read more₹
99
84.15 15% off
Unavailable
Format
About the Book
तेवरी को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में श्री रमेशराज का नाम अनायास ही सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता। इसके लिए उनका अथक परिश्रम और संघर्ष का अनूठा इतिहास उनके द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका ' तेवरीपक्ष' से प्रारंभ होता है। “ तेवरी एक स्वतंत्र विधा है”, यह सिद्ध करने के लिए वे निरंतर अपने आलेखों के माध्यम से तेवरी के शिल्प पर प्रामाणिक चर्चा करते रहे हैं। तेवरी के पृथक रूप - रसरूप को समझाने के लिए एक नितांत मौलिक रस, ' विरोधरस ' की स्थापना भी उन्होंने की है। छंद के क्षेत्र में नए-नए छंदों के साथ तेवरियों का रचाव अंततः इस भ्रम को तोड़ने में सफल रहता है कि तेवरी ग़ज़ल की नक़ल न होकर अपना एक पृथक अस्तित्व रखती है।
तेवरी को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान दिलाने में उनका सद्यः प्रकाशित लंबी-लंबी तेवरियों का संग्रह -तेवर सप्तक उन सारी खूबियों को समाहित किए है, जिनके माध्यम से आसानी से यह सिद्ध किया जा सकता है कि तेवरी का अपना एक अलग नया और मौलिक काव्यशास्त्र है।
“सप्तक” साहित्य के क्षेत्र में कोई नया नाम नहीं है। रेख़्ता, हिंदवी शब्दकोशों के अनुसार, सप्तक शब्द के “एक ही प्रकार की सात वस्तुओं” या “कृतियों”, “संगीत में सात स्वरों” के समूह या सात कवियों के एक मंडल द्वारा संकलित कविता के संग्रह को “सप्तक” कहा जाता है।
उपरोक्त विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए साहित्य के जाने माने कवि श्री अज्ञेय द्वारा 1943 ईस्वी में नयी कविता के प्रणयन हेतु सात कवियों का एक मंडल बनाकर संकलित किया गया था
“तार सप्तक”। यह संग्रह नयी कविता का प्रस्थान बिंदु रेखांकित किया गया। इस “तार सप्तक” के बाद देखते ही देखते, गीत सप्तक, ग़ज़ल सप्तक, कविता सप्तक, ग़ज़ल कविता सप्तक, दोहा सप्तक, सजल सप्तक आदि अनेक सप्तक प्रकाश में आए। जिनमें “गजल कविता सप्तक”, संपादक -जितेंद्र चौहान पार्वती प्रकाशन, इंदौर, तथा “ग़ज़ल सप्तक”, संपादक-राम निहाल गुंजन एवं मथुरा में हिन्दी सजल सर्जना समिति के तत्वावधान में प्रथम हिन्दी सजल महोत्सव, 2017 में पद्मश्री गोपालदास नीरज के कर कमलों से ‘‘सजल सप्तक ’’ का लोकार्पण हुआ।
“सप्तक” की इन्हीं मान्यताओं या विशेषताओं को को ध्यान में रखते हुए श्री रमेशराज के इस “तेवर सप्तक” में भी सौ-सौ तेवर वाली सात लंबी तेवरियों को सात शतकों के रूप में एक साथ प्रस्तुत किया है।
“तेवर सप्तक” के अंतर्गत शतक के रूप में इन सात लंबी तेवरियों को निम्न नामों से इस प्रकार रखा गया है - 1.घड़ा पाप का भर रहा, 2. अंतर आह अनंत अति, 3. ककड़ी के चोरों को फांसी, 4. मन के घाव नये न ये, 5. रावण कुल के लोग, 6. धन का मद गदगद करे 7. मेरा हाल सोडियम-सा है।
सात तेवर शतकों के बना रमेशराज का तेवर सप्तक भी सुधी पाठकों के बीच है। अन्य सप्तकों की तरह इस सप्तक का भी साहित्य जगत में स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है।
~विनोद भारती ' व्यग्र'
Book details
- Format
- Digital book
- Publisher
- Rachnaye Fulfilled
- ISBN-13
- RF-RR-TS
- Pages
- 45
- Reading time
- ~2 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Language
- Hindi
Customer reviews
Be the first to write a review
Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

