Shiv Ki Chhati Par Kali Ka Paon
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पके हुए प्रेम की एक पहचान यह भी है कि सृजन के शिल्प में वह कभी-कभी कच्चा भी रह जाता है। इस तरह की लिखाई उत्कृष्टता की आकांक्षा व दबाव से मुक्त, सहज और स्वाभाविक होती है। काफ़िर की कविताएँ इसी सरलता से पैदा हुई हैं, जो दुनिया में प्रेम की उपस्थिति पर भरोसा जगाती हैं। इन कविताओं से गुज़रते हुए मैंने पाया कि इनकी बनावट में वैशिष्ट्य का आग्रह नहीं, किंतु जीवन की धड़कती हुई ध्वनि जहाँ-तहाँ गूँजती है।</p> <p>काफ़िर की कविताओं में महज़ प्रेम नहीं है, बल्कि एक पक्के प्रेमी की तरह तबाह हो जाने की पर्याप्त चाह भी है। इस जटिल सरंचना वाले अंधकारपूर्ण संसार में उनकी कविताओं का प्रेमी ऐसा प्रतीत होता है मानो बिना बिजली वाले किसी गाँव में अमावस की तिथि पड़ी हो और सुदूर आकाश में सितारे जगमगा रहे हों। </p> <p>इस दौर में प्रेम की कविता एक बड़ी चुनौती से जूझ रही है। प्रेम की अभिव्यक्ति में भावों की तीव्रता को गति की तीव्रता ने विचलित किया है। इस कठिनाई से उबरने का उपाय है एक सघन जीवन से जन्मा धैर्य और अपनी कला के प्रति वीतरागी भाव। काफ़िर की कविता में व्याप्त तीव्र भावनात्मक संवेग और निर्वाण की अवस्था के प्रति मद्धम आसक्ति एक तरह का विरोधाभासी दृश्य रचते हैं। नए-नए उपमान या बिम्बों से विस्मय जगाने वाली तकनीक नहीं, बल्कि उपरोक्त विरोधाभास के आंतरिक संघर्ष से उपजा धैर्य इन कविताओं की प्राणवायु है। —बाबुषा कोहली
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पके हुए प्रेम की एक पहचान यह भी है कि सृजन के शिल्प में वह कभी-कभी कच्चा भी रह जाता है। इस तरह की लिखाई उत्कृष्टता की आकांक्षा व दबाव से मुक्त, सहज और स्वाभाविक होती है। काफ़िर की कविताएँ इसी सरलता से पैदा हुई हैं, जो दुनिया में प्रेम की उपस्थिति पर भरोसा जगाती हैं। इन कविताओं से गुज़रते हुए मैंने पाया कि इनकी बनावट में वैशिष्ट्य का आग्रह नहीं, किंतु जीवन की धड़कती हुई ध्वनि जहाँ-तहाँ गूँजती है।</p>
<p>काफ़िर की कविताओं में महज़ प्रेम नहीं है, बल्कि एक पक्के प्रेमी की तरह तबाह हो जाने की पर्याप्त चाह भी है। इस जटिल सरंचना वाले अंधकारपूर्ण संसार में उनकी कविताओं का प्रेमी ऐसा प्रतीत होता है मानो बिना बिजली वाले किसी गाँव में अमावस की तिथि पड़ी हो और सुदूर आकाश में सितारे जगमगा रहे हों। </p>
<p>इस दौर में प्रेम की कविता एक बड़ी चुनौती से जूझ रही है। प्रेम की अभिव्यक्ति में भावों की तीव्रता को गति की तीव्रता ने विचलित किया है। इस कठिनाई से उबरने का उपाय है एक सघन जीवन से जन्मा धैर्य और अपनी कला के प्रति वीतरागी भाव। काफ़िर की कविता में व्याप्त तीव्र भावनात्मक संवेग और निर्वाण की अवस्था के प्रति मद्धम आसक्ति एक तरह का विरोधाभासी दृश्य रचते हैं। नए-नए उपमान या बिम्बों से विस्मय जगाने वाली तकनीक नहीं, बल्कि उपरोक्त विरोधाभास के आंतरिक संघर्ष से उपजा धैर्य इन कविताओं की प्राणवायु है। —बाबुषा कोहली
Book Details
-
ISBN9788119092079
-
Pages104
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आम इंसान की नज़र संसार को देखती है तो उस घटनाओं, व्यक्तियों के प्रति नफ़रत, दुख, क्रोध जैसे विभिन्न भाव पैदा होते हैं मगर जब ये नज़र प्रेम की नज़र बन जाती है तो उसमें संसार की हर वस्तु के प्रति शुकराने का भाव पैदा होता है। और हर पदार्थ के पीछे उसी ऊर्जा, अनवारे-इलाही आदि शक्ति नज़र आने लगती है। फिर तो महबूब में, मुर्शिद में, दोस्त में, दुश्मन में जन्म में, मृत्यु में, उसी अनवारे-इलाही का जलवा नज़र आने लगता है। यही बात है कि मजन का प्यार किसी संत की इबादत से कम नहीं।"तेरी आँखों में रात डूबी है" की ये ग़जलें जहाँ आफिस में काम करने वाली प्रेमिका, संसार से उकताये हुए आदमी, बेटी के प्रति प्रेम में डूबे पिता, विश्व समाज के बदलते हुए परिवेश की मंज़रकशी करती हैं, वहीं इन ग़ज़लों में भाषा की सादगी के साथ जुबान की दिलकश पेशगोई है। ये ग़ज़लें और नज्में एक प्रेमी, एक कामगार, एक साधक की भावनाओं का आईना है साथ ही शरीर और मन के पार रुहानी संसार की तरफ़ भी इशारे करती हैं सूफ़ियाना नज़र देती हैं। निश्चित रूप से इन नज्मों में ऐसा बहुत कुछ है जहाँ से हर इंसान को कभी न कभी गुज़रना है, ठहरना है।
सुर्ख खंजर लिये पीछे है हुजूमे-कातिल
शहरे-जाना से मगर होते भी रुखसत न बनें
क्योंकि ये शहरे-जाना है, परमात्मा का नगर है ये जगत। हमें इसमें जीना है और आनन्दपूर्ण जीना है। ये ग़जलें सुख-दुख के दो किनारों से आगे नये जश्न के सफ़र की तरफ़ ले जा रहीं हैं और उत्सव में जीने का मंगल सन्देश हैं।
Farhad Nahin Hone Ke
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प्रेम की गहरी व्यंजना, नज़दीकियों और दूरियों की हस्सास अक्कासी, देश और समाज की तल्ख़ हक़ीक़तों से ज़ख़्मी मिसरों और शे’रों की गहरी बुनावट—इन सबसे मिलकर बनती हैं मोनिका सिंह की ग़ज़लें और इस नए ग़ज़ल-संग्रह के ख़्वाब।
कहते हैं सहर यानी सुबह के वक़्त देखे गए ख़्वाब सच हो जाते हैं। इस संग्रह की ग़ज़लों में ऐसे अनेक ख़्वाब सँजोए गए हैं, जिन्हें सच होना ही चाहिए। ख़ुशियों के, प्यार के, मिलन के, समाजी एकता और क़ौमी मुहब्बत के ख़्वाब के साथ मोनिका सिंह अपने वक़्त को भी बहुत गहराई से देखती है; और अपने मन को भी। यही वजह है कि उनके अहसास का सन्तुलन कहीं भी गड़बड़ाता नहीं है।
‘यकायक नींद में आँसू निकल आए; वो ख़्वाबों में मुझे तड़पा गया शायद।’ एक ग़ज़ल का यह शे’र जहाँ इश्क़ की गहरी संवेदना को रौशन करता है, वहीं हमें ऐसे शे’र भी पढ़ने को मिलते हैं: ‘दूरियाँ दो मज़हबों में की जिन्होंने, कह रहे वो/फ़ासले होते नहीं कम, बात इतनी सी नहीं है/ फेंककर स्याही बने हैं देशभक्ति के पुजारी/बँट गए मुद्दों में यूँ हम, बात इतनी सी नहीं है।’
देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली ग़ज़लों ने धीरे-धीरे उर्दू अल्फ़ाज़ से अपनी नज़दीकी बढ़ाई है, आमफ़हम होने के नाम पर सपाट होने की आशंका को उसने काफ़ी कम किया है, और उर्दू ग़ज़ल की बहुस्तरीय अर्थगर्भिता के नज़दीक गई है। यह बात इस संग्रह में भी देखने को मिलती है।
Use Laut Aana Chahiye
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मुझे अपनी कविताओं के प्रति मोह बिलकुल नहीं है, ऐसा कहना ग़लत होगा। मैं शायद ज़रूरत से ज़्यादा सतर्क और सजग अपनी कविताओं के बारे में हूँ—इसलिए उनसे डरता रहता हूँ। फिर भी यदि कविता लिखता हूँ तो लगता है, ऐसी बातें तो मैं कह चुका हूँ, दूसरे शब्दों से उन्हीं बातों को सहलाना भी मेरे चुक जाने की ही निशानी है। ऐसा नहीं कि मेरे पास विचार या जीवनानुभवों का टोटा पड़ गया है—अभी भी किसी विचार, किसी घटना, छोटी-बड़ी बात से परेशान हो उठता हूँ, कभी-कभी महीनों तक जूझता रहता हूँ। पर उनसे निकलने के लिए कविता मेरे लिए अब आसान रास्ता नहीं रह गई है।
मैं सोचता हूँ कि लेखन में कोई इसलिए आता है कि उसे अपने दिए हुए संसार में बने रहना नाकाफ़ी लगता है। उसके आस-पास जो लोग हैं, सिर्फ़ उनसे रूबरू होकर उसका काम नहीं चलता। वह ऐसे लोगों से बातचीत करना चाहता है जिन्हें वह जानता भी नहीं है, जो दूसरे नगरों में रहते हैं, जो शायद मर चुके हैं या अभी पैदा भी नहीं हुए हैं। वह अपने आस-पास की सांसारिकताओं में ही मशगूल हो जाता है, या दीगर दिलचस्पियों में खप जाता है तो उसकी मानसिकता में दूर, मनचाहे से, अज्ञात से रिश्ते जोड़ने की सामर्थ्य नहीं बची रहती। जितने मनोरथ मैंने उठा रखे हैं, वे ही अब मुझसे नहीं सधते—क्या किया जाए?
देश में और समाज में तमाम तरह की उत्तेजनाएँ हैं। करोड़ों लोग अपनी ज़िन्दगी के थोड़े-बहुत सार्थक को भी बचा रख पाने के लिए दारुण संघर्ष में लगे हुए हैं। काफ़ी लोग बदलाव के लिए बेचैन हो रहे हैं। यह देश और दुनिया ऐसी बने रहने के लिए अभिशप्त नहीं है। तमाम लोग लगे हैं, इसे बदलने के लिए। इस बात से कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता कि एक कवि चुक गया है या उसका वक़्त आ गया है। हो सकता है कि ठीक अज़ाँ सुनने पर वह भी अपना क़फ़न फाड़कर बाहर निकल ही आए। अपनी छोटी-सी भूमिका निभाने में शायद वह और कोताही न करे। मूक बोलने लगे और पंगु गिरि को लाँघने लगे, ऐसा नामुमकिन नहीं है।
— सुदीप बॅनर्जी
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