Seeds of Light
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This book contains the workings of my heart. My attempt to find the silver lining in the most painful moments. I have depicted the inner journey akin to a blossoming flower. If you are afraid of feeling, this book will help you to honour that. Any reader, no matter how novice on the spiritual journey or how refined- can find peace in contemplation and reflection. “Seeds of Light” will enrich your soul, enrapturing the mind with the elements of love, pain, joy, and truth. -Jaskiran Singh
Read moreAbout the Book
This book contains the workings of my heart. My attempt to find the silver lining in the most painful moments.
I have depicted the inner journey akin to a blossoming flower. If you are afraid of feeling, this book will help you to honour that. Any reader, no matter how novice on the spiritual journey or how refined- can find peace in contemplation and reflection.
“Seeds of Light” will enrich your soul, enrapturing the mind with the elements of love, pain, joy, and truth. -Jaskiran Singh
Book Details
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ISBN978-93-90882-17-5
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Pages74
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Avg Reading Time2 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginUnited States
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‘देह की भाषा’ सुरेश कुमार वशिष्ठ का महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह है। गाँव और माटी से जुड़े सुरेश सामाजिक अन्तःकरण रखनेवाले कवि हैं और इसी दायरे में रिश्तों की तलाश करते हैं। वे अपनी परिस्थिति और अपनी काव्यवस्तु से प्रगीतात्मक रिश्ता बनाकर जीवन के अनुभव की अखंडता और भाव-जगत की सच्चाई को शब्दों में समेट लेते हैं। वे प्रेम के चित्र उकेरते हुए जीवन से एक अपूर्व सांगीतिक लय बनाए रखने में सफल साबित होते हैं। ‘देह की भाषा’ में कवि का विनम्र मानववाद जीवन के राग-रंग और रति के अलावा समय से जुड़े संकट, व्यक्ति की पीड़ा, उसके रुदन-चिन्ता और आघात से रागात्मक लगाव रखने में सफल साबित होता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर कहते हैं, ‘संसार की वास्तविकता मनुष्य की भावनात्मक और कल्पनात्मक पृष्ठभूमि में ही तो प्रकट होती है!’ प्रथमद्रष्ट्या सुरेश बेहद बेपरवाह नज़र आते हैं मगर कभी देह की परिधि में बँधकर प्रेम की सत्ता को स्वीकार करते हुए ख़ुद को उससे दूर नहीं जाने की ज़िद करते दीखते हैं और कभी दूर रहकर भी सहज नहीं रह पाते बल्कि उसके मंगल में अपना मंगल ढूँढ़ते हैं। उसके राग में ही जीवन के रंग ढूँढ़ते हैं...जिन रंगों में रिश्तों की ख़ुशबू है। सुरेश की कविताओं में भाषाई सहजता है, जिनमें उनके स्वभाव का भोलापन है, जिसके बूते उन्होंने प्रेम के हर पक्ष को समझा है...पूर्णता के साथ, पूर्वग्रह से परे। प्रेम को वे इतना सघन मानते हैं कि पूछो मत...जैसे फ़र्श पर पसरे पानी से लकीरें खींची जाएँ....रेट पर कुछ लिखा जाए, थोड़े क्षणों के लिए ही सही। फिर जैसे सब कुछ धुल जाए, बिसर जाए और रह जाएँ मात्र स्मृतियाँ...हज़ारों स्मृतियाँ अतीत के दामन में। शान्त-स्थिर मगर निरन्तरता के साथ।
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यह कहकर कि विष्णु खरे हिन्दी में बिलकुल अलग ढंग की कविता लिखते थे (उनकी ख़ास अपने रंग की कविता की बात है यह, उन कुछेक कविताओं की नहीं जो उनकी उतनी ख़ास नहीं हैं), हम ज़रूर एक बड़ी बात कहते हैं। पर उनका अपना रंग क्या है, यह बताए बग़ैर बात अधूरी है। पहली ही नज़र में उन्हें अलग दिखा देनेवाली चीज़ है उनकी कविता का बाना; ऐसा बाना जिसमें से 'कवितापन’ के निशान मानो चुन-चुनकर हटा दिए गए हैं—भावनात्मकता, लयात्मकता, आवेग और बहाव, लगाव और आत्मीयता, सहानुभूति और करुणा तक...। पहली नज़र में वे कविता होने का दावा करनेवाली गद्यात्मक कहानियाँ मालूम होती हैं। उनका कहानीपन भी वर्णनात्मक लगता है, कथात्मक नहीं, मानो जान-बूझकर लयहीन, गद्यात्मक, मनमाने तौर पर लम्बी या छोटी पंक्तियों में कुछ चीज़ों के बारीक वर्णन में घटना या पात्र जोड़ दिए गए हैं; आप कविता से जुड़ी अपनी अपेक्षाएँ, रुचियाँ, आदतें लेकर उनके पास जाते हैं और निराश होते हैं; आप कहानी की तरह उसे पढ़ना चाहते हैं तो पाते हैं कि जिन तत्त्वों (सूक्ष्म निरीक्षण, मानसिक या घटनागत मोड़, आश्चर्य इत्यादि) को आप कहानी पढ़ने के बाद खोजते या निकालते, वे ढाँचे की तरह—मांस-मज्जा-मोटापे से रहित—आपके सामने हैं, पूरी कहानी नहीं। कविता के रूप में आप जिस ताप, आवेग और शब्दों की मितव्ययिता चाहते हैं, वह नहीं है। कविता के रूप में उक्त तत्त्वों को जिन आवरण-आच्छादनों के साथ चाहते हैं, वे आवरण-आच्छादन भी नहीं हैं। कहानी की दृष्टि से शब्दों की कंजूसी, कविता की दृष्टि से शब्दों की इफ़रात। ‘अकेला आदमी’, ‘कोशिश’ और ‘दोस्त’ जैसी कविताएँ आपको तब भी अपनी संस्कारगत काव्य-रुचियों के क़रीबतर जान पड़ती हैं। इससे बरबस आप विष्णु खरे की दूसरी कविताओं को समझने की, उनमें ‘कवितापन’ खोजने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी यह कोशिश लगातार चलती है; होते-होते आप कवि के मुरीद भी हो जा सकते हैं। समय इन कविताओं में एक तरह से सर्वव्याप्त आयाम है जिसमें देश या स्थान भी समाहित है। 'टेबिल’ में वह चार पीढ़ियों का क़िस्सा बनता है। ‘हँसी’ में वह हमारा अपना ज़माना है, जब पुरस्कृत बालक भूखा, पैदल, थका, शील्डों के बोझ से दबा घर पहुँचता है, जहाँ ख़ुद ही उसे ताला खोलना है; समारोह में विशेष स्वागत अतिथियों का है, सड़क पर पुलिस की घुड़क है, दूसरे दिन स्कूल में क़तार में वह निरीह इकाई मात्र है। एक संवेदनहीन, मूल्यहीन, क्रूर समाज का समय। 'गर्मियों की शाम’ में वह हमारी यौन-नैतिकता, अच्छाई, किशोर-मन की कसमसाहट का समय है। ‘स्वीकार’ और ‘डरो’ में, ‘दूरबीन’ और ‘वापस’ में और ‘कार्यकर्ता’ और ‘कोमल’ में हमारे समय का समाज-संगठन, व्यक्ति-सत्ता, व्यंग्य, तल्ख, विडम्बना, अक्सर दुरदुराए जाते आम इनसान संकेतित हैं। समय पर यही आँख ‘मुक़ाबला’ में प्रागैतिहासि फ़ैंटेसी को समेट लाती है। बचपन, कैशोर्य, जवानी, बुढ़ापा; सफलता, रोग, दैन्य, छोटे शहरों की उदासी और उदास आकर्षण, बड़े शहरों का दृश्य (‘वापस’) उनमें तरह-तरह से आता है। समय के लिए विष्णु खरे काल या महाकाल जैसे प्रत्यय नहीं अपनाते, और इस नुक्ते में उनकी काव्य-चेतना के दो रुझान स्पष्ट हैं। ‘समय’ शब्द हमारे समय में अंग्रेज़ी के ‘टाइम’ का प्रत्ययान्तर है, और प्रचलित आधुनिकतावाद में वह प्रगति, इतिहास, उत्तरोत्तर आगे बढ़नेवाला, रैखिक विकास का अर्थ लिए हुए है; व्यतीत हो जानेवाला समय है, ‘कालो न यात:’ वाला, आवर्तित, चक्राकार काल नहीं। लेकिन विष्णु खरे इसको ‘अर्थ’ और ‘अव्यक्त’ जैसी कविताओं में ‘एक प्रवहमान अनन्त लीला’ से जोड़ते हैं। आधुनिकता के विश्लेषणात्मक, वैज्ञानिक, विषयी-निरपेक्ष विषय-केन्द्रित दृष्टि के उपकरणों का उपयोग क्या वे अपनी मूल भारतीय दार्शनिक अवधारणाओं की पड़ताल करने में कर रहे हैं? सर्वातीत, लीला, स्थावर-जंगम जैसे शब्द उनके यहाँ बार-बार हैं, और केवल शब्द ही नहीं, उनके अर्थ को स्वीकार करनेवाली चेतना भी। यह चेतना—शक होता है कि—सचेत रूप से अपनाई हुई नहीं है, बल्कि उनमें ख़ुद-ब-ख़ुद है, इस देश-प्रदेश में पलने, बढ़ने के कारण। उसकी पुष्टि तरह-तरह के अध्ययनों से, हालाँकि भारतीय अवधारणा से कुछ भिन्न रूपोंवाले स्रोतों से होती है—दॉन हुआन, बोर्खेस के हवाले द्रष्टव्य हैं। तर्क से चलकर अतर्क्य तक पहुँचना इसीलिए सम्भव है। क्षणवाद को इस तरह वे विजित करते दीखते हैं। अस्तित्ववादी अकेलेपन और संत्रास की धारणाओं का आतंक इसीलिए उन पर नहीं दीखता। अन्तत: निष्कृति का द्वार उन्हें सहज ही पता है।
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रवीन्द्र भारती की कविताओं में चारों ओर की वास्तविकताओं से मनुष्य के लिए रचनात्मक संस्कार खोजने की शक्ति दीखती है। अपनापे का यह अनुभव छायावादोत्तर रोमानी मिठास का नहीं, एक संघर्षरत मनुष्य के लौकिक-भौतिक प्रेम का अनुभव है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि उनकी कविता उन दृश्यों को भी साकार कर देती है, जो उसमें लिखे नहीं गए, परन्तु छाया की भाँति इसके तथ्यों से निसृत हैं। कई आयामों को एक में समाहित कर सकने की यह सामर्थ्य आज की कविता में दुर्लभ ही है। रवीन्द्र भारती की कविताएँ गाँव, घर, खेत, लोग आदि सबके दृश्यमान यथार्थ के पीछे करुणा के आयामों को खोलती और सम्पूर्ण अनुभव के आयामों को गहरा करती हैं। आज के दौर में जहाँ सरल भाषा में दुरूह कविता खुलेआम स्वीकृत की जा रही है, वहाँ यह कवि सरल भाषा में गहराई का अन्वेषण कर रहा है और भावुकता को आत्मदया बनाने से बचता हुआ सहानुभूति को व्यापक अर्थ देकर काव्य-भाषा को समृद्ध कर रहा है। रघुवीर सहाय; ‘रविवार’, 15-21 नवम्बर, 1987 रवीन्द्र भारती ने इतनी तीव्र और मर्मान्तक संवेदना से अपने अनुभवों को जो काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी है, उसने मुझे बराबर प्रभावित किया है। गाँव के अनुभवों की जो सम्पदा आप अपने भीतर समोए हैं, वह अथाह जान पड़ती हैं—और जब उनमें से कुछ को चुनकर अभिव्यक्त करते हैं—बिलकुल अपने निजी मुहावरे में तो लोग, लैंडस्केप और चारों तरफ़ की पीड़ा का प्रदेश आलोकित हो उठता है। —निर्मल वर्मा; पत्रांश, 10.5.1981
Customer Reviews
5 out of 5
Book
22/04/2023
Shreya Patel
"Seeds of Light" is a moving memoir that delves deep into the author's heart and takes the readers on an emotional journey of love, pain, joy and truth. Through her vivid descriptions of life's most challenging moments, Jaskiran Singh beautifully portrays the inner workings of the human mind and soul, likening it to a blossoming flower. Jaskiran's words will make you feel less alone in your struggles and encourage you to embrace your emotions, no matter how difficult theg may be. Her insights on sporituality are also profound, making this booka perfect read for anyone looking to embark on a spiritual journey. The way Jaskiran has penned her journey in this book is nothing short of magical. The book is written in a way that keeps the reader hooked from beginning to end. Her writing is simple, yet so powerful that it will move you to tears. She has also included beautiful poetry that adds to the overall beauty of the book. Jaskiran Singh has poured her heart and soul into this book, and it shows in every word. It's a book that will inspire you to find the silver lining in even the most painful moments of life.
Seeds of Light by Jaskiran Singh traces the arc of emotional transformation — the passage from pain to peace, despair to clarity — through verse structured as a flowering, each poem a petal unfolding toward the light. Singh writes for the reader who is afraid to feel, offering language that honours fear while guiding contemplation. This is not poetry that performs; it is poetry that accompanies, turning the inner journey into a shared ritual of reflection. The collection moves through love, loss, joy, and truth with a quietness that resists resolution, favouring instead the slow work of recognition. Singh's voice is spare and intimate, the kind of writing that lingers in the mind long after the page is turned. Seeds of Light is a book for anyone seeking not answers, but permission to sit with their own heart.
What kind of reading experience will Seeds of Light give me?
Seeds of Light offers a meditative, slow-paced journey through emotion rather than narrative. Each poem invites quiet reflection, creating space for the reader to sit with feelings of love, pain, joy, and truth. The experience is introspective and gentle, favouring contemplation over catharsis. Singh's language is spare and intimate, leaving behind a sense of having been quietly understood rather than entertained or instructed.
Who is this book best suited for, and what does it expect of its reader?
This collection is ideal for readers navigating emotional difficulty — heartbreak, loss, or spiritual uncertainty — who seek companionship rather than advice. It welcomes both those new to spiritual exploration and seasoned reflective readers. The book expects only a willingness to pause, to feel, and to honour one's inner landscape. No prior experience with poetry or spiritual practice is required, only openness to sitting with difficult emotions.
What is the cultural significance of introspective poetry for Indian readers today?
In a culture often oriented toward collective duty and external achievement, introspective poetry offers Indian readers permission to turn inward and attend to emotional truth. Seeds of Light honours vulnerability in a context where emotional expression can be stigmatised, particularly around pain and fear. This kind of reflective writing resonates with a growing movement among younger Indian readers seeking mental health awareness, spiritual authenticity, and language for the inner life beyond traditional religious frameworks.
What makes Jaskiran Singh's approach to pain and healing distinctive?
Singh structures the collection as a blossoming — an organic, gradual unfolding rather than a linear recovery narrative. This approach resists the demand for resolution or closure, instead honouring the reader's fear of feeling as a valid starting point. The tone is companionable rather than prescriptive, offering reflection without instruction. Singh's sparing language and metaphor of the flower create a poetic space that feels both personal and universal, intimate without confession.
What does this book leave the reader with after finishing it?
Readers come away with a sense of having been quietly accompanied through difficulty, not rescued from it. Seeds of Light leaves behind permission to feel slowly, to honour pain as part of growth, and to recognise illumination as incremental rather than sudden. The lasting impression is one of gentleness toward oneself — an emotional posture that continues beyond the final page, reshaping how readers approach their own inner landscapes in daily life.