Shanti Parv
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आशीष त्रिपाठी की कविताएँ हमारे समय की कई आन्तरिक परतों को भेदते और उधेड़ते हुए, उसके अन्तर्विरोधों और विडम्बनाओं से होकर अपने समय का वास्तविक चेहरा तलाश करने की कोशिश करती हैं। संग्रह में शामिल कविता ‘काला सूर्य’ में कवि देख पाता है कि इस समय जब उजाले की वह भाषा, जिसकी संधि में करोड़ों लोगों की निर्मलता समाई हुई थी, उस पर कालिमा के शब्द और वाक्य छाते जा रहे हैं। उस भाषा में प्रश्न करने के अधिकार और असहमति को बेदख़ल कर दिया गया है। उजले सूर्य आकाशगंगा से और उजली ऋचाएँ भाषा से बाहर फेंक दी गई हैं। धीरे-धीरे सब कुछ गिर रहा है। यह सिर्फ़ भाषा का संकट नहीं है। भाषा की नब्ज़ में समाज के शरीर की सारी व्याधियों का हालचाल छिपा है। कवि इस नब्ज़ पर अपनी उँगलियाँ रखकर, हमें हमारे आसपास घटित प्रकट-अप्रकट को दिखाने का उपक्रम करता है। ‘काला सूर्य’ विराट कास्मिक बिम्ब की अनुगूँजों से भरी कविता है।</p> <p>आशीष की कविता की भाषा का तापमान अक्सर बहुत संयत बना रहता है। भावों की रास कवि के हाथ से कभी छूटती नहीं। उसका आलोचकीय विवेक हमेशा जागृत रहता है। उसकी विविधता उसके विषयों और दृश्यों में प्रकट होती है। वह बहुत महीन आब्ज़र्वेशन से प्रकट के भीतर छिपे अप्रकट को विचक्षणता से दिखा देते हैं। आशीष की कविता को पढ़ते हुए जितना उसे सुना जा सकता है, उतना ही उसे देखा भी जा सकता है। वह जितनी शब्द में है उतनी ही दृश्य में भी है। </p> <p>कहना न होगा कि आशीष की कविता में एक क़िस्म का नाटक उसके अन्तरतल में लगातार बना रहता है। नाटक उसकी कविता की सरंचना में विन्यस्त है। ‘तुम्हारा अभिनय’, ‘गहनों की दुकान’, ‘मुखौटा’ आदि कई कविताएँ इसकी गवाही देती हैं। जीवन में जटिलताएँ बढ़ रही हैं और वो व्यक्ति के व्यवहार को भी पहले के बनिस्बत अधिक जटिल बना रही हैं। आशीष की कविता इन जटिलताओं को उकेरते हुए भी अपनी बनक में सहज बनी रहती है।</p> <p>आशीष की कविताएँ एक ऐसा गीत भी हैं जिसमें ‘बातों की कुल्हाड़ी से समय के पहाड़ के कटते जाने’ और ‘पनछुछही और ठंडी चाय की सबसे अच्छी चुस्कियाँ’ भी हैं।</p> <p>—राजेश जोशी</p> <p>
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आशीष त्रिपाठी की कविताएँ हमारे समय की कई आन्तरिक परतों को भेदते और उधेड़ते हुए, उसके अन्तर्विरोधों और विडम्बनाओं से होकर अपने समय का वास्तविक चेहरा तलाश करने की कोशिश करती हैं। संग्रह में शामिल कविता ‘काला सूर्य’ में कवि देख पाता है कि इस समय जब उजाले की वह भाषा, जिसकी संधि में करोड़ों लोगों की निर्मलता समाई हुई थी, उस पर कालिमा के शब्द और वाक्य छाते जा रहे हैं। उस भाषा में प्रश्न करने के अधिकार और असहमति को बेदख़ल कर दिया गया है। उजले सूर्य आकाशगंगा से और उजली ऋचाएँ भाषा से बाहर फेंक दी गई हैं। धीरे-धीरे सब कुछ गिर रहा है। यह सिर्फ़ भाषा का संकट नहीं है। भाषा की नब्ज़ में समाज के शरीर की सारी व्याधियों का हालचाल छिपा है। कवि इस नब्ज़ पर अपनी उँगलियाँ रखकर, हमें हमारे आसपास घटित प्रकट-अप्रकट को दिखाने का उपक्रम करता है। ‘काला सूर्य’ विराट कास्मिक बिम्ब की अनुगूँजों से भरी कविता है।</p>
<p>आशीष की कविता की भाषा का तापमान अक्सर बहुत संयत बना रहता है। भावों की रास कवि के हाथ से कभी छूटती नहीं। उसका आलोचकीय विवेक हमेशा जागृत रहता है। उसकी विविधता उसके विषयों और दृश्यों में प्रकट होती है। वह बहुत महीन आब्ज़र्वेशन से प्रकट के भीतर छिपे अप्रकट को विचक्षणता से दिखा देते हैं। आशीष की कविता को पढ़ते हुए जितना उसे सुना जा सकता है, उतना ही उसे देखा भी जा सकता है। वह जितनी शब्द में है उतनी ही दृश्य में भी है। </p>
<p>कहना न होगा कि आशीष की कविता में एक क़िस्म का नाटक उसके अन्तरतल में लगातार बना रहता है। नाटक उसकी कविता की सरंचना में विन्यस्त है। ‘तुम्हारा अभिनय’, ‘गहनों की दुकान’, ‘मुखौटा’ आदि कई कविताएँ इसकी गवाही देती हैं। जीवन में जटिलताएँ बढ़ रही हैं और वो व्यक्ति के व्यवहार को भी पहले के बनिस्बत अधिक जटिल बना रही हैं। आशीष की कविता इन जटिलताओं को उकेरते हुए भी अपनी बनक में सहज बनी रहती है।</p>
<p>आशीष की कविताएँ एक ऐसा गीत भी हैं जिसमें ‘बातों की कुल्हाड़ी से समय के पहाड़ के कटते जाने’ और ‘पनछुछही और ठंडी चाय की सबसे अच्छी चुस्कियाँ’ भी हैं।</p>
<p>—राजेश जोशी</p>
<p>
Book Details
-
ISBN9789360866280
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Bhakti Kavya-Parampara Aur Kabir
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Namvar Singh +2
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सम्पूर्ण भक्ति कविता को एक ही आँख से देखने और एक ही तराजू में तौलनेवालों की भारी भीड़ है। इस भीड़ के सदस्य भक्ति कविता के प्रगतिशील तत्त्वों और यथास्थितिवादी तत्त्वों को अलगाने का विरोध करते हैं। ऐसे लोग यह देखने में असमर्थ हैं कि भक्ति कविता के क्रान्तिकारी तत्त्वों का विरोध करनेवाली सामाजिक शक्तियों की संख्या बहुत बड़ी है।
मुक्तिबोध संगी नामवर सिंह इस पूरी राजनीति के गुब्बारे में सुई चुभोते हैं और भक्ति कविता की दूसरी परम्परा के पक्ष में प्रभावी ढंग से खड़े होते हैं।
बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक और इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने भक्ति, भक्ति आन्दोलन और कबीर पर पुनः-पुनः विचार किया। वे बताते हैं कि भक्ति आन्दोलन के साथ ही आधुनिक भाषाओं ने पहली बार साहित्यिक जीवन प्राप्त किया। भक्ति ने कविता की भाषा को क्रान्तिकारी ढंग से बदला। भक्ति-कविता ने काव्यभाषा का जनतांत्रीकरण ही नहीं किया, उसे रचनात्मक नवाचारों से गूँथ दिया।
कबीर की क्रान्तिकारी विरासत को अक्सर आधुनिक यथास्थितिवादियों व सुधारवादियों ने एक खास तरह से संकुचित किया। हिन्दू-मुसलमान एकता का लक्ष्य रखनेवाले विचारकों और नेताओं ने एक खास तरह से उन्हें समन्वयवाद में सीमित करने की कोशिश की। नामवर जी कबीर के रास्ते को अन्य मार्गों से अलग निरूपित करते हुए कबीर की क्रान्तिकारिता को इस प्रकरण में भी पुनः स्थापित करने की कोशिश करते हैं।
आधुनिक साम्प्रदायिकता के विकास ने भक्ति कविता की प्रासंगिकता में एक नया आयाम जोड़ा है और उसके मानवीय आदर्शों के मूल्य को कई गुना बढ़ा दिया है। इस संदर्भ में भी नामवर जी के भक्ति-कविता संबंधी विचारों को वापस देखने की जरूरत है।
इस पुस्तक में उनके भक्ति कविता और कबीर सम्बन्धी आलेखों, व्याख्यानों और साक्षात्कार-अंशों को संकलित किया गया है।
Yathaprasang
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Namwar Singh +1
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हिन्दी क्षेत्र में फासीवाद इसलिए ताकतवर हो सका है, क्योंकि शिक्षित लोग सुपढ़ होने के बजाय कुपढ़ हुए हैं। उन्होंने परम्परा, संस्कृति, धर्म, आधुनिकता, ज्ञान-विज्ञान—सबकी अतार्किक और अतिरेकी सम्प्रदायवादी-फासीवादी व्याख्याओं पर भरोसा किया है। इसलिए शिक्षित लोगों के पास जाना और उनसे बात करना जरूरी है। उनके बीच जाकर धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और जनवादी विचारों को पहुँचाना जरूरी है। उनके दिमागों में छाए हुए वैचारिक जालों को साफ करना जरूरी है। इस बात की जरूरत को प्रगतिशील आन्दोलन और नामवर जी बहुत गम्भीरता से समझते थे। इसीलिए अपने हजारों व्याख्यानों के माध्यम से नामवर जी ने प्रगतिशील नवजागरण को आगे बढ़ाया। कहना न होगा कि नामवर सिंह आधुनिक हिन्दी के सबसे बड़े संवादी हैं। जिस अर्थ में महात्मा गांधी आधुनिक भारत के। वाद-विवाद संवाद को अनिवार्य मानते हुए संवाद के प्रत्येक रूप के लिए प्रस्तुत। संवादी आलोचक। साहित्य-समाज में छिड़ी चर्चाओं में अपनी मान्यताओं और तर्कों के साथ उपस्थित होकर उनमें अपने ढंग से हस्तक्षेप करना उन्हें जरूरी लगता था। रुचिकर भी। वाद-विवाद संवाद की इस प्रक्रिया में नामवर जी ने साहित्यिक और साहित्येतर विषयों, व्यक्तियों और प्रकरणों पर अपने विचार विस्तार से व्यक्त किये। कहना न होगा कि इस प्रक्रिया में वे साहित्यिक आलोचक की सीमित परिधि से बाहर निकलकर हिन्दी समाज में एक विचारक के तौर पर उभरे। यह मुख्यतः नामवर जी के व्याख्यानों का संकलन है, कुछ महत्त्वपूर्ण साक्षात्कार भी इसमें शामिल हैं। इस पुस्तक में संकलित सामग्री से गुजरते हुए आप नामवर जी की प्रतिभा के विविध आयामों से संवाद कर सकेंगे।
Kavita Ki Zameen Aur Zameen Ki Kavita
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Namvar Singh +2
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‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’, ‘छायावाद’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’ जैसी कविता-केन्द्रित पुस्तकों के लेखक प्रो. नामवर सिंह के अब तक असंकलित कविता-केन्द्रित निबन्धों का संकलन है—‘कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता’। ये निबन्ध लगभग पाँच दशकों की विस्तृत अवधि में लिखे गए थे। संस्कृत कविता से लेकर प्रगतिशील काव्यधारा और नई कविता के कवियों पर केन्द्रित निबन्ध यहाँ एक साथ संकलित हैं। साथ ही साथ कविता के प्रतिनिधि कवियों ब्रेख़्त और विशेषत: पाब्लो नेरुदा पर केन्द्रित अनेक निबन्ध यहाँ मौजूद हैं। पुस्तक का केन्द्र प्रगतिशील और नई कविता है। ‘ज्ञानोदय’ में ‘नई कविता पर क्षण भर’ शृंखला तथा उस समय के अन्य निबन्धों में हमें सहज ही ‘कविता के नए प्रतिमान’ जैसी प्रबन्धात्मक और संवादी पुस्तक के आलोचनात्मक मानस का विकास दिखाई देता है। बाद में विकसित हुई अनेक अवधारणाएँ यहाँ बीज रूप में मौजूद हैं।
नागार्जुन-शमशेर पर लिखे गए निबन्धों से गुज़रते हुए हम सहज ही लक्षित कर सकते हैं कि ये निबन्ध ‘कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक की काव्य-दृष्टि का विस्तार और स्पष्टीकरण एक साथ है। एक हद तक उसमें छूट गए महत्त्वपूर्ण रचना-संसार को फ़ोकस में लाने का एक गम्भीर प्रयास भी। एक तरह का प्रत्याख्यान। एक आलोचना प्रयास के केन्द्र में यदि मुक्तिबोध हैं तो दूसरे के केन्द्र में हैं नागार्जुन और त्रिलोचन। कहना न होगा कि इन शीर्ष कवियों के माध्यम से प्रगतिशील काव्यधारा का खंडित रहा परिदृश्य इस तरह नामवर के आलोचना संसार में रचनात्मक पूर्णता के साथ उपस्थित हो पाया है।
Kitabnama
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Namvar Singh +2
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नामवर सिंह पाठ से गहरा, आत्मीय और संवादी तादात्म्य स्थापित कर सकने वाले आलोचक थे। अपने व्याख्यानों और साक्षात्कारों में वे उपन्यासों, कहानियों, कविताओं, निबन्धों, नाटकों और आलोचना-निबन्धों पर जिस तरह बात करते थे, उससे इसकी पुष्टि होती है।
पाठ का आस्वाद करने की क्षमता आलोचक के संवेदनात्मक आधारों पर निर्भर करती है और उसका विवेचन कर पाने की शक्ति उसकी ज्ञानात्मक तैयारी पर। यदि वह अपनी तैयारी के दौरान अन्तरानुशासित होकर जीवन-जगत को देखने की दृष्टि विकसित कर पाया है, तभी वह रचना के पाठ के जीवन-जगत में फैले आधारों को देख पाएगा।
प्रत्येक कृति अन्तत: एक विशिष्ट भाषा, उसकी साहित्यिक परम्परा और विधागत विरासत से संबद्ध होती है। एक परम्परा-सजग आलोचक ही इस बात की पहचान कर सकता है कि रचना परम्परा में कहाँ और किस वैचारिक-सौन्दर्यात्मक धारा में स्थित है। नामवर सिंह एक आलोचक के रूप में ‘पाठ’ से ऐसा गहरा और संवादी रिश्ता बना पाते थे, जहाँ उनकी ये सारी खूबियाँ एक साथ देखी जा सकती हैं।
Jeevan Kya Jiya
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Namvar Singh +2
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नामवर सिंह ने आत्मकथा नहीं लिखी, इसके बावजूद उनकी आत्मकथा अंशों में प्रकाशित होती रही। इस पुस्तक में उनके वाचिक के ऐसे अंशों को एकत्र और क्रमबद्ध किया गया है कि उसे व्यवस्थित रूप में पढ़ा जा सके। बचपन के दिनों से लेकर आखिर दिनों तक की सिलसिलेवार स्मृतियाँ पहले खंड में मौजूद हैं। विशिष्ट व्यक्तियों से जुड़ी स्मृतियों को दूसरे खंड में रखा गया है। नामवर जी के रोजमर्रा के जीवन को समझने के दृष्टिकोण से डायरी का एक अंश तीसरे खंड में प्रस्तुत है। डायरी के अतिरिक्त पूरी पुस्तक में कुल मिलाकर लिखित अंश दो ही हैं : ‘एक किताब पृथ्वीराज रासो : भाषा और साहित्य’ और ‘शमशेर से वह आखिरी मुलाकात’। शेष सभी ‘नामवर का वाचिक’ हैं। समय-समय पर दिये गए व्याख्यानों और साक्षात्कारों के अंशों को जोड़कर यह 'आत्मकथा' रची गई है। नामवर-कथा को जानने में दिलचस्पी रखनेवाले पाठकों को इसमें रुचि होगी। इस पुस्तक का शीर्षक मुक्तिबोध की सुविख्यात कविता
‘अँधेरे में’ की एक पंक्ति से लिया गया है। ‘अँधेरे में’ कविता के जिस अंश से यह पंक्ति ली गई है, उसका केन्द्रीय भाव मध्यवर्ग का आत्मलोचन है। नामवर जी अक्सर इस अंश का उपयोग अपनी बातचीत में किया करते थे। ‘तद्भव’ पत्रिका में प्रकाशित सुदीर्घ स्मृति-कथा का समापन भी उन्होंने इसी अंश से किया था।
Tokri Mein Digant
- Author Name:
Anamika
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अनामिका के नए संग्रह ‘टोकरी में दिगन्त—थेरी गाथा : 2014’ को पूरा पढ़ जाने के बाद मेरे मन पर जो पहला प्रभाव पड़ा, वो यह कि यह पूरी काव्य-कृति एक लम्बी कविता है, जिसमें अनेक छोटे-छोटे दृश्य, प्रसंग और थेरियों के रूपक में लिपटी हुई हमारे समय की सामान्य स्त्रियाँ आती हैं। संग्रह के नाम में 2014 का जो तिथि-संकेत दिया गया है, मुझे लगता है कि पूरे संग्रह का बलाघात थेरी गाथा के बजाय इस समय-सन्दर्भ पर ही है। संग्रह के शुरू में एक छोटी-सी भूमिका है, जिसे कविताओं के साथ जोड़कर देखना चाहिए। बुद्ध अनेक कविताओं के केन्द्र में हैं, जो बार-बार प्रश्नांकित भी होते हैं और बेशक एक रोशनी के रूप में स्वीकार्य भी। इस नए संकलन में अनेक उद्धरणीय काव्यांश या पंक्तियाँ मिल सकती हैं, जो पाठक के मन में टिकी रह जाती हैं।
बिना किसी तार्किक संयोजन के यह पूरा संग्रह एक ऐसे काव्य-फलक की तरह है, जिसके अन्त को खुला छोड़ दिया गया है। स्वयं इसकी रचयिता के अनुसार “वर्तमान और अतीत, इतिहास और किंवदन्तियाँ, कल्पना और यथार्थ यहाँ साथ-साथ घुमरी परैया-सा नाचते दीख सकते हैं।” आज के स्त्री-लेखन की सुपरिचित धारा से अलग यह एक नई कल्पनात्मक सृष्टि है, जो अपनी पंक्तियों को पाठक पर बलात् थोपने के बजाय उससे बोलती-बतियाती है, और ऐसा करते हुए वह चुपके से अपना आशय भी उसकी स्मृति में दर्ज करा देती है। शायद यह एक नई काव्य-विधा है, जिसकी ओर काव्य-प्रेमियों का ध्यान जाएगा। समकालीन कविता के एक पाठक के रूप में मुझे लगा कि यह काव्य-कृति एक नई काव्य-भाषा की प्रस्तावना है, जो व्यंजना के कई बन्द पड़े दरवाज़ों को खोलती है और यह सब कुछ घटित होता है एक स्थानीय केन्द्र के चारों ओर। कविता की जानी-पहचानी दुनिया में यह सबाल्टर्न भावबोध का हस्तक्षेप है, जो अलक्षित नहीं जाएगा।
—केदारनाथ सिंह
Saptaparna
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Mahadevi Verma
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मनुष्य की स्थूल पार्थिव सत्ता उसकी रंग-रूपमयी आकृति में व्यक्त होती है। उसके बौद्धिक संगठन से जीवन और जगत सम्बन्धी अनेक जिज्ञासाओं, उनके तत्त्व के शोध और समाधान के प्रयास, चिन्तन की दिशा आदि संचालित और संयमित होते हैं! उसकी रागात्मक वृत्तियों का संघात उसके सौन्दर्य-संवेदन, जीवन और जगत के प्रति आकर्षण-विकर्षण, उन्हें अनुकूल और मधुर बनाने की इच्छा, उसे अन्य मानवों की इच्छा से सम्पृक्त कर अधिक विस्तार देने की कामना और उसकी कर्म-परिणति आदि का सर्जक है।
Naye Yug Mein Shatru
- Author Name:
Mangalesh Dabral +1
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एक बेगाने और असन्तुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं—अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल के अन्तराल से आए इस संग्रह का शीर्षक चार ही लफ़्ज़ों में सब कुछ बता देता है : उनकी कला-दृष्टि, उनका राजनीतिक पता-ठिकाना, उनके अन्तःकरण का आयतन।
यह इस समय हिन्दी की सर्वाधिक समकालीन और विश्वसनीय कविता है। भारतीय समाज में पिछले दो-ढाई दशक के फासिस्ट उभार, साम्प्रदायिक राजनीति और पूँजी के नृशंस आक्रमण से जर्जर हो चुके लोकतंत्र के अहवाल यहाँ मौजूद हैं और इसके बरक्स एक सौन्दर्य-चेतस कलाकार की उधेड़बुन का पारदर्शी आकलन भी। ये इक्कीसवीं सदी से आँख मिलाती हुई वे कविताएँ हैं जिन्होंने बीसवीं सदी को देखा है। ये नए में मुखरित नए को भी परखती हैं और उसमें बदस्तूर जारी पुरातन को भी जानती हैं। हिन्दी कविता में वर्तमान सदी की शुरुआत ही ‘गुजरात के मृतक का बयान’ से होती है।
ऊपर से शान्त, संयमित और कोमल दिखनेवाली, लगभग आधी सदी से पकती हुई मंगलेश की कविता हमेशा सख्तजान रही है—किसी भी चीज़ के लिए तैयार। इतिहास ने जो ज़ख़्म दिए हैं उन्हें दर्ज करने, मानवीय यातना को सोखने और प्रतिरोध में ही उम्मीद का कारनामा लिखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध। यह हाहाकार की ज़बान में नहीं लिखी गई है; वाष्पिभूत और जल्दी ही बदरंग हो जानेवाली भावुकता से बचती है। इसकी मार्मिकता स्फटिक जैसी कठोरता लिए हुए है। इस मामले में मंगलेश ‘क्लासिसिस्ट’ मिज़ाज के कवि हैं—सबसे ज़्यादा तैयार, मँजी हुई और तहदार ज़बान लिखनेवाले।
मंगलेश असाधारण सन्तुलन के कवि हैं—उनकी कविता ने न यथार्थ-बोध को खोया है, न अपने निजी संगीत को। वे अपने समय में कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों को अच्छे से सँभाले हुए हैं और इस कार्यभार से दबे नहीं हैं। मंगलेश के लहज़े की नर्म-रवी और आहिस्तगी शुरू से उनके अकीदे की पुख़्तगी और आत्मविश्वास की निशानी रही है। हमेशा की तरह जानी-पहचानी मंगलेशियत इसमें नुमायाँ है।
और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो सकती है कि इन कविताओं में वह साजे-हस्ती बे-सदा नहीं हुआ है जो ‘पहाड़ पर लालटेन’ से लेकर उनके पिछले संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ में सुनाई देता रहा था। ‘नए युग में शत्रु’ में उसकी सदा पूरी आबो-ताब से मौजूद है।
—असद ज़ैदी।
Main Jab Tak Aayi Bahar
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Gagan Gill
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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
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