Shanti Parv
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आशीष त्रिपाठी की कविताएँ हमारे समय की कई आन्तरिक परतों को भेदते और उधेड़ते हुए, उसके अन्तर्विरोधों और विडम्बनाओं से होकर अपने समय का वास्तविक चेहरा तलाश करने की कोशिश करती हैं। संग्रह में शामिल कविता ‘काला सूर्य’ में कवि देख पाता है कि इस समय जब उजाले की वह भाषा, जिसकी संधि में करोड़ों लोगों की निर्मलता समाई हुई थी, उस पर कालिमा के शब्द और वाक्य छाते जा रहे हैं। उस भाषा में प्रश्न करने के अधिकार और असहमति को बेदख़ल कर दिया गया है। उजले सूर्य आकाशगंगा से और उजली ऋचाएँ भाषा से बाहर फेंक दी गई हैं। धीरे-धीरे सब कुछ गिर रहा है। यह सिर्फ़ भाषा का संकट नहीं है। भाषा की नब्ज़ में समाज के शरीर की सारी व्याधियों का हालचाल छिपा है। कवि इस नब्ज़ पर अपनी उँगलियाँ रखकर, हमें हमारे आसपास घटित प्रकट-अप्रकट को दिखाने का उपक्रम करता है। ‘काला सूर्य’ विराट कास्मिक बिम्ब की अनुगूँजों से भरी कविता है।</p> <p>आशीष की कविता की भाषा का तापमान अक्सर बहुत संयत बना रहता है। भावों की रास कवि के हाथ से कभी छूटती नहीं। उसका आलोचकीय विवेक हमेशा जागृत रहता है। उसकी विविधता उसके विषयों और दृश्यों में प्रकट होती है। वह बहुत महीन आब्ज़र्वेशन से प्रकट के भीतर छिपे अप्रकट को विचक्षणता से दिखा देते हैं। आशीष की कविता को पढ़ते हुए जितना उसे सुना जा सकता है, उतना ही उसे देखा भी जा सकता है। वह जितनी शब्द में है उतनी ही दृश्य में भी है। </p> <p>कहना न होगा कि आशीष की कविता में एक क़िस्म का नाटक उसके अन्तरतल में लगातार बना रहता है। नाटक उसकी कविता की सरंचना में विन्यस्त है। ‘तुम्हारा अभिनय’, ‘गहनों की दुकान’, ‘मुखौटा’ आदि कई कविताएँ इसकी गवाही देती हैं। जीवन में जटिलताएँ बढ़ रही हैं और वो व्यक्ति के व्यवहार को भी पहले के बनिस्बत अधिक जटिल बना रही हैं। आशीष की कविता इन जटिलताओं को उकेरते हुए भी अपनी बनक में सहज बनी रहती है।</p> <p>आशीष की कविताएँ एक ऐसा गीत भी हैं जिसमें ‘बातों की कुल्हाड़ी से समय के पहाड़ के कटते जाने’ और ‘पनछुछही और ठंडी चाय की सबसे अच्छी चुस्कियाँ’ भी हैं।</p> <p>—राजेश जोशी</p> <p>
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आशीष त्रिपाठी की कविताएँ हमारे समय की कई आन्तरिक परतों को भेदते और उधेड़ते हुए, उसके अन्तर्विरोधों और विडम्बनाओं से होकर अपने समय का वास्तविक चेहरा तलाश करने की कोशिश करती हैं। संग्रह में शामिल कविता ‘काला सूर्य’ में कवि देख पाता है कि इस समय जब उजाले की वह भाषा, जिसकी संधि में करोड़ों लोगों की निर्मलता समाई हुई थी, उस पर कालिमा के शब्द और वाक्य छाते जा रहे हैं। उस भाषा में प्रश्न करने के अधिकार और असहमति को बेदख़ल कर दिया गया है। उजले सूर्य आकाशगंगा से और उजली ऋचाएँ भाषा से बाहर फेंक दी गई हैं। धीरे-धीरे सब कुछ गिर रहा है। यह सिर्फ़ भाषा का संकट नहीं है। भाषा की नब्ज़ में समाज के शरीर की सारी व्याधियों का हालचाल छिपा है। कवि इस नब्ज़ पर अपनी उँगलियाँ रखकर, हमें हमारे आसपास घटित प्रकट-अप्रकट को दिखाने का उपक्रम करता है। ‘काला सूर्य’ विराट कास्मिक बिम्ब की अनुगूँजों से भरी कविता है।</p>
<p>आशीष की कविता की भाषा का तापमान अक्सर बहुत संयत बना रहता है। भावों की रास कवि के हाथ से कभी छूटती नहीं। उसका आलोचकीय विवेक हमेशा जागृत रहता है। उसकी विविधता उसके विषयों और दृश्यों में प्रकट होती है। वह बहुत महीन आब्ज़र्वेशन से प्रकट के भीतर छिपे अप्रकट को विचक्षणता से दिखा देते हैं। आशीष की कविता को पढ़ते हुए जितना उसे सुना जा सकता है, उतना ही उसे देखा भी जा सकता है। वह जितनी शब्द में है उतनी ही दृश्य में भी है। </p>
<p>कहना न होगा कि आशीष की कविता में एक क़िस्म का नाटक उसके अन्तरतल में लगातार बना रहता है। नाटक उसकी कविता की सरंचना में विन्यस्त है। ‘तुम्हारा अभिनय’, ‘गहनों की दुकान’, ‘मुखौटा’ आदि कई कविताएँ इसकी गवाही देती हैं। जीवन में जटिलताएँ बढ़ रही हैं और वो व्यक्ति के व्यवहार को भी पहले के बनिस्बत अधिक जटिल बना रही हैं। आशीष की कविता इन जटिलताओं को उकेरते हुए भी अपनी बनक में सहज बनी रहती है।</p>
<p>आशीष की कविताएँ एक ऐसा गीत भी हैं जिसमें ‘बातों की कुल्हाड़ी से समय के पहाड़ के कटते जाने’ और ‘पनछुछही और ठंडी चाय की सबसे अच्छी चुस्कियाँ’ भी हैं।</p>
<p>—राजेश जोशी</p>
<p>
Book Details
-
ISBN9789360866280
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अदनान कफ़ील ‘दरवेश’ की कविता को पढ़ते हुए लगता है जैसे हम अपने समय में फिर से दाख़िल हो रहे हैं। यह एक गतिमान समय है जिसमें आगे-पीछे आवाजाही करते हुए जितना आप अतीत में जाते हैं उतना ही वर्तमान में और भविष्य में भी। कवि ने समय की जो विभाजक रेखा बनाई है, वह स्वयं भी उस रेखा से पीछे जाकर ही वर्तमान के चेहरे के नाक-नक़्श उकेरता है। इस समय की ठीक-ठीक शक्ल पहचानने के लिए शायद समय में यह आवाजाही ज़रूरी है। बिना इसके इसे पहचानना सम्भव नहीं है।
वर्तमान, जिसकी विडम्बनाओं, विद्रूपताओं और नई तकनीकों के प्रतिदिन बदलते चेहरे को हम जानते हैं। उसकी बर्बरता और अमानवीयता को हम जानते हैं और समय की गति को अचानक बदल देने वाले परिवर्तनों को भी हमने बहुत क़रीब से देखा है। लेकिन अदनान की कविता को पढ़ने के बाद चीज़ें ज़्यादा साफ़ नज़र आने लगती हैं। जैसे हमारे ऐनक का नम्बर एकाएक बदल गया हो। शायद इस कविता की एक बड़ी ख़ूबी यह भी है कि वह प्रत्यक्षतः जानने और कविता को पढ़कर जानने के बीच के अन्तर का एहसास हमें कराती है। अदनान की कविता बहुत मुखर होकर स्वयं बहुत ऊँची आवाज़ में नहीं बोलती, जीवन की वास्तविकताएँ ही उसमें से बोलती हैं। इसलिए उसकी आवाज़ ज़्यादा विश्वसनीय लगती है। उसकी कविता में वाचिक कविता जैसा प्रवाह और उसकी प्रति-गति कविता के क़द को ऊँचा कर देती है। वह हमारी संवेदनाओं को झिंझोड़कर जागृत कर देती है और चीज़ों और स्थितियों के प्रति ज़्यादा वस्तुनिष्ठ बना देती है।
अदनान की कविता अपनी अस्मिता और परम्पराओं को बचाते हुए हमारे समय के सांस्कृतिक आघात के प्रति असहमति और प्रतिरोध की कविता है। वह हिन्दी कविता के अनुभवों के लैंडस्केप को अपने अनुभवों और मिथकों से पूरा करने की बहुत सजग कोशिश है।
–राजेश जोशी
Ummeed Se Banate Hain Raste
- Author Name:
Santosh Kumar Chaturvedi
- Book Type:

- Description: संतोष कुमार चतुर्वेदी के इस संग्रह की कविताएँ भूलने के खिलाफ रचनाधर्मी विपक्ष के अस्तित्ववान होने का गवाह बनती हैं। अपनी समस्त रचनाधर्मिता के साथ जहाँ विपक्ष हो, वहाँ विचारों के चौराहे अनिवार्यत: होंगे ही। सुकरात और बुद्ध से ले कर मुक्तिबोध, धूमिल और आगे भी विपक्ष की रचनाधर्मिता ने इन चौराहों को बनाते हुए और इन्हीं चौराहों पर स्वयं को बनते हुए देखा है, विकल्पहीनता के हर दौर में विकल्पों को सृजित कर सता के नशे में चूर गढ़ों और मठों को ध्वस्त किया है। कविता के पास चीजों को ‘हटकर देखने’ की आँख होती है । इस संग्रह की ज्यादातर कविताएँ इसका उदाहरण हैं। कील-कब्जे, कूड़ा करकट, पोस्टमॉर्टम, पासंग जैसी कविताएँ ‘दृश्य’ के दबाव में ‘अदृश्य’ रह गयी श्रमशीलता की महत्ता को पूरी संवेदना के साथ उजागर करती हैं। एक समूचा ‘अदृश्य’ परिवेश हमारे सामने कौंध उठता है जो ‘दृश्यता’ के भारी-भरकम तामझाम को अपने श्रम के बूते थामे हुए है। कविता के असुविधाजनक और संघर्ष भरे पथ पर हर कोई नही चल सकता। ग़ालिब नें यों ही नहीं कहा था कि ‘जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।’ हर ‘छोटे’ और ‘बड़े’ कवि को हर दौर में हर कदम पर अपना आत्मविश्वास अर्जित करना पड़ता है, दुनियादारी के सर्वग्रासी खोल से बाहर निकल कर दुनिया का सामना करने के लिए। संतोष के कवि के पास यह आत्मविश्वास फिलवक्त है जो हिन्दी कविता के लिए आश्वस्ति की तरह है। —प्रियम अंकित
Meri Kavitai Ki Aadhi Sadi
- Author Name:
Harivansh Ray Bachchan
- Book Type:

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Description:
प्रस्तुत कृति बच्चन की बावन कविताओं का संकलन है जिनमें से पैंतालीस उनके पूर्व प्रकाशित चौबीस संग्रहों से चुनी गई हैं और सात कविताएँ यहाँ पहली बार प्रकाशित की जा रही हैं।
बच्चन ने इस सदी के तीसरे दशक की समाप्ति पर लिखना आरम्भ किया था, और आठवें दशक के अन्त तक लिखते रहे हैं। ज़ाहिर है, उन्हें द्विवेदीयुगीन प्रतिष्ठित और छायावादी प्रयोगात्मक काव्य-शैली दाय के रूप में मिली थी।
फिर भी काव्य-क्षेत्रा में पदार्पण करने पर एक प्रख्यात समालोचक ने उनके बारे में लिखा था, ‘‘...बच्चन सारा ढाँचा बदलकर आए...नई भाषा, नई अभिव्यंजना और नए क़िस्म की अनुभूति—उनका सब कुछ नया ही नया है।’’
इस अभिनव भूमि से प्रस्थान करके बच्चन ने जो काव्य-यात्रा लगभग पचास वर्षों तक की है, और उनके दौरान उनकी भाषा भाव-भंगिमा में जो परिवर्तन आते रहे हैं उनकी साक्षी है यहाँ प्रस्तुत ये कविताएँ—उनके सफ़र के ख़ास-ख़ास पड़ाव के रूप में।
हम आपको कवि के साथ एक बार इस काव्य-यात्रा पर निकलने और इन शब्द-पड़ावों पर ठहरने के लिए आमन्त्रित करते हैं।
Kamayani : Moolpath Evam Teeka
- Author Name:
Vishvambhar 'Manav'
- Book Type:

- Description: ‘कामायनी’ एक महाकाव्य है। इसकी प्रधान पात्र श्रद्धा है। काम की पुत्री होने के कारण उसका दूसरा नाम कामायनी भी है। प्रसाद जी ने इस गरिमामयी नारी को सम्मान देने के लिए ही अपने महाकाव्य का नाम ‘कामायनी’ रखा है। इसकी कथा का आधार ‘ऋग्वेद’, ‘छांदोग्य’ ‘उपनिषद्’, ‘शतपथ ब्राह्मण’ और ‘श्रीमद्भागवत’ है। घटनाओं का चयन प्रसाद ने मुख्यत: ‘शतपथ ब्राह्मण’ से किया है। उसमें मनु, श्रद्धा, इड़ा, किलात और आकुलि के नाम आए हैं। जल-प्लावन की घटना का उसमें कुछ विस्तार से वर्णन है। मनु देव-जाति में उत्पन्न होने पर भी मानवों के आदि पुरुष हैं। इसी से उनमें देवत्व और मानवत्व के सम्मिलित संस्कार पाए जाते हैं। इस पात्र की महत्ता इस बात में निहित है कि उसके माध्यम से देव-संस्कृति के विनाश के उपरान्त मानव-सभ्यता के विकास की कहानी कही गई है। ‘कामायनी’ में मनु, श्रद्धा और इड़ा, मन, हृदय और बुद्धि के प्रतीक हैं। इस दृष्टि से यह कृति अन्त:करण में वृत्तियों के विकास की गाथा भी कहती है। ‘कामायनी’ में सर्गों का नामकरण इन्हीं वृत्तियों के आधार पर हुआ है। यह मानवीय मनोविकारों का विराट रूपक है।
Tarapath
- Author Name:
Sumitranandan Pant
- Book Type:

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Description:
‘तारापथ’ का यह परिवर्धित संस्करण पंत जी के समग्र काव्य-साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है। ‘वीणा’ से लेकर अधुनातन कृति ‘संक्रान्ति’ तक के काव्य-संग्रहों से उनकी रचनाओं का सुरुचिपूर्ण चयन इसमें प्रस्तुत किया गया है। इस संकलन की विशेषता यह है कि इसमें पंत जी की नवीनतम कृतियों का प्रतिनिधित्व पाठकों को मिलेगा।
पंत जी ने इस युग को एक ‘महासंक्रान्ति युग’ कहा है। इस महासंक्रान्ति काल की कविता में आस्था और लोकमंगल को प्रतिष्ठित करना किसी भी साधारण प्रतिभा और जीवन-दृष्टि के कवि के बूते के बाहर की बात है। जबकि विघटन, विशृंखलता, नैतिक मूल्यों का ह्रास चारों ओर दिखाई पड़ रहा है, उसमें महाकवि पंत का यह स्वप्न (‘मुझे स्वप्न दो, मुझे स्वप्न दो’) एक महान जीवन और विराट आस्था की परिकल्पना करता है। यही वह सन्देश है, जो समस्त पंत-काव्य के अन्दर-ही-अन्दर प्रवाहित होता हुआ हमें मिलता है।
उनका समस्त काव्य अन्तर्मुखता का काव्य न होकर आत्मोत्कर्ष का काव्य है। यह आत्मोत्कर्ष अपनी समग्र संरचना में एक सार्वभौमिक शुभेच्छा तक ले जाता है। इसीलिए उनका काव्य अतीतोन्मुख न होकर वर्तमान के फलक पर भविष्योन्मुखी काव्य है। यह सार्वभौमिक शुभेच्छा ही वह तत्त्व है, जिसके भीतर से कवि पंत ने विश्व-मानव और नव-मानव की परिकल्पना को अपनी कविता में सार्थक किया है। अपनी सम्पूर्ण काव्य-सम्पदा के भीतर से उन्होंने एक नए और निजी अध्यात्म की रचना की है। यह अध्यात्म अपनी मंगलकामना में निजी होते हुए भी ‘स्व’ भावना से पूर्णतया मुक्त है।
Braj Ritusanhar
- Author Name:
Prabhudyal Meetal
- Book Type:

- Description: “हिन्दी की परम्परा और सर्जनात्मक वैभव का बहुत बड़ा हिस्सा ब्रज काव्य है। ब्रज काव्य में भक्ति, शृंगार और प्रकृति पर केन्द्रित कविताएँ अपनी विपुलता, विविधता और काव्य-कौशल के लिए विख्यात रही हैं। उनमें सौन्दर्य को भाषिक सौन्दर्य में रूपान्तरित करने की अद्भुत क्षमता दीख पड़ती है। लगभग सात दशकों पहले मथुरा के एक विद्वान–रसिक श्री प्रभुदयाल मीतल ने ‘ब्रजभाषा साहित्य का ऋतु-सौन्दर्य’ नाम से प्रकृति-काव्य का एक संचयन प्रकाशित किया था जिसकी प्रस्तावना महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने लिखी थी। अपनी परम्परा के स्मृति-लोप के इस अभागे समय में इसे ‘ब्रज ऋतुसंहार’ शीर्षक से पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत ऐसे गौरवग्रन्थों को फिर से पाठकों के सामने लाने का यह एक उपक्रम है। स्मृति के पुनर्वास की एक चेष्टा।” —अशोक वाजपेयी
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