Madhumas Utar Aya
Author:
Kashiram SoniPublisher:
Shivna PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 160
₹
200
Available
poetry-and-plays
ISBN: B0D53SX6LP
Pages: 124
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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राजभवन की सुख-समृद्धि तथा ऐश्वर्य और भोग-विलास को ही नहीं वरन् यशोधरा जैसी पत्नी तथा राहुल जैसे एकमात्र पुत्र का परित्याग करके निर्वाण के मार्ग में निकले भगवान बुद्ध की कथा इतनी महान बनी कि स्वयं बौद्ध धर्म के जन्म और विस्तार की प्रेरक कथा बन गई।
मैथिलीशरण गुप्त मूलत: कवि थे, जो राष्ट्रकवि बन गए। अत: उन्होंने भगवान बुद्ध की कथा को काव्य-कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। इस रचना में गुप्त जी ने यशोधरा के त्याग की परम्परा को मुख्य रूप से उद्घोषित किया है, जिसने भगवान बुद्ध के राजभवन लौटने और स्वयं यशोधरा के कक्ष में उससे भेंट करने जाने पर अपने बेटे राहुल का महान पुत्रदान देकर अपने मन की महानता को प्रतिष्ठित किया। राष्ट्रकवि की यह रचना मनोरंजक ही नहीं, प्रेरक भी है।
Kashtiyon Wala Safar
- Author Name:
Satyamohan Verma
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सत्यमोहन की कविताएँ दो स्तरों पर विकसित होती हैं—एक सामाजिक अनुभूति और दूसरा व्यक्तिगत द्वंद्व। उनकी कविताओं का शिल्प बहुत सुगठित है। उनके प्रयोग नई कविताएँ और नवगीत की भावभूमि पर ले जाते हैं।
—दिनकर सोनवलकर
सघन वैचारिकता और आकांक्षा सत्यमोहन की रचनाओं की अपनी ख़ासियत है। इनमें आस्थामय सम्भावनाएँ हैं और जीवन की रंगोली सजाने की कोशिश है। सत्यमोहन का कवि यथार्थ की क्रूरताओं से वाक़िफ़ है और प्रकृति के सहज चित्रों से तन्मयता से आबद्ध। वह सजग अभिव्यक्ति का धनी है।
—डॉ. संतोष कुमार तिवारी
सत्यमोहन वर्मा कविताओं के बनते-बदलते तेवरों के न केवल साक्षी हैं—उनका उनमें रचनात्मक हस्तक्षेप भी है। उन्होंने यथेष्ट लिखा है और अभी भी अनन्त अनकहे के धनी हैं। असन्तोष से उपजा उन्मेष उनकी कविताओं और ग़ज़लों में प्रभावी अभिव्यक्ति बन गया है।
—प्रो. सरोज कुमार
सत्यमोहन और उनकी रचनाओं की पूरी बनावट प्यार से प्यार तक की अनन्त यात्रा है। उनकी कविताएँ, गीत, ग़ज़लें विराट होने का दम नहीं भरतीं किन्तु इनमें अनेक स्वर और रंग हैं जिनकी ताज़गी मन को छूती है।
—डॉ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य
Neend Mein Ek Gharelu Stri
- Author Name:
Ram Kumar Aatrey
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- Description: Poems
Samay Ke Pass Samay
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
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प्रेम, मृत्यु और आसक्ति के कवि अशोक वाजपेयी ने इधर अपनी जिजीविषा का भूगोल एकबारगी बदल दिया है : वे कहेंगे बदला नहीं, सिर्फ़ उसमें शामिल कुछ ऐसे अहाते रौशन भर कर दिए हैं जो पहले भी थे पर लोगों को नज़र नहीं आते थे। अपनी निजता को छोड़े बिना उनकी कविता की दुनिया अब कुछ अधिक पारदर्शी और सार्वजनिक है। उसमें अब एक नए क़िस्म की बेचैनी और प्रश्नाकुलता विन्यस्त हो रही है।
समय, इतिहास, सच्चाई आदि को लेकर बीसवीं शताब्दी के अन्त में जो दृश्य हाशिये पर से दीखता है, उसे अशोक वाजपेयी अपनी कविता के केन्द्र में ले आए हैं। जुड़ाव-उलझाव के कुछ बिलकुल अछूते प्रसंग उनकी पहली लम्बी कविता में कुम्हार, लुहार, बढ़ई, मछुआरा, कबाड़ी और कुंजड़े जैसे चरित्रों के मर्मकथनों से अपनी पूरी ऐन्द्रियता और चारित्रिकता के साथ प्रगट हुए हैं। उनका पुराना पारिवारिक सरोकार अपने पोते के लिए लिखी गई दो कविताओं में दृष्टि और अनुभव के अनूठे रसायन में चरितार्थ होता है।
एक बार फिर अशोक वाजपेयी की आवाज़ नए प्रश्न पूछती, नई बेचैनी व्यक्त करती और कविता को वहाँ ले जाने की कोशिश करती है जहाँ वह अक्सर नहीं जाती है। अब उनका काव्यदृश्य सयानी समझ और उदासी से, सयानी आत्मालोचना से आलोकित है, उसमें किसी तरह अपसरण नहीं है—कवि अपनी दुनिया में अपनी सारी अपर्याप्तताओं और निष्ठा के साथ शामिल है। कविता उसके इस अटूट उलझाव का साक्ष्य है।
Hanso Hanso Jaldi Hanso
- Author Name:
Raghuvir Sahay
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रघुवीर सहाय विडम्बना के खोजी कवि हैं। समाज और उसके ऊपर-नीचे खड़ी-पड़ी तमाम संरचनाओं, यथा राजनीति, शासन-प्रशासन और ताक़त से बने या ताक़त से बिगड़े अनेक मूर्त-अमूर्त फ़ॉर्म्स को वे एक नई और असंलग्न निगाह से देखते हैं। इस बहुपठित-बहुचर्चित संग्रह की अनेक कविताएँ, जिनमें अत्यन्त प्रसिद्ध कविता, 'रामदास' भी है उनकी उसी असंलग्नता के कारण इतनी भीषण बन पड़ी है। वह असंलग्नता जो अपने समाज से बहुत गहरे, बेशर्त जुड़ाव के बाद किसी शुभाकांक्षी मन का हिस्सा बनती है।
वे इस समाज और उसको चला रही व्यवस्था को बदलने की इतनी गहरी आकांक्षा से बिंधे थे कि कविता भी उन्हें कवि न बनाकर एक चिन्तित सामाजिक के रूप में प्रक्षेपित करती थी। इसीलिए उनकी हर कविता अपनी पूर्ववर्ती कविता के विस्तार की तरह नहीं, एक नई शाखा की तरह प्रकट होती थी। यह संग्रह अपने संयोजन में स्वयं इसका साक्षी है कि हर कविता न तो शिल्प में, और न ही भाषा में अपनी किसी परम्परा का निर्माण करने की चिन्ता करती दिखती और न किसी और काव्य-परम्परा का निर्वाह करती। हर बार उनका कवि समाज नामक दु:ख के इस विस्तृत पठार में एक नई जगह से उठता दिखाई देता है और पीड़ा के एक नए रंग, नए आकार का ध्वज लेकर।
ये कविताएँ बार-बार पढ़ी गई हैं और बार-बार पढ़े जाने की माँग करती हैं। आज भी, क्योंकि, हमारे समूह-मन की जिन दरारों की ओर इन कविताओं ने संकेत किया था, आज वे और गहरी हो गई हैं।
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