Madhumas Utar Aya
(0)
₹
200
₹ 160 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
poetry-and-plays
Read moreAbout the Book
poetry-and-plays
Book Details
-
ISBNB0D53SX6LP
-
Pages124
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Main Boond Swayam, Khud Sagar Hoon
- Author Name:
Ashutosh Agnihotri
- Book Type:

-
Description:
‘मैं बूंद स्वयं, खुद सागर हूँ’ कवि आशुतोष अग्निहोत्री का चौथा कविता-संग्रह है। इस कविता-पुस्तक में उन्होंने अपनी जिन कविताओं को प्रस्तुत किया है, वे एक सजग, संवेदनशील और संवादधर्मी सामाजिक मनुष्य के सम्पूर्ण संसार को प्रतिबिम्बित करती है। प्रकृति, ईश्वर, समाज, परिवार और देश ने कवि को जो दिया, यह संकलन उसका कृतज्ञता ज्ञापन है, कोई भी पाठक जिसे पढ़ते हुए अपने ही भावोद्गार समझेगा।
‘स्नेह’, ‘प्रेम’, ‘धर्म’, ‘देश’, ‘दर्शन’ और ‘प्रेरणा’—इन छह उपशीर्षकों के तहत कवि ने यहाँ उन तमाम स्रोतों को अपने भाव समर्पित किए हैं जो मनुष्य मात्र के जीवन का आधार हैं, जहाँ से वह जीने की, सिरजने की, आगे बढ़ने और स्वयं को सार्थक करने की प्रेरणा ग्रहण करता है।
ये कविताएँ हमें हमारी उन अनुभूतियों को व्यक्त करने का बहाना बनती हैं, जिन्हें हम अपने भीतर तो रखते हैं लेकिन उचित शब्दावली और सम्यक लय के साथ व्यक्त नहीं कर पाते। इसीलिए ये कविताएँ सबकी हैं—उनकी भी जो काव्य-आस्वाद के अनुभवी लोग हैं, और उनकी भी जो पहली बार इन्हें पढ़ेंगे, और सदैव के लिए अपने अन्तस में सँजो लेंगे। एक भाव सम्पन्न कविता-संग्रह जिसकी कविताओं का पाठ आप अपनों के बीच बैठकर बार-बार करना चाहेंगे।
Naye Varsh Ki Subha
- Author Name:
Gerdur Kristny
- Book Type:

- Description: 1970 में रेकजाविक, आइसलैंड में जन्मी गेरदुर क्रिस्ट्नी गुद्योंसदोत्तिर एक बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न लेखिका हैं, जिन्होंने रचनात्मक लेखन की विभिन्न विधाओं में अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है। कहानियाँ, नाटक, यात्रा-संस्मरण लिखे हैं। स्कूली बच्चों के लिए पाठ्य-पुस्तकें लिखी हैं। इन सबके साथ-साथ पत्रकार के रूप में भी विशेष ख्याति अर्जित की है। कई वर्षों तक आइसलैंड की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘मैनलिफ़’ की मुख्य सम्पादक रहीं और फ़ैशन लाइफ़-स्टाइल के साथ-साथ समसामयिक सामाजिक विषयों पर गम्भीर विश्लेषणात्मक लेख लिखे। गैरदुर को प्रकृति से बेहद प्यार है जो उनकी ‘प्रकृति’ कविता में स्पष्ट झलकता है। वे ईश्वर की उपस्थिति को बड़ी शिद्दत के साथ प्रकृति में महसूस करती हैं। ईश्वर एक सर्जनात्मक ऊर्जा के साथ उनकी कविताओं में मौजूद है। कवि को ‘लैंगनेस’ कविता में ‘बंजर में फूटती आवाज़ों की फुसफुसाहट’ में ईश्वर का प्रतिरूप दिखाई देता है। इसी तरह एक कविता में प्रेम और ऊन से बुनी शिशु यीशु की शॉल उन स्त्रियोचित गुणों को रेखांकित करती है जिनसे वह पूरे मानवीय समाज को सम्पृक्त करना चाहती हैं। उनकी कविता ‘चियर्स’ में सृष्टि की उत्पत्ति दो रूपों में व्यंजित हुई है—एक का सन्दर्भ है ईसाई धर्मग्रन्थ जैनेसिस में आई दन्तकथा तो दूसरे का सन्दर्भ है योहान सिगुरजनसन की आइसलैंड की अत्यन्त लोकप्रिय कविता ‘द कप’।
Gubare-Ayyaam
- Author Name:
Faiz Ahmed 'Faiz'
- Book Type:

- Description: ‘ग़ुबारे-अय्याम’ फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ की आख़िरी कविता पुस्तक है जिसका प्रकाशन उनके निधन के बाद हुआ था। साल 1981 से 1984 के बीच लिखी गईं इन नज़्मों और ग़ज़लों का मुख्य स्वर अपने पूरे जीवन पर दृष्टिपात करने जैसा है। जैसाकि हमें मालूम है उनका निजी और सार्वजनिक जीवन असाधारण ढंग से घटनाप्रधान रहा। जेल भी गए और जीवन के कई साल निर्वासन में भी गुज़ारे। ‘ग़ुबारे-अय्याम’ की पहली कविता ‘तुम ही कहो क्या करना है’ में फ़ैज़ ने प्रगतिशील सोच वाले उन तमाम लोगों के संघर्ष को शब्द दिए हैं जिन्होंने पूरी मानवता के लिए बराबरी और इज़्ज़त के सपने देखे थे; जो जवान हौसलों के साथ एक बड़ी दुनिया बनाने निकले थे, लेकिन उन्हें गहरी निराशा मिली—‘जब अपनी छाती में हमने/इस देस के घाओ देखे थे/था वेदों पर विश्वास बहुत/और याद बहुत से नुस्ख़े थे/...’ पर घाव इतने पुराने और जटिल थे कि ‘वेद इनकी टोह को पा न सके/और टोटके सब बेकार गए’। ‘ग़ुबारे-अय्याम’ में संकलित ‘एक नग़्मा कर्बला-ए-बेरूत के लिए’, ‘एक तराना मुजाहिदीने-फ़िलस्तीन के लिए’, ‘हिज्र की राख और विसाल के फूल’ तथा ‘आज शब कोई नहीं है’ जैसी नज़्में और ग़ज़लें उनके आख़िरी दिनों की पीड़ा को व्यक्त करती हैं लेकिन उम्मीद से ख़ाली वे भी नहीं हैं।
Geetanjali
- Author Name:
Rabindranath Thakur
- Book Type:

- Description: ‘गीतांजलि’ गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर (1861-1941) की सर्वाधिक प्रशंसित और पठित पुस्तक है । इसी पर उन्हें 1913 में विश्वप्रसिद्द नोबेल पुरस्कार भी मिला । इसके बाद अपने पुरे जीवनकाल में वे भारतीय साहित्याकाश पर छाए रहे । साहित्य की विभिन्न विधाओं, संगीत और चित्रकला में सतत सृजनरत रहते हुए उन्होंने अंतिम साँस तक सरस्वती की साधना की और भारतवासियों के लिए ‘गुरुदेव’ के रूप में प्रतिष्ठित हुए । प्रकृति, प्रेम, इश्वर के प्रति निष्ठा, आस्था और मानवतावादी मूल्यों के प्रति समर्पण भाव से संपन्न ‘गीतांजलि’ के गीत पिछली एक सदी से बांग्लाभाषी जनों की आत्मा में बसे हुए हैं । विभिन्न भाषाओँ में हुए इसके अनुवादों के माध्यम से विश्व-भर के सहृदय पाठक इसका रसास्वादन कर चुके हैं । प्रतुत अनुवाद हिंदी में अब तक उपलब्ध अन्य अनुवादों से इस अर्थ में भिन्न है कि इसमें मूल बांग्ला रचनाओं की गीतात्मकता को बरक़रार रखा गया है, जो इन गीतों का अभिन्न हिस्सा है । इस गेयता के कारण आप इन गीतों को याद रख सकते हैं, गा सकते हैं ।
Antas Ki Khurchan
- Author Name:
Yatish Kumar
- Book Type:

-
Description:
‘यतीश कुमार की कविताओं को मैंने पढ़ा। अच्छी रचना से मुझे सार्वजनिकता मिलती है। मैं कुछ और सार्वजनिक हुआ, कुछ और बाहर हुआ, कुछ अन्य से मिला, उनके साथ हुआ और उनके साथ चला।’
—विनोद कुमार शुक्ल
यतीश की कविता का कुनबा काफ़ी बड़ा है, जिसमें आवाँ जितने पात्र भरे पड़े हैं। इनका वैविध्य उनकी संवेदना की परिधि को कहीं व्यापक बनाता है तो कहीं भरमाता है। इस विचलन को हुनर में बदल देने की सम्भावना और भरपूर क्षमता उनके कवित्व में मौजूद है, जिसका प्रमाण हैं इस संकलन की कविताएँ।
—अष्टभुजा शुक्ल
Is Shahar Mein Tumhen Yaad Kar
- Author Name:
Virbhadra Karkidholi
- Book Type:

-
Description:
'इस शहर में तुम्हें याद कर' संग्रह की कविताएँ इसी दुनिया में एक ऐसी धरती की कविताएँ हैं, जहाँ आसमान में जब काले बादल मँडराते हैं, धरती बिवाइयों की तरह फटती है और अपनी पीड़ा किसी से नहीं कह पाती; जहाँ कुछ लोग बाज और चील की तरह अपनी उड़ान में शामिल हैं और कुछ उन तोते-मैना की तरह हैं जिनके पंख काट दिए गए हैं; जहाँ दया और प्रेम की हत्याएँ होती हैं तो अपराधियों के अपराध की सज़ा एक निरपराध को भुगतना पड़ता है; जहाँ एक भागा हुआ आदमी भागकर भी कहीं नहीं भाग पाता, वापस वहीं आ जाता है अपनी ग़लती पुन: दुहराने; जहाँ बूट रौंदते हैं सड़कों को तो आह में बस पिघलने को अभिशप्त पर्वत देखते रह जाते हैं कि रात में श्रमिकों की ख़ुशियों को जलानेवाले ही दिन में संरक्षक हैं...। ऐस में कवि की यह अदम्य जिजीविषा ही है कि वह अपनी आग से सृजन की ही कामना करता है और कहता है—'...तुम्हारे कारावास से परे/जो जीवन है/नितान्त नवीन जीवन/वहीं से गुज़रने दो/कि मैं तुम्हारी ईश्वरीय दुनिया में/पुन: एक युग ईश्वरहीन होकर जी सकूँ!
इस संग्रह की कविताएँ अपनी पीठ पर अपना बोझ लेकर अपने पैरों से यात्रा करनेवाले कवि की कविताएँ हैं, जो अपने वितान-उद्देश्य में जितनी मनुष्यों की उतनी ही प्रकृति की हैं—सुख, दु:ख, संघर्ष और सौन्दर्य के साथ; अपनी बोली-बानी, संस्कृति और सभ्यता के साथ; बदलते समय में सत्ता और समाज के बीच निरन्तर प्रदूषित होते कारकों के साथ—इसीलिए ये कविताएँ अपने पाठक से मुखर होकर संवाद भी करती हैं।
प्रेम है, बिछुड़न है और उसकी यादें भी हैं जो कवि की अपनी ज़मीन की ऋतुओं और पर्वतों की तरह जीने की कला में शामिल हैं, और इस तरह जैसे थाह के आगे अथाह की अभिव्यक्ति हों; वह कैनवस हों जहाँ कहने-भूलने के सम्बन्धों की हार-जीत का कोई भी चित्र बनाना बेमानी है। ईश्वर है तो आध्यात्मिक चेतना के उस रूप में जिससे कुछ कहा जा सके, जिसका कुछ सुना जा सके। आँसुओं में मन की बातें देखने-समझने की ये कविताएँ जो अनूदित होने के बावजूद अपरिचित नहीं लगतीं—साथ जगते हुए जीने की कविताएँ हैं।
Ek Khushboo Tahalti Rahee
- Author Name:
Monika Hathila
- Book Type:

- Description: This book has no description
Desh
- Author Name:
Harprasad Das
- Book Type:

-
Description:
‘देश’ को उत्तर–आधुनिक महाकाव्य माना गया है। बल्कि इसे सिर्फ़ एक संरचना ही कहा जाए तो कवि को कोई आपत्ति नहीं होगी, यदि इसकी वास्तुकला में पाठक मेद, खनिज और काष्ठ के प्रयोग को पहचान ले। इस विलक्षण संरचना में बहुमुखी कल्पना का प्रयोग है, यथार्थ की एक मुख्य धारा इसमें कल्पना का स्रोत बनकर प्रवाहित होती है। किसी स्थिर बिन्दु से देश को देखने का तरीक़ा इसमें अद्भुत रूप से बदलता है। इस बदलाव में एक तीव्र और जादुई शक्ति है जो कविताओं को एकात्मकता प्रदान करती है, हालाँकि यह संरचना किसी पूर्व–निर्धारित काव्यवस्तु को प्रतिष्ठित नहीं करना चाहती।
देश की कविताओं में अनेक आरम्भ हैं और अनेक अन्त, परन्तु यह सब किसी एक निर्दिष्ट समाप्ति की ओर अग्रसर नहीं होता, बल्कि एक व्यापक असमाप्ति का निर्माण करता है। इसका उत्तर–आधुनिक रूप इसी असमाप्त निर्मिति से बनता है। ‘देश’ भूखंड है, भाग्य है, निवास है, निर्वासन है, यहाँ तक कि ‘देश’ देशान्तर है और देशोत्तर भी। विविधता के बीच अस्तित्व की यह खोज वस्तुपरकता के परे शुद्ध कविता के अन्त:करण को प्रस्तुत करती है। समकालीन भारतीय साहित्य में इस कृति को अपनी कलात्मकता की लय, लोक–चेतना की मिथकीय पुन:प्रतिष्ठा और मार्मिक अस्तित्वबोध के लिए पहचाना जाएगा।
Saare Sukhan Humare
- Author Name:
Faiz Ahmed 'Faiz'
- Book Type:

- Description: ‘सारे स़ुखन हमारे’ के रूप में समकालीन उर्दू शाइरी के अजीमुश्शान शाइर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तमाम ग़ज़लों, नज़्मों, गीतों और क़तआ’त को हिन्दी में पहली बार एक साथ प्रस्तुत किया गया है। इसमें उनका आख़िरी कलाम तक शामिल है। उर्दू शाइरी में फ़ैज़ को ग़ालिब और इक़बाल के पाये का शाइर माना गया है, लेकिन उनकी प्रतिबद्ध प्रगतिशील जीवन-दृष्टि सम्पूर्ण उर्दू शाइरी में उन्हें एक नई बुलन्दी सौंप जाती है। फूलों की रंगो-बू से सराबोर शाइरी से अगर आँच भी आ रही हो तो मान लेना चाहिए कि फ़ैज़ वहाँ पूरी तरह मौजूद हैं। यही उनकी शाइरी की ख़ास पहचान है, यानी रोमानी तेवर में ख़ालिस इन्क़लाबी बात। उनकी तमाम रचनाओं में जैसे एक अर्थपूर्ण उदासी, दर्द और कराह छुपी हुई है, इसके बावजूद वह हमें अद्भुत रूप से अपनी पस्तहिम्मती के ख़िलाफ़ खड़ा करने में समर्थ हैं। कारण, रचनात्मकता के साथ चलनेवाले उनके जीवन-संघर्ष। उन्हीं में उनकी शाइरी का जन्म हुआ और उन्हीं के चलते वह पली-बढ़ी। वे उसे अपने लहू की आग में तपाकर अवाम के दिलो-दिमाग़ तक ले गए और कुछ इस अन्दाज़ में कि वह दुनिया के तमाम मजलूमों की आवाज़ बन गई। वस्तुत: फ़ैज़ की शाइरी हमारे समय की गहन मानवी, समाजी और सियासी सच्चाइयों का पर्याय है। वह हर पल असलियत के साथ है और भाषाई दीवारों को लाँघकर बोलती है। कहना न होगा कि उर्दू के इस महान शाइर की सम्पूर्ण कविताओं का यह एकज़िल्द मज्मूआ हिन्दी में चाव के साथ पढ़ा और सहेजा जाएगा।
Os Ki Thapaki
- Author Name:
Ashutosh Agnihotri
- Book Type:

- Description: की थपकी' साधारण भावनाओं की सरल लेकिन अहसास के स्तर पर ठहरकर पढ़ी जानेवाली कविताओं का संग्रह है। इस संग्रह में सम्मिलित कविताएँ पहली निगाह में बहुत आसान अनुभवों की नक्काशी करती नज़र आती हैं, लेकिन ध्यान से देखें तो उनके पीछे जीवन के जटिल और आवेशकारी तजुर्बों की एक लम्बी शृंखला बिंधी दिखाई देती है। कवि एक कविता में समाज के, हमारे आस-पास के परिवेश में व्याप्त दीमकों की तरफ़ ध्यान आकर्षित करते हुए कहता है कि 'अफ़सोस से देखते हैं/कुतरी हुई किताबें/उदास अलमारियाँ/...मगर करें तो करें क्या/ज़िद्दी हैं ये दीमक।' ग़ौर से नहीं देखें तो हम इसे एक सीलन-भरे कमरे का दृश्य समझकर आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि ये दीमकें उन ताक़तों का प्रतीक मात्र हैं जो हमारे आस-पास आजकल हर कहीं ख़ास तौर पर ज्ञान, शिक्षा और पुस्तकों के विरुद्ध अपनी कुंद दिमाग़ ज़िद को चढ़ाए बैठी हैं। इसीलिए कवि अन्त में इसके लिए एक उपचार भी सुझाता है कि ये दीमकें 'तब तक उगतीं/और उठती रहेंगी/जब तक खोदकर/गहराइयों में/जला नहीं देते/नई अलख...।' एक ऐसी अलख जिसकी आँच में मिट्टी का कण-कण, हमारे परिवेश का एक-एक अंश गमकने लगे। नई लौ और नई ख़ुशबू इस तरह जाग्रत हों कि भविष्य में किसी भी दीमक को, किसी भी ऐसी ताक़त को उभरने का अवसर न मिले जो हमारी मानवीय जिज्ञासा को चुनौती देती हो। इसी तरह इस संग्रह की लगभग सभी कविताएँ जीवन के अतिसाधारण बिम्बों और चित्रों के माध्यम से ऐसी समस्याओं से हमारा परिचय कराती हैं जिनकी तरफ़ हमारा ध्यान अपनी दैनंदिन व्यस्तताओं की ऊहापोह में नहीं जाता है। ये कविताएँ वास्तव में हमारी उन्हीं दैनिक सामान्यताओं को कविता के असाधारण अनुभव में बदलने का भाषिक उपक्रम ह
Kuchh Pate Kuchh Chitthiyan
- Author Name:
Raghuvir Sahay
- Book Type:

-
Description:
रघुवीर सहाय का यह पाँचवाँ कविता-संग्रह है। आमतौर पर हिन्दी का हर कवि उम्र के हर अगले पड़ाव पर थका, ऊबा और ठस जान पड़ता है लेकिन ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ’ का कवि इसका आश्चर्यजनक अपवाद है। काव्यानुभव और सामाजिक चेतना—इन दो को अलग-अलग खानों में न बाँटने और व्यक्ति और कवि को एक समग्र इकाई बनाने की पुरानी प्रतिज्ञा के अनुसार प्रस्तुत संग्रह तक कवि का विकास देखा जा सकता है।
इस कवि में प्रखर ऐन्द्रिक संवेदन प्रखर राजनीतिक-सामाजिक चेतना का आनुषंगिक है। इसलिए इसके यहाँ यथार्थ न कोरा सतही यथार्थ रहने पाता है, न नकारात्मकता का पर्याय बनने पाता है। प्रस्तुत कविता-संग्रह इस बात की याद फिर से दिलाएगा कि रघुवीर सहाय ने आग्रहपूर्वक सच्चाइयों की चिकनी ‘काव्यात्मक’ सतह को अस्वीकार किया है और जहाँ औरों को कविता नहीं दिखती, वहाँ कविता को पहचाना है।
यह संग्रह एक विशेष अर्थ में कवि की यात्रा के अगले दौर की पूर्वसूचना भी देता है। पहले की अपेक्षा इन कविताओं में तमाम मानवीय कार्यव्यापारों की अर्थ-छवियाँ अधिक विस्तृत भूमि पर फैली हैं और कवि का सम्बन्ध ठोस वस्तुगत संसार से प्रगाढ़तर है। अपने को निरन्तरता में नया करते जानेवाले अपनी रचना-प्रक्रिया के प्रति सजग और आत्मचेता इस कलाकार के “नागर मन की भावप्रवणता, सूक्ष्मदर्शिता और तटस्थ निर्ममता अब नए परिचय की मोहताज नहीं। सहज सौन्दर्य और सूक्ष्म अनुभूति से निर्मित रघुवीर सहाय का काव्य-संसार जितना निजी है उतना ही हम सबका है—एक गहरे और अराजनैतिक अर्थ में जनवादी। भीड़ से घिरा एक व्यक्ति जो भीड़ बनने से इनकार करता है और उससे भाग जाने को ग़लत समझता है, रघुवीर सहाय का साहित्यिक व्यक्तित्व है।’’
—भारतभूषण अग्रवाल की यह टिप्पणी आज भी उल्लेखनीय है।
जहाँ तक कवि का प्रश्न है, वह मानता है कि उसे यह जानने से शक्ति नहीं मिलती कि उसने अपने को कहाँ जोड़ा है। उसका सर्जनात्मक सुख यह जानने में है कि उसने अपने को कहाँ तोड़कर एक नई बस्ती बसाई है और कमोबेश वह यह भी दिखा सके कि वह नई सृष्टि उसकी पुरानी बस्ती को उजाड़कर बनी है तो क्या कहने।
Mulaqatein
- Author Name:
Alokdhanva
- Book Type:

-
Description:
जब-जब किसी समाज, व्यक्ति, प्रकृति या स्थान का उसकी पूरी गरिमा के साथ हमारे समय में होना असम्भव हुआ है, आलोकधन्वा की कविताओं ने उसे अपनी परिधि में संभव किया है। निर्वासित और नष्ट होती स्थितियों की पुनर्रचना जितनी सहज और प्राकृतिक आभा के साथ उनकी कविताओं में होती है वह बहुत आम नहीं है। उनके लिए कविता हर कहीं मौजूद है, पानी में, ओस में, बच्चे में, गायकों में, योद्धाओं में, औरतों और पेड़ों में।
‘मुलाक़ातें’ उनका दूसरा कविता-संग्रह है जो बहुत लम्बी प्रतीक्षा के बाद आ रहा है। इस संग्रह में शामिल कविताएँ प्रकृति, जीवन, जन-गण और संसार के प्रति उनके उच्छल प्रेम को और भी पारदर्शिता के साथ व्यक्त करती हैं, और समय के प्रति उनकी असहमतियों और आलोचना-भाव को भी।
उनकी कविता एक बड़ी हद तक अन्धविश्वासी और आत्मघाती होते समाज में निर्वासन झेलती वैज्ञानिक विचारधारा की पुनर्रचना है। देश और समाज उनके लिए सिर्फ विचार नहीं ठोस और छूकर महसूस की जानेवाली जीवंत इकाइयाँ हैं, तभी वे फाँसी के तख्ते की ओर बढ़ते हुए शहीदों के सरोकारों को भी अनुभूत कर पाते हैं और अलग-अलग भाषाओं में बोलती, क्रूरताओं के सामन्ती गढ़ों को तोड़कर बढ़ी आती आज की युवा शक्ति में ‘कुछ ज्यादा भारत’ को भी चीन्ह पाते हैं। देश का बँटवारा उन्हें आज भी सालता है। कहते हैं—“अगर भारत का विभाजन/नहीं होता/तो हम बेहतर कवि होते/बार-बार बारूद से झुलसते/कत्लगाहों को पार करते हुए/हम विडम्बनाओं के कवि बनकर रह गए।”
हिन्दी कविता को प्रेम करनेवाले पाठकों के लिए अपने प्रिय कवि का यह संग्रह निश्चय ही एक सुखद घटना साबित होगा।
Nahin
- Author Name:
Pankaj Singh
- Book Type:

-
Description:
अपने ऐतिहासिक समय को वंचित मनुष्यता की पीड़ा और संघर्ष के गहरे सरोकारों की केन्द्रीयता के साथ परिभाषित करती कविता का यह संकलन ‘नहीं’ यथार्थ की द्वन्द्वात्मकता को उन बिन्दुओं पर सृजन के अनुभवों में बदलता है, जहाँ यथास्थिति के निषेध में नई और सच्ची मानव-निर्मितियों की आकांक्षा और सम्भावनाएँ एकत्र होकर क्रियाशील होती हैं। पंकज सिंह की इन कविताओं की दृष्टिसम्पन्नता और आशय इन्हें कोरे नकार की निष्फलता से बचाकर संवेदना की उस मनोभूमि में ले जाते हैं जो ‘नहीं’ की पवित्र दृढ़ता से अनन्त सम्भावनाओं की प्रक्रिया और उसकी सहज-अबाध परिणतियों के प्रकट होते जाने की आश्वस्ति देती है।
पंकज सिंह ने अपने पिछले काव्य-संग्रहों, ‘आहटें आसपास’ और ‘जैसे पवन पानी’, की कविताओं में सार्थक जोखिम उठाते हुए भारतीय समाज में पिछली शताब्दी के सातवें दशक की ‘वसन्त गर्जना’ से उत्प्रेरित प्राण-शक्ति को भाषा में अनूठे रूपाकार दिए। अन्याय की सत्ताओं के बरक्स सांस्कृतिक संरचना में प्रतिरोध के साहस की अभिव्यक्ति और परिवर्तन के महास्वप्न की अर्थ-सक्रियता उन कविताओं की उदग्र पहचान बनी। उन तत्त्वों से हिन्दी में अनुभव-सघन तथा अभिप्राय की गरिमा से भरी जिस मौलिक राजनीतिक कविता को पंकज सिंह के कवि ने सम्भव किए उसके नए और कदाचित् अधिक क्षिप्र रूप भी, ‘नहीं’ की कविताओं में हैं।
इन कविताओं में अनुभव-अनुकूलित शिल्प का सुघड़पन है और कहन के ऐसे अनेक लहज़े हैं जो काव्य-औज़ारों, हिकमतों और समग्र प्रविधि के मामले में हिन्दी काव्य के नए विस्तार के सूचक हैं।
‘नहीं’ की कविताओं की जीवन्त अनुभव-राशि में अगर अन्तर्विरोधों और द्वन्द्वों में शामिल विडम्बनाएँ और कई प्रकार के सामूहिक बोध के समुच्चय हैं, तो निजी आवेग-संवेग, प्रेम और आसक्ति, आघात-संघात और अवसाद-विषाद भी हैं जो पंकज सिंह की कविताओं में व्यापक और तीव्र संवेदकों की उपस्थिति को गहराई देनेवाली चीज़ें हैं, और इस अर्थ में चकित करनेवाली भी कि वे तर्क और विवेक की शक्लें अख़्तियार करके सार्वजनिक संलाप का हिस्सा मालूम होने लगती हैं।
अगर काव्य के कुछ शाश्वत मापक होते हों तो उनके सम्मुख भी ‘नहीं’ की जीवन-विश्वासी कविता सार्थक और सामाजिक-सांस्कृतिक उपयोग की बनी रहेगी, क्योंकि इसकी आत्मा में करुणा और प्रेम की सुनिश्चित लय है और वह उसी महास्वप्न से आबद्ध-प्रतिबद्ध है जो उसे जीवन और भाषा में चतुर्दिक फैले विचलनों के बीच सन्तुलित और ऊर्जस्व बनाए हुए है।
Dhoop Aur Dhuan
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
‘धूप और धुआँ' आज़ादी के बाद लिखी गई राष्ट्रीय कविताओं का एक महत्त्वपूर्ण संग्रह है। इसमें संगृहीत कविताएँ समकालीन अवस्थाओं के विरुद्ध भावात्मक प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट हुई हैं। स्वराज्य से फूटनेवाली आशा की धूप और उसके विरुद्ध जन्मे असन्तोष का धुआँ, ये दोनों ही इन रचनाओं में यथास्थान प्रतिबिम्बित हैं। अतएव, जिनकी आँखें धूप और धुआँ, दोनों को एक ख़ास परिप्रेक्ष्य में देख सकती हैं, उनके लिए यह नाम निरर्थक नहीं लगेगा।
इस संग्रह में कविताएँ रचना के कालक्रम के अनुसार नहीं रखी गई हैं। इसके बारे में दिनकर जी का ख़ुद कहना है कि, '...मैंने कई ऐसी कविताओं को आरम्भ में ही रख दिया है, जिनकी रचना हाल में हुई है। यह इसलिए कि मैं देखता हूँ कि इधर मेरे लिखने की तर्ज मेरी वर्तमान मनोदशा के मुआफिक भी आ रही है। यह प्रयोग है या प्रगति, मैं नहीं बता सकता। निश्चयपूर्वक इतना ही कह सकता हूँ कि आजकल इसी लहजे में बोलने में कुछ सन्तोष का अनुभव करता हूँ।'
'धूप और धुआँ' दिनकर जी की कविताओं का एक अनूठा संग्रह है। इनमें जहाँ नवीनता है, ताजगी है, विचारों में उत्तेजना है, वहीं मन में स्फुरण जगाने की शक्ति भी है।
Shreyasi
- Author Name:
Vinay Kumar
- Book Type:

-
Description:
विनय कुमार की ‘श्रेयसी’ सरस्वती के अनाविल उज्ज्वल स्वरूप का साक्षात्कार है। इसे पढ़ते हुए ऋग्वेद के वाक्सूक्त के मन्त्र चित्त में विवर्तित होने लगते हैं। ये कविताएँ चेतना के गह्वरों तक उतरती हैं और अतीत और इतिहास ही नहीं, वर्तमान को स्वरित करते हुए भविष्य की आहटों से भी परिचित कराती हैं। विनय कुमार बदलते परिवेश में अपने अक्षुण्ण सांस्कृतिक बोध के साथ कविता को वहाँ ले जाते हैं जहाँ ज्ञान शब्दों में सिमटकर नहीं रह जाता, अनुभव में संवेद्य बन जाता है।
—राधावल्लभ त्रिपाठी
विनय कुमार की ‘यक्षिणी’ को लोगों ने नए ढंग का खंड-काव्य कहा था। सात सर्गों में बँटा इस पुस्तक का कलेवर उससे आगे जाता है। एक लम्बी, गहरी और बहुआयामी विचार-यात्रा से सम्भव हुई इस कृति में सूखी वैचारिकी नहीं है। गीतात्मक तरलता, आख्यान-कुशलता, नए और अनोखे बिम्बों के साथ-साथ इसमें एक बंकिमता भी है जो कविताओं को मार्मिक और बेधक बनाती है।
‘श्रेयसी’ में परम्परागत अवधारणाओं का स्वीकार भी है और प्रतिरोध भी, विस्तार भी है और तिक्रमण भी। कवि दिव्य से आँखें तो मिलाता है मगर नाहक अभिभूत नहीं होता। वह ज्ञान की परम्परा को समझने का प्रयास करता है और इस क्रम में आवश्यक प्रतिवाद और भविष्यगामी संवाद भी सम्भव करता है जिसे इस यात्रा की उपलब्धि कह सकते हैं। सरस्वती की अवधारणा यूँ तो भारतीय है मगर इसे रचनेवाले तत्त्व कमोबेश हर संस्कृति में हैं। कवि ने भू-राजनीतिक और भाषिक सीमाओं का सहज भाव से अतिक्रमण करते हुए मानव-सभ्यता की सारस्वत-सर्जनात्मक यात्राओं की शक्तियों और चुनौतियों को स्वर दिया है।
यह कृति भारतीय होकर भी वैश्विक है, और धर्मों और संस्कृतियों के विभाजन से परे जाती है। ‘श्रेयसी’ में सरस्वती बड़ी सहजता के साथ गलेटिया, हाइपैटिया, बहादुरशाह ज़फ़र और वाजिद अली शाह से बात करती दिखती है। यह वंदना की किताब नहीं। श्रेयसी कोई देवी नहीं, एक तरलता है जो प्रकृति, कथा और सर्जनात्मक प्रज्ञा तीनों में बहती है। इन तरलताओं के बिना न तो मनुष्य का जीवन सम्भव है और न ही मनुष्यता का।
महाकाव्यात्मक सम्भावनाओं को अपने वितान में समेटती ‘श्रेयसी’ को वर्तमान हिन्दी काव्य-जगत में एक सार्थक हस्तक्षेप की तरह देखा जाएगा।
Ek Cheez Kam
- Author Name:
Neelesh Raghuwanshi
- Book Type:

-
Description:
‘कहना है मुझे उस तरह/जिस तरह कहा नहीं गया अब तक’ इस साधारण से वाक्य से नहीं लगता था कि कविता का हिस्सा बनकर यह कथन बहुआयामी हो जाएगा। नीलेश की कविताओं में साधारण को असाधारण में ढालने की क्षमता है। क्या कभी सोचा जा सकता है कि समाज में बूढ़े हो चुके पिता परिवार से इस तरह अलग-थलग होते जाते हैं, जैसे अंगुली से नाखून अलग किए जाते हैं—‘नाखून की तरह/पिता भी तो झर रहे हैं/अब जीवन से’, इस वाक्योक्ति में पैवस्त यातना दहला देने वाली है।
नीलेश के यहाँ वाक्यांश मुहावरों में ढलते नज़र आते हैं। ‘जिन आँखों में काजल लगाया मैंने (कैसे) देख सकूँ उसमें दुख को’ कहते हुए कवि को लगता है—‘चट्टानों के बीच से/कोंपल की तरह फूटता है/दुख’। यहाँ मुहावरा उलट गया है। चट्टानों में कोंपल का फूटना अदम्य जिजीविषा का द्योतक है पर यहाँ हमारे सामाजिक यथार्थ की क्रूर चट्टानों से तो केवल दुख ही उपजता है। बदलते वक्त के साथ सामाजिक यथार्थ कितना उलट गया है, कवि इस स्थिति को ‘नागरिकता की मृत्यु’ की तरह देखने को विवश है।
ट्रैफिक के लिए सड़क किनारे के बोर्ड की चेतावनी को इस तरह पढ़ा जाना कि ‘सावधान! आगे अंधा मोड़ है/कहती हैं सड़कें/हमारे जीवन की कहानी’। सिर्फ कविता में ही सम्भव हो सकता है जीवन के इस कटु यथार्थ को एक साधारण-सी बात में इस तरह गुम्फित करना और नीलेश इसे बहुत सलीके से करती हैं। इसमें राजनीतिक हालात का दर्शन भी किया जा सकता है। ‘भला मानुष’ पद कभी निष्कपट, सच्चे और किसी कदर भोले-भाले व्यक्ति के लिए प्रयोग में आने लगा था लेकिन नीलेश उसी के अभिधार्थ में कहती हैं—‘जब मानुष भला मानुष हो जाएगा/तो बन्दर भी भले बन्दर हो जाएँगे’। पाठक के लिए यहाँ भी राजनीतिक अर्थ खोजने की गुंजाइश बनती है।
अपने आसपास उपस्थित परिवेश के आमफहम बिम्बों में जीवन के शाश्वत प्रश्नों की तरफ संकेत करना नीलेश की कविता की भी विशेषता रही है और गद्य की भी। उनका यह नया कविता-संग्रह निश्चय ही उनके कवि-मानस के अन्य विस्तारों से हमारा परिचय कराएगा।
He Ram…!
- Author Name:
Mahesh Katare
- Book Type:

- Description: Book
Kalam Aaj Unki Jai Bol
- Author Name:
Vinamra Sen Singh
- Book Type:

-
Description:
भारत का युवा जो साहित्य का विद्यार्थी है उसे भी या जो नहीं है वह भी ऐसे महान रचनाकारों के जीवन और सृजन से परिचित कराना पुस्तक का उद्देश्य है जिन्होंने भारत की स्वाधीनता में अपना तन-मन-धन सब कुछ समर्पित तो किया ही परन्तु अपनी लेखनी से ऐसा व्यापक जन जागरण किया कि सारा देश उस स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ा और अन्ततः अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही पड़ा। इस दृष्टि से इस पुस्तक में आधुनिक हिन्दी साहित्य के ऐसे 14 रचनाकारों के जीवन और सृजन पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया गया है जिन्होंने अपनी लेखनी के द्वारा स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया, जिनकी रचनाएँ भारतीय समाज को उसके स्वाभिमान, गौरव और स्वतन्त्रता के महत्त्व का बोध कराती हैं। ऐसे रचनाकारों के बारे में देश के प्रत्येक व्यक्ति को जानना आवश्यक है जिनके प्रति हम सभी भारतवासियों का कृतज्ञता भाव रखना कर्तव्य है। ऐसा नहीं कि यह विशेषता केवल इन 14 कवियों में ही थी। परन्तु पुस्तक की एक सीमा है। इसीलिए मेरी दृष्टि से जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण थे उन्हें इस पुस्तक में सम्मिलित किया गया।
पुस्तक में इन कवियों के जीवन और सृजन के साथ ही उनकी तीन-तीन ऐसी प्रमुख रचनाएँ भी संकलित की गई हैं जो राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
Man Ki Nadi Me Bheege Shabd
- Author Name:
Rekha Bhatia
- Book Type:

- Description: Book
Tumhen Saunpta Hun
- Author Name:
Trilochan
- Book Type:

-
Description:
पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी कविता के परिदृश्य में त्रिलोचन की कविता का महत्त्व असाधारण रूप से बढ़ा है। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि इस महत्ता की स्वीकृति में पेशेवर साहित्य मर्मज्ञों और तथाकथित अकादमियों का योगदान न के बराबर रहा है। अगर पिछले कुछ वर्षों की लघु-पत्रिकाएँ उठाकर देखा जाए तो यह स्पष्ट लगेगा कि युवा कवियों ने अपने समय की सांस्कृतिक जड़ता के ख़िलाफ़ त्रिलोचन की रचनाशीलता में एक नई ताज़गी और ऊर्जा का अनुभव किया है, अपने समय की रचनात्मक चुनौतियों से निपटने के लिए उनकी रचनाएँ एक योद्धा के रूप में उनके सामने उभरीं। ‘तुम्हें सौंपता हूँ’ उनकी कविताओं का एक विशिष्ट संग्रह है, जिसमें उनकी सन् 1935 से 83 तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कविताएँ शामिल हैं। इतने लम्बे कालक्रम में बिखरी इन कविताओं में आप कवि के रचनात्मक विकास की अनेक मंज़िलों से साक्षात्कार करेंगे। वास्तव में त्रिलोचन की कविताएँ दु:खों और विपदाओं के अपार समुद्र में मानवीय सौन्दर्य, प्रेम, आशा और स्वप्न का एक ऐसा घनीभूत पुंज हैं जो हमारे भीतर जीवन के प्रति अगाध विश्वास जगाता है। छोटी-
बड़ी इक्यासी कविताओं का यह संग्रह कवि के व्यक्तित्व के कुछ ऐसे आयामों को भी सामने लाता है, जिनसे हिन्दी जगत प्राय: अपरिचित ही रहा है।
इस संग्रह के शान्ति पर्व वाले खंड में त्रिलोचन के चार काव्य रूपक भी शामिल किए गए हैं जो उन्होंने दूसरे महायुद्ध के नरसंहार की पृष्ठभूमि में लिखे थे। जीवन को विध्वंस की आग में झोंकनेवाली शक्तियों के ख़िलाफ़ त्रिलोचन की कविताएँ किसी गुरिल्ला सैनिक की तरह हमारे भीतर प्रवेश करती हैं। यह उनकी कविताओं का ऐसा प्रतिनिधि संग्रह है जिसमें पूर्व संकलनों की कोई कविता भरसक नहीं आने पाई है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book