Sarhadon Ke Paar Darakhton Ke Saaye Me
(0)
₹
200
₹ 160 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
Book
Read moreAbout the Book
Book
Book Details
-
ISBN9789390593194
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Ek Patang Anant Mein
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
पिछले दशकों में न केवल हिन्दी बल्कि समूचे भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य पर आलोचक, सम्पादक और संस्कृतिकर्मी के रूप में अशोक वाजपेयी की सक्रियता बहुचर्चित और ध्यानाकर्षण का केन्द्र रही है। इन्होंने इस दौरान साहस, संकल्प और खुलेपन से जो कुछ भी किया, विवादास्पद और विचारोत्तेजक सिद्ध हुआ।
अन्दर और बाहर के नक़ली भेद को अस्वीकार करते हुए अशोक वाजपेयी जीवन से प्रेमासक्त कवि हैं। उनकी कविता में चीख़-पुकार या हाहाकार नहीं है : उनके यहाँ तोड़ने का नहीं जोड़ने का गहरा संघर्ष है जिसमें शान्त पर अचूक उग्रता है। उनका यह संसार व्यापक है, उसमें माता-पिता, पूर्वजों से लेकर प्रेम, नौकरशाही की छवियाँ शामिल हैं। चालू मुहावरे के आतंक से मुक्त रहकर उन्होंने अपनी काव्यभाषा को अधिक पारदर्शी, ऐन्द्रिय और समावेशी बनाया है। हमारे निर्दय और कठिन समय में भरा-पूरा मनुष्य होना सम्भव है, ये कविताएँ इसी विश्वास को चरितार्थ करती हैं।
इन कविताओं का कवि महत्त्वाकांक्षी नहीं है लेकिन कविता में ‘किसी छोटे से सच को भी खराब नहीं जाना चाहिए’ इसकी सजगता उसमें है। विराट सत्यों से आक्रान्त समकालीन कविता में यह कविता ‘छोटे सच’ का एक विनम्र, सशक्त और अलक्षित विकल्प प्रस्तुत करती है। उनमें सच का खरापन है और उसे सँभालने-बचाने का जतन भी।
You Only Live Once (Hindi Translation of You Only Live Once)
- Author Name:
Stuti Changle
- Book Type:

- Description: अगर आप अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाकर भागे तो क्या होगा? बीस साल बाद, तीन लोग आपकी तलाश कर रहे हैं। एक, आपसे दोबारा मिलने की आस लिये दम तोड़ रहा है। दूसरा, यह सोचता है कि काश, आप उनसे कभी मिले ही न होते। तीसरा, चाहता है कि काश वे आपसे एक बार मिल लेते। आप एक ही व्यक्ति हैं। हैं न? लेकिन उनमें से हर एक के लिए वही व्यक्ति नहीं हैं। प्यार की तलाश और खुद को ढूँढऩे पर आधारित इस कहानी में अपने जीवन से जुड़े सवालों के जवाब हासिल कीजिए। मिलिए एक टूटे दिलवाली, मगर यूट्यूब की उभरती स्टार अलारा से। एक संघर्षरत लेकिन उम्मीदों से भरे स्टैंडअप कॉमेडियन आरव से, और समुद्र तट पर बीच शैक के सनकी मालिक रिकी से। ये सब एक साथ गोवा के गहरे समंदर के किसी तट पर से मशहूर गायिका एलिशा के गायब होने के सच का पता लगाने निकल पड़ते हैं
Archna
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

-
Description:
‘अर्चना’ निराला की परवर्ती काव्य-चरण की प्रथम कृति है। इसके प्रकाशन के बाद कुछ आलोचकों ने इसमें उनका प्रत्यावर्तन देखा था। लेकिन सच्चाई यह है कि जैसे ‘बेला’ के गीत अपनी धज में ‘गीतिका’ के गीतों से भिन्न हैं, वैसे ही ‘अर्चना’ के गीत भी
‘गीतिका’ ही नहीं, ‘बेला’ के गीतों से भिन्न हैं। इस संग्रह की समीक्षा करते हुए श्रीनरेश मेहता ने लिखा था कि यह निराला की ‘विनयपत्रिका’ है। निश्चय ही इसके अधिसंख्यक गीत धर्म-भावना नहीं है। यहाँ हमें मार्क्स की यह उक्ति याद करनी चाहिए : ‘धार्मिक वेदना एक साथ ही वास्तविक वेदना की अभिव्यक्ति और वास्तविक वेदना के विरुद्ध विद्रोह भी है। अकारण नहीं कि ‘अर्चना’ के भक्तिभाव से भरे हुए गीत स्वातंत्र्योत्तर भारत के यथार्थ को बहुत तीखे ढंग से हमारे सामने लाते हैं, यथा—‘आशा-आशा मरे/लोग देश के हरे!’ ‘निविड़ विपिन, पथ अराल;/भरे हिंस्र जन्तु-व्याल’ आदि गीत।
पहले की तरह ही अनेक गीतों में निराला का स्वर स्पष्टत: आत्मपरक है, जैसे ‘तरणी तार दो/अपर पार को!’ ‘प्रिय के हाथ लगाए जगी,/ ऐसी मैं सो गई अभागी।’ ऐसे सरल प्रेमपरक गीत हमें उनमें पहले नहीं मिलते! प्रकृति से भी उनका लगाव हर दौर में बना रहता है। यह बात ‘आज प्रथम गाई पिक पंचम’ और ‘फूटे हैं आमों में बौरे’ ध्रुवकवाले गीतों में दिखलाई पड़ती है।
‘अर्चना’ में ऐसे गीत भी हैं, जो इस बात की सूचना देते हैं कि कवि अब महानगर और नगरों को छोड़कर अपने गाँव आ गया है। उनका कालजयी और अपनी सरलता में बेमिसाल गीत ‘बाँधो न नाव इस ठाँव, बन्धु!/पूछेगा सारा गाँव, बन्धु’ ‘अर्चना’ की ही रचना है, जिसमें गाँव की एक घटना के सौन्दर्यात्मक पक्ष का चित्रण किया गया है।
—नन्दकिशोर नवल
Avalamban
- Author Name:
Manish Shrivastav
- Book Type:

-
Description:
किसी नए कवि की रचना से गुज़रते हुए अक्सर उम्मीद की जाती है कि उसमें कुछ नया होगा लेकिन मनीष श्रीवास्तव की कविताओं के साथ केवल नए होने का भाव नहीं है, यहाँ विविधता है। अपने होने में पूरी विनम्रता के साथ लेकिन रचनात्मक रूप से लगभग अतार्किक। ये कविताएँ कोई नई ज़मीन तोड़ने का दावा नहीं करतीं, कोई नारेबाज़ी नहीं करतीं, चौंकाती भी नहीं—बस, अपने कविता होने को आश्वस्त करती हैं और यह भी कि इन रचनाओं में पुरखे शामिल हैं।
सांस्कृतिक तत्सम शब्दावली और मीर, ग़ालिब, पंत की भाषा परम्परा के रास्ते से ये रचनाएँ ग्लोबल कविता की अवधारणा में प्रवेश पाती हैं। यहाँ हर रचना के साथ कोई एक छाया चलती है—भाषा, काल और कहन के एक ऐसे पृष्ठ-तनाव को फिर-फिर उजागर करती हुई, अपने पूरे संस्कार और संवेदना के साथ, जो किसी एक रचनाकार के लिए इन दिनों असम्भव है।
मनीष पूरे विस्तार के साथ शब्दों को बरतते हैं, एक चौकन्नेपन के साथ, कहीं-कहीं अतिरिक्त सावधानी के साथ भी, लेकिन बाज़ार की माँग के अनुसार तो कुछ भी नहीं। रचना का होना बचा रहे, इसका निर्वाह तो हरेक रचनाकार स्वाभाविक रूप से करता है, लेकिन यह
होना यहाँ किसी अनुशासन की तरह नहीं है।
इन रचनाओं में शब्दों का पड़ोस है जीवन और अन्ततः प्रेम जहाँ ये कविताएँ सहज रूप से खुलती चली जाती हैं।
Herstory
- Author Name:
Neha Bansal
- Book Type:

- Description: Herstory is a new collection of poems by Neha Bansal, a civil servant, providing a fresh perspective on the lives of others.
Teri Ankhon Mein Raat Doobi Hai
- Author Name:
Osho Nilanchal
- Book Type:

-
Description:
आम इंसान की नज़र संसार को देखती है तो उस घटनाओं, व्यक्तियों के प्रति नफ़रत, दुख, क्रोध जैसे विभिन्न भाव पैदा होते हैं मगर जब ये नज़र प्रेम की नज़र बन जाती है तो उसमें संसार की हर वस्तु के प्रति शुकराने का भाव पैदा होता है। और हर पदार्थ के पीछे उसी ऊर्जा, अनवारे-इलाही आदि शक्ति नज़र आने लगती है। फिर तो महबूब में, मुर्शिद में, दोस्त में, दुश्मन में जन्म में, मृत्यु में, उसी अनवारे-इलाही का जलवा नज़र आने लगता है। यही बात है कि मजन का प्यार किसी संत की इबादत से कम नहीं।"तेरी आँखों में रात डूबी है" की ये ग़जलें जहाँ आफिस में काम करने वाली प्रेमिका, संसार से उकताये हुए आदमी, बेटी के प्रति प्रेम में डूबे पिता, विश्व समाज के बदलते हुए परिवेश की मंज़रकशी करती हैं, वहीं इन ग़ज़लों में भाषा की सादगी के साथ जुबान की दिलकश पेशगोई है। ये ग़ज़लें और नज्में एक प्रेमी, एक कामगार, एक साधक की भावनाओं का आईना है साथ ही शरीर और मन के पार रुहानी संसार की तरफ़ भी इशारे करती हैं सूफ़ियाना नज़र देती हैं। निश्चित रूप से इन नज्मों में ऐसा बहुत कुछ है जहाँ से हर इंसान को कभी न कभी गुज़रना है, ठहरना है।
सुर्ख खंजर लिये पीछे है हुजूमे-कातिल
शहरे-जाना से मगर होते भी रुखसत न बनें
क्योंकि ये शहरे-जाना है, परमात्मा का नगर है ये जगत। हमें इसमें जीना है और आनन्दपूर्ण जीना है। ये ग़जलें सुख-दुख के दो किनारों से आगे नये जश्न के सफ़र की तरफ़ ले जा रहीं हैं और उत्सव में जीने का मंगल सन्देश हैं।
Mitti Ka Chand
- Author Name:
Dr.Abrar Multani
- Rating:
- Book Type:

- Description: क्या अन्याय तब शुरू हुआ होगा जब मनुष्यों ने अपना घर बनाने के लिए किया होगा गुफ़ाओं पर अतिक्रमण या फिर शुरू हुआ होगा तब जब उसने घर बनाने के लिए काटे होंगे पेड़ क्या अन्याय तब शुरू हुआ होगा जब मनुष्यों ने बाँटे होंगे स्त्री-पुरुष के काम या फिर शुरू हुआ होगा तब जब उसने खुद को शासक और शासित में बाँटा होगा क्या अन्याय तब शुरू हुआ होगा जब जनता को अपना शासक चुनने का मौक़ा मिला या फिर शुरू हुआ होगा तब जब शासक अपनी जनता चुनने लगे
Tao-Te-Chhing
- Author Name:
Laotse
- Book Type:

-
Description:
‘ताओ जिसे परिभाषित किया जा सके, शाश्वत ताओ नहीं।’ यह शब्द संसार के धार्मिक साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय है। ताओ-ते-छिङ के इक्यासी अध्याय ढाई हज़ार वर्ष पूर्व हमारे समीपवर्ती राष्ट्र, चीनी जनसमूह को सम्बोधित थे। ये इक्यासी अध्याय बाइबल, भागवत गीता, क़ुरान आदि की तरह बहुत-सी भाषाओं में अनूदित हुए हैं। ताओ का मार्ग हमें दिखाता है कि ब्रह्मांड और हमारे अन्तरलोक की ऊर्जाएँ परस्पर कैसे प्रतिबिम्बित होती हैं। धूलिकण के समान तुच्छ होते हुए भी हम उस विराट का भाग हैं। दर्शन के अभाव में जीवनयापन करते हुए हम स्वयं सरल मूल्यों को जटिल बनाकर जीवन-प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करते हैं।
‘ताओ-ते-छिङ’ मनुष्य की आध्यात्मिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, दैनिक-दैहिक स्थिति-परिस्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन है। यह मनुष्य की योग्यता के उन स्तरों का आग्रह करता है जो सामान्यतः हमारे बोध का हिस्सा नहीं हैं। यह पुस्तक धार्मिक व सामाजिक कर्मकांडी विलक्षणताओं से उपजी समस्याओं के सरलीकरण की अद्भुत सूक्तियाँ उपलब्ध कराती है, साथ ही वर्तमान में पश्चिमी संस्कृति की देन तर्कमूलक चिन्तन के औचित्य को प्रश्नचिह्नित करते हुए मनुष्य के जीवन की सार्थकता का आह्वान करती है।
Subtle - Love and its Afflictions
- Author Name:
Deepika Bhardwaj
- Rating:
- Book Type:

- Description: This book is a collection of poems that celebrate every aspect of love. From falling in love to falling apart. It touches upon a different emotion on every page.
Nahin
- Author Name:
Pankaj Singh
- Book Type:

-
Description:
अपने ऐतिहासिक समय को वंचित मनुष्यता की पीड़ा और संघर्ष के गहरे सरोकारों की केन्द्रीयता के साथ परिभाषित करती कविता का यह संकलन ‘नहीं’ यथार्थ की द्वन्द्वात्मकता को उन बिन्दुओं पर सृजन के अनुभवों में बदलता है, जहाँ यथास्थिति के निषेध में नई और सच्ची मानव-निर्मितियों की आकांक्षा और सम्भावनाएँ एकत्र होकर क्रियाशील होती हैं। पंकज सिंह की इन कविताओं की दृष्टिसम्पन्नता और आशय इन्हें कोरे नकार की निष्फलता से बचाकर संवेदना की उस मनोभूमि में ले जाते हैं जो ‘नहीं’ की पवित्र दृढ़ता से अनन्त सम्भावनाओं की प्रक्रिया और उसकी सहज-अबाध परिणतियों के प्रकट होते जाने की आश्वस्ति देती है।
पंकज सिंह ने अपने पिछले काव्य-संग्रहों, ‘आहटें आसपास’ और ‘जैसे पवन पानी’, की कविताओं में सार्थक जोखिम उठाते हुए भारतीय समाज में पिछली शताब्दी के सातवें दशक की ‘वसन्त गर्जना’ से उत्प्रेरित प्राण-शक्ति को भाषा में अनूठे रूपाकार दिए। अन्याय की सत्ताओं के बरक्स सांस्कृतिक संरचना में प्रतिरोध के साहस की अभिव्यक्ति और परिवर्तन के महास्वप्न की अर्थ-सक्रियता उन कविताओं की उदग्र पहचान बनी। उन तत्त्वों से हिन्दी में अनुभव-सघन तथा अभिप्राय की गरिमा से भरी जिस मौलिक राजनीतिक कविता को पंकज सिंह के कवि ने सम्भव किए उसके नए और कदाचित् अधिक क्षिप्र रूप भी, ‘नहीं’ की कविताओं में हैं।
इन कविताओं में अनुभव-अनुकूलित शिल्प का सुघड़पन है और कहन के ऐसे अनेक लहज़े हैं जो काव्य-औज़ारों, हिकमतों और समग्र प्रविधि के मामले में हिन्दी काव्य के नए विस्तार के सूचक हैं।
‘नहीं’ की कविताओं की जीवन्त अनुभव-राशि में अगर अन्तर्विरोधों और द्वन्द्वों में शामिल विडम्बनाएँ और कई प्रकार के सामूहिक बोध के समुच्चय हैं, तो निजी आवेग-संवेग, प्रेम और आसक्ति, आघात-संघात और अवसाद-विषाद भी हैं जो पंकज सिंह की कविताओं में व्यापक और तीव्र संवेदकों की उपस्थिति को गहराई देनेवाली चीज़ें हैं, और इस अर्थ में चकित करनेवाली भी कि वे तर्क और विवेक की शक्लें अख़्तियार करके सार्वजनिक संलाप का हिस्सा मालूम होने लगती हैं।
अगर काव्य के कुछ शाश्वत मापक होते हों तो उनके सम्मुख भी ‘नहीं’ की जीवन-विश्वासी कविता सार्थक और सामाजिक-सांस्कृतिक उपयोग की बनी रहेगी, क्योंकि इसकी आत्मा में करुणा और प्रेम की सुनिश्चित लय है और वह उसी महास्वप्न से आबद्ध-प्रतिबद्ध है जो उसे जीवन और भाषा में चतुर्दिक फैले विचलनों के बीच सन्तुलित और ऊर्जस्व बनाए हुए है।
Aatma Ki Aankhein : Dinkar Granthmala
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
‘आत्मा की आँखें' में संकलित हैं डी.एच. लॉरेन्स की वे कविताएँ जो यूरोप और अमेरिका में बहुत लोकप्रिय नहीं हो सकीं, लेकिन दिनकर जी ने उन्हें चयनित कर अपनी सहज भाषा-शैली में इस तरह अनुवाद किया कि नितान्त मौलिक प्रतीत होती हैं।
डी.एच. लॉरेन्स की कविताओं के अनुवाद के पीछे जो मुख्य बातें थीं, उनके बारे में ख़ुद दिनकर जी का कहना है कि ‘इन सभी कविताओं की भाषा बुनियादी हिन्दी है। लॉरेन्स की जिन कविताओं पर ये कविताएँ तैयार हुई हैं, उनकी भाषा भी मुझे बुनियादी अंग्रेज़ी के समान दिखाई पड़ी–सरल, मुहावरेदार, चलतू और पुरजोर जिसमें बनावट का नाम भी नहीं है। कविताओं की भाषा गढ़ने के लिए लॉरेन्स छेनी और हथौड़ी का प्रयोग नहीं करते थे। जैसे ज़िन्दगी वे उसे मानते थे जो हमारी सभ्यतावाली पोशाक के भीतर बहती है। उसी तरह, भाषा उन्हें वह पसन्द थी जो बोलचाल से उछलकर क़लम पर आ बैठती है। बुद्धि को वे बराबर शंका से देखते रहे और कला में पच्चीकारी का काम उन्हें नापसन्द था। मैंने ख़ासकर उन्हीं कविताओं को चुना है जो भारतीय चेतना के काफ़ी आस-पास चक्कर काटती हैं।’ इस तरह देखें तो ‘आत्मा की आँखें’ नए आस्वाद और सहज सम्प्रेष्य कविताओं का एक अनूठा संकलन है।
Neera Ke Liye
- Author Name:
Sunil Gangopadhyay
- Book Type:

-
Description:
सुनील गंगोपाध्याय के देहावसान के बाद विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने एक कविता लिखी—‘पत्र जिसे पढ़नेवाला चला गया’। इसकी पंक्तियाँ हैं—‘कौन जाने नीरा का पत्र हो जिसके लिए लिखता रहा वह कविताएँ और कविताएँ और कविताएँ।’
सुनील गंगोपाध्याय की रचनाशीलता में 'नीरा' का एक विचित्र स्थान है। एक साथ ऐन्द्रिक और अतीन्द्रिय। 'नीरा के लिए' कविता-संग्रह में इसका अनुभव किया जा सकता है। प्रस्तुत कविता-संग्रह की भूमिका में सुनील गंगोपाध्याय स्वीकारते हैं, “...तमाम बीते बरसों में नीरा बार-बार घूम-फिरकर आती रही मेरी कविता में। मेरी उम्र ढल रही है पर नीरा आज भी किसी स्थिर चित्र की तरह ‘नव-यौवना’ है। मैं उसे रक्त-मांस की मानवी बनाकर रखना चाहता हूँ पर कभी-कभी अचानक से वह प्रवेश कर जाती है शिल्प की सीमाओं के भीतर।
मैं उसे फिर वापस ले आना चाहता हूँ, उसके पाँव में काँटे चुभ जाते हैं, उसकी आँखों में अश्रु झिलमिलाने लगते हैं। यह दूरी, साथ ही यह आलिंगन की निकटता, नीरा के साथ यह खेल चलता ही रहा है जीवन-भर।”
मूलत: बांग्ला में लिखी इन कविताओं का सोमा बंद्योपाध्याय द्वारा किया गया यह अनुवाद मौलिक आस्वाद प्रदान करता है। आसक्ति व अनासक्ति के बीच विचरण करती अद्भुत कविताओं का प्रीतिकर संग्रह।
Samay Shabd Aur Main
- Author Name:
Krishnkant Nilose
- Book Type:

- Description: Book
Khud Se Guzarte Hue
- Author Name:
Sangita Kujara Tak
- Book Type:

- Description: Book
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam
- Book Type:

-
Description:
अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है।
अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है।
—सुमित्रानन्दन पंत
Safed Par Kala
- Author Name:
Prashan Kumar Jain
- Book Type:

- Description: Book
Kuchh Kavitayen Va Kuchh Aur Kavitayen
- Author Name:
Shamsher Bahadur Singh
- Book Type:

-
Description:
शमशेर जी का पहला कविता-संग्रह ‘कुछ कविताएँ’ 1959 में आया था और दूसरा ‘कुछ और कविताएँ’ 1961 में—यानी उस समय जब वे पचास वर्ष के थे। और ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने कविताएँ तभी लिखना प्रारम्भ किया था—इन दोनों संग्रहों की कविताएँ पिछले बीसेक वर्षों में लिखी गई थीं।
अधिकांश कवि पचास तक पहुँचते-पहुँचते अपने उतार पर होते हैं, लेकिन शमशेर के बारे में यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि निराला के बाद और ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ के पहले किसी भी एक कवि के दो ऐसे छोटे-छोटे अत्यन्त संकोची एवं विनम्र, संग्रहों ने हिन्दी कविता और उसकी आलोचना पर इतना गहरा और दूरगामी असर नहीं डाला।
शमशेर के अनेक कट्टर प्रशंसक अब भी यह मानते पाए जा सकते हैं कि उनकी अधिकांश कालजयी कविताएँ इन्हीं में हैं।...इसमें सन्देह नहीं कि ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में शमशेरियत के सारे मौलिक रंग मौजूद हैं—स्वस्थ-वयस्क रूमान, सारे सौन्दर्य में ऐसी सूक्ष्म-ऐन्द्रिक दृष्टि जो सिर्फ़ उन्हीं की है, शिल्प के प्रतिबद्ध और नाजुक प्रयोग जिनमें प्रगल्भता और प्रदर्शन का नितान्त अभाव है, ‘उर्दू’ और ‘हिन्दी’ का कारगर मेल, छन्दों, ग़ज़लों और नज़्मों से बेपरहेज़गी, कई सांस्कृतिक परम्पराओं का अपनी रक्त-मज्जा में अहसास, ‘परम्परा’ और ‘आधुनिकता’ का सहज मेल और इस सबके साथ और सबके ऊपर सर्वहारा—भारतीय सर्वहारा—के साथ तादात्म्य।
शमशेर ने छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, भारतीय-अरबी-फ़ारसी, परम्परा, आधुनिकतावाद, सौन्दर्यानुभूति, संगीत, चित्रकला, विश्व-समाज तथा राजनीति और प्रतिबद्धता के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं को अपनी अद्वितीय प्रतिभा में ढालकर जो अपना—केवल शमशेर का—काव्य, काव्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र गढ़ा है वह ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में अपने पूरे टटकेपन और उत्कर्ष के साथ उपस्थित है—मूल्यांकन के सारे ‘शुद्ध’, ‘शाश्वत’, कूढ़मग्ज़ और संकीर्ण सिद्धान्तों को विकलांग बनाता हुआ और एक बिलकुल अलग, पूर्णतर और बलिष्ठ सौन्दर्यशास्त्र तथा समीक्षा की माँग करता हुआ।
—विष्णु खरे
Is Bhanwar Ke Paar
- Author Name:
Shashi Shekhar Sharma
- Book Type:

-
Description:
अगर काव्य को जीवन के सामासिक एवं वैयक्तिक सरोकारों की पहचान का एक बिम्बात्मक माध्यम माना जाए तो शशि शेखर के इस संग्रह की कविताएँ उन सरोकारों को अनुभूति के कई स्तरों पर टटोलती हैं। एक स्तर पर मनुष्य के निजी अनुभवों का विराट एवं अत्यन्त ही दुरूह संसार है तो दूसरे स्तर पर समाज के सामूहिक जीवन का उल्लास एवं उसकी विवशताएँ हैं।
ये कविताएँ इन स्तरों के अन्तर्सम्बन्धों की पहचान तो करती ही हैं, उनकी पुनर्व्याख्या के माध्यम से वर्तमान के अपसंस्कारों की ओर हमारा ध्यान भी खींचती हैं। समसामयिक जीवन का सामाजिक, सैद्धान्तिक एवं वैचारिक अनुभव ख़ूब मुखर होकर इन कविताओं में ध्वनित हुआ है। जहाँ वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में जोड़कर देखा गया है, वहीं उस परिदृश्य के तात्कालिक महत्त्व एवं उसकी कुरूप विडम्बनाओं को भी रेखांकित किया गया है, और ऐसा करते समय ये कविताएँ ‘अच्छा’ समझे जाने की चिन्ता से पूरी तरह मुक्त हैं।
अपनी बात बिना लाग–लपेट कहने का आग्रह इन कविताओं की महत्त्वपूर्ण पहचान है। इस आग्रह के कारण ही ये कविताएँ सहसा हमें आईने के सामने खड़ा कर देती हैं। शशि शेखर ने समान सामर्थ्य के साथ काव्य की अनेक विधाओं का प्रयोग किया है। चाहे गीत हों या दोहे, मुक्त छन्द हों या ग़ज़ल, हर पैमाने में उनके अनुभवों का रस ख़ूब पककर छलका है। इस हिसाब से ये कविताएँ पूरे तौर पर हिन्दुस्तानी मिज़ाज की हैं। भाषा और बिम्ब के सन्दर्भ में भी हमारी वैविध्यपूर्ण जीवन–शैली—शहरी और ग्रामीण, खड़ी बोली और उर्दू—के परस्पर रिश्तों की विरासत इन कविताओं में स्पष्ट रूप से मुखरित होती है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये कविताएँ पाठक से सीधे संवाद की अपेक्षा से अनुप्राणित हैं।
Pahar Yeh Bephar Ka
- Author Name:
Tushar Dhawal
- Book Type:

-
Description:
तुषार धवल की कविताओं का भूगोल काफ़ी विस्तृत है और बीहड़ भी। समकालीन
समाज अनेक रूपों, अनेक छवियों में अपनी तमाम जटिलताओं के साथ उनकी कविताओं में मौजूद
दिखाई देता है। उनकी कविता तेज़ी से बदल रहे परिवेश से उलझती-झगड़ती कविता है। आज के दौर
में पूँजी और तकनीक के मेल से मानव जीवन, स्वभाव और समाज बुनियादी बदलाव के दूरगामी
प्रभावों के सामने अकबकाया खड़ा है। जिस गति से ये बदलाव आज हो रहे हैं इतिहास में पहले कभी
नहीं हुए। कवि अपनी परख, संवेदना और समझ से इसी तेज़ी से बदल रहे अपने विश्व को समझना
चाह रहा है। सरोकार का यह बदलता सन्दर्भ उनकी कविताओं को पिछले दशकों के कवियों से यहीं
अलग कर देता है। ‘धूप में/सूखती अँतड़ियों के बीच/चल रहा हूँ/अपनी ज़मीन के लिए/हाथ में उठाए/
तुम्हारी जूठन का प्रसाद’। उनकी कविताओं में विस्थापन का दंश है, संघर्ष का वैभव है, रिश्तों में
बढ़ती अजनबीयत है, शहरों का बदलता परिदृश्य है, उदारीकरण के बाद नया बनता समाज है।
अकारण नहीं है कि उनकी कविताओं में कभी मोबाइल खो जाता है तो कभी एसएमएस करती लड़की
दिखाई दे जाती है। तो कभी दबाव में जी रहे आज के मनुष्य की मानसिक स्थिति ‘नींद में
चलता/सपने में बड़बड़ाता/मैं आदमी हूँ नई सदी का’ जैसी पंक्तियों से प्रकट होती है। वैसे तो ‘पहर
यह बेपहर का’ तुषार का पहला ही कविता-संग्रह है मगर उनका काव्य-मुहावरा प्रचलित समकालीन
काव्य-मुहावरों से नितान्त भिन्न है। आज हिन्दी कविता में जिस तरह की चीख़-पुकार, जिस तरह
का हाहाकार व्याप्त है, उसमें समकालीन कवियों की अपनी विशिष्टता कम ही लक्षित हो पाती है।
इसके विपरीत तुषार धवल की कविताओं में मितकथन की शैली अपनाई गई है। सादाबयानी और
मितकथन के मेल से उनकी कविताओं का मुहावरा तैयार होता है। उनकी कविताओं में केवल
बौद्धिकता नहीं है सहज रागात्मकता भी है। रागात्मकता जीवन-जगत के प्रति, निजी रिश्तों के प्रति।
‘चालीस साल कंधों पर/कारख़ाना उठाए/अब सो रहे हैं पिता/उनके सपने में आए हैं हाल पूछने/उनके
पिता’—केवल सम्बन्धों की परम्परा ही नहीं उनकी कविताओं में हिन्दी की कविता-परम्परा की अनुगूँजें
भी साफ़ सुनाई देती हैं। तुषार की कविताओं में अकविता का आवेश है तो नई कविता सी
प्रश्नाकुलता भी है। ‘पहर यह बेपहर का’ की कविताएँ बताती हैं कि यह नया कवि वास्तव में कितना
सिद्धहस्त है।
Alvida Nehru
- Author Name:
Mohammad Naushad
- Book Type:

- Description: ‘अलविदा नेहरू’ में उन शोकाकुल नज़्मों को संकलित किया गया है जो उर्दू शायरों ने नेहरू को श्रद्धांजलि देते हुए कहीं। इन शायरों में उस दौर के लगभग तमाम शायर शामिल हैं। इस मर्सियानुमा शायरी को पढ़ते हुए एहसास होता है कि राजनेता और व्यक्ति के रूप में नेहरू को कितनी व्यापक और दिली स्वीकृति हासिल थी। पुस्तक की भूमिका में महमूद फ़ारूक़ी लिखते हैं कि “तरक़्क़ीपसन्द शायर कई मामलों में ख़ुद को नेहरू के क़रीबतर पाते थे। बेशतर नौजवान उर्दू शायर वैसी ही आज़ादी चाहते थे जो नेहरू का ख़्वाब थी जिसमें शान्ति, तरक़्क़ी, आर्थिक ख़ुशहाली, इनसान और फ़र्द की आज़ादी शामिल रहे...और रैशनलिज़्म को फ़रोग़ दिया जाए।” नेहरू का जाना उनके लिए उस पूरी तहरीक का माँद पड़ जाना था, जो इस मुल्क को एक समतावादी, सेक्युलर और आधुनिक देश बनाने के लिए उनके नेतृत्व में शुरू हुई थी। आज जब नेहरू के राजनीतिक मूल्यों और उनके दौर की आर्थिक-सामाजिक उपलब्धियों पर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं, ये रचनाएँ उनकी छवि का एक अलग रुख़ पेश करती हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book