Jayasi Soor Bihari
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<span lang="HI">यह पुस्तक सिविल सेवा</span>, <span lang="HI">विश्वविद्यालय परीक्षा समेत समस्त प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।</span><br /><span lang="HI">पुस्तक में जायसी</span>, <span lang="HI">सूरदास और बिहारी के प्रमुख पद सरलार्थ सहित उपलब्ध कराए गए हैं।</span><br /><span lang="HI">परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक कवि की रचना पर आलोचनात्मक लेख भी पुस्तक में शामिल है।</span>
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<span lang="HI">यह पुस्तक सिविल सेवा</span>, <span lang="HI">विश्वविद्यालय परीक्षा समेत समस्त प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।</span><br /><span lang="HI">पुस्तक में जायसी</span>, <span lang="HI">सूरदास और बिहारी के प्रमुख पद सरलार्थ सहित उपलब्ध कराए गए हैं।</span><br /><span lang="HI">परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक कवि की रचना पर आलोचनात्मक लेख भी पुस्तक में शामिल है।</span>
Book Details
-
ISBN9788195099566
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘चिदंबरा’ मेरी काव्यचेतना के द्वितीय उत्थान की परिचायिका है। उसमें ‘युगवाणी’ से लेकर ‘अतिमा’ तक की रचनाओं का संचयन है—सन् ’37 से ’57 तक प्राय: बीस वर्षों की विकास-श्रेणी का विस्तार।
‘चिदंबरा’ की पृथु-आकृति में मेरी भौतिक, सामाजिक, मानसिक, आध्यात्मिक संचरणों से प्रेरित कृतियों को एक स्थान पर एकत्रित देखकर पाठकों को उनके भीतर व्याप्त एकता के सूत्रों को समझने में अधिक सहायता मिल सकेगी। इनमें मैंने अपनी सीमाओं के भीतर, अपने युग के बहिरन्तर के जीवन तथा चैतन्य को, नवीन मानवता की कल्पना से मंडित कर, वाणी देने का प्रयत्न किया है। मेरी दृष्टि में ‘युगवाणी’ से लेकर ‘वाणी’ तक मेरी काव्य-चेतना का एक ही संचरण है, जिसके भीतर भौतिक और आध्यात्मिक चरणों की सार्थकता, द्विपद मानव की प्रकृति के लिए, सदैव ही अनिवार्य रूप से रहेगी।
‘‘पाठक देखेंगे कि (इन रचनाओं में) मैंने भौतिक-आध्यात्मिक, दोनों दर्शनों से जीवनोपयोगी तत्त्वों को लेकर, जड़-चेतना सम्बन्धी एकांगी दृष्टिकोण का परित्याग कर, व्यापक सक्रिय सामंजस्य के धरातल पर, नवीन लोक-जीवन के रूप में, भरे-पूरे मनुष्यत्व अथवा मानवता का निर्माण करने का प्रयत्न किया है, जो इस युग की सर्वोपरि आवश्यकता है?’’
—भूमिका से
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अष्टभुजा शुक्ल वर्तमान हिन्दी कविता के पेन्टहाउस से बाहर के कवि हैं जिनकी कविता का सीत-घाम देस के अन्दर के अहोरात्र से निर्धारित होता है, उस अहोरात्र के प्रतिपक्ष में तैयार किए गए उपकरणों से नहीं। उनका प्रकाश्यमान संग्रह ‘रस की लाठी’ भी उनके पूर्व प्रकाशित चार संग्रहों की तरह ही ऐसी ‘छोटी-छोटी बातों’ का बयान है जिनसे चाहे ‘अमेरिका के तलवों में गुदगुदी भी न हो किन्तु जो समूचे हिन्दुस्तान को रुलाने के लिए काफ़ी है।’ रस की इस लाठी में चोट और मिठास एक दूसरे से कोई मुरव्वत नहीं करते, किन्तु इस बेमुरव्वत वर्तमान में भी एक सुरंग मौजूद है जिसका मुहाना भूत और भविष्य को संज्ञाओं के एक दूसरे में मिथुनीकृत हो जाने से बताए जानेवाले कालखंड की ओर खुलता है जिसमें वसन्त अभियोग नहीं है और पंचम स्वर में मंगलगान की छूट होगी।
इस कालखंड की काव्य-सृष्टि में भूत का ठोस भरोसा सरसों और गेहूँ की उस पुष्टि-प्रक्रिया पर टिका है जिसे सारी यांत्रिकता के बाबजूद मिटूटी, पानी और वसन्त की उतनी ही ज़रूरत है जितनी हमेशा से रही है, और भविष्य का तरल आश्वासन उतना ही मुखर है जितनी स्कूल जाती हुई लड़की को साइकिल की घंटी या गोद में सो रहे बच्चे के सपने में किलकती हँसी होती है। ये कविताएँ उन आँखों की आँखनदेखी हैं जिनसे टपकते लहू ने उन्हें इतना नहीं धुँधलाया कि वे सूरज की ललाई न पहचान सकें। लेकिन भले ही कविता में इतनी ऊर्जा बचा रखने की दृढ़ता हो कि वह बुरे वक़्त की शबीह-साज़ी तक अपनी तूलिका को न समेट ले, डिस्टोपिया की ठिठुरन से सामना करने के लिए उँगलियों की लचक को कुछ अतिरिक्त ऊष्मा का ताप दिखाना ही पड़ता है। अष्टभुजा जी के पाठकों से यह बात छिपी न रहेगी कि उनकी कविता के जो अलंकार कभी दूर से झलक जाया करते थे, वे अब रीति बनकर उसकी धमनियों में दिपदिपा रहे हैं और उसकी कमनीयता अपनी काव्य-सृष्टि की ‘फ़लानी’ की उस ‘असेवित देहयष्टि’ की कमनीयता है जिसकी गढ़न में अगली पीढ़ी की जवानी तक पहुँचनेवाली प्रौढ़ता भी शामिल है।
अष्टभुजा जी की कविता का मुहावरा समय के साथ उस बढ़ते हुए बोझ को सँभालने की ताक़त और पुख़्तगी अपने भीतर सहेजता रहा है जिसके तले आज की हिन्दी कविता के अधिकतर ढाँचे उठने के पहले ही भरभरा पड़ते हैं। जो लोग उनकी कविता से पहली बार इस संग्रह के नाते ही दो-चार होंगे, उन्हें भी उसकी उस रमणीयता का आभास होगा जो अपने को निरन्तर पुनर्नवीकृत करती रहती है और जिसके नाते उसके अस्वादकों को उसका प्रत्येक साक्षात्कार एक आविष्कार लगता है।
—वागीश शुक्ल
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- Description: हिन्दी कविता में युगान्तर उपस्थित करनेवाले कवि महाप्राण निराला के उस काव्य-संसार से गुज़रना जो अब तक अजाना और प्राय: अपठित रहा है, पाठकों के लिए कुछ कम महत्त्वपूर्ण और मुग्धकारी नहीं है—कहीं-कहीं विस्मय की हद तक। अपनी कविताओं के जो संग्रह उन्होंने तैयार किए, अनेक कविताएँ उनमें इसलिए शामिल नहीं कीं कि या तो वे प्रारम्भिक थीं या फिर कमज़ोर। कुछ कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बावबूद गुम गईं और कुछ उनके ही काग़ज़ों के ढेर में गुमनाम बनी रहीं। पर अब ऐसी सभी कविताएँ इस संग्रह में हैं। इनके अतिरिक्त इस संकलन में जहाँ निराला की पहली प्रकाशित कविता ‘जन्मभूमि’ है, वहीं आचार्य रामचन्द शुक्ल और बापू के प्रति लिखी गई व्यंग्य रचनाएँ भी हैं। परिशिष्ट में उनकी बहुचर्चित कविता ‘जुही की कली’ का आदि-रूप सुरक्षित किया गया है, जिससे उनकी रचना-प्रक्रिया को समझने में भी मदद मिलती है। इसलिए निराला की कविताओं का यह संकलन कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है—ख़ासकर, संकलनकर्ता डॉ. नन्दकिशोर नवल के शब्दों में कहें तो, ‘इसमें संकलित कविताएँ निराला के कवि-जीवन के आरम्भ और विकास दोनों को ही समझने की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी हैं’ और ‘इन कविताओं में से अनेक में हमें उनकी उत्कृष्ट काव्य-कला के दर्शन होते हैं।’
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