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"रेख़्ता क्लासिक्स" सीरीज़ उर्दू के क्लासिकी शायरों के प्रतिनिधि शायरी को नए पाठकों तक पहुँचाने के एक अनूठा प्रयास है। प्रस्तुत किताब में शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की प्रतिनिधि शायरी है जिसका संकलन फ़रहत एहसास साहब ने किया है।
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"रेख़्ता क्लासिक्स" सीरीज़ उर्दू के क्लासिकी शायरों के प्रतिनिधि शायरी को नए पाठकों तक पहुँचाने के एक अनूठा प्रयास है। प्रस्तुत किताब में शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ की प्रतिनिधि शायरी है जिसका संकलन फ़रहत एहसास साहब ने किया है।
Book Details
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ISBN9788194415077
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Pages188
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: आँजुर भरि इजोत रोमिशाक प्रेम सम्बन्धी कविता स्त्री आ मनुष्यक सामूहिक जीवन मे अस्तित्वक अही अविचल यथार्थक वास्तविक मूल्य तकैत अछि। प्रपंच सँ संचालित सामाजिक व्यवस्थाक प्रवंचित मनुष्यक समस्त अभिलाषा केँ हुनकर काव्य-नायिका अपन जाग्रत चेतना सँ देखै छथि, आ जीवन मे किछु महत्त्वपूर्ण करबा लेल व्याकुल रहै छथि। अपन उद्यम मे यत्र-तत्र-सर्वत्र समाजक बहुमुखी आघात सहैतो कखनहुँ हताश नइँ होइ छथि। हुनकर स्त्री, पशु मनोवृत्तिक हिंस्र, खूँखार, वेधक दृष्टि-घात अहर्निश सहिकए क्रमश: पकठोस आ सावधान समझ बना लै छथि। एहेन स्त्री परिवार केँ सुगठित करबा लेल एक-एक साँस लगबै छथि। समस्त कर्तव्यक पूर्ति करैत हुनका एतबा कचोट अवश्य होइ छनि जे समाज आ कि परिवार हुनकहु मादे सोचथि। कवयित्रीक ई अपेक्षा एक टा महत्त्वपूर्ण पक्ष केँ उद्घाटित करैत समाज केँ ई संकेत दैत अछि जे पारिवारिकताक रक्षा मे आ परिवारक गठन मे जीवन झोंकि देनिहारि स्त्रीक पहचान आ हुनकर मनोबलक संज्ञान लेब अनिवार्य अछि। सूर्य, चन्द्रमा, फूल, पवन, प्रकाश, प्रेम, मनुष्यता, नैतिकता, विवेकशीलता, कृतज्ञता आदिक प्रति मोहाविष्ट हएब; प्राकृतिक अवदान सँ आह्लादक रूपक गढ़ब, कविता मे मोहक आ बहुरंगी व्यंजना उपस्थित करब...तय करैत अछि, जे रोमिशा केँ मानवीय परिवेश लेल बड़ बेसी अनुराग छनि। इएह अनुराग हुनका जनसरोकारक दायित्व सँ बन्हने रखतनि, आ हुनकर रचनात्मकता केँ उत्कर्ष देतनि। —देवशंकर नवीन
KUDHAB KUBELA
- Author Name:
Shailey
- Book Type:

- Description: Collection of poems
Ye Galat Baat Hai
- Author Name:
Manoj Kumar Sharma
- Book Type:

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Description:
‘ये ग़लत बात है’ कवि-कहानीकार मनोज कुमार शर्मा का पठनीय कविता-संग्रह है। समकालीन हिन्दी कविता सहसा इतनी सजग और त्वरित हो उठी है कि परिवेश की प्रत्येक गतिविधि उसकी ज़द में है। इसके परिणाम अनेक रूपों में प्राप्त हो रहे हैं। कुछ रूप मनोज कुमार शर्मा की इन कविताओं में देखे जा सकते हैं।
सामाजिक विसंगतियाँ, आत्मीय प्रसंग, प्रगतिशील चिन्तन, निजता के निमिष और मानवीय प्रयत्न— इन बिन्दुओं पर मनोज ने अपनी कविताएँ केन्द्रित की हैं। कुछ कविताओं में प्रकारान्तर से समय, नियति और नियन्ता से संवाद है। कवि जीवन की ‘म्रियमाण वास्तविकता’ को भी रेखांकित करता है। ऐसी कविताओं से व्यंग्यमिश्रित पीड़ा का यह भाव भी मुखर होता है—‘ऐ लीलाधर!/क्यों बनाया मनुष्य को भस्मासुर/क्यों बनाया मनुष्य/क्यों?’
जब मनोज ‘पानी’ कविता लिखते हैं तब वे जल के साथ ‘सजल संवेदना’ पर मँडराते संकटों का संकेत भी करते हैं। ऐसे प्रयत्नों से वे अपने निहितार्थों को व्यापक बनाते हैं। यह पढ़कर अच्छा लगता है कि उनका दृढ़ भरोसा प्रेम में है—चाहे वह प्रेम व्यक्ति केन्द्रित हो या मूल्य सन्दर्भित। और इसकी प्रतीक्षा कवि अनन्त तक कर सकता है—‘जब मिल जाएँगी दसों दिशाएँ आकाश से/ क्या तुम तब मिलोगे?’
ये कविताएँ पाठक को उकसाती हैं कि वह नई सुबह की अगवानी कर सके। विश्वास है, यह संग्रह पाठकों की प्रीति अर्जित करेगा।
Kuchh Kavitayen Va Kuchh Aur Kavitayen
- Author Name:
Shamsher Bahadur Singh
- Book Type:

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Description:
शमशेर जी का पहला कविता-संग्रह ‘कुछ कविताएँ’ 1959 में आया था और दूसरा ‘कुछ और कविताएँ’ 1961 में—यानी उस समय जब वे पचास वर्ष के थे। और ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने कविताएँ तभी लिखना प्रारम्भ किया था—इन दोनों संग्रहों की कविताएँ पिछले बीसेक वर्षों में लिखी गई थीं।
अधिकांश कवि पचास तक पहुँचते-पहुँचते अपने उतार पर होते हैं, लेकिन शमशेर के बारे में यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि निराला के बाद और ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ के पहले किसी भी एक कवि के दो ऐसे छोटे-छोटे अत्यन्त संकोची एवं विनम्र, संग्रहों ने हिन्दी कविता और उसकी आलोचना पर इतना गहरा और दूरगामी असर नहीं डाला।
शमशेर के अनेक कट्टर प्रशंसक अब भी यह मानते पाए जा सकते हैं कि उनकी अधिकांश कालजयी कविताएँ इन्हीं में हैं।...इसमें सन्देह नहीं कि ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में शमशेरियत के सारे मौलिक रंग मौजूद हैं—स्वस्थ-वयस्क रूमान, सारे सौन्दर्य में ऐसी सूक्ष्म-ऐन्द्रिक दृष्टि जो सिर्फ़ उन्हीं की है, शिल्प के प्रतिबद्ध और नाजुक प्रयोग जिनमें प्रगल्भता और प्रदर्शन का नितान्त अभाव है, ‘उर्दू’ और ‘हिन्दी’ का कारगर मेल, छन्दों, ग़ज़लों और नज़्मों से बेपरहेज़गी, कई सांस्कृतिक परम्पराओं का अपनी रक्त-मज्जा में अहसास, ‘परम्परा’ और ‘आधुनिकता’ का सहज मेल और इस सबके साथ और सबके ऊपर सर्वहारा—भारतीय सर्वहारा—के साथ तादात्म्य।
शमशेर ने छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, भारतीय-अरबी-फ़ारसी, परम्परा, आधुनिकतावाद, सौन्दर्यानुभूति, संगीत, चित्रकला, विश्व-समाज तथा राजनीति और प्रतिबद्धता के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं को अपनी अद्वितीय प्रतिभा में ढालकर जो अपना—केवल शमशेर का—काव्य, काव्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र गढ़ा है वह ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में अपने पूरे टटकेपन और उत्कर्ष के साथ उपस्थित है—मूल्यांकन के सारे ‘शुद्ध’, ‘शाश्वत’, कूढ़मग्ज़ और संकीर्ण सिद्धान्तों को विकलांग बनाता हुआ और एक बिलकुल अलग, पूर्णतर और बलिष्ठ सौन्दर्यशास्त्र तथा समीक्षा की माँग करता हुआ।
—विष्णु खरे
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