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Poetry

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Hindi

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बीसवीं सदी की हिन्दी कविता में अपनी धुन और आत्महानि की सीमा तक जाकर, लीक छोड़ लिख पानेवाले कम थे लेकिन शायद विष्णु खरे उन्हीं में गिने जाएँ। विष्णु खरे के साथ एक बड़ी घटना यह रही कि उनकी कविता हिन्दी के विभिन्न समसामयिक सम्प्रदायों को तुष्ट नहीं कर पाई। उनके न तो गुरु-संरक्षक रहे, न मित्र-प्रोत्साहक और न भक्त-शिष्य। ऐसी लगभग सर्वसम्मत उपेक्षा के बावजूद कहीं-कहीं उनकी कविताएँ न केवल याद रखी गईं, बल्कि कभी-कभी उनकी माँग भी की जाती रही, यही कोई कम ग़नीमत नहीं है। अपने और दूसरों के लिए और मुश्किलें पैदा करते हुए विष्णु खरे एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिसमें भूले-भटके काव्यावेश आ जाता है, वरना अक्सर उसमें निम्न-मध्यवर्गीय संकेतों और ब्याजशब्दावली का बाहुल्य रहता है और कभी उनकी ज़ुबान बातचीत की तरह आमफ़हम, दफ़्तरी, अख़बारी, तत्समी या गवेषणात्मक तक हो जाती है और ख़तरनाक ढंग से कहानी, गद्य, वर्णन, ब्योरों, रपट आदि के नज़दीक पहुँचती है और यह तय करना कठिन होता है कि उस निर्विकार-सी वस्तुपरकता में तथ्याभास का व्यंग्य है, करुणा है या उन्हें कविता लिखना ही नहीं आता। कविता के विषयों को लेकर भी उनके यहाँ एक कैलाइडोस्कोप की बहुबिम्‍बदर्शी विविधता है जो उनकी हर चीज़ में दिलचस्पी के दख़ल की पैदाइश है और इस ज़िद की कि सब कुछ में जो कविता है, उसका कुछ हिस्सा हासिल करना ही है। दुनिया उनके आगे बाज़ीचा-ए-इत्‍फ़ाल नहीं, उसमें जन्म ले चुके आदमी का कौतूहल और कशमकश है। विष्णु खरे को भी कवियों का कवि कहकर दाख़िल-दफ़्तर कर देना सुविधाजनक है लेकिन वे उन सजगों के कवि हैं जिनकी तादाद अन्दाज़ से कहीं ज़्यादा है। भारतीय आदमी और मानव के लिए उनकी प्रतिबद्धता असन्दिग्ध है लेकिन वे सारे ऐहिक और अपौरुषेय व्यापार, माया और लीला, यथार्थ और मिथक को जानने के प्रयास के प्रति भी वचनबद्ध हैं, क्योंकि हर बार उसे नई तरह से जानना चाहे बिना आदमी और अस्तित्व के पूरे बखेड़े को समझने की कोशिश अधूरी ही रहेगी। इसमें अनुभववाद या दूर की कौड़ी लाने का लाघव-प्रदर्शन नहीं है, समूचे जीवन से वाबस्तगी की बात है। इसीलिए विष्णु खरे की कविता न तो आदमी और समाज से घबराकर ‘शुद्ध कला’, अध्यात्म या रहस्यवाद में पलायन करती है और न कायनात को मात्र भौतिक मान किसी आसान ‘वाद’ की शरण लेती है। उनके यहाँ अनुभव और कविता ‘प्‍योर’ तथा ‘अप्लाइड’ दोनों अर्थों में हैं क्योंकि दोनों प्रकारों का एक-दूसरे के बिना अस्तित्व और गुज़ारा सम्भव नहीं है। वे वाक़ई अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने को मनुष्य और कवि होने की सार्थकता मानते हैं। इस संग्रह की कविताओं में भी वे अपने कथ्य, भाषा तथा शैली को जोखिम-भरी चुनौतियों और परीक्षाओं के सामने ले गए हैं। वे कविता को बाँदी या देवदासी की तरह नहीं, मानव-प्रतिभा की तरह हर काम में सक्षम देखना चाहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ऐसी कोई स्थिति नहीं है जिसकी अपनी कोई अर्थवत्ता न हो—हर आवाज़ के पीछे जो दुनिया है, विष्णु खरे की यदि कोई महत्त्वाकांक्षा है तो उसे ही अभिव्यक्ति देने का प्रयास करने की लगती है।

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बीसवीं सदी की हिन्दी कविता में अपनी धुन और आत्महानि की सीमा तक जाकर, लीक छोड़ लिख पानेवाले कम थे लेकिन शायद विष्णु खरे उन्हीं में गिने जाएँ। विष्णु खरे के साथ एक बड़ी घटना यह रही कि उनकी कविता हिन्दी के विभिन्न समसामयिक सम्प्रदायों को तुष्ट नहीं कर पाई। उनके न तो गुरु-संरक्षक रहे, न मित्र-प्रोत्साहक और न भक्त-शिष्य। ऐसी लगभग सर्वसम्मत उपेक्षा के बावजूद कहीं-कहीं उनकी कविताएँ न केवल याद रखी गईं, बल्कि कभी-कभी उनकी माँग भी की जाती रही, यही कोई कम ग़नीमत नहीं है।

अपने और दूसरों के लिए और मुश्किलें पैदा करते हुए विष्णु खरे एक ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिसमें भूले-भटके काव्यावेश आ जाता है, वरना अक्सर उसमें निम्न-मध्यवर्गीय संकेतों और ब्याजशब्दावली का बाहुल्य रहता है और कभी उनकी ज़ुबान बातचीत की तरह आमफ़हम, दफ़्तरी, अख़बारी, तत्समी या गवेषणात्मक तक हो जाती है और ख़तरनाक ढंग से कहानी, गद्य, वर्णन, ब्योरों, रपट आदि के नज़दीक पहुँचती है और यह तय करना कठिन होता है कि उस निर्विकार-सी वस्तुपरकता में तथ्याभास का व्यंग्य है, करुणा है या उन्हें कविता लिखना ही नहीं आता।

कविता के विषयों को लेकर भी उनके यहाँ एक कैलाइडोस्कोप की बहुबिम्‍बदर्शी विविधता है जो उनकी हर चीज़ में दिलचस्पी के दख़ल की पैदाइश है और इस ज़िद की कि सब कुछ में जो कविता है, उसका कुछ हिस्सा हासिल करना ही है। दुनिया उनके आगे बाज़ीचा-ए-इत्‍फ़ाल नहीं, उसमें जन्म ले चुके आदमी का कौतूहल और कशमकश है। विष्णु खरे को भी कवियों का कवि कहकर दाख़िल-दफ़्तर कर देना सुविधाजनक है लेकिन वे उन सजगों के कवि हैं जिनकी तादाद अन्दाज़ से कहीं ज़्यादा है। भारतीय आदमी और मानव के लिए उनकी प्रतिबद्धता असन्दिग्ध है लेकिन वे सारे ऐहिक और अपौरुषेय व्यापार, माया और लीला, यथार्थ और मिथक को जानने के प्रयास के प्रति भी वचनबद्ध हैं, क्योंकि हर बार उसे नई तरह से जानना चाहे बिना आदमी और अस्तित्व के पूरे बखेड़े को समझने की कोशिश अधूरी ही रहेगी। इसमें अनुभववाद या दूर की कौड़ी लाने का लाघव-प्रदर्शन नहीं है, समूचे जीवन से वाबस्तगी की बात है।

इसीलिए विष्णु खरे की कविता न तो आदमी और समाज से घबराकर ‘शुद्ध कला’, अध्यात्म या रहस्यवाद में पलायन करती है और न कायनात को मात्र भौतिक मान किसी आसान ‘वाद’ की शरण लेती है। उनके यहाँ अनुभव और कविता ‘प्‍योर’ तथा ‘अप्लाइड’ दोनों अर्थों में हैं क्योंकि दोनों प्रकारों का एक-दूसरे के बिना अस्तित्व और गुज़ारा सम्भव नहीं है। वे वाक़ई अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने को मनुष्य और कवि होने की सार्थकता मानते हैं। इस संग्रह की कविताओं में भी वे अपने कथ्य, भाषा तथा शैली को जोखिम-भरी चुनौतियों और परीक्षाओं के सामने ले गए हैं। वे कविता को बाँदी या देवदासी की तरह नहीं, मानव-प्रतिभा की तरह हर काम में सक्षम देखना चाहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि ऐसी कोई स्थिति नहीं है जिसकी अपनी कोई अर्थवत्ता न हो—हर आवाज़ के पीछे जो दुनिया है, विष्णु खरे की यदि कोई महत्त्वाकांक्षा है तो उसे ही अभिव्यक्ति देने का प्रयास करने की लगती है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
3rd
Publication year
1994
Weight
254 grams
ISBN-13
9788171195121
Pages
119
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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