Symphonies of a Curious Mind
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We all speak in one language or the other. The many cultures have varieties languages that help them interact with one another. However, our mind sometimes lack the words to express the emotions that it experiences in bouts ecstasy and enlightenment. This book holds a such verses that have not escaped the mind in a way original to the author. Kumar Harsh has put his mind and heart in perfect synchrony and has written these with utmost care and affection. The readers might find it delightful to read. It's a treat for the heart and mind. Symphonies a Curious Mind will take you back to all those unfelt emotions and will remind you things intangible, even those close to touch sometimes. A harmony modern times. Organic, Dexterous, Easy.
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We all speak in one language or the other. The many cultures have varieties languages that help them interact with one another. However, our mind sometimes lack the words to express the emotions that it experiences in bouts ecstasy and enlightenment. This book holds a such verses that have not escaped the mind in a way original to the author. Kumar Harsh has put his mind and heart in perfect synchrony and has written these with utmost care and affection. The readers might find it delightful to read. It's a treat for the heart and mind. Symphonies a Curious Mind will take you back to all those unfelt emotions and will remind you things intangible, even those close to touch sometimes. A harmony modern times. Organic, Dexterous, Easy.
Book Details
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ISBN9789388799652
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Pages192
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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आज की हिन्दी कविता को जिन लोगों ने सम्भव किया है, उनमें विवेक निराला सर्वाधिक महत्त्व के अधिकारी हैं। सर्वथा नई काव्यभूमि का अर्जन और भाषा की अनूठी भंगिमाओं का सृजन विवेक की कविताओं को एक पृथक् पहचान देते हैं। विवेक अपने काव्य-सन्धान में सुदूर ‘महाभारत’ तक जाते हैं और साथ ही साथ बिलकुल सामने की गली में चल रहे जीवन-व्यापार को भी उसी तन्मयता और कलागत सौष्ठव से चित्त में उतार लेते हैं। इसी प्रशस्त जीवन-चाप के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं 'जूठा-झूठा' जैसे मार्मिक चित्र। बहुत कम कवियों के पास ऐसा विराट कथ्य-वृत्त मिलता है।
विवेक ने बड़े अपनापे के साथ साधारण लोगों का चित्रण किया है। गहरी करुणा और प्रेम से उनके संघर्षों, जिजीविषा और जीवट को उद्घाटित किया है। विवेक की बहुत बड़ी ख़ूबी है उनके स्वर का सन्तुलन। अत्यन्त भावाविष्ट क्षणों में भी उनका स्वर संयत और उद्वेगहीन रहता है यानी तरंगें ताल में नहीं बल्कि पाठक के अन्तस में उठती हैं। ऐसा आत्म-नियंत्रण, वस्तुनिष्ठता और आसक्ति से भरी अनासक्ति दुर्लभ है।
विवेक गहरे और वास्तविक अर्थों में राजनीतिक कवि हैं। कई बार उनकी कविताएँ सपाट और मुँहफट भी लग सकती हैं लेकिन यह भी कवि की रणनीति ही है। वह जो कुछ करते हैं, वह सोची-समझी कला-नीति का परिणाम होता है। 'दिल्ली में एक दिन की राष्ट्रीय समस्या' एक अद्भुत राजनीतिक कविता है। इसका शिल्प भी बेजोड़ है। लेकिन शिल्प की दृष्टि से जो कविता स्वयं विवेक की पिछली सारी कविताओं को पीछे छोड़ देती है वह है ‘नई वर्णमाला’। सम्भवत: ऐसी कविता आज तक लिखी ही नहीं गई। इसी से लगता है कि विवेक कविता की नई वर्णमाला रच रहे हैं और कवि को सभी काव्य-रूपों पर अधिकार प्राप्त है। चाहे वह गद्य कविता हो या छन्दोबद्ध, चाहे लघुकाय हो अथवा लम्बी। ‘स्वर्णयुगों पर शोकगीत’ और ‘विरासत का सवाल’ काफ़ी लम्बी कविताएँ हैं और यहाँ भी कवि ने उसी नियंत्रण और शैल्पिक तथा वास्तु-प्रवीणता का परिचय दिया है।
ऐसा संग्रह कभी-कभी ही बन जाता है। आशा है कि हिन्दी के चारु, सहृदय पाठक इसको अंगीकार करेंगे।
—अरुण कमल
Yugantar Ke Phool
- Author Name:
Kumar Mithilesh Prasad Singh
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Description:
‘युगान्तर के फूल’ में युग-युग का अन्तर जतलाने की तहज़ीब है। व्यक्तित्व की प्रधानता के कारण ख़ास कालखंड को उस व्यक्तित्व का नाम देकर युग को सम्बोधित करने की परिपाटी है कि वह अमुक युग था या यह अमुक युग चल रहा है।
‘युगान्तर के फूल’ में दस लम्बी कविताएँ हैं। सभी कविताएँ अलग-अलग भावभूमि की हैं, जिनमें देखी-समझी-भोगी अनुभूतियों के अलावा वर्तमान विसंगतियों और ज़रूरतों का समावेश भी हैं।
‘युगान्तर के फूल’ ऐसे विषय से सम्बन्धित है, जो काव्य-रचना की परम्परा में सर्वस्वीकृत नहीं माने जा सकते। इसकी स्वीकार्यता के ख़तरे को जानते हुए भी मैंने जोखिम उठाया है। मैं साहित्य की समृद्धि के लिए ऐसे जोखिम को आवश्यक मानता हूँ। यदि पाठक ऐसे विषयों पर लिखी कविताओं को साहित्य की समृद्धि एवं दीन-दुखियों की सेवा के लिए अपरिहार्य मानें तो मैं उन्हें भरोसा दे सकता हूँ कि इस दिशा में अभिनवपन की ख़ुराक उन्हें भविष्य में भी मिलेगी।
यों भी विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने लेखकों को चुनौती दे रखी है कि अब नई पीढ़ी को अद्यतन जानकारी से सहज-सरल तरीक़ों से अवगत कराओ। ग्राह्य और विषयगत बनाने की जवाबदेही लेखक बिरादरियों की है। पुरातन परम्पराएँ बदलाव के साथ अपना विकास चाहती हैं।
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