Nayee Ankhen
(0)
₹
280
229.6 (18% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
श्री रविन्द्र कुमार के द्वारा प्रणीत 'नई आँखें कविता संग्रह की कविताएँ काव्य के संसार में अपना एक पृथक स्थान निर्मित करती हैं और विभिन्न कोणों से तथा अपनी काव्यमयी अनुभूतियों से मस्तिष्क की अनेक खिड़कियाँ खोल देती हैं। सद्विचारों के लिए भी स्वच्छ और ताजा हवा का आना आवश्यक है। ये कविताएँ भी स्वच्छ और ताजा हवा की तरह साहित्य को एक नया रूप देने में सक्षम हैं। बिम्बों-प्रतीकों का हारा हुआ विधान इन कविताओं में एक नया कलेवर लेकर आया है तथा ये कविताएँ एक नए क्षितिज का द्वार खोलती हैं। इन कविताओं में कवि एक नई भाव-भंगिमा से संसार को देखने की दृष्टि सृजित करता है। प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ संसार की गतिमयता को अत्यंत सूक्ष्मता से अभिव्यंजित करती हैं। एक आलोकमयी दृष्टि का प्रक्षेपण करते हुए कवि यथार्थ के दृश्यों का उद्घाटन करता है। एक सामाजिक यथार्थ जो बहुधा दर्शन से समझा जा सकता है, उसे कवि ने कविता के माध्यम से समझाने की चेष्टा की है। बहुत कुछ चिरंतन सत्य की परिभाषा में लिखे हुए शब्द समय से पार देखने को विवश करते हैं। अदृश्य को देखने की जिजीविषा का एक अनूठा प्रयास इन कविताओं में है। स्वच्छ प्रकृति की स्वच्छ मानसिकता की इस काव्यमयी सृष्टि के लिए कवि श्री रविन्द्र्र कुमार जी की इन कविताओं का स्वागत होना ही चाहिए। —डा. अनूप सिंह
Read moreAbout the Book
श्री रविन्द्र कुमार के द्वारा प्रणीत 'नई आँखें कविता संग्रह की कविताएँ काव्य के संसार में अपना एक पृथक स्थान निर्मित करती हैं और विभिन्न कोणों से तथा अपनी काव्यमयी अनुभूतियों से मस्तिष्क की अनेक खिड़कियाँ खोल देती हैं। सद्विचारों के लिए भी स्वच्छ और ताजा हवा का आना आवश्यक है। ये कविताएँ भी स्वच्छ और ताजा हवा की तरह साहित्य को एक नया रूप देने में सक्षम हैं। बिम्बों-प्रतीकों का हारा हुआ विधान इन कविताओं में एक नया कलेवर लेकर आया है तथा ये कविताएँ एक नए क्षितिज का द्वार खोलती हैं। इन कविताओं में कवि एक नई भाव-भंगिमा से संसार को देखने की दृष्टि सृजित करता है। प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ संसार की गतिमयता को अत्यंत सूक्ष्मता से अभिव्यंजित करती हैं। एक आलोकमयी दृष्टि का प्रक्षेपण करते हुए कवि यथार्थ के दृश्यों का उद्घाटन करता है। एक सामाजिक यथार्थ जो बहुधा दर्शन से समझा जा सकता है, उसे कवि ने कविता के माध्यम से समझाने की चेष्टा की है। बहुत कुछ चिरंतन सत्य की परिभाषा में लिखे हुए शब्द समय से पार देखने को विवश करते हैं। अदृश्य को देखने की जिजीविषा का एक अनूठा प्रयास इन कविताओं में है। स्वच्छ प्रकृति की स्वच्छ मानसिकता की इस काव्यमयी सृष्टि के लिए कवि श्री रविन्द्र्र कुमार जी की इन कविताओं का स्वागत होना ही चाहिए। —डा. अनूप सिंह
Book Details
-
ISBN9789388799768
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Jai Kanhaiyalal Ki
- Author Name:
Rameshraaj
- Rating:
- Book Type:

- Description: कवि ने प्रथम पृष्ठ पर ही शीर्षक के नीचे टिप्पणी दी है –“ कृष्ण-रूप में कंस जैसे हर शासक के प्रति “, जिससे मुख्य मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है ‘ करारे व्यंग्य – देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर ‘ | रमेशराज के व्यंग्यों की ख़ास बात यह है कि स्तरहीनता नहीं, कहीं अशिष्टता नहीं, न कहीं मर्यादा का उल्लंघन, फिर भी करारे प्रहार | जीवन का भोगा हुआ यथार्थ जैसे साकार सामने खड़ा हो | कैसी सहज-सरल अभिव्यक्ति, लक्ष्य की ओर दनदनाते-सनसनाते तीर की तरह – जन को न रोटी-दाल, जै कन्हैयालाल की नेताजी को तर माल, जै कन्हैयालाल की! नीति है कमाल की !! व्यंग्य को अधिक धारदार और मारक बनाने के लिए कवि ने उद्धव-गोपी प्रसंग को बड़ी होशियारी के साथ जोड़ दिया है- ऊधौ देश पर आप कर्ज विश्वबैंक का लाद-लाद हो निहाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कथ्य की सशक्तता के साथ कवि का कौशल भी प्रभावित करता है | इसे मैं उक्ति-वैचित्र्य का कमाल मानता हूँ, साथ ही वर्ण-मैत्री भी निर्दोष एवं प्रभावी है | प्रकृति से जो प्रतीक लिए गए हैं वे कवि के मन्तव्य को भी स्पष्ट करते हैं तथा उनसे काव्य में कलात्मक विम्ब-सौन्दर्य भी प्रभावित करता है | देखिये एक उदाहरण – खुशियों का मानसून अँखियों से दूर है सूख गए सुख-ताल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कवि ने अपने कथ्य को अधिक ग्राह्य बनाने के लिए पौराणिक इंगित भी दिए हैं | कहीं विरोधाभास से अपना मन्तव्य स्पष्ट किया है तो कहीं आधुनिक योजनाओं की विडम्बनाओं की ओर इंगित है – केवल अंगूठे नहीं मांगें आज द्रोण जी भील को करें हलाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !!
Aghoshit Ulgulan
- Author Name:
Anuj Lugun
- Book Type:

-
Description:
सभ्यता के तथाकथित केन्द्रों से अपसरित आक्रामक विकास के विरुद्ध संघर्षरत नागरिकता के आत्मनिर्भर हाशियों के पक्ष में हिन्दी कविता को एक निर्णायक भंगिमा देने में अनुज लुगुन की कविता की अहम भूमिका रही है। आदिवासियत को जीवन-पद्धति के साथ-साथ एक वैचारिक अवधारणा के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए उन्होंने प्रतिरोध की काव्य-चेतना को एक सशक्त मोर्चा देने का प्रयास निरंतर अपनी कविता में किया है। वे उस जीवन के बीचोबीच रहते आए हैं जो मुख्यधारा से दूर अपनी प्राकृतिक जिजीविषा और सम्पूर्णता के साथ पेड़ों, पहाड़ों, नदियों और पशु-पक्षियों से अपने आदिम रिश्ते निभाते हुए अपने अस्तित्व में सार्थक है और जिसे चाहें तो मुख्यधारा के विकल्प के रूप में भी देखा जा सकता है। लेकिन होता इसके विपरीत है। मुख्यधारा उस बहुरंगी जीवन को अपने जैसा कर लेना चाहती है, सो भी बिना उनकी मर्जी के। आदिवासियत का केन्द्रीय सरोकार इसी अनचाहे आप्लावन से बचे रहना है। यही उसका संघर्ष है और अनुज की कविताएँ लगातार इस संघर्ष के साथ चलती हैं।
अघोषित उलगुलान में इस सफर की हर छवि अपने मूल मानवीय तर्क के साथ उपस्थित है। ये कविताएं आदिवासी जीवन के खूबसूरत बिम्ब हम तक पहुँचाती हैं तो आक्रान्ताओं के विरुद्ध तनी मुट्ठियों को भी स्वर देती हैं। देशों, भाषाओं और संस्कृतियों के पार जाते हुए वे हर उस असहाय के साथ खड़ी होती हैं जो परभक्षी सभ्यता के निशाने पर है, जिसे सत्ता और शक्ति की विभिन्न संरचनाओं ने गैरजरूरी के खाते में डाल दिया है।
नींद के बारे में सबसे मीठे गीत गाने वाले तोतों और सहजीवी भाव से अपनी दैनंदिन मुश्किलों को आसान करते ग्रामीण जनों से लेकर क्यूबा और फिलिस्तीन तक फैले यातना और प्रतिरोध के चित्रों को वे सहज ही हमारे स्थानीय बोध का हिस्सा बना देते हैं—“टूटे पुल के उस पार/फेंकता हूँ एक डोरी/आदमीयत की टोली में/आदमीयत के लिए संघर्ष कर रहे टोलों की ओर से”—आह्वान है पृथ्वी के किसी भी कोने में संघर्षरत आदमीयत को एक साथ होकर लड़ने का जिसे अनुज की कविता अनुभूति की प्रामाणिक छवियों के साथ हम तक पहुँचाती है।
Garbh ki utaran
- Author Name:
Pushpita Awasthi
- Book Type:

- Description: A Collections of Hindi Poems by Pushpita Awasthi
Lautati Dopaharein
- Author Name:
Sonnet Mondal
- Book Type:

-
Description:
सॉनेट मंडल अंग्रेजी कविता और साहित्य के सुपरिचित नाम हैं। हिन्दी में यह उनका पहला कविता-संग्रह है। लौटती दोपहरें की कविताएँ पढ़कर लगेगा कि ये एक ध्यानस्थ मस्तिष्क से प्रसूत रचनाएँ हैं। एक मन जो पूर्ण एकाग्रता की एक सीधी रेखा पर स्वयं को, अपने बहुत निकट से प्रसरित होकर ब्रह्मांड के छोर तक जाते समय को, अपने अतीत को और उस बीते, लेकिन कहीं अब भी ठहरे हुए काल में फॉसिल्स की तरह जमी स्मृतियों को बहुत ललक से देखता है।
वे कहते हैं—‘समय मेरी अदृश्य छाया है/उजाले में अदृश्य/नंगी आँखों से छिपी/सहज-बोध के लिए खुली।’ इस समय को पकड़ने और इन कविताओं के अन्तस तक पहुँचने के लिए हमें एक समतल अहसास के रास्ते पर चलना होता है। उनके कवि ने अपनी हर पद-चाप को ध्यान से सुना है, और बहुत करीने से कविता में निथारा है।
Raja Ayogya Hai Tatha Anya Kavitayen
- Author Name:
Madhulika Ben Patel
- Book Type:

-
Description:
राजा अयोग्य है तथा अन्य कविताएँ' भारतीय समाज का आईना है। कविता संग्रह की शुरुआत 'आईना' से होती है। आगे की कविताएँ भारतीय समाज में व्याप्त अविश्वास, भुखमरी, गरीबी, धोखा, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, लोकतंत्र की दुर्दशा, शासक की नियति, औरतों के साथ छल, पुरुषों की नियति, पारिवारिक संबंधों की प्रगाढ़ता, माँ की ममता, स्त्री की सहृदयता को दिखाने का मुकम्मल आईना बनती हैं। इस कविता संग्रह की कविताओं को पढ़ने पर भारतीय समाज और भारतीय मन का चित्र स्वतः उभरकर सामने आ जाता है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह कविता संग्रह पाठकों के हृदय में अपना मुकम्मल स्थान जरूर बनायेगा।
प्रो. बिपिन कुमार हिन्दी विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
Yaad Kiya Dil Ne
- Author Name:
Dr. Trinetra Bajpai
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी फिल्म संगीत का एक दौर ऐसा भी था जब गीतों, गजलों, नज्मों की सम्पदा सुमधुर धुनों और संयत लय-ताल के साथ हमारे जीवन के तकरीबन हर पहलू की जीवन्त व्याख्या की तरह हमारे साथ रहती थी। हर मन की हर बात कहने के लिए कोई-न-कोई गीत निकल आता था, दर्द की, खुशी की, अफसोस की, शोक की हर लहर किसी-न-किसी गीत से जाकर जुड़ जाती थी। आज भी जरूरत के वक़्त वही गीत हमारे काम आते हैं।
और उन गीतों के पीछे थी ऐसे अनेक संगीतकारों की सुर-साधना, अनेक ऐसे गायकों की संगीत-चेतना जिनमें से बहुतों का नाम भी हम आज के धूम-धड़ाके में भूल गए हैं, या जान ही नहीं पाए।
यह किताब उन्हीं नामों की स्वर्ण-तालिका को प्रकाशित करती है। वे संगीत-निर्देशक जिन्होंने हिन्दी फ़िल्म संगीत की जड़ें गूँथी, अपनी धुनों से देश के जन-गण को स्वर दिया, ऐसी लयबद्ध पंक्तियाँ दीं जो कहीं-न-कहीं हर किसी को आपस में जोड़कर देश की सामूहिक संवेदना को आकार देती हैं।
इस पुस्तक के केन्द्र में खास तौर पर उन संगीतकारों का जीवन और कृतित्व है जिन्होंने फ़िल्म संगीत को एक नई, सुरीली और कलात्मक दिशा दी और फ़िल्म-संगीत के उस दौर को सम्भव किया जिसे आगे चलकर संगीत का ‘स्वर्ण युग’ कहा गया। संगीत की गहरी समझ, शोध और लोकप्रियता के आधार पर यहाँ ऐसे 26 संगीतकारों पर फोकस किया गया है। अपने क्षेत्र के इन युग-प्रवर्तकों के साथ ही यहाँ उन लोगों के काम को भी रेखांकित किया गया है जिन्होंने भारतीय फ़िल्म संगीत के खजाने को समृद्ध करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई और जो आज भी सक्रिय हैं।
फ़िल्म-संगीत के प्रेमी पाठक इस अनूठी पुस्तक को सन्दर्भ ग्रंथ की तरह सहेज सकते हैं।
Swachchhand
- Author Name:
Sumitranandan Pant
- Book Type:

-
Description:
कविश्री सुमित्रानंदन पंत का काव्य-संसार अत्यन्त विस्तृत और भव्य है। प्रायः काव्य-रसिकों के लिए इसके प्रत्येक कोने-अँतरे को जान पाना कठिन होता है। पंत जी की काव्य-सृष्टि में, किसी भी श्रेष्ठ कवि की तरह ही, स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठता के शिखरों के दर्शन होते हैं, नवीन काव्य-भावों के अभ्यास का ऊबड़-खाबड़, निचाट मैदान भी मिलता है और अवरुद्ध काव्य-प्रयासों के गड्ढे भी। किन्तु किसी कवि के स्वभाव को जानने के लिए यह आवश्यक होता है कि यत्नपूर्वक ही नहीं, रुचिपूर्वक भी उसके काव्य-संसार की यात्रा की जाए। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पंत जी के बारे में लिखा कि आरम्भ में उनकी प्रवृत्ति इस जग-जीवन से अपने लिए सौन्दर्य का चयन करने की थी, आगे चलकर उनकी कविताओं में इस सौन्दर्य की सम्पूर्ण मानव जाति तक व्याप्ति की आकांक्षा प्रकट होने लगी। प्रकृति, प्रेम, लोक और समाज-विषय कोई भी हो, पंत-दृष्टि हर जगह उस सौन्दर्य का उद्घाटन करना चाहती है, जो प्रायः जीवन से बहिष्कृत रहता है। वह उतने तक स्वयं को सीमित नहीं करती, उस सौन्दर्य को एक मूल्य के रूप में अर्जित करने का यत्न करती है।
सुमित्रानंदन पंत की जन्मशती के अवसर पर उनकी विपुल काव्य-सम्पदा से एक नया संचयन तैयार करना पंत जी के बाद विकसित होती हुई काव्य-रुचि का व्यापक अर्थ में अपने पूर्ववर्ती के साथ एक नए प्रकार का सम्बन्ध बनाने का उपक्रम है। यह चयन पंत जी के अन्तिम दौर की कविताओं के इर्द-गिर्द ही नहीं घूमता, जो काल की दृष्टि से हमारे अधिक निकट हैं; बल्कि उनके बिलकुल आरम्भिक काल की कविताओं से लेकर अन्तिम दौर तक की कविताओं के विस्तार को समेटने की चेष्टा करता है। चयन के पीछे पंत जी को किसी राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा, किसी नई नैतिक-दार्शनिक, दृष्टि जैसे काव्य-बाह्य दबाव में नए ढंग से प्रस्तुत करने की प्रेरणा नहीं है—यह एक नई शताब्दी और सहस्राब्दी की उषा वेला में मनुष्य की उस आदिम, साथ ही चिरनवीन सौन्दर्याकांक्षा का स्मरण है, पंत जी जैसे कवि जिसे प्रत्येक युग में आश्चर्यजनक शिल्प की तरह गढ़ जाते हैं।
किसी कवि की जन्मशती के अवसर पर परवर्ती पीढ़ी की इससे अच्छी श्रद्धांजलि क्या हो सकती है कि वह उसे अपने लिए सौन्दर्यात्मक विधि से समकालीन करे। पंत-शती के उपलक्ष्य में उनकी कविताओं के संचयन को ‘स्वच्छंद’ कहने के पीछे मात्र पंत जी की नहीं, साहित्य मात्र की मूल प्रवृत्ति की ओर भी संकेत है। संचयन में कालक्रम के स्थान पर एक नया अदृश्य क्रम दिया गया है, जिसमें कवि-दृष्टि, प्रकृति, मानव-मन, व्यक्तिगत जीवन, लोक और समाज के बीच संचरण करते हुए अपना एक कवि-दर्शन तैयार करती है। ‘स्वच्छन्द’ के माध्यम से पंत जी के प्रति विस्मरण का प्रत्याख्यान तो है ही, इस बात को नए ढंग से चिह्नित भी करना है कि जैसे प्रकृति का सौन्दर्य प्रत्येक भिन्न दृष्टि के लिए विशिष्ट है, वैसे ही कवि-संसार का सौन्दर्य भी अशेष है, जिसे नई दृष्टि अपने लिए विशिष्ट प्रकार से उपलब्ध करती है।
Gaganvat : Sanskrit Muktakon Ka Sweekaran
- Author Name:
Mukund Laath
- Book Type:

-
Description:
'स्वीकरण’ शब्द मेरा नहीं, पुराना है—12वीं सदी के काव्याचार्य राजशेखर का है। मैंने शब्द 'कविता का एक भाषा से दूसरी भाषा में काव्यानुवाद’—इस अर्थ में लिया है। राजशेखर ने 'स्वीकरण’ का प्रयोग इसे 'हरण’ से व्यावृत्त—अलग—करने के लिए किया है। राजशेखर कहते हैं कि नई कविता बनती ही पुरानी चली-आती कविताओं की परम्परा के भीतर है—यों पुरानी कविता को 'ले लेना’ कोई बुरी बात नहीं—बल्कि अनिवार्य है। पर उसे सचमुच 'अपना लेना’ उपाय-कौशल चाहता है। राजशेखर ऐसे उपायों का विस्तार से वर्णन करते हैं। इसके लिए पुरानी कविता का रूपान्तर आवश्यक था जो कई तरह से किया जा सकता था, जिन्हें राजशेखर खोल कर दिखाते हैं। 'स्वीकरण’ शब्द राजशेखर ने गढ़ा था। पर इसके पीछे जो धारणा है, विचार है, वह 'ध्वन्यालोक’ के विख्यात लेखक, भाषा में एक नए अर्थलोक—व्यंजना—के द्रष्टा, महत् दार्शनिक आनन्दवर्धन का है। आनन्दवर्धन अपने ग्रन्थ में ध्वनि (व्यंजना) की शास्त्रीय स्थापना करने के बाद पूछते हैं कि यह जो स्थापना हुई है, यह क्या शास्त्रमात्र-सार नहीं? इससे कवि को क्या लाभ? उत्तर देते हुए आचार्य कहते हैं कि मनुष्य के चित्त में जितने भाव हैं, पुरानी कविता में उनकी सक्षम अभिव्यक्ति हो चुकी है, आज का कवि नया क्या कर सकता है? पर कविता तो नई ही होती है। आनन्दवर्धन की दृष्टि में यह नयापन व्यंजना का ही नयापन होता है। पुरानी कविता की व्यंजना बदल दी जाए तो कविता नई हो जाती है।
मेरे अनुवाद इन पुराने रास्तों पर नहीं चलते। 'स्वीकरण’ मेरे लिए अनूदित कविता का रूपान्तरण नहीं, उलटे उस कविता के स्वरूप-स्वभाव को, भाव-मर्म को बजा रखते हुए उसे एक नई भाषा में उतारना है। एक बात और कहना चाहूँगा। संस्कृत कविता मुक्तक-प्रधान है। बड़ी कविताओं में, महाकाव्यों में भी, यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। मैंने अपने 'अनुवचन’ में मुक्तक पर कुछ लम्बी चर्चा की है। पाठक उसे देखेंगे तो इन कविताओं में उसकी पैठ बढ़ सकती है।
—प्रस्तावना से
संस्कृत काव्य की विपुलता और वैभव का अक्सर ज़िक्र होता है। मुकुन्द लाठ उन बिरले कवि-चिन्तकों में से हैं जिन्होंने इस काव्य के अपार लालित्य को हिन्दी में सुघरता और संवेदनशीलता से लाने की कोशिश की है। राजशेखर के हवाले से वे इन्हें 'स्वीकरण’ कहते हैं। वे इस अर्थ में स्वीकरण हैं भी कि उन्हें पढ़ते लगता है कि आप मूल हिन्दी कविता ही पढ़ रहे हैं। हमें प्रसन्नता है कि हम रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत इस संचयन को एक बार फिर हिन्दी पाठकों के समक्ष रसास्वादन के लिए ला रहे हैं।
—अशोक वाजपेयी
Dhoop Se Roothi Chandni
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
- Rating:
- Book Type:

- Description: This book has no description
Dilli
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
style="font-weight: 400;">‘दिनकर’ की कविताओं में जो गीतात्मक लयात्मकता है वह ‘दिल्ली’ संग्रह की कविताओं में भी मुखर है। इसमें चार कविताएँ संकलित हैं जो दिल्ली के यथार्थ और निहितार्थ को इतने अनूठे ढंग से प्रकट करती हैं कि यह शहर एक प्रतीक बनकर सामने आता है।
संग्रह की पहली कविता ‘नई दिल्ली के प्रति’ 1929 की है। इसकी पृष्ठभूमि में नई दिल्ली का प्रवेशोत्सव है जो 1929 में मनाया गया था। उसी वर्ष भगत सिंह पकड़े गए और लाहौर-कांग्रेस में पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास हुआ। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उस उथल-पुथल भरे दौर में उत्सव और दमन के विरोधाभासों को यह कविता बखूबी मूर्त करती है।
संग्रह की दूसरी कविता ‘दिल्ली और मास्को’ है जिसका रचनाकाल 1945 का है। इसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और समाजवादी क्रान्ति का जयघोष निहित है जो राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रमों की प्रभावी भूमिकाओं को दिल्ली के सन्दर्भों में देखे जाने की माँग करती है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व रचित उपरोक्त दोनों कविताओं के विपरीत शेष दो कविताएँ—‘हक़ की पुकार’ और ‘भारत का यह रेशमी नगर’—स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद क्रमश: 1952 और 1954 की हैं। इन दोनों कविताओं में दिल्ली का तत्कालीन यथार्थ तो प्रकट हुआ ही है, वह विलासी रूप भी उजागर हुआ है जिससे राजनीतिक कर्मठता को प्रेरणा नहीं मिलती, उलटे बाधा पड़ती है। दिनकर कहते हैं कि देश के नवनिर्माण का कार्य जो इतनी धीमी गति से चल रहा है, उसका भी मुख्य कारण यही है कि कार्याधिकारी देश की आकुलता से अपरिचित हैं। जबकि दिल्ली हमारी सारी शिराओं का केन्द्र है। इसी ऊहापोह की राजनीतिक स्थिति से जो क्षोभ उठता है, वही इन कविताओं का मूल भाव है।
राष्ट्रीय राजधानी पर लिखी इन कविताओं को एक साथ पढ़ने पर पाठक कवि के उपरोक्त दृष्टिकोण को कुछ अधिक न्याय के साथ ग्रहण कर सकेंगे।
Kuch Anchuye Pehlu
- Author Name:
Kalapana Shukla
- Book Type:


- Description: Masterpeice hindi poetry collection
Kavita Mein Banaras
- Author Name:
Rajeev Singh
- Book Type:

-
Description:
ग़ालिब उसे हिन्दुस्तान का क़ाबा कहते हैं, तो कबीर कहते हैं, ‘चोवा चंदन अगर पान, घर घर सुमृति होत पुरान’, तुलसी के लिए वह ‘परमारथ की खान’ है। भारतेन्दु के लिए वहाँ के ‘लोग निकम्मे भंगी गंजड़, लुच्चे बे-बिसवासी’ हैं तो बेढब बनारसी कहते हैं कि बनारस की कोई शान ही नहीं रह जाएगी जिस दिन गलियों में पान की दुकानें नहीं दिखेंगी। श्रीकान्त वर्मा की काशी में ‘जिस रास्ते जाते हैं शिव, उसी रास्ते आता है शव’, तो वली दकनी का दिल जोगी बनकर इसी बनारस में वास करना चाहता है।
यह काशी है, वाराणसी, बनारस जिसे दुनिया के प्राचीनतम नगरों में गिना जाता है। यह अपनी विलक्षणताओं से हर किसी को आकर्षित करता है। भौतिक सुखों से उकताए यूरोप-अमेरिकावासियों से लेकर मोक्ष और अध्यात्म को जीवन का लक्ष्य मानने वाले अनपढ़ ग्रामीण भारतीयों तक।
कवि, लेखक, कलाकार, फ़िल्मकार भी उसके लगभग रहस्यमय आकर्षण में बिंधे उसकी तरफ़ खिंचे चले जाते हैं। संसार में बहुत ही कम ऐसे शहर होंगे जो कविताओं, फ़िल्मों और कलाओं में एक मिथक की तरह बार-बार आते रहते हैं। वे सिर्फ़ शहर नहीं होते, मानव की वृहत् इतिहास यात्रा के पड़ाव होते हैं। बनारस भी उन्हीं में से एक है जिसकी साक्षी है यह पुस्तक।
इसमें उन कविताओं को इकट्ठा किया गया है, जो अलग-अलग भाषाओं के कवियों ने अपने-अपने समय के बनारस को देख और जी कर लिखीं। लगभग छह सौ साल का विराट समय-पट्ट और उस पर अंकित ये कविताएँ!
इन कविताओं से गुज़रना बनारस के इतिहास और संस्कृति के साथ-साथ उसके अव्याख्येय और कालातीत सौन्दर्य से साक्षात्कार करना भी है। कबीर, रैदास, भारतेन्दु, प्रसाद, शमशेर, त्रिलोचन, श्रीकान्त वर्मा, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी, ज्ञानेन्द्रपति, अष्टभुजा शुक्ल और व्योमेश शुक्ल सहित उनतालीस हिन्दी कवियों और वली दकनी, ग़ालिब, अकबर इलाहाबादी और नज़ीर बनारसी सहित पन्द्रह उर्दू शायरों के साथ बांग्ला के राजा जयनारायण घोषाल, शंखघोष और विश्वप्रसिद्ध स्पेनिश कवि होर्हे लुईस बोर्हेस की कविताएँ इसमें शामिल हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि बनारस-प्रेमी पाठकों के लिए यह एक दस्तावेज़ी और संग्रहणीय पुस्तक है।
Panchhi
- Author Name:
Gopal Singh 'Nepali'
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Sampoorna Kavitayein : Namwar Singh
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

-
Description:
एक कवि के रूप में नामवर सिंह जिस परिवेश में विकसित हुए वह नितान्त किसानी उजास और सौन्दर्य से भरा हुआ था। वहाँ आसपास सहज सुलभ थी–ग्रामीण मनोवृत्ति और प्रकृति से घनिष्ठता। नामवर जी ने कवि के रूप में उसी प्रकृति से उजाला पाया और अपनी कविता से उसी उजाले को विकसित और अभिव्यक्त किया।
उनकी जितनी भी कविताएँ हैं वे 1940 से 1950 के बीच में लिखी गई थीं। इसके बाद उनका रुझान आलोचना की ओर होता चला गया और कवि-मन कहीं पीछे छूट गया। जिस कालखंड में ये कविताएँ विकसित हुईं, हिन्दी में वह प्रयोगवाद का समय है। नामवर सिंह की कविताएँ इस प्रयोगवाद से किनारा करती हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी कविताओं के विषय नवीन नहीं हैं, बल्कि उनके यहाँ मन की गाँठों के लिए कोई जगह दिखलाई नहीं देती। उनका स्वर उल्लास की ओर ही अधिक रहा।
उनकी कविताओं में अपने समय की राजनीतिक गतिविधियों के प्रति भी एक गहरी अन्तर्दृष्टि दिखलाई पड़ती है। स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय तत्कालीन राजनीतिक कार्यकताओं के जीवन-संघर्ष को आधार बनाकर वे अपने जन के मन को ओज से भरने का कार्य भी करते हैं।
ये कविताएँ पाठकों को छायावादी आभास लिये दिख ज़रूर सकती हैं, किन्तु उनमें आधुनिकता का पुट भी बराबर रहता है। राजनीतिक सजगता तो उन्हें छायावाद से अलग करती ही है। उनकी कविताएँ जीवन को बहुत नज़दीक से देखती हैं। जीवन का हास-परिहास उनके यहाँ जीवंतता के साथ आया है। उनकी अधिकतर कविताओं में ग्राम है और उसकी मनोहर प्रकृति। यह प्रकृति उन्हें ढाँढस भी बँधाती है और लड़ने की शक्ति भी देती है।
इस पुस्तक में नामवर जी लिखित ‘अपने बारे में’ शीर्षक एक आलेख भी शामिल है जिसमें वे अपने कवि का परिचय अत्यंत रोचक ढंग से देते हैं।
Surkh
- Author Name:
Bhavesh Dilshad
- Book Type:

- Description: बनाव-सिंगार, बाग़, तितली, भोग-विलास से कोत तो क्या, बस पहाड़, जंगल, खाई, ख़ला, समन्दर, ये सब मुझे ाियादा पुकारते रहे। ये रहस्य, सन्नाटे, चुनौतियां और बेबाकियां। कभी हैरान करती रहीं, कभी तलाश तो कभी मुझे बयान। छटपटाहट, घुटन, कसक और उन्हीं लमहों में पूरी फ़क़ीरी, ािद और विध्वंस भी... इसी दौर में वो मुझे मिली। घूंघट, पर्दे और नक़्ली ोवरों के बोझ से घुटी-घुटी सी। दोनों ने तनहाई चुनी पर सच से चौंककर हम कतराये तो नहीं। एक-दूसरे का हाथ थामे बढ़ते रहे। एक-दूजे को जानने, पहचानने से चला सिलसिला समझने और महसूसने तक पहुंचा। फिर ढलने और पिघलने तक। बाहिर बरसों और यूं सदियों का सफ़र करते हम इकाई में रच-बस गये। अपने ही ढंग से, अपनी ही एक दुनिया में... वो मेरा पहला प्यार और इकलौती क़सम हो चुकी। प्यार, सफ़र, सिलसिला चल रहा है। चलता रहेगा। हम अपनी एक दुनिया बसा लेंगे। नहीं तो किसी अतल, अबूझ या गुमनाम कोने में एक-दूजे के सहारे जी लेंगे। हर क़दम नयी-नयी बेचैनियों, ख़लिशों के साथ वही सरमस्ती है। जबात की उथल-पुथल है। न चाहे भी रहेगी। इसी सफ़र के बीच इस ट्रायोलॉजी की शक्ल में खींच ली गयी मेरी और मेरी शाइरी की यह तस्वीर यहीं रह जाएगी। हमेशा के लिए! भवेश दिलशाद
Pratinidhi Kavitayein: Pawan Karan
- Author Name:
Pawan Karan
- Book Type:

- Description: पवन करण की कविताओं में हमें अपनी जानी-पहचानी दुनिया दिखाई देती है, लेकिन ठीक उसी तरतीब में नहीं, जिस तरतीब में हम उसे देखने के आदी हैं। वे उस दुनिया को भीतर से बदल रहे होते हैं; उसकी आन्तरिक बुनावट को उसके अपने ही औज़ारों से नया रूप देते हुए; और एकदम से इतना भी न बदलते हुए कि वह हमें अनजानी लगने लगे, डराने लगे। वे एक सुलझी हुई दृष्टि के साथ और सहानुभूतिपूर्वक हमारे सामाजिक आत्म को न्याय की एक व्यापक संकल्पना से अनुकूलित करते हैं और हमें अपने अन्यायों को देखने में सक्षम बनाते हैं। स्त्री को उनकी कविता ने एक ऐसी कसौटी के रूप में चीन्हा है जिस पर हमारा वर्तमान और इतिहास, दोनों अपनी मनुष्यता और न्यायबोध को परख सकते हैं। उनकी प्रतिनिधि कविताओं की यह प्रस्तुति उनकी कवि-दृष्टि और काव्य-सामर्थ्य दोनों को समझने में सहायक होगी।
Bawan Chitthiyan
- Author Name:
Babusha Kohli
- Book Type:

- Description: ‘रज़ा पुस्तक माला में युवा लेखकों और ग़ैर-रस्मी लेखन को विशेष स्थान देने की हमारी चेष्टा है। कवि का गद्य वैसे भी सामान्य गद्य से अलग रंगत का होता है। कवयित्री बाबुषा कोहली की 'बावन चिठ्ठियाँ’ मनीष पुष्कले के रेखांकनों के साथ प्रस्तुत करते हुए हमें प्रसन्नता है। उनमें बहुत कुछ है जो असाधारण है, असाधारण को अनायास छूता-ज़ाहिर करता है।’ —अशोक वाजपेयी
Jo Nadi Hoti
- Author Name:
Pragya Rawat
- Book Type:

-
Description:
प्रज्ञा रावत का हिन्दी कविता-संसार में प्रवेश एक विरल घटना है। घर-परिवार के तमाम कार्यभार के बीच अपने निजी एकान्त में निरन्तर सृजनशील प्रज्ञा ने कभी अपने को प्रक्षेपित नहीं किया, बल्कि श्लाघनीय निस्पृहता के साथ अपना रचना-कर्म जारी रखा। निजी अनुभवों के ताप से सिद्ध ऐसी प्रखर कविताएँ पहले कभी लिखी नहीं गईं। इनके सर्वथा नए एवं विलक्षण जीवन-प्रसंग भाषा को नई गृहस्थी प्रदान करते हैं, जहाँ कविता नया कलेवर, नया परिपाक एवं आभरण ग्रहण करती है।
प्रज्ञा रावत की कविताएँ अपने अनूठे सम्भार एवं रूप-विधान के लिए अलग से सराही जाएँगी। दुर्लभ बिम्बों एवं अनगिनत लयों का सम्पुंजन इन्हें एक पृथक् व्यक्तित्व प्रदान करता है। प्रज्ञा की कविताएँ अपने सौष्ठव एवं संरचनागत दृढ़ता के लिए सहृदय समालोचकों द्वारा पहले भी समादृत हो चुकी हैं। यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि प्रज्ञा रावत सभी स्त्री रचनाकारों से भिन्न नितान्त नवीन एवं स्वतंत्र स्वत्व से समृद्ध कवयित्री हैं। यहाँ न तो स्त्री-विमर्श का कोई अतिरंजित स्वर है, न ही कोई अन्य ग्रन्थि। जो है, जीवन का सहज स्वीकार और अभिव्यक्ति है, बहुत कुछ सुभद्राकुमारी चौहान की तरह। इसलिए प्रज्ञा रावत का यह संग्रह एक नए रचना उन्मेष के तौर पर स्वीकार किया जाएगा।
—अरुण कमल
Nigahon Ke Saye
- Author Name:
Jaan Nisar Akhtar
- Book Type:

-
Description:
जाँ निसार अख़्तर
फरवरी, 1914 को खैराबाद, ज़िला—सीतापुर में जन्म हुआ। पिता मुज़्तर खैराबादी उर्दू के प्रसिद्ध कवियों में से थे और घर का वातावरण साहित्यिक होने के कारण उनमें बचपन से ही शे’र कहने की रुचि पैदा हुई और दस-ग्यारह वर्ष की आयु से कविता करने लगे। सन् 1939 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर में उर्दू के प्राध्यापक नियुक्त हुए, किन्तु 1947 में साम्प्रदायिक दंगे छिड़ जाने से त्याग-पत्र देकर भोपाल चले गए और वहाँ हमीदिया कॉलेज के उर्दू-फ़ारसी विभाग के अध्यक्ष बने। फिर 1950 में वहाँ से त्याग-पत्र देकर बम्बई चले गए। प्रारम्भ के रूमानी काव्य में धीरे-धीरे क्रान्तिकारी तत्त्वों का मिश्रण होता गया और वे यथार्थवाद की ओर बढ़ते गए। साम्राज्यवाद का विरोध और स्वदेश-प्रेम की भावना से इनकी कविता ओत-प्रोत रही। दूसरा महायुद्ध, आर्थिक दुर्दशा, राजनीतिक स्वाधीनता, विश्वशान्ति और ऐसी ही अनेक घटनाएँ हैं जिनको ‘अख़्तर’ ने वाणी प्रदान की। आज के जीवन-संघर्ष को वे कल के नव-निर्माण का सूचक मानते थे। उनके काव्य में सामाजिक यथार्थ का गहरा बोध परिलक्षित होता है और उनके काव्य का लक्ष्य वह मानव है जो प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सुन्दर, सरस और सन्तुलित जीवन के निर्माण के लिए संघर्षशील है। उनके कला-बोध की परिपक्वता एक ओर तो उनकी सम्पन्न विरासत और दूसरी ओर उर्दू-फ़ारसी साहित्य के गहन अध्ययन की देन है। प्रस्तुत पुस्तक का विषय-चयन तथा काव्य-सम्पादन उनकी उपर्युक्त विशेषताओं का ही परिणाम है। वे वर्षों फ़िल्म-जगत से सम्बद्ध रहे और उनके अनेक फ़िल्मी गीत विशेषतः लोकप्रिय हुए।
निधन: 18 अगस्त, 1976
Sach Sune Kai Din Huye
- Author Name:
Badri Narayan
- Book Type:

-
Description:
बद्रीनारायण अपनी पीढ़ी के उन दो-तीन कवियों में हैं जिनकी कविता से एक साफ़ चेहरा और कुछ रास्ता निकलता नज़र आता है। यह महज़ अच्छे और ‘होनहार’ कवि ही नहीं, सामाजिक अंतःकरण रखने वाले कवि भी है। अपनी परिस्थिति और अपनी काव्यवस्तु से उनका रिश्ता प्रगीतात्मक होकर भी ज़मीनी, जिम्मेदार और क़तई मामूली है और उसी के नाप की भाषा और संवेदना उन्होंने अर्जित की है। उक्ति-वैचित्र्य, बेपर की उड़ान और वाक् चातुर्य से किसी क़दर परहेज़ करते हुए वह एक ही चक्कर में घर-बार, दुनिया-जहान, अंतरिक्ष और तारामण्डल के नज़ारों को समेट लाते हैं। इसकी वजह है, उनके अनुभव की अखण्डता और भाव-जगत की सचाई। उनकी कविता में कोई नक़ली सेट नहीं है, न ऐसी सृष्टि जो सिर्फ़ कविता के लिए रची गई हो।
बद्रीनारायण जिस ‘लोक’ का बयान करते हैं उसमें विभिन्न चीजों ओर मनोभावों के अपने वज़न, आयतन, अनुपात और सापेक्ष स्थिति का खयाल रखते हैं। वह किसी चीज़ को ‘लार्जर दैन लाइफ़’ साइज़ में पेश करने के विशेषाधिकार का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं करते। स्केल की यह समझ सिर्फ़ उनकी शैली या काव्यगत स्ट्रेटेजी की ही नहीं, उस दार्शनिक रवैये की निशानदेही करती है जिसमें मानवीय खुद्दारी, बेकली और करुणा तो है, मनुष्य होने की बिलावजह अकड़ और प्रशस्ति नहीं है। ऐसे विनम्र मानववाद से ही वह आत्मिक संगीत निकल सकता है जो इतिहास के वर्तमान चरण में हमारे संकट, व्यथा, रुदन, चिंता और आघात से रिश्ता बनाता हो।
हिन्दी में कहने को तो व्यापकतर सामाजिक और नैतिक सरोकार की कविता खूब लिखी जाती है, पर ग़ौर से देखें तो वह बहुत संकीर्ण दायरे और सीमित कार्यक्रम की कविता है। बद्रीनारायण की कविता इस दायरे को बढ़ाने और इस कार्यक्रम में कुछ बातें जोड़ने का काम करती है। इसे पढ़कर यह उम्मीद भी बँधती है कि बद्रीनारायण भविष्य में जीवन में आशा-निराशा के उपलब्ध स्रोतों से परे जाकर सांस्कृतिक-सामाजिक संकट की तीव्रता और जटिलता को एक चुनौती और एक बुलावे की तरह स्वीकार करेंगे, क्योंकि वह उस सन्तुलन, विवेक और निश्चय के मालिक हैं जो कविता को मात्र एक संरक्षणात्मक क्रिया ही नहीं, एक आलोचनात्मक और परिवर्तनकामी कर्म बनाते हैं ।
–असद ज़ैदी
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book