Chidiya Laut Aai Hai
About the book
मुनिश्री क्षमासागर हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं, एक अद्वितीय कवि। यह तथ्य उनके प्रत्येक काव्य-संग्रह के साथ और पुष्ट और गहरा होता गया। मुनिश्री की कविताएँ जितना बाहर की यात्रा कराती हैं, उससे कहीं अधिक भीतर अपनी पड़ताल करती हैं। संवेदना के दायरे में आई हर वस्तु असाधारण काव्यात्मक गरिमा से भर उठती है। वस्तुओं की वस्तुमयता और जीवों के जैविक गुण और क्रियाकलापों की स्वाभाविकता बनाए रख, उसे अपनी दृष्टि से इतना ट्रांसपेरेंट और व्यापक बना देते हैं कि हमें हमारी गाँठें स्वत: दिखाई पड़ने लगती हैं—‘वाह रे हम/अपनी प्यास/अपने लालच/और अपने दीवानेपन पर/हमें अपने से/कुछ नहीं कहना।’ जीवन और जगत् के प्रति उनकी सजग, सतर्क, संवेदनशील दृष्टि समूचे काव्य-जगत से झाँकती है। जड़ता हमारे समाज को चारों तरफ़ से घेर रही है, ऐसे में मानवीय संवेदना को जीवित और सुरक्षित रखना कवि की प्राथमिकता है—‘सवाल यह नहीं है/कि किसे कम मिला/और किसके हिस्से में/ज़्यादा आया है/मेरी पीड़ा/अपने ही/बँट जाने की है।’ मुनि क्षमासागर जी की कविताओं को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। एक वह, जिसके केन्द्र में प्रकृति है। दूसरा वह, जिसमें इहलोक झाँकता है और कर्म के लिए प्रेरित करता है। तीसरा वह, जिसमें अमूर्त व गूढ़ विषयों पर महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं। बहुत सारे अवरोध तो उसके अपने ही हाथों खड़े किए गए हैं। चिड़िया भीग जाती है, नदी भर जाती है, धरती गीली हो जाती है, पर वह न भीग पाता है, न भर पाता है, न गीला हो पाता है। बचने की जुगत में रीता ही रह जाता है। भीगना, भरना, गीला होना व्यापक सन्दर्भ खोलते हैं। प्रकृति से यह दूरी उसे अधूरा ही रखती है—‘पर बहुत मुश्किल है/इस तरह/आदमी का/भीगना और/भर जाना/आदमी के पास/बचने के/उपाय हैं न।’ इन कविताओं में आकाश शामिल होता है चिड़िया की उड़ान में। चिड़िया की, घर पहुँचने की दृढ़ता को असीम सखा भाव से सहलाता है। प्रकृति से बड़ा कोई कलाकार नहीं और न ही प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक, सखा। प्रकृति न कोई भेदभाव करती है, न जाति-बिरादरी के आधार पर बँटवारा। कठघरे, घेरे तो हमारे अपने बनाए हैं—‘आकाश सबका/ दीवारें हमारी अपनी/नदी सबकी/गागर हमारी अपनी/धरती सबकी/आँगन हमारा अपना/बिराट सबका/सीमाएँ हमारी अपनी।’ मुनि क्षमासागर जी की कविताओं से गुज़रकर चीज़ें वह नहीं रहतीं जो पूर्व में थीं। उन्हें देखने का नज़रिया अलहदा हो जाता है। इन कविताओं में ‘घर’ रह-रहकर आता है और घर एक समाधान, दिशा, दृष्टि की तरह आता है। वह दृष्टि, जो ‘मेरे घर’ को ‘अपना घर’ बनाती है—‘तुम मेरे घर/नहीं आती/अपने घर आती हो/पर अपने घर/आने के लिए/तुम्हारा मेरे घर आना/मुझे अच्छा लगता है/सचमुच/तुम्हारे घर ने/मेरे घर को/अपना घर बना दिया है।’ वहीं घर-1 व घर-2 कविताओं में घर भिन्न तरह से आता है, जहाँ ‘अपना घर’ कविता में सबके लिए गुंजाइश है। वह मेरे घर से अपना घर बनता है। पर यहाँ बड़ा घर होता है। अतीत, अनागत, वर्तमान के बावजूद। घर—1 कविता यही कहती है—‘चिड़ियों के लिए/और शायद/हम सभी के लिए/अतीत/अनागत/और वर्तमान का/इतना ही अर्थ है/कि हमें हर बार/रहने के लिए/एक घर बनाना है।’ एक छत की जद्दोजहद तो हमेशा रही है और सम्बन्धों के सगेपन को जीने की चाह भी और जहाँ यह हो, वहाँ तो घर होता ही है। ‘खिड़की’ कविता में व्याप्त घर इसी तरफ़ इशारा करता है। ये कविताएँ कर्म के लिए उकसाती हैं। होश और जोश दोनों ही स्थितियों में कर्म की सीढ़ी बनाने की बात कहती हैं। इन कविताओं के केन्द्र में मनुष्य है। ये कविताएँ अपने-अपने ख़ुदाओं को बनानेवाले मनुष्य से मनुष्य बनने का आग्रह करती हैं—‘सवाल सिर्फ़/योग्यता का नहीं/हू-ब-हू होने का है/स्वयं को/भगवान मानने/मनवाने का नहीं स्वयं भगवान बन जाने का है/और फिर इस बार/ना सही भगवान/एक बेहतर/इनसान तो बन जाएँ।’ मुनि क्षमासागर जी की कविताएँ, प्रकृति को इतना पारदर्शी बना देती हैं कि उसमें भूत-वर्तमान-भविष्य, सत्ता, नश्वरता, व्यवस्था और जनजीवन के जटिल सम्बन्धों की पहचान आसानी से हो जाती है। ये कविताएँ प्रकृति को इतना अर्थगर्भित और व्यापक बना देती हैं कि इसमें हमारे समय और समाज की आहट अनन्त सम्भावनाएँ उत्पन्न करती हैं। इन कविताओं से गुज़रना प्रकृति, कर्म और घर के नज़दीक होना है। चिड़िया की तरह अपने आकाश, पेड़, नदी, परिवेश को जीना है। कुल मिलाकर अपने नज़दीक आना है, चिड़िया की तरह लौट आना है। —प्रताप राव कदम
Read more₹
95
₹ 76 20% off
Unavailable
Format
About the Book
मुनिश्री क्षमासागर हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं, एक अद्वितीय कवि। यह तथ्य उनके प्रत्येक काव्य-संग्रह के साथ और पुष्ट और गहरा होता गया। मुनिश्री की कविताएँ जितना बाहर की यात्रा कराती हैं, उससे कहीं अधिक भीतर अपनी पड़ताल करती हैं। संवेदना के दायरे में आई हर वस्तु असाधारण काव्यात्मक गरिमा से भर उठती है। वस्तुओं की वस्तुमयता और जीवों के जैविक गुण और क्रियाकलापों की स्वाभाविकता बनाए रख, उसे अपनी दृष्टि से इतना ट्रांसपेरेंट और व्यापक बना देते हैं कि हमें हमारी गाँठें स्वत: दिखाई पड़ने लगती हैं—‘वाह रे हम/अपनी प्यास/अपने लालच/और अपने दीवानेपन पर/हमें अपने से/कुछ नहीं कहना।’
जीवन और जगत् के प्रति उनकी सजग, सतर्क, संवेदनशील दृष्टि समूचे काव्य-जगत से झाँकती है। जड़ता हमारे समाज को चारों तरफ़ से घेर रही है, ऐसे में मानवीय संवेदना को जीवित और सुरक्षित रखना कवि की प्राथमिकता है—‘सवाल यह नहीं है/कि किसे कम मिला/और किसके हिस्से में/ज़्यादा आया है/मेरी पीड़ा/अपने ही/बँट जाने की है।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। एक वह, जिसके केन्द्र में प्रकृति है। दूसरा वह, जिसमें इहलोक झाँकता है और कर्म के लिए प्रेरित करता है। तीसरा वह, जिसमें अमूर्त व गूढ़ विषयों पर महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं। बहुत सारे अवरोध तो उसके अपने ही हाथों खड़े किए गए हैं। चिड़िया भीग जाती है, नदी भर जाती है, धरती गीली हो जाती है, पर वह न भीग पाता है, न भर पाता है, न गीला हो पाता है। बचने की जुगत में रीता ही रह जाता है। भीगना, भरना, गीला होना व्यापक सन्दर्भ खोलते हैं। प्रकृति से यह दूरी उसे अधूरा ही रखती है—‘पर बहुत मुश्किल है/इस तरह/आदमी का/भीगना और/भर जाना/आदमी के पास/बचने के/उपाय हैं न।’
इन कविताओं में आकाश शामिल होता है चिड़िया की उड़ान में। चिड़िया की, घर पहुँचने की दृढ़ता को असीम सखा भाव से सहलाता है। प्रकृति से बड़ा कोई कलाकार नहीं और न ही प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक, सखा। प्रकृति न कोई भेदभाव करती है, न जाति-बिरादरी के आधार पर बँटवारा। कठघरे, घेरे तो हमारे अपने बनाए हैं—‘आकाश सबका/ दीवारें हमारी अपनी/नदी सबकी/गागर हमारी अपनी/धरती सबकी/आँगन हमारा अपना/बिराट सबका/सीमाएँ हमारी अपनी।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं से गुज़रकर चीज़ें वह नहीं रहतीं जो पूर्व में थीं। उन्हें देखने का नज़रिया अलहदा हो जाता है। इन कविताओं में ‘घर’ रह-रहकर आता है और घर एक समाधान, दिशा, दृष्टि की तरह आता है। वह दृष्टि, जो ‘मेरे घर’ को ‘अपना घर’ बनाती है—‘तुम मेरे घर/नहीं आती/अपने घर आती हो/पर अपने घर/आने के लिए/तुम्हारा मेरे घर आना/मुझे अच्छा लगता है/सचमुच/तुम्हारे घर ने/मेरे घर को/अपना घर बना दिया है।’ वहीं घर-1 व घर-2 कविताओं में घर भिन्न तरह से आता है, जहाँ ‘अपना घर’ कविता में सबके लिए गुंजाइश है। वह मेरे घर से अपना घर बनता है। पर यहाँ बड़ा घर होता है। अतीत, अनागत, वर्तमान के बावजूद। घर—1 कविता यही कहती है—‘चिड़ियों के लिए/और शायद/हम सभी के लिए/अतीत/अनागत/और वर्तमान का/इतना ही अर्थ है/कि हमें हर बार/रहने के लिए/एक घर बनाना है।’ एक छत की जद्दोजहद तो हमेशा रही है और सम्बन्धों के सगेपन को जीने की चाह भी और जहाँ यह हो, वहाँ तो घर होता ही है। ‘खिड़की’ कविता में व्याप्त घर इसी तरफ़ इशारा करता है।
ये कविताएँ कर्म के लिए उकसाती हैं। होश और जोश दोनों ही स्थितियों में कर्म की सीढ़ी बनाने की बात कहती हैं। इन कविताओं के केन्द्र में मनुष्य है। ये कविताएँ अपने-अपने ख़ुदाओं को बनानेवाले मनुष्य से मनुष्य बनने का आग्रह करती हैं—‘सवाल सिर्फ़/योग्यता का नहीं/हू-ब-हू होने का है/स्वयं को/भगवान मानने/मनवाने का नहीं स्वयं भगवान बन जाने का है/और फिर इस बार/ना सही भगवान/एक बेहतर/इनसान तो बन जाएँ।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताएँ, प्रकृति को इतना पारदर्शी बना देती हैं कि उसमें भूत-वर्तमान-भविष्य, सत्ता, नश्वरता, व्यवस्था और जनजीवन के जटिल सम्बन्धों की पहचान आसानी से हो जाती है। ये कविताएँ प्रकृति को इतना अर्थगर्भित और व्यापक बना देती हैं कि इसमें हमारे समय और समाज की आहट अनन्त सम्भावनाएँ उत्पन्न करती हैं। इन कविताओं से गुज़रना प्रकृति, कर्म और घर के नज़दीक होना है। चिड़िया की तरह अपने आकाश, पेड़, नदी, परिवेश को जीना है। कुल मिलाकर अपने नज़दीक आना है, चिड़िया की तरह लौट आना है।
—प्रताप राव कदम
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2011
- Weight
- 150 grams
- ISBN-13
- 9788183614726
- Pages
- 132
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
Customer reviews
Be the first to write a review
Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.
