Gungunaiye

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Author:

Gulzar

Language:

Hindi

Category:

Poetry

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वे अल्फ़ाज़ के दो कुनबों को जोड़ के ज़बान का एक नया ख़ानदान बना देते हैं, वे इमे​जिन करते हैं तो धरती आसमान के और हवाएँ पानियों के आँगनों से घूम-टहल आते हैं...वे जब मुहब्बत की तरफ़ देखते हैं तो रूह धूप बनकर जिस्म को ढाँप लेती है और जिस्म के खुरदरे कोने पाकीज़ा मुलायमियत में पिघलने लगते हैं और जब समाजी मसायल की तरफ़, मुल्क और मुल्क की ख़लक़त की तरफ़ देखते हैं, रिश्तों और दिलों की कशमकश को, बेचैनी को देखते हैं तो उनके बोल हमारे लिए हमारी अपनी बात बन जाते हैं।</p> <p>गुलज़ार ने फ़िल्मों के ​लिए गीत लिखे, अभी भी लिख रहे हैं, लेकिन उनके गीत कभी दी हुई सिचुएशन तक सीमित नहीं रहे, उन्होंने सिचुएशन को एक अलग वुसूअत दी, नये मायने दिये, गहराई दी। उनके गीत, उनके अल्फ़ाज़ चीज़ों को देखने और ज़बान को इस्तेमाल करने की हमारी आदतों को बदल देते हैं, वही हमारे जाने-पहचाने अल्फ़ाज़ जब उनके तख़य्युल में नई तरतीब पाते हैं तो हमारे दिल की पुरानी बोसीदा स्लेटें भी सरककर नए सिरे से ताज़ा हो जाती हैं।</p> <p>‘गुनगुनाइए...’ उनके गीतों का मजमूआ है। इसमें अलग-अलग मिज़ाज के गीतों को अलग-अलग उनवान के तहत इकट्ठा किया गया है ताकि पढ़नेवाले उनकी पूरी तासीर को महसूस कर सकें। एक बात और, जब हम गीतों को सुनते हैं तो अकसर कई सारे बोलों से महरूम रह जाते हैं; यहाँ वह बात नहीं; यहाँ ये गीत अपनी तमाम पोएटिक ख़ूबियों के साथ आपके सामने हैं।</p> <p>तो आइए, गुनगुनाइए!

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Avg Reading Time
22 hrs
Age
18+ yrs
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India

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वे अल्फ़ाज़ के दो कुनबों को जोड़ के ज़बान का एक नया ख़ानदान बना देते हैं, वे इमे​जिन करते हैं तो धरती आसमान के और हवाएँ पानियों के आँगनों से घूम-टहल आते हैं...वे जब मुहब्बत की तरफ़ देखते हैं तो रूह धूप बनकर जिस्म को ढाँप लेती है और जिस्म के खुरदरे कोने पाकीज़ा मुलायमियत में पिघलने लगते हैं और जब समाजी मसायल की तरफ़, मुल्क और मुल्क की ख़लक़त की तरफ़ देखते हैं, रिश्तों और दिलों की कशमकश को, बेचैनी को देखते हैं तो उनके बोल हमारे लिए हमारी अपनी बात बन जाते हैं।</p>
<p>गुलज़ार ने फ़िल्मों के ​लिए गीत लिखे, अभी भी लिख रहे हैं, लेकिन उनके गीत कभी दी हुई सिचुएशन तक सीमित नहीं रहे, उन्होंने सिचुएशन को एक अलग वुसूअत दी, नये मायने दिये, गहराई दी। उनके गीत, उनके अल्फ़ाज़ चीज़ों को देखने और ज़बान को इस्तेमाल करने की हमारी आदतों को बदल देते हैं, वही हमारे जाने-पहचाने अल्फ़ाज़ जब उनके तख़य्युल में नई तरतीब पाते हैं तो हमारे दिल की पुरानी बोसीदा स्लेटें भी सरककर नए सिरे से ताज़ा हो जाती हैं।</p>
<p>‘गुनगुनाइए...’ उनके गीतों का मजमूआ है। इसमें अलग-अलग मिज़ाज के गीतों को अलग-अलग उनवान के तहत इकट्ठा किया गया है ताकि पढ़नेवाले उनकी पूरी तासीर को महसूस कर सकें। एक बात और, जब हम गीतों को सुनते हैं तो अकसर कई सारे बोलों से महरूम रह जाते हैं; यहाँ वह बात नहीं; यहाँ ये गीत अपनी तमाम पोएटिक ख़ूबियों के साथ आपके सामने हैं।</p>
<p>तो आइए, गुनगुनाइए!

Book Details

  • ISBN
    9788119989546
  • Pages
    660
  • Avg Reading Time
    22 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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