Neel Kusum
Author:
Ramdhari Singh DinkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Unavailable
प्रस्तुत काव्य-संग्रह ‘नील कुसुम’ में राष्ट्रकवि ‘दिनकर' की सौन्दर्यान्वेशी वृत्ति काव्यमयी हो जाती है, पर यह अँधेरे में ध्येय सौन्दर्य का अन्वेषण नहीं, उजाले में ज्ञेय सौन्दर्य का आराधन है। कवि के स्वर का ओज नए वेग से नए शिखर तक पहुँच जाता है। वह काव्यात्मक प्रयोगशीलता के प्रति आस्थावान है। स्वयं प्रयोगशील कवियों को जयमाल पहनाने और उनकी राह फूल बिछाने की आकांक्षा उसे विकल कर देती है। नवीनतम काव्यधारा से सम्बन्ध स्थापित करने की कवि की इच्छा स्पष्ट हो जाती है।</p>
<p>प्रस्तुत पुस्तक में पाठक कवि के भाषा-प्रवाह, ओज अनुभूति की तीव्रता और गहरे छूती संवेदना का अनुभव करेंगे।
ISBN: 9788180314100
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
निर्मला ठाकुर की कविताएँ यह कहना चाहती हैं कि अनुभव रचना का एक ज़रूरी तत्त्व है। जीवनानुभव की रोशनी में बाहरी दुनिया को देखते हुए उन्होंने कविताओं को आकार दिया है। 'हँसती हुई लड़की' का केन्द्रीय सरोकार स्त्री है। स्त्री की बहुतेरी छवियाँ हैं। यहाँ जीवन का मार्मिक विस्तार है। ‘रूप—कई रूप’ कविता में ’नन्ही/मुन्नी दँतुली में हँसी—दूध की' से लेकर सन्ध्या की देहरी तक आ पहुँची स्त्री-जिजीविषा का वर्णन है। निर्मला ठाकुर ने बहुत संजीदगी के साथ आधी आबादी के संघर्षों व स्वप्नों को चित्रित किया है। ‘औरत की दुनिया’ इस सन्दर्भ में ख़ासतौर पर पढ़ी जानी चाहिए।
इन कविताओं का सशक्त पक्ष है ‘अबूझ की समझ’। यही कारण है कि इनमें सुसंवेद्य पारदर्शिता है। ‘बर्तन माँजती हुई स्त्री की फलश्रुति है—इधर देखो/मुखातिब हो ज़रा हमसे/मुख पर कौन सी छाया घनेरी/लिए बैठी हो/उठो न/चेहरा इधर कर/ऊपर उठाओ/समय का दर्पण तुम्हारे सामने है।’ कवयित्री ने स्त्री-जीवन के कोलाहल और अकेलेपन की शिनाख़्त की है।
रिश्ते, प्रकृति, रूपबोध व जनजीवन आदि कविताओं में शामिल हैं। 'स्वर्ग सुख' कविता पढ़कर निराला की वह ‘तोड़ती पत्थर’ याद आ सकती है। ‘जो करना’ आत्मकथात्मक है और बेहद मार्मिक।
भाषा-शिल्प की सहजता में विन्यस्त ये कविताएँ एक संवेदनशील मन का आईना हैं।
Udho Kahiyo Jay
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description: गोपियों को आमजन का प्रतिनिधि और उद्धव को कृष्णरूप में गद्दी पर बैठे कंस जैसे हर शासक का संदेशवाहक मानकर पुराने प्रसंग को नये सन्दर्भों में पिरोकर रची गयी तेवरीकार रमेशराज नयी कृति “ऊधौ कहियो जाय“ तेवरी-शतक में पाठकों के समक्ष है | शतकों की परम्परा में प्रस्तुत यह तेवरी-शतक पठनीय ही नहीं, इस कारण भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उद्धव जो कृष्ण के दूत बनकर गोपियों के समक्ष आते हैं तो गोपियाँ उनसे कोई विरह या प्रेम-प्रसंग नहीं रखतीं बल्कि उनकी पीड़ा तो उस सिस्टम की बखिया उधेड़ती है जो जाने-अनजाने आमजन का सुख-चैन लीलने को आतुर है |
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