Sajde Mein Aakash
Author:
Kumar VinodPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 114.8
₹
140
Available
Ghazals
ISBN: 9789385013706
Pages: 88
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Ashutosh Agnihotri
- Book Type:

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Description:
‘मैं बूंद स्वयं, खुद सागर हूँ’ कवि आशुतोष अग्निहोत्री का चौथा कविता-संग्रह है। इस कविता-पुस्तक में उन्होंने अपनी जिन कविताओं को प्रस्तुत किया है, वे एक सजग, संवेदनशील और संवादधर्मी सामाजिक मनुष्य के सम्पूर्ण संसार को प्रतिबिम्बित करती है। प्रकृति, ईश्वर, समाज, परिवार और देश ने कवि को जो दिया, यह संकलन उसका कृतज्ञता ज्ञापन है, कोई भी पाठक जिसे पढ़ते हुए अपने ही भावोद्गार समझेगा।
‘स्नेह’, ‘प्रेम’, ‘धर्म’, ‘देश’, ‘दर्शन’ और ‘प्रेरणा’—इन छह उपशीर्षकों के तहत कवि ने यहाँ उन तमाम स्रोतों को अपने भाव समर्पित किए हैं जो मनुष्य मात्र के जीवन का आधार हैं, जहाँ से वह जीने की, सिरजने की, आगे बढ़ने और स्वयं को सार्थक करने की प्रेरणा ग्रहण करता है।
ये कविताएँ हमें हमारी उन अनुभूतियों को व्यक्त करने का बहाना बनती हैं, जिन्हें हम अपने भीतर तो रखते हैं लेकिन उचित शब्दावली और सम्यक लय के साथ व्यक्त नहीं कर पाते। इसीलिए ये कविताएँ सबकी हैं—उनकी भी जो काव्य-आस्वाद के अनुभवी लोग हैं, और उनकी भी जो पहली बार इन्हें पढ़ेंगे, और सदैव के लिए अपने अन्तस में सँजो लेंगे। एक भाव सम्पन्न कविता-संग्रह जिसकी कविताओं का पाठ आप अपनों के बीच बैठकर बार-बार करना चाहेंगे।
Trishanku Swarg
- Author Name:
Akkitam Achyutan Nambudiri
- Book Type:

- Description: त्रिशंकु स्वर्ग ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित मलयालम भाषा के शीर्षस्थ कवि अक्कितम अच्युतन नम्बूदिरी की चुनिन्दा कविताओं का संकलन है। उनकी कविताओं में परम्परा और आधुनिकता का अपूर्व मेल दिखाई पड़ता है। वेदों के गहन अध्ययन से परम्परा के उदात्त तत्वों को उन्होंने अपनी कविता में उतारा, तो सात दशक पहले प्रकाशित उनके खंड काव्य ‘इरूपदाम नूट्टांडिंडे इतिहासम्’ (बीसवीं शताब्दी का इतिहास) से मलयालम कविता में आधुनिकता का प्रवेश हुआ। परम्परा की निरन्तरता में विश्वास रखने वाले इस महाकवि के लिए मनुष्यता की पक्षधरता और मानवीय वेदना का परित्राण हमेशा सर्वोपरि रहा, जिसका प्रमाण इस चयनिका की कविताओं में मिलता है।
Via Nayi Sadi
- Author Name:
Shriprakash Shukla
- Book Type:

- Description: ‘वाया नई सदी’ दस्तावेज़ है समय की असहजताओं और अस्वाभाविकताओं का जिन्हें हमने जीवन की स्वाभाविक मुद्राओं की तरह स्वीकार कर लिया है। ये कविताएँ इस स्वीकृति के विरुद्ध उठी मुट्ठियों की तरह हैं। यह समय जहाँ बोलने, चीखने और विरोध करने पर लगातार कठोर होती पाबन्दियाँ हमारी चुप्पियों पर हँसने लगी हैं, और हम प्यार को, जनतन्त्र को, मानवीयता को धीरे-धीरे छीजते देख रहे हैं, और ख़ामोश हैं। ‘हमारे समय के करुण इतिहास पर/हिंसा की तरह दर्ज अभिलाषाओं में/महामौन की तरह खड़ी है एक गाय/जो अभी-अभी खूँटे पर आई है/लहूलुहान’—‘गाय’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ भारत की नयी सदी की उस महाविडम्बना की ओर संकेत करती है जहाँ करुणा में रसे-बसे सांस्कृतिक प्रतीकों को हिंसक बिम्बों में बदलने की कोशिश बाक़ायदा सत्ता के इशारों पर हो रही है और समाज, जैसे कि उसे इसी का इंतज़ार था, इस प्रक्रिया को पूरा करने में जुटा हुआ है : ‘उनमें ग़ज़ब की सामूहिक सहमति है’, और ‘एक सीधी सरल गाय/हिंसक पशु में बदल जाती है।’ श्रीप्रकाश शुक्ल भारतीयता के इस क्षरण के प्रति अपनी असहमति, अपना प्रतिरोध दर्ज कराना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि हम बोलें, 'चुप्पी के काइएँपन से दूसरे की हत्या करने से बेहतर है/बोल-बोलकर ख़ुद के भीतर जमी काइयों का वध करना।’ वे कहते हैं कि ‘बोलता आदमी जब चुप हो जाए/तो समझिए कि इस व्यवस्था में एक तानाशाह का जन्म हो चुका है/जो हमारे मुँह से प्रवेश करता है और जीभ को चीरता हुआ/अंतड़ियों में उतर जाता है।’ इसीलिए वे एक मुखर आदमी के पक्ष में अपना बयान देते हैं, ‘मनुष्यों के मुद्दे राजनीति से बड़े होते हैं/और अर्थनीति से ज़्यादा उलझे हुए/...कि लोकतंत्र के मुद्दे भुजा से नहीं/भाषा से तय होते हैं।’ श्रीप्रकाश शुक्ल के इस नए संग्रह में कई कविताएँ ऐसी हैं जो इस विचित्र सदी को सीधे-सीधे सम्बोधित हैं और कई ऐसी जो समय के शोर में बिला रही मनुष्यता की सरस, सहज, सकारात्मक भंगिमाओं को आवाज़ देती हैं। उनके ‘नहीं होने’ को रेखांकित करती हैं ताकि हम उन्हें लौटा लाएँ। कोरोना काल के भीषण विद्रूप भी इन कविताओं में अंकित हुए हैं, और प्रकृति के साहचर्य से पल्लवित संवेदनाएँ भी। लेकिन ‘वाया’ की ओट से समय की लय को भंग करनेवाली ताक़तों को लेकर चेतावनी कहीं धूमिल नहीं पड़ती : ‘बादल होंगे लेकिन नमी नहीं होगी/...रक्षक होंगे लेकिन रक्षार्थ कुछ नहीं होगा.../और तब वे अपने वर्तमान से मुक्त होकर/एक शानदार विरासत का जश्न मनाएँगे/...मानव-मुक्त विकास का जश्न!’
Thami Hui Barish Mein Dophar
- Author Name:
Savita Bhargav
- Book Type:

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Description:
अग्रणी हिन्दी कवि सविता भार्गव का नया संग्रह ‘थमी हुई बारिश में दोपहर’ स्त्री-कविता के क्षेत्र में ही नहीं वरन् समकालीन भारतीय कविता के क्षेत्र में भी एक नया प्रस्थान माना जा सकता है। स्त्री-जीवन के अनेकानेक अनदेखे, अनछुए प्रसंगों, अनुभवों और जटिलताओं से समृद्ध यह संग्रह अपने ताप, ताज़गी और त्वरा के लिए एक विलक्षण संग्रह के रूप में स्थापित होगा। प्रेम, दाम्पत्य, कुटुम्ब, समाज और राजनीति सब मिलकर एक नया रसायन बनाते हैं। बिना किसी दुराव के, बिल्कुल अकुंठ भाव से कवि ने अनेक तरह के सम्बन्धों का उद्घाटन किया है। और ये सम्बन्ध इकहरे नहीं हैं। एक आरम्भिक कविता में सविता भार्गव कहती हैं : ‘तुम कल्पना करो/मैं तुम्हारी नई प्रेमिका हूँ/और रच डालो/शमशान तक पहुँचने के/सारे दृश्य’।
यहाँ ‘शमशान’ का हठात् प्रयोग इस कविता को स्त्री-पुरुष सम्बन्धों से परे एक वृहत्तर अर्थ देता है। प्रेम की ऐसी कविताएँ न तो देह पर रुकती हैं न देह का लोप करती हैं, बल्कि देह और जीवन की अन्तिम परिणति तक ले जाती हैं। ‘मैं जाग रही हूँ किसके लिए’ सरीखी कविताओं में भी इसे देखा जा सकता है। इसके दूसरे छोर पर ‘इस्तरी करती स्त्री’ को रखा जा सकता है जहाँ एक स्त्री- देह की स्वायत्तता व्यक्त होती है। इसके बरअक्स ‘अविराम घूमती पृथ्वी की तरह’ स्त्री-पुरुष के योग को तलाशती एक अद्भुत कविता है। पूरा संग्रह ऐसी कविताओं का अक्षय-कोश है।
लेकिन जिन कविताओं को समकालीन हिन्दी कविता की उपलब्धि कहा जा सकता है वे हैं ‘अनुभव’, ‘यौवन बीत गया’ और ‘माँ वापस जा रही है’।
सिनेमा का सीन करते हुए/थोड़ी सी झिझक से/कैमरे के सामने खड़ी होती हूँ/क्योंकि कैमरा पूरा समाज है/और मैं अकेली स्त्री हूँ/पसीना पोंछते और मेकअप धोते हुए/मैं शामिल हो जाती हूँ/समाज में। (अनुभव)
कुछ दिन बेटी के घर में रहने के बाद माँ वापस जा रही है और बेटी के ‘भीतर कुहरा बैठ रहा है’। यह एक अविस्मरणीय मार्मिक कविता है जो केवल एक स्त्री की लेखनी ही रच सकती थी। लेकिन जिस कविता ने मुझे रोक लिया वो है ‘यौवन बीत गया’। शायद ऐसी कविता पहले नहीं लिखी गयी समकालीन भारतीय साहित्य में।
खेल जो मैंने खेले/लगते आज वे कितने अधूरे/डूबा दिन/रातें रहीं नहीं चाँदनी/बारिश बीती/चींटियाँ खोद रहीं/फिर से मिट्टी/मेरी मिट्टी होती/चींटियों जैसी
यह संग्रह अपने सर्वथा नए बिम्बों, लयों और भावों के लिए समादृत होगा। ‘मेरे होंठ की फाँक जैसा टेढ़ा चाँद’ कितना नया बिम्ब है ! ‘थमी हुई बारिश में दोपहर’ अपने आप में जीवन के द्वन्द्व और द्विगु का विलक्षण रूपक है।
—अरुण कमल
Samvedana Ke Swar
- Author Name:
Dinesh Adhikari
- Book Type:

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Description:
दिनेश अधिकारी नेपाली कवि हैं। हिन्दी में यह उनका पहला काव्य-संग्रह है। बहैसियत कवि अपने काव्य-कर्म के बारे में उनका कहना है कि आदमी और आदमी से जुड़े तमाम सन्दर्भ ही उनके लेखन की ऊर्जा बनते हैं। मौलिकता की उनकी अवधारणा ठीक उतनी ही विनम्र है जितनी ये कविताएँ। विनम्र लेकिन तत्वतः ठोस और अपने पैरों के नीचे की ज़मीं को भरी-पूरी नज़रों से देखती-आँकती हुई। वे कहते हैं कि एक ही विश्व के निवासी होने के कारण विषयवस्तु में समानता की सम्भावना प्रबल होती है। सो सृष्टा की मौलिकता को उसके प्रस्तुति-क्रम में खोजना चाहिए। लेकिन मौलिकता की एक कसौटी और भी है, वह है दृष्टि, जिसके दर्शन इस संग्रह की कविताओं में होते हैं। उनकी कविता पूछती है : ‘प्रदर्शन मात्र ही शक्ति है क्या?’ उनकी कविता बताती है : ‘कपड़ा फट जाता है, चमड़ी नहीं।’ उनकी कविता उद्घाटित करती है : ‘तर्क वास्तव में बेशर्म ही होता है...शासक की तरह बेहया।’ उनकी कविता स्वीकार करती है : ‘अकेले चलने का आनन्द तुम्हारे साथ चलते नहीं आता।’ ये कुछ पंक्तियाँ यद्यपि उनकी मौलिकता को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन इस
संग्रह की कविताओं की अर्थ और सन्दर्भ-व्याप्ति कहीं अधिक है।
बीच-बीच में नेपाली अभिव्यक्तियों के साथ ये कविताएँ अखिल मानवता को सम्बोधित करती हैं। ‘हर्क बहादुर’, ‘कहाँ रखें अब पैदा होनेवाले पुत्र को’, ‘मच्छरदानी के भीतर आदमी’, ‘आदमी का क़द’ और ‘विकासोन्मुख देश का आदमी’ जैसी अनेक कविताएँ कवि के आन्तरिक विस्तार का परिचय देती हैं।
संग्रह में प्रकाशित ‘गाँव की एक कविता’ बार-बार पढ़ने लायक़ कविता है जिसमें प्रस्तुत गाँव की तस्वीर भारत में भी जहाँ चाहे वहाँ देखी जा सकती है। हस्तक्षेप के रूप में देखें तो यह विचारणीय है जो यह कविता कहती
है : ‘गोद के शिशु को पीठ पर बाँधकर मज़े से निकल जाती है कोई भी माँ अपनी सन्तान पर भी बोझ बन सकती है—उसे पता नहीं।’ हिन्दी कविता के परिदृश्य में हमारे प्रिय पड़ोसी देश से आई यह दस्तक स्वागत योग्य है, पर उससे पहले ध्यान से पढ़ने योग्य।
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