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Yeh Bhumandal Ki Raat Hai

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कविता की यात्रा में अकसर ही कुछ ऐसा होता है जो छूटता जाता है, उसी को समेटते-सहेजते हुए फिर एक और कवि आता है, और समकालीन रचनात्मकता के अधूरे परिदृश्य को पूरा करता है। पंकज राग का यह संग्रह और उनकी कविताएँ यही काम करती दिखती हैं। न सिर्फ़ विषयों और शीर्षकों में, बल्कि भाषा के प्रयोग और बिम्बों-प्रतीकों के मुखौटों में भी वे उन चीज़ों और भंगिमाओं को पकड़ने की कोशिश करते हैं जो सिर्फ़ उनकी अपनी खोज हैं। “दिन बड़ा अजीब-सा गुज़रे/शाम बड़ी थकी-थकी-सी हो/भूख हो पर लगे नहीं/हरारत हो पर दिखे नहीं/बातें सतरंगी करो/यह भूमंडल की रात है।” संग्रह की पहली और शीर्षक-कविता की शुरुआती ये पंक्तियाँ कवि की विशिष्टता की भूमिका की तरह पाठक के मन में गड़ जाती हैं, जिसका निर्वाह यह संग्रह अन्त तक करता है। पंकज राग की ये कविताएँ उन चिन्ताओं को तो देखती ही हैं जो आज हम सबके लिए निर्णायक विषय बनी हुई हैं, साथ ही वे उन पीड़ाओं को भी अनदेखा नहीं करतीं जो हमारे अतीत में गुज़री हैं और आज हमारी स्मृतियों में कसकती हैं। ‘दिल्ली : शहर-दर-शहर’ जो इस संग्रह की सबसे लम्बी कविता है, वर्तमान और अतीत का ऐसा ही महाआख्यान बुनती है, जिसमें कवि एक शहर की नियति के बहाने मनुष्य की ही नियति से दो-चार होता है। “तुम मुझे फ़ीरोज़ी बना दो/दिल्ली की उस मध्यवर्गीय लड़की ने अपने पास बैठे लड़के से कहा/कोटला फ़ीरोज़शाह के स्लेटी खँडहरों के बीच/उस लड़के का उत्तर फँस-सा गया/फिर इन दोनों की कहानी का कुछ नहीं हुआ/वैसे ही जैसे फ़ीरोज़ाबाद का भी कुछ न हो सका।” अतीत से वर्तमान तक व्याप्त मनुष्य के अधूरेपन की निशानदेही करती ये कविताएँ निश्चित रूप से पाठकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव साबित होंगी।

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कविता की यात्रा में अकसर ही कुछ ऐसा होता है जो छूटता जाता है, उसी को समेटते-सहेजते हुए फिर एक और कवि आता है, और समकालीन रचनात्मकता के अधूरे परिदृश्य को पूरा करता है।

पंकज राग का यह संग्रह और उनकी कविताएँ यही काम करती दिखती हैं। न सिर्फ़ विषयों और शीर्षकों में, बल्कि भाषा के प्रयोग और बिम्बों-प्रतीकों के मुखौटों में भी वे उन चीज़ों और भंगिमाओं को पकड़ने की कोशिश करते हैं जो सिर्फ़ उनकी अपनी खोज हैं। “दिन बड़ा अजीब-सा गुज़रे/शाम बड़ी थकी-थकी-सी हो/भूख हो पर लगे नहीं/हरारत हो पर दिखे नहीं/बातें सतरंगी करो/यह भूमंडल की रात है।” संग्रह की पहली और शीर्षक-कविता की शुरुआती ये पंक्तियाँ कवि की विशिष्टता की भूमिका की तरह पाठक के मन में गड़ जाती हैं, जिसका निर्वाह यह संग्रह अन्त तक करता है।

पंकज राग की ये कविताएँ उन चिन्ताओं को तो देखती ही हैं जो आज हम सबके लिए निर्णायक विषय बनी हुई हैं, साथ ही वे उन पीड़ाओं को भी अनदेखा नहीं करतीं जो हमारे अतीत में गुज़री हैं और आज हमारी स्मृतियों में कसकती हैं। ‘दिल्ली : शहर-दर-शहर’ जो इस संग्रह की सबसे लम्बी कविता है, वर्तमान और अतीत का ऐसा ही महाआख्यान बुनती है, जिसमें कवि एक शहर की नियति के बहाने मनुष्य की ही नियति से दो-चार होता है। “तुम मुझे फ़ीरोज़ी बना दो/दिल्ली की उस मध्यवर्गीय लड़की ने अपने पास बैठे लड़के से कहा/कोटला फ़ीरोज़शाह के स्लेटी खँडहरों के बीच/उस लड़के का उत्तर फँस-सा गया/फिर इन दोनों की कहानी का कुछ नहीं हुआ/वैसे ही जैसे फ़ीरोज़ाबाद का भी कुछ न हो सका।”

अतीत से वर्तमान तक व्याप्त मनुष्य के अधूरेपन की निशानदेही करती ये कविताएँ निश्चित रूप से पाठकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव साबित होंगी।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2008
Weight
294 grams
ISBN-13
9788126716692
Pages
121
Reading time
~4 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22.5 cm
Language
Hindi

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