Manthan
Author:
Rajesh MaheshwariPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Unavailable
कविता अनेक विधियों से अभिव्यक्त होती है। कभी उसे अनुभव के उत्स की आवश्यकता होती है और कभी किसी सामाजिक सत्य के प्रोत्साहन की। राजेश माहेश्वरी ने कविता के लिए उन व्यापक अनुभवों को चुना है जिनके प्रमाण समाज में प्राय: दिखते रहते हैं।</p>
<p>इस संग्रह की रचनाएँ सुस्पष्ट रूप से विभिन्न विषयों पर अपना संवेदनात्मक अभिमत व्यक्त करती हैं! ‘विवेक’ कविता का निष्कर्ष है, ‘विवेकशील पाता है/गंगा सा प्रेम और ममता/यमुना-सी हृदय की कोमलता/और सरस्वती के समान बंधुआता।’ वस्तुत: राजेश माहेश्वरी ऐसे प्रश्नों से साक्षात्कार करते हैं जिनके उत्तर अभी उत्तर-आधुनिकता तलाश रही है।</p>
<p>इन कविताओं में प्रेरणा और उत्साह के स्वर सर्वोपरि हैं। वर्तमान समय में बिसरती आदर्शवादिता भी यहाँ देखी जा सकती है। यह इसलिए है क्योंकि कवि विसंगतियों व विषमताओं से मुक्ति चाहता है। यथार्थ के विश्लेषण से उत्पन्न ये रचनाएँ सचमुच पाठक के मन में ऊर्जा का संचार करती हैं।</p>
<p>सुगम व स्पष्ट अभिव्यक्ति इन कविताओं की उपलब्धि है। ‘नैतिकता’ कविता की इन पंक्तियों से यह तथ्य रेखांकित होता है—‘नैतिकता/बाज़ार में नहीं मिलती/यह एक आध्यात्मिक गुण है/जो करती है/सभ्यता का विकास/और संस्कृति का निर्माण।’</p>
<p>अपने उद्देश्य में प्रभावी और एक महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह।
ISBN: 9788183616201
Pages: 120
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: सदरां दा सफ़र खारीयां रातां तों कसैले दिन, सुफनेयां दे निघ तों उडीक दी पीड़, ओसीयां भरीयां ‘तरकालां’ तों हिजर दी हूक निकियां-निकियां उम्मीदां, उडीकां ते गुआचीआं मुस्कुराहटां तों उस ‘किल’ तक दा है जो ऐसी ‘पीड़’ दे गया जिस तों कई जन्मां, रिश्तेयां ते रुतां दे बाद वी निजात नहीं मिली जापदी। बिट्टू दियां सदरां पता नहीं केहड़े जन्म तों केहड़ा पतझड़ ते केहड़ी बसन्त आपणी पोटली च बन लेआइयां हन। गल ख़ास एह है कि बिट्टू दी पहली किताब ‘सफ़ीना’ 2009 विच हिन्दुस्तानी दा लड़ फड़ डूंगे उफानी रुहानी समुंदरां च गोते लाउंदी सी। अज उनां समुंदरां ने साडे आले दुआले दी मिट्टी नू गल ला पंजाबी विच गुनीआं सदरां नू साडी झोली पाया ए। एह मिट्टी दा असर वी है। ते हां जो बिट्टू संधू नू नहीं जाणदे ते सिर्फ़ ‘सफ़ीना’ दी उर्दू हिन्दी विच बुणी महीन कविता नू मणदे हन। उन्हा लई एह ख़ुशख़बरी है कि पंजाबी बिट्टू संधू नू उन्हां दी अम्मी तों मिलया तोहफ़ा है। पनताली कवितावां विच लखां सदरां करोड़ां सुफनेआं ते अनगिणत सफ़र नामेयां दा एह ज़िक्र ख़ूबसूरत है बिट्टू च रचेया, मिचेया हूबहू उसदे नाल दा, बिलकुल उसदे हाल दा।
Uska To Koi Gaon Hoga Hi Nahi
- Author Name:
Manoj Kumar Sharma
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Description:
‘‘मनोज कुमार शर्मा की कविताएँ आगामी कविता की ऐसी दस्तकें हैं जिनकी नादमयता में हम लोकभाषा की महीन किन्तु अविच्छिन्न उपस्थिति देख सकते हैं। शायद अच्छी कविता का लक्ष्य भी यही है। इनके पास जो भाषा है, वह आकस्मिक-सी नहीं है बल्कि वह धीरे-धीरे किसी उफनती हुई बाढ़ग्रस्त नदी की वास्तविकता की तरह है।’’
—गंगाप्रसाद विमल
‘‘प्रीत और सौन्दर्य की जो छवियाँ कवि श्री मनोज ने उकेरी हैं, वे हार्दिक हैं।’’
—ताराप्रकाश जोशी
‘‘अभिव्यक्ति का माध्यम शब्द, भाव और शिल्प है। मनोज कुमार शर्मा की कविताएँ अधिक लम्बी नहीं हैं। कहा जा सकता है कि छोटी-छोटी कविताओं में बहुत बड़ी बातों को सहज में कहने का ही नहीं अपितु ध्यान आकर्षित करने का सफल प्रयास है।’’
—मधुमती
(राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर)
Bhramargeet Saar
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
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Description:
सूर के कृष्ण-प्रेम तथा भक्ति के सागर ‘सूरसागर’ का सबसे मूल्यवान मोती है ‘भ्रमरगीत’ जिसमें सूरदास के हृदय से निकली अपूर्व रसधारा बही है। ‘भ्रमरगीत सार’ के संकलन-सम्पादन का कार्य आचार्य शुक्ल ने 1920 में शुरू किया था, लेकिन ठीक से पूरा होने में इसे कुछ समय लगा। लगभग चार सौ पदों के इस संचयन में उस समय कुछ पुनरुक्ति दोष भी रह गया था जिसे पुस्तक की लोकप्रियता और लगातार बढ़ती माँग के चलते, ठीक करने का समय आचार्य नहीं जुटा पाए थे।
प्रस्तुत संस्करण वरिष्ठ आलोचक और आचार्य शुक्ल के समीप रहे विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित है। सो इसमें नए पाठकों की सुविधा के लिए कुछ और टिप्पणियाँ भी जोड़ दी गई हैं, जिन्हें हम ‘चूर्णिका’ शीर्षक से पुस्तक के अन्त में पाएँगे।
आचार्य शुक्ल के शब्दों में सूरदास का प्रेम-पथ ‘लोक से न्यारा’ है। गोपियों के प्रेम-भाव की गम्भीरता उद्धव के ज्ञान-गर्व को मिटाती हुई दिखाई पड़ती है। वह भक्ति की एकान्त साधना का आदर्श प्रतिष्ठित करती जान पड़ती है, लोकधर्म के किसी अंग का नहीं। सूरदास सच्चे प्रेम-मार्ग के त्याग और पवित्रता को ज्ञान-मार्ग के त्याग और पवित्रता के समकक्ष खड़ा करने में सफल रहे हैं। साथ ही, उन्होंने उस त्याग को रागात्मिका वृत्ति द्वारा प्रेरित दिखाकर भक्ति या प्रेम-मार्ग की सुगमता भी प्रतिपादित की है।
पदों के प्रामाणिक पाठ के साथ आचार्य शुक्ल की सुदीर्घ व्याख्या इस पुस्तक को सूर के प्रेम-पक्ष की मूल्यवान विवेचना का रूप देती है, जो मध्यकालीन काव्य, विशेषकर भक्तिधारा के अध्येताओं के साथ ही भाव-प्रेमी पाठकों के लिए भी आनन्द का स्रोत सिद्ध होती है।
Kachhar-Katha
- Author Name:
Harish Chandra Pandey
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Description:
कुछ ही कवि चेतना की चोट से अब तक की परिभाषाओं को धीरे-धीरे ढहाकर अपनी कविता का परिसर निर्मित कर पाते हैं। हिन्दी के हरीश चन्द्र पाण्डे उनमें से एक हैं। उनमें सायास लिखने की न तो बहुत उठाबैठक है, न अनायास लिखने का क्रीड़ा-विलास और निष्प्रयोजनीयता। बल्कि उनकी कविता की चौहद्दी से बाहर भी संवेदना की बहुत सारी हरी-हरी दूब मुलमुलाकर झाँकती मिलती है।
‘गले को ज्योति मिलना’ से लगायत ‘फूल को खिलते हुए सुनना’ जैसे तमाम प्रयोग हरीश चन्द्र पाण्डे के काव्य-संसार में पारम्परिक इन्द्रियबोध को धता बताकर सर्वथा नई तरह की अनुभूति का अहसास कराने में सक्षम हैं। आभासी दृश्यों के घटाटोप को भेदती हुई उनकी कविताएँ उन अनगिन आवाज़ों को ठहरकर सुनने का प्रस्ताव करती हैं जिनमें एतराज़, चीत्कार, हँसी और ललकार के अनेक कंठ ध्वनित होते हैं और ‘हर आवाज़ चाहती है कि उसे ग़ौर से सुना जाए’। क्योंकि हमारी दुनिया ‘अँधेरे के टापू’ में तब्दील होती जा रही है और भयावह अँधेरे को बेकाबू हाथी के अक्स में ढालती जा रही है।
कोई देखे या न देखे लेकिन एक ‘सूर गायक’ इसे यहाँ अपनी प्रज्ञाचक्षु से देख भी रहा है और उसे अपनी आवाज़ भी दे रहा है—एक ऐसी आवाज़ जिससे लोकगीत कहते हैं कि हमें अपना कंठ दें दो और निर्गुण कहते हैं कि हमें। हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ ऐसी ही आवाज़ों की सम्पुंज हैं जो बादल छँटने की आवाज़ भी सुन सकती हैं जो एकदम बेआवाज़ हैं। यहाँ हमारे समय की वे बर्बरताएँ भी दर्ज हैं जहाँ कॉलेज जातीं, खुसुरफुसुर करतीं, चहचहातीं, पढ़ाई-लिखाई के दबाव झेलतीं और किशोरवय को सेलीब्रेट करतीं लड़कियों के आसपास ही कोई लड़का घात लगाए केमिस्ट की दुकान से एसिड की बोतल ख़रीद रहा है।
इस ब्रोकर समय में ज़मीन से आसमान तक बेच देने की हवस जिस तरह मनुष्यता के लिए ख़तरे की घंटी है, उसे कवि की उठी हुई तर्जनी सधे ढंग से लक्ष्य करती है। इसीलिए अपने नतोन्नत पहाड़ों पर खिलते बुरूंश के फूलों से लेकर गंगा-जमुना के अवतल कछारों तक पसरी हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ अपनी सौन्दर्यदृष्टि, प्रतिरोधी चेतना, भावाभिव्यक्ति और इन्द्रियबोध से कविता की तथाकथित मुख्यधारा से अलग उद्गम और सरणी निर्मित करती हैं। उनका प्रस्तावित नया संग्रह 'कछार-कथा' कोई मील का पत्थर नहीं बल्कि कवि के काव्य-परिसर को और आगे तक देखने का आमंत्रण है। —अष्टभुजा शुक्ल
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