Mritti-Tilak
Author:
Ramdhari Singh DinkarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Unavailable
निक हिन्दी कविता में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का शंखनाद करनेवाले विख्यात कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का एक महत्त्वपूर्ण संग्रह है 'मृत्ति-तिलक'। संग्रह की कविताओं में जहाँ देश के विराट व्यक्तियों के प्रति कवि का श्रद्धा-निवेदन है, वहीं कुछ कविताओं में उत्कट देश-प्रेम की ओजस्वी अभिव्यक्ति है। कुछ कविताएँ ख्यातनाम देशी-विदेशी कवियों की उत्कृष्ट रचनाओं का सरस अनुवाद हैं तो कुछ कविताओं में निसर्ग का सुन्दर चित्रण है।
प्रांजल, प्रवाहमयी भाषा, उच्चकोटि का छन्द-विधान और सहज भाव-सम्प्रेषण इन कविताओं की अद्भुत विशेषता है। अपने सरोकार और संवेदना में हिन्दी साहित्य के लिए थाती हैं ये कविताएँ।
'मृत्ति-तिलक' को पढ़ना हिन्दी काव्य के स्वर्ण-युग की यात्रा करना ह
ISBN: 9789388211949
Pages: 91
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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हिन्दी कविता में अपनी अलग पहचान बना चुके उमा शंकर चौधरी का यह कविता-संग्रह हाल के वर्षों में सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर हुए उन तमाम बदलावों का साक्ष्य है जिन्होंने आम आदमी की मुश्किल जिन्दगी को और मुश्किल बना दिया है। संग्रह की कविताएँ समाज की गति और दिशा का बेबाक आकलन ही नहीं करती हैं, उनके निहितार्थों को भी उद्घाटित करती हैं।
कम ही कवि ऐसे हैं जिनके यहाँ राजनीतिक कविताएँ इतनी शिद्दत से अनवरत आती रही हैं जितनी उमा शंकर के यहाँ। उनका राजनीतिक पक्ष स्पष्ट है, इसलिए उनकी कविताएँ भी अपना पक्ष तय करती हुई आम आदमी के हक में जाकर खड़ी हो जाती हैं। समसामयिक राजनीति जिस नए सत्य को गढ़ने और समाज को उसे अपनाने के लिए बाध्य करने को प्रयासरत है, उसकी वास्तविकता को ये कविताएँ सूक्ष्मता से रेखांकित करती हैं। कविता को अपने समय से किस तरह सम्पृक्त होना चाहिए और किस तरह उसे अपने समय का एक अन्तर्पाठ तैयार करना चाहिए ये कविताएँ इसका उदाहरण हैं।
इन कविताओं में अपने समय के प्रति कवि का क्षोभ और क्रोध तो है लेकिन उनसे कहीं ज्यादा दुख है। यहाँ स्त्री का दुख है तो घरों में बन्द होने को मजबूर बच्चों का दुख भी। यहाँ हमारे भीतर की मरती जा रही संवेदनशीलता का दुख है तो सड़कों पर उतर चुकी भीड़ के उन्मादी हो जाने का दुख भी। यहाँ सत्ता की बढ़ती निरंकुशता के कारण दुख है तो उसके खिलाफ उठ रहे प्रतिरोध की आवाज को दबाए जाने का दुख भी। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने समय की भयावहता को दर्ज करते कवि में दुख एक स्थायीभाव की तरह स्थापित हो गया है। कहना न होगा कि इस दुखबोध में ही मनुष्यता का भविष्य निहित है।
दरअसल ये कविताएँ अपने समय-समाज का एक ऐसा दस्तावेज हैं जो मनुष्यता की पक्षधरता में हमेशा प्रासंगिक बनी रहेंगी।
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व्योमेश शुक्ल के यहाँ राजनीति कुछ तेवर या अमर्षपूर्ण वक्तव्य लेकर ही नहीं आती, बल्कि उनके पास पोलिंग बूथ के वे दृश्य हैं जहाँ भारतीय चुनावी राजनीति अपने सबसे नंगे, षड्यंत्रपूर्ण और ख़तरनाक रूप में प्रत्यक्ष होती है। वहाँ संघियों और संघ-विरोधियों के बीच टकराव है, फ़र्ज़ी वोट डालने की सरेआम प्रथा है, यहाँ कभी भी चाकू और लाठी चल सकते हैं लेकिन कुछ ऐसे निर्भीक, प्रतिबद्ध लोग भी हैं जो पूरी तैयारी से आते हैं और हर साम्प्रदायिक धाँधली रोकना चाहते हैं। ‘बूथ पर लड़ना’ शायद हिन्दी की पहली कविता है जो इतने ईमानदार कार्यकर्ताओं की बात करती है जिनसे ख़ुद उनकी ‘सेकुलर’ पार्टियों के नेता आजिज आ जाते हैं, फिर भी वे हैं कि अपनी लड़ाई लड़ते रहने की तरक़ीबें सोचते रहते हैं।
ऐसा ही इरादा और उम्मीद ‘बाईस हज़ार की संख्या बाईस हज़ार से बहुत बड़ी होती है’ में है जिसमें भूतपूर्व कुलपति और गांधीवादी अर्थशास्त्र के बीहड़ अध्येता दूधनाथ चतुर्वेदी को लोकसभा का कांग्रेस का टिकट मिलता है किन्तु समूचे देश की राजनीति इस 75 वर्षीय आदर्शवादी प्रत्याशी के इतने विरुद्ध हैं कि चतुर्वेदी छठवें स्थान पर बाईस हज़ार वोट जुटाकर अपनी जमानत ज़ब्त करवा बैठते हैं और बाक़ी बची प्रचार सामग्री का हिसाब करने बैठ जाते हैं तथा कविता की अन्तिम पंक्तियाँ यह मार्मिक, स्निग्ध, सकारात्मक नैतिक एसर्शन करती हैं कि ‘बाईस हज़ार एक ऐसी संख्या है जो कभी भी बाईस हज़ार से कम नहीं होती’।
व्योमेश की ऐसी राजनीतिक कविताएँ लगातार भूलने के ख़िलाफ़ खड़ी हुई हैं और वे एक भागीदार सक्रियतावादी और चश्मदीद गवाह की रचनाएँ हैं जिनमें त्रासद प्रतिबद्धता, आशा और एक करुणापूर्ण संकल्प हमेशा मौजूद हैं।...यहाँ यह संकेत भी दे दिया जाना चाहिए कि व्योमेश शुक्ल की धोखादेह ढंग से अलग चलनेवाली कविताओं में राजनीति कैसे और कब आ जाएगी, या बिलकुल मासूम और असम्बद्ध दिखनेवाली रचना में पूरा एक भूमिगत राजनीतिक पाठ पैठा हुआ है, यह बतलाना आसान नहीं है।...ये वे कविताएँ हैं जो ‘एजेंडा’, ‘पोलेमिक’ और कला की तिहरी शर्तों पर खरी उतरती हैं।
—विष्णु खरे
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कविता जादू है। जो जैसा है उसे तुरत-फुरत पलक झपकते बदल डालने का जादू है कविता। राजेश जोशी ने यह बात अपने पहले कविता-संग्रह में कही थी। इसी कविता के जादू को समझने के लिए उन्होंने कहा कि एक कबूतर ख़ाली टोकरी से निकलेगा और फिर लम्बी-लम्बी उड़ान भरेगा। यह उड़ान ही कविता के जादू की परिणति है। इसी समझ के कारण राजेश जोशी की कविताओं में यथार्थ और फ़ैंटेसी का अन्तर्गठन सम्भव हुआ। अपने समय के विरुद्ध तात्कालिक प्रतिक्रिया व्यक्त करते वक़्त वे कभी भी अच्छे जीवन का सपना देखना नहीं भूलते।
विश्व-हिंसा और दिन-रात फैलते प्रदूषण के ख़िलाफ़ राजेश जोशी ने बहुत समर्थ कविताएँ लिखी हैं। इसका एक कारण तो यह है कि भोपाल की त्रासदी उन्होंने बहुत निकट से देखी और झेली है। दूसरा यह कि उनके अन्तरंग संवेदनों की दुनिया को इससे ज़बर्दस्त आघात पहुँचा है। उन्होंने मनुष्य की महानतम उपलब्धियों की क्षणभंगुरता और आत्मघाती दर्प की भयावह सच्चाई को पहचान लिया।
अपने परिवेश के प्रति अगाध प्रेम और सम्बद्धता शायद ही इधर प्रकाशित दूसरे कवियों की कविताओं में मिले। ख़ास बात यह है कि राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक़्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते। लय उनकी कविताओं में अत्यन्त सहज भाव से आती है, जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो। इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है। वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं।
राजेश जोशी की कविताओं में कहीं भी पराजित होकर दूर खड़े रहने का भाव नहीं है। वे अपने परिवेश और लोगों से गहरे जुड़े हैं और उन्हीं से अपनी कविताओं के लिए ऊर्जा और आस्वाद ग्रहण करते हैं।
वे फैंटेसी का इस्तेमाल भयावह पटकथा के रूप में नहीं करते। वे तो इसे अपने मन की सहज, सरल भावाकुलता में गूँथकर यथार्थ के बरअक्स तीखे विपर्यय के रूप में रखते हैं, ताकि यथार्थ का चेहरा अधिक नुकीला और वास्तविक दिखाई दे।
—ऋतुराज की एक टिप्पणी से कुछ पंक्तियाँ।
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