Dharashayi Hebaak Samay
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मैथिली साहित्यक आधुनिक काल जहिया सँ प्रतिष्ठापित भेल, मैथिलीक साहित्यकार-समाज सेहो एहि मर्मान्तक दृश्य सब केँ साहित्य मे मूर्त करैत रहला अछि। दुनिया जें कि प्रौद्योगिक विकास पर चढ़ैत आइ ग्लोबल विलेज भ' गेल अछि, कोविड-19 नामक अइ महामारीक प्रकोप सेहो मनुष्यक नक्शे-कदम पर चलैत ग्लोबल जटिलता सँ भरल-पुरल साबित भ' रहल अछि। भारत सहित दुनियाक तमाम भाषा मे साहित्यकार लोकनि अइ अभूतपूर्व परिस्थिति केँ शब्दांकित करैत देखल गेला अछि। मैथिली अइ मे पाछू नहि रहल अछि। तारानंद वियोगीक ई संग्रह कविता मे कोरोना-काल केँ दृश्यांकित करबाक चेष्टा थिक। महामारीक फैलाव, एकर चुनौती, मानव-संबंध पर पड़ल एकर असर, व्यवस्था आ विज्ञानक लाचारगी, प्रभावित लोकनिक हाहाकार—सब कथू अइ कविता सब मे जगह-जगह आयल अछि। प्रकृति सँ दूर हटैत उत्तर आधुनिक मनुष्यक सभ्यता केँ ल' क' कतेको ठाम वियोगी कइएक मूलभूत प्रश्न सब उठबैत छथि। प्रकृतिक स्वयं मे की संकेत अछि, आ विकासक पैमाना कोना अपूर्ण अछि, इहो सब प्रसंग ठाम-ठाम आयल अछि। कवि अपने सेहो कोरोना सँ संक्रमित भेला, कठिन परिस्थिति सँ जूझैत स्वास्थ्य-लाभ केलनि। घोर आदंकक दौर मे सेहो ओ रोगग्रस्त अवस्था मे प्रतिदिन कविता-डायरी लिखलनि, सेहो अइ संग्रह मे संगृहीत अछि। ई मनुष्यक जिजीविषाक ज्वलंत निदर्शन बनि क' सोझा आयल अछि। वियोगीक काव्य के सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता ओकर लोकधर्मिता अछि। हुनक काव्य भाषाक सहजता, सरलता आ बिम्बधर्मिता ओकरा अत्यधिक व्यंजक बनबैत अछि। ओ मर्मस्पर्शी काव्य शिल्पक रचनाकार तँ छथिहे, सब सँ रोचक अछि वियोगीक काव्यभाषा, जकरा लेल ओ सब दिन स्मरण कयल जेता। —केदार कानन
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मैथिली साहित्यक आधुनिक काल जहिया सँ प्रतिष्ठापित भेल, मैथिलीक साहित्यकार-समाज सेहो एहि मर्मान्तक दृश्य सब केँ साहित्य मे मूर्त करैत रहला अछि। दुनिया जें कि प्रौद्योगिक विकास पर चढ़ैत आइ ग्लोबल विलेज भ' गेल अछि, कोविड-19 नामक अइ महामारीक प्रकोप सेहो मनुष्यक नक्शे-कदम पर चलैत ग्लोबल जटिलता सँ भरल-पुरल साबित भ' रहल अछि। भारत सहित दुनियाक तमाम भाषा मे साहित्यकार लोकनि अइ अभूतपूर्व परिस्थिति केँ शब्दांकित करैत देखल गेला अछि। मैथिली अइ मे पाछू नहि रहल अछि। तारानंद वियोगीक ई संग्रह कविता मे कोरोना-काल केँ दृश्यांकित करबाक चेष्टा थिक। महामारीक फैलाव, एकर चुनौती, मानव-संबंध पर पड़ल एकर असर, व्यवस्था आ विज्ञानक लाचारगी, प्रभावित लोकनिक हाहाकार—सब कथू अइ कविता सब मे जगह-जगह आयल अछि। प्रकृति सँ दूर हटैत उत्तर आधुनिक मनुष्यक सभ्यता केँ ल' क' कतेको ठाम वियोगी कइएक मूलभूत प्रश्न सब उठबैत छथि। प्रकृतिक स्वयं मे की संकेत अछि, आ विकासक पैमाना कोना अपूर्ण अछि, इहो सब प्रसंग ठाम-ठाम आयल अछि। कवि अपने सेहो कोरोना सँ संक्रमित भेला, कठिन परिस्थिति सँ जूझैत स्वास्थ्य-लाभ केलनि। घोर आदंकक दौर मे सेहो ओ रोगग्रस्त अवस्था मे प्रतिदिन कविता-डायरी लिखलनि, सेहो अइ संग्रह मे संगृहीत अछि। ई मनुष्यक जिजीविषाक ज्वलंत निदर्शन बनि क' सोझा आयल अछि। वियोगीक काव्य के सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता ओकर लोकधर्मिता अछि। हुनक काव्य भाषाक सहजता, सरलता आ बिम्बधर्मिता ओकरा अत्यधिक व्यंजक बनबैत अछि। ओ मर्मस्पर्शी काव्य शिल्पक रचनाकार तँ छथिहे, सब सँ रोचक अछि वियोगीक काव्यभाषा, जकरा लेल ओ सब दिन स्मरण कयल जेता। —केदार कानन
Book Details
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ISBN9789388799799
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Pages112
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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वरिष्ठ कवि गंगेश गुंजनक 'अन्हार मे डमरू' घुप्प अन्हरियाक विरुद्ध इजोत तकबाक विलक्षण काव्य-प्रयासक नाम थिक। सम्पूर्ण सम्भावनाक संग कविक दायित्व-बोध आ काव्य-विवेकक मणिकांचन सहकार संग्रहक वैशिष्ट्य। 'धानक शीश जकाँ फुटैत' जाग्रत कविताक 'बगूचा' अछि—'अन्हार मे डमरू'। चमत्कृत करैत कविताक रेंज आ कविक निजी काव्य-भाषाक सौंदर्य कविता केँ नव सृजनशीलता सँ भरि दैछ। मिथिलाक संस्कृति सँ अथाह अनुराग आ रूढ़ अपसंस्कृतिक प्रति घोर चिंताक अंतर्द्वंद्व सँ बनैत कविता विमर्शक लेल पाठक केँ सहजहि हकारैत अछि। 'प्रथम चुम्बनक कृतज्ञता' आ 'दोसर चुम्बनक कृतघ्नता' सँ ल' क' 'कुसियारक पर्याय बनैत स्त्रीक जीवन-कथा', 'धुआँइन ढेकार जकाँ सुन्न दालन पर' 'पुरना मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि जकाँ' पड़ल लोकतंत्रक ठठरी, दिल्ली नगरक त्रासद तामस, जबियाअल मनुक्खक सामने अकादारुन बजार वा 'यात्रीजीक एक कंठ मे सय-पचास लाखक प्रतिध्वनि'; ई सभ टा स्वर समवेत रूपेँ 'अन्हार मे डमरू:क परिसर मे भेटि जैत। बहुस्वरता, विषय-बहुलता आ कथन-भंगीक विविधता संग्रहक नवीनता थिक। प्रतीक, बिंब सँ सुसज्जित एक टा पारदर्शी महीन काव्य-आवरण कविता केँ कुहेसगर नहि बना जीवन-जगतक अलक्षित समय केँ दर्शबैत अछि। गुंजनजीक कविताक संवादधर्मिता हुनक कविता केँ सहज बोधगम्य तँ बनबैत अछि, मुदा ई सहजता सरलता नहि अपितु विषय-वस्तुक समग्रता आ जटिलता केँ सरलता सँ बुझबाक काव्य-युक्ति अछि। —कमलानंद झा
Ek Ta Herayal Duniya
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Krishna Mohan Jha
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Collection of Maithili Poems
Sang Samay Ke
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Mahaprakash
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Collection of Maithili Poems
Khattar Kakak Tarang
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Harimohan Jha
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खट्टर कका आई सँ पछस्तर साल पहिने ‘प्रकट’ भेलाह। केना? इ रहस्य बाद मे, मुदा भाङक भांगक तरंग मे एहन-एहन गूढ़ अर्थक फुलझड़ी छोड़ल जा सकैत अछि, इ प्रतिभा खट्टर कका कें छोड़ि कऽ ककरो लग नहि अछि। ओ कखनो सोमरस कें भाङ सिद्ध क दैत छैथ, तऽ आयुर्वेद कें महाकाव्य। कखनो अपन तर्क सँ भगवान कें मौसा बना लैत छैथ, तऽ कखनो समधि। ओ पातिव्रत्य कें व्यभिचार साबित कऽ सकैत छैथ, तऽ असती कें सती। हुनकर नजर मे कामदेव सृष्टि कें कर्ता छैथ। जेना कबीरदासक उनटे वाणी कहल जायत अछि, तहिना खट्टर कका उनटे गंङ्गा बहबैत छैथ। तरंग मे कहल हुनकर गप्पक जवाब प्रकांड पंडितो कें नहि फुरैत छहिन। हुनकर किछु तरंग देखू—ब्रह्मचारी कें वेद नहि पढ़बाक चाही, पुराण बहु-बेटी कें योग्य नहि अछि, दुर्गाक कथा स्त्रैण रचनै छैथ, गीता मे श्रीकृष्ण अर्जुन कें फुसला लेलथिन, दर्शनशास्त्रक रचना रस्सी देखि क भेल अछि, असली ब्राह्मण विदेश मे रहैत छैथ, मूर्खताक कारण पंडितगण छैथ, दही-चूड़ा-चीनी सांख्यक त्रिगुण अछि, स्वर्ग गेला पर धर्म भ्रष्ट भ जायत आदि। इ जनैत कि हुनकर तरंग कर्मकाडी कें लाल-पीअर करैत अछि, खट्टर कका मस्त रहैत छैथ, भांग घोंटैत रहैत छैथ, आ आनन्द-विनोदक वर्षा करैत रहैत छैथ। जेना शुरू मे कहल गेल कि खट्टर कका प्रकट भेलाह, तऽ ओ प्रकट होयते प्रसिद्ध भ गेलाह। मैथिलिए मे नहि, हिन्दी, गुजराती आदि भाषा मे सेहो पढ़ल गेलाह। ‘कहानी’, ‘धर्मयुग’ जकाँ पत्रिका खट्टर ककाक किछु तरंग छपलक। हुनकर लोकप्रियता एहन छलैन्हि कि हुनकर परिचय-पात, घर-द्वार जनैत लेल चिट्ठी आबऽ लागल। खट्टर कका हँसी-हँसी मे जरूर तरंग छोड़ैत छैथ, मुदा ओकरा ओ अपन तर्क सँ प्रमाणित सेहो क दैत छथिन। वेद, उपनिषद, पुराण सब पर हुनकर पकड़ छैन। तर्कक जाल एहन बुनताह कि पाठकगण सोच मे पड़ि जेताह। हुनकर चश्मा सँ देखब, त इ दुनिया मे सब उनिटा नजर आयत। मुदा, हुनकर बातक रस आ विनोद पाठकगण कें सब उलझन सुलझा दैतेन, इ भरोसा अछि।
Kanyadan • Dwiragaman
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Harimohan Jha
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‘कन्यादान’ मिथिलाक एहन व्यथा-कथा अछि, जकरा सँ अजुका समाज सेहो मुक्त नहि भ सकल अछि। उपन्यासक पहिल संस्करण नौ दशक पहिने, यानी 1933 मे पुस्तकाकार छपल छल, मुदा आइ धरि मिथिलाक समाज मे ‘बुच्चिदाइ’ देखल जायत छैथ, आ हुनकर संघर्ष अनवरत चलि रहल छैन। कन्यादान नाम कें साकार करैत घरक मुखिया आइयो अपन कन्या कें जड़ पदार्थ जकाँ दान करबाक हेतु निमित्त रहैत छैथ आ ‘बुच्चिदाइ’ कें विवाहक हेतु सूत्रधार भाँति-भाँतिक तिकड़म लगबैत छैथ। बेस, आइ परिस्थिति बदलल अछि। आब गाम-घरक बुच्ची सेहो स्कूल जायत छैथ। मुदा लड़का-लड़किक भेद एखनो बनल अछि। आइयो कतेको घर मे लड़का कें दूध मिलैत अछि, त लड़की कें माँड़ सँ सन्तोष करऽ पड़ैत छैन।
इ पोथी कें लोकप्रियता सिर्फ समाजक यथार्थ चित्रण सँ नहि मिलल। एकर भाषा आ शिल्प अप्रतिम अछि। इ उपन्यास मैथिली समाजक मनोवृत्ति आ विसंगति कें बिना लाग-लपेट अभिव्यक्त करैत अछि। हास्यक रस होयतो इ पुस्तक मर्मस्पर्शी अछि। अहि लेल एकरा पढ़बा लेल गैर-मैथिली भाषी सेहो मैथिली सिखलाह। आ जे पढ़बा मे समर्थ नहि छलाह, से वाचन सं एकर रसास्वादन कैलाह। हरिमोहन झा हास्य सम्राट जरूर कहल जायत छैथ, मुदा ओ एहन दक्ष गद्यकार सेहो छलाह, जे मनोरंजक ढंग सँ कथा कहैत पाठक कें यथार्थक भूमि पर विस्मित कऽ दैत छथिन। हुनकर लेखनी विमर्शक एतेक द्वारि खोलैत अछि कि पाठकगण सोचबा लेल विवश होयत छैथ। ‘कन्यादान’ सेहो इ कसौटी कें सार्थक करैत अछि। इ उपन्यास मे अपन बिटियाक विवाहक हेतु माय-बाप कें चिन्ता अछि, विवाह कें सम्भव बनैबाक हेतु सूत्रधारक दाँव-पेच, नव रंग-ढंग मे रंगल पतिक आकांक्षा, अनपढ़ आ गामक संस्कृति मे रमल पत्निक कायान्तरण, आ सबसँ उल्लेखनीय, पुरातन बनाम आधुनिक परम्पराक जंग अछि। हरिमोहन झा कें नजर से केओ बाँचल नहि छैथ, अहि लेल ‘कन्यादान’ अनवरत प्रासंगिक बनल अछि।
इ पोथी मे ‘कन्यादान’ तथा ‘द्विरागमन’ (1943)— जे वस्तुत: एके उपन्यासक दू भाग अछि—एक संग प्रकाशित अछि। पाठक लोकनि हरिमोहन झा कऽ इ करिश्मा कें स्वयं अनुभव करू...
Aaranyak
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आरण्यक भारतीय साहित्यमे अनेक एहन महान विभूति लोकनि छथी जे अपना कृतित्व साँ अपन युग आ समकालीन परिदृष्क समृद्ध कयलनि अछि आ ओकरा एक नव दृष्टि प्रदान कयलनि अछि। एहि उपन्यासमे उपन्यासकार 'प्रकृत प्रदत' वन-संपादमे प्रकृति चित्रण, मानवीय संवेदनाक घटित घटनाकाँ अनुभवक आधार पर मनुष्यक लेल एक एहन कथानकक निर्माण कयलनि अछि, जाहिसाँ जीवन-जगतक सत्यता बहुत लग साँ देखल गेल अछि। ई एक अनुपम, अनुभूतिपूर्ण स्मृति-कथा अछि जे मनुष्य जीवनक आख्यान आ ओकर यात्राकाँ सार्थक करैत अछि। ई एक प्रकरें मानव जीवक एकांत समानुभूतिशील साहचर्यक आख्यान थीक।
Aksh Par Nachait
- Author Name:
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Maithili Memoir
Abhilasha
- Author Name:
Panna Jha
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