Sansad Se Sarak Tak
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धूमिल मात्र अनुभूति के नहीं, विचार के भी कवि हैं। उनके यहाँ अनुभूतिपरकता और विचारशीलता, इतिहास और समझ, एक-दूसरे से घुले-मिले हैं और उनकी कविता केवल भावात्मक स्तर पर नहीं बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी सक्रिय होती है। धूमिल ऐसे युवा कवि हैं जो उत्तरदायी ढंग से अपनी भाषा और फ़ार्म को संयोजित करते हैं। धूमिल की दायित्व-भावना का एक और पक्ष उनका स्त्री की भयावह लेकिन समकालीन रूढि़ से मुक्त रहना है। मसलन, स्त्री को लेकर लिखी गई उनकी कविता ‘उस औरत की बग़ल में लेटकर’ में किसी तरह का आत्मप्रदर्शन, जो इस ढंग से युवा कविताओं की लगभग एकमात्र चारित्रिक विशेषता है, नहीं है बल्कि एक ठोस मानव स्थिति की जटिल गहराइयों में खोज और टटोल है जिसमें दिखाऊ आत्महीनता के बजाय अपनी ऐसी पहचान है जिसे आत्म-साक्षात्कार कहा जा सकता है। उत्तरदायी होने के साथ धूमिल में गहरा आत्मविश्वास भी है जो रचनात्मक उत्तेजना और समझ के घुले-मिले रहने से आता है और जिसके रहते वे रचनात्मक सामग्री का स्फूर्त लेकिन सार्थक नियंत्रण कर पाते हैं। यह आत्मविश्वास उन अछूते विषयों के चुनाव में भी प्रकट होता है जो धूमिल अपनी कविताओं के लिए चुनते हैं। ‘मोचीराम’, ‘राजकमल चौधरी के लिए’, ‘अकाल-दर्शन’, ‘गाँव’, ‘प्रौढ़ शिक्षा’ आदि कविताएँ, जैसा कि शीर्षकों से भी आभास मिलता है, युवा कविता के सन्दर्भ में एकदम ताज़ा बल्कि कभी-कभी तो अप्रत्याशित भी लगती हैं। इन विषयों में धूमिल जो काव्य-संसार बसाते हैं, वह हाशिए की दुनिया नहीं, बीच की दुनिया है। यह दुनिया जीवित और पहचाने जा सकनेवाले समकालीन मानव-चरित्रों की दुनिया है जो अपने ठोस रूप-रंगों और अपने चारित्रिक मुहावरों में धूमिल के यहाँ उजागर होती है।
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धूमिल मात्र अनुभूति के नहीं, विचार के भी कवि हैं। उनके यहाँ अनुभूतिपरकता और विचारशीलता, इतिहास और समझ, एक-दूसरे से घुले-मिले हैं और उनकी कविता केवल भावात्मक स्तर पर नहीं बल्कि बौद्धिक स्तर पर भी सक्रिय होती है।
धूमिल ऐसे युवा कवि हैं जो उत्तरदायी ढंग से अपनी भाषा और फ़ार्म को संयोजित करते हैं।
धूमिल की दायित्व-भावना का एक और पक्ष उनका स्त्री की भयावह लेकिन समकालीन रूढि़ से मुक्त रहना है। मसलन, स्त्री को लेकर लिखी गई उनकी कविता ‘उस औरत की बग़ल में लेटकर’ में किसी तरह का आत्मप्रदर्शन, जो इस ढंग से युवा कविताओं की लगभग एकमात्र चारित्रिक विशेषता है, नहीं है बल्कि एक ठोस मानव स्थिति की जटिल गहराइयों में खोज और टटोल है जिसमें दिखाऊ आत्महीनता के बजाय अपनी ऐसी पहचान है जिसे आत्म-साक्षात्कार कहा जा सकता है।
उत्तरदायी होने के साथ धूमिल में गहरा आत्मविश्वास भी है जो रचनात्मक उत्तेजना और समझ के घुले-मिले रहने से आता है और जिसके रहते वे रचनात्मक सामग्री का स्फूर्त लेकिन सार्थक नियंत्रण कर पाते हैं।
यह आत्मविश्वास उन अछूते विषयों के चुनाव में भी प्रकट होता है जो धूमिल अपनी कविताओं के लिए चुनते हैं। ‘मोचीराम’, ‘राजकमल चौधरी के लिए’, ‘अकाल-दर्शन’, ‘गाँव’, ‘प्रौढ़ शिक्षा’ आदि कविताएँ, जैसा कि शीर्षकों से भी आभास मिलता है, युवा कविता के सन्दर्भ में एकदम ताज़ा बल्कि कभी-कभी तो अप्रत्याशित भी लगती हैं। इन विषयों में धूमिल जो काव्य-संसार बसाते हैं, वह हाशिए की दुनिया नहीं, बीच की दुनिया है। यह दुनिया जीवित और पहचाने जा सकनेवाले समकालीन मानव-चरित्रों की दुनिया है जो अपने ठोस रूप-रंगों और अपने चारित्रिक मुहावरों में धूमिल के यहाँ उजागर होती है।
Book Details
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ISBN9788126724499
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: बेर भीलनी के' काव्य की रचना खण्डशः हुई है। राम-कथा में भीलनी का प्रसंग युग सापेक्ष तथा मनोनुकूल प्रतीत होता है। भगवान् राम ने दरिद्रनारायण भक्त को गले से लगाया, अपने कर-कमलों से उसके आँसू पोंछे तथा द्रवीभूत हुए इसका सम्पूर्ण जीवन्त निदर्शन भीलनी प्रसंग में प्राप्त हो जाता है। शूद्रा भीलनी के प्रति राम की करुणा,धर्म का अस्पष्ट रूप तथा राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँधने की ललक, तथा लोकेषणा इन सब तत्त्वों ने मिलकर 'बेर भीलनी के' खण्ड काव्य के सृजन को बल प्रदान किया है। प्रत्येक रचना का अपना एक प्रयोजन हुआ करता है। रचना के पीछे भी निश्चित ही प्रयोजन-दृष्टि रहती है। इसमें निम्नवर्ग की एक साधारण स्त्री के आत्मिक एवं आध्यात्मिक संघर्ष की ऐसी कथा है, जो रामायण के शीर्षस्थ पात्रों, चरित्रों में भी अपनी पहचान बनाये रखती है। रामायण में प्रयुक्त अन्य साधारण पात्र, अपनी प्रयुक्ति के बाद रचना के गतिशील फलक में विलीन हो जाते हैं परन्तु शबरी जिस क्षण वाल्मीकि के द्वारा राम-गाथा में प्रयुक्त होती है उस समय तक वह अत्यन्त उच्च भाव-भूमि प्राप्त किये हुए होती है। रचनात्मक प्रयुक्ति के क्षण में शबरी के लिए राम स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। साधना की यह परावस्था ही शबरी को सारे रामायणकालीन पात्रों में विशिष्ट बनाती है। कवि की मानवीय दृष्टि ने ही शबरी के साधारणत्व को असाधारणत्व प्रदान किया। जिस युग की यह कथा है उस समय सामाजिक स्तर पर भले ही वर्ण-व्यवस्था का विधान रहा हो पर व्यक्ति, कर्म के द्वारा वर्ण-मुक्त होने की चेष्टा कर सकता था। 'बेर भीलनी के' की कथा में भी यही वर्ण-मुक्त होने की चेष्टा है। यह ठीक है कि इसके लिए व्यक्ति को संघर्ष करना ही होता था। जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें वर्ग-व्यवस्था प्रधान है। वर्ग-मुक्त होने की हमारी सबसे प्रमुख समस्या है। सामाजिक वर्ग-व्यवस्था और वैयक्तिक कर्म विधान में एकता की चेष्टा सदा से कवि, विचारक, दार्शनिक और सधारक होते आये हैं। आज की वर्ग-व्यवस्था वाली सामाजिकता का श्रम-विधान के द्वारा सुलझाने की चेष्टा निरन्तर की जा रही है। हमारा समाज श्रम और कर्म दोनों ही क्षेत्रों में वैसे ही भटक गया है जैसे कि तपते मरुस्थल में कोई साथी खो जाता है। 'इस छोटे से खण्डकाव्य में मैं अपनी बात को केवल संकेत में ही कह सका हूँ क्योकि मुख्य रूप से इसे किसी इतर प्रयोजन के लिए ही मुझसे लिखवाया गया, छन्दोबद्ध भी लिखा तथा रचना की संरचना में वैचारिकता भी कम ही आने दी। फिर भी अपने मूल प्रयोजन में यह रचना भी मेरे कवि का उतना ही प्रतिनिधित्व करती है जितनी की अन्य काव्य-कृतियाँ।
Sirf Kavi Nahi
- Author Name:
Bodhisatwa
- Book Type:

- Description: समकालीन हिन्दी कविता के उपादान आज कुछ इतने सरल हो गये हैं कि ‘कोई कवि बन जाय, सहज सम्भाव्य है।’ कविता के इस संकट में ऊपरी तौर पर अच्छी कविताएँ लिख लेना कठिन नहीं है। लेकिन ऐसी कविता जो एक ‘नयी शुरुआत’ करे, जो अचानक ‘ताज़गी के एक अनहोनेपन’ से पाठक को अपने अनुरूप ढाल ले, ऐसी कविता कहीं नहीं दिखती। ‘ताज़गी (वस्तु और शिल्प) के इसी अनहोनेपन’ के अनुभव को व्यक्त करती हैं बोधिसत्व की कविताएँ। बोधिसत्व की कविताएँ कविता की एक नयी भाषा की खोज में पैदा हुई हैं। गढ़ी हुई, उपलब्ध काव्य-भाषा के नकार और गैरपहचान से बोधिसत्व की काव्य-भाषा का निर्माण हुआ है। नये ढंग की अछूती बिम्ब-मालाओं के माध्यम से यह कवि अपनी बात कहता है। ऐसे शब्दों का प्रयोग कवि करता है जो हमारी संस्कृति के अछूते कोनों से आकर सहसा कविता में एक बिल्कुल नये सांस्कृतिक व्यक्तित्व की रचना करते हैं। इस तरह बोधिसत्व की कविताएँ ‘कविता के एक नये संसार को जन्म देती हैं। निपट भोलेपन के बीच एक तार्किक और जनोन्मुखी अन्तर्दृष्टि सम्पन्न ये कविताएँ अपनी विविधता में एक अद्भुत ‘कोलाज़’ की रचना करती हैं।
Ek Anant Jheel
- Author Name:
Medhavi Jain
- Book Type:

- Description: मेधावी की कविता चंचलता, सरलता, ताज़गी और जीवन के प्रति उत्साह और जुनून की उपज है। लेखिका ने स्वयं को विदुषी और बुद्धिजीवी प्रस्तुत करने का ज़रा भी प्रयास नहीं किया। शायद इसीलिए इन कविताओं में ज़िन्दादिली और मनोभावों की स्वच्छ अभिव्यक्ति उमड़कर आती है। कहीं-कहीं मेधावी की कविताएँ प्रकृति की विराट धारा में डुबकी लगाती हैं तो कहीं अध्यात्म की ओर प्रेरित होती हैं। मेधावी शब्दों से उसी प्रेम से खेलती हैं, जैसे संगीतकार सुरों को जगाते हैं।
Pallav
- Author Name:
Sumitranandan Pant
- Book Type:

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Description:
‘पल्लव’ बिलकुल नए काव्य-गुणों को लेकर हिन्दी-साहित्य जगत में आया...पंत में कल्पना शब्दों के चुनाव से ही शुरू होती है। छन्दों के निर्वाचन और परिवर्तन में भी वह व्यक्त होती है। उसका प्रवाह अत्यन्त शक्तिशाली है। इसके साथ जब प्रकृति और मानव-सौन्दर्य के प्रति कवि के बालकोचित औत्सुक्य और कुतूहल के भावों का सम्मिलन होता है तो ऐसे सौन्दर्य की सृष्टि होती है जो पुराने काव्य के रसिकों के निकट परिचित नहीं होता। कम संवेदनशील पुराने सहृदय इस नई कविता से बिदक उठे थे और अधिक संवेदनशील सहृदय प्रसन्न हुए थे। पल्लव के भावों की अभिव्यक्ति में अद्भुत सरलता और ईमानदारी थी। कवि बँधी रूढ़ियों के प्रति कठोर नहीं है, उसने उनके प्रति व्यंग्य और उपहास का प्रहार नहीं किया, पर वह उनकी बाहरी बातों की उपेक्षा करके अन्तराल में स्थित सहज सौन्दर्य की ओर पाठक का ध्यान आकृष्ट करता है। मनुष्य के कोमल स्वभाव, बालिका के अकृत्रिम प्रीति-स्निग्ध हृदय और प्रकृति के विराट और विपुल रूपों में अन्तर्निहित शोभा का ऐसा हृदयहारी चित्रण उन दिनों अन्यत्र नहीं देखा गया।’’
—आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
Pratinidhi Kavitayein : Ravindra Bharati
- Author Name:
Ravindra Bharti
- Book Type:

- Description: रवीन्द्र भारती की कविताएँ साधारण लोगों और चीज़ों की साधारणता को इस तरह आलोकित करती हैं कि वे उत्सवधर्मी और बड़बोली असाधारणताओं के सम्मुख न सिर्फ़ उनका विकल्प बल्कि उनसे ज़्यादा गरिमापूर्ण और अर्थवान लगने लगती हैं। बहुत नज़दीक और बहुत जाने-पहचाने हमारे संसार में ही उनकी कविता ऐसे बिन्दुओं को चिह्नित करती चलती है जहाँ हम एक मनुष्य के रूप में सहजभाव से रह सकते हैं। सरल और आमफ़हम शब्दावली में अनुभूति के सघन क्षणों को कविता में ले आना रवीन्द्र भारती की विशेषता है, जिसे अपने देशज बोध के साथ वे एक अविस्मरणीय दृश्य के रूप में पाठक के सामने कर देते हैं। आज के काव्य-जगत में उनकी कविताओं को पढ़ना कविता की एक अत्यन्त प्राकृतिक भूमि से साक्षात्कार करना है, वह भूमि जहाँ कुछ भी ऐसा नहीं जो कविता न हो सके।
Yun To Sab Kuchh Purvavat Hai
- Author Name:
Hema Dikshit
- Book Type:

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Description:
हेमा दीक्षित ने कठिन काव्य-क्षेत्र में एक सहमा विकम्पित-सा क़दम रखा है। लेकिन जल्दी ही यह साफ़ हो जाता है कि जीवन-संघर्ष में वह कविता को अपना सम्बल और लड़ने का आयुध बनाना चाहती हैं। यह आग्रह उन्हें काव्य व्यक्तित्व देता है और उनके उपक्रम को जेनुइन बनाता है। कविता की अपनी पहली किताब में वह अपने स्वत्व और उसे कह पाने वाली भाषा के आविष्कार में सन्नद्ध दिखती हैं। काव्यशास्त्र में कविता के प्रयोजन के बारे में प्रायः पूछा जाता है कि कविता लिखने का उद्देश्य क्या है? हेमा के लिए इसका उत्तर यह है कि वह अपनी विकलताओं को कविता में लाना चाहती हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जीवन की निजता को कविता में लाते हुए वह बहुत नैसर्गिक तरीक़े से निर्वैयक्तिकता को कविता में अनुस्यूत होने देती हैं। इस तरह निजी दुख सार्वजनीन दुख का प्रतिनिधि बन जाता है, अपना सन्ताप दुनिया का सन्ताप और न्याय को न पाने की निजी त्रासदी तमाम लोगों के न्याय को न पाने की अवस्थिति में बदल जाती है। इस तरह आत्म-सजगता के बावजूद आत्म-गरिमा का क्षरण नहीं होता जो आत्म-विस्तार में बदलकर किसी भी आत्म-ग्रस्तता का निषेध बन जाता है। उनकी कविता का पाठ किसी साँचे में ढले ऐस्थेटिक्स से न तो अनुकूलित है और न उसमें विद्रोह की कोई चौंकाने वाली अनावश्यक भंगिमा ही है। ऐसा भी नहीं कि उनकी सहज साहसिकता कविताओं में अव्यक्त रह जाए। अन्तर्वस्तु को न खोने का हठ यदि कविता का आत्मिक गुण माना जाता हो तो हेमा की कविता में उसकी ख़ला नहीं।
—देवी प्रसाद मिश्र
Kamayani : Moolpath Evam Teeka
- Author Name:
Vishvambhar 'Manav'
- Book Type:

- Description: ‘कामायनी’ एक महाकाव्य है। इसकी प्रधान पात्र श्रद्धा है। काम की पुत्री होने के कारण उसका दूसरा नाम कामायनी भी है। प्रसाद जी ने इस गरिमामयी नारी को सम्मान देने के लिए ही अपने महाकाव्य का नाम ‘कामायनी’ रखा है। इसकी कथा का आधार ‘ऋग्वेद’, ‘छांदोग्य’ ‘उपनिषद्’, ‘शतपथ ब्राह्मण’ और ‘श्रीमद्भागवत’ है। घटनाओं का चयन प्रसाद ने मुख्यत: ‘शतपथ ब्राह्मण’ से किया है। उसमें मनु, श्रद्धा, इड़ा, किलात और आकुलि के नाम आए हैं। जल-प्लावन की घटना का उसमें कुछ विस्तार से वर्णन है। मनु देव-जाति में उत्पन्न होने पर भी मानवों के आदि पुरुष हैं। इसी से उनमें देवत्व और मानवत्व के सम्मिलित संस्कार पाए जाते हैं। इस पात्र की महत्ता इस बात में निहित है कि उसके माध्यम से देव-संस्कृति के विनाश के उपरान्त मानव-सभ्यता के विकास की कहानी कही गई है। ‘कामायनी’ में मनु, श्रद्धा और इड़ा, मन, हृदय और बुद्धि के प्रतीक हैं। इस दृष्टि से यह कृति अन्त:करण में वृत्तियों के विकास की गाथा भी कहती है। ‘कामायनी’ में सर्गों का नामकरण इन्हीं वृत्तियों के आधार पर हुआ है। यह मानवीय मनोविकारों का विराट रूपक है।
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