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Sipi Mein Shankhnad

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‘सीपी में शंखनाद’ की कविताओं को आधुनिक स्त्री-विमर्श में एक भारतीय हस्तक्षेप की तरह देखा जा सकता है। इन कविताओं में उस स्त्री के दुःख और संघर्ष व्यक्त हुए हैं जो परम्परा से विच्छिन्न होकर नहीं, उसमें परिवर्तन करते हुए आगे बढ़ना चाहती है, पुरुष को एक नए रूप में ढालना चाहती है, एक ऐसी इकाई के रूप में जो स्त्री होने के अर्थ को समझ सके। अपने समय, समाज और परिवेश की देखी-जानी स्थितियों को नई दृष्टि से देखने की क्षमता प्रदान करने वाली ये कविताएँ उन ​स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो पुरुष द्वारा रचे गए भेद-विभेद को अपने सूक्ष्म प्रयासों से अनहुआ कर देना चाहती हैं। इन कविताओं से पाँच वर्ष की वह बच्ची भी झाँकती है जिसकी कटोरी में चावल का पानी और उसके भाई के सामने दूध का कटोरा है, वह किशोरी भी जिसकी पढ़ाई छुड़ाकर उसे किसी पुरुष को सौंप दिया जाता है, वह वयस्क स्त्री भी जिसकी कोख को पाँचवीं बेटी को जन्म देते ही कलुषित घोषित कर दिया जाता है, वह पचास वर्षीय प्रौढ़ा भी जिसके बच्चे बूढ़ी कहकर उसका मखौल उड़ाते हैं। यह काव्य-गाथा पूछती है कि क्या स्त्री होना दोयम दर्जे का मनुष्य होना है? स्त्री-विमर्श इस कविता का आधार है लेकिन थोड़ा भिन्न रूप में। स्त्री यहाँ प्रकृति है जो पुरुष के साथ अभिन्न होकर जुड़ी है। ये कविताएँ स्त्री की उस सोच को भी स्वर देती हैं जो बदल रही है, जो पुरुष जैसी होकर नहीं बल्कि स्त्री होकर ही उस अन्याय को ग़ैर-ज़रूरी बना देती है जो बरसों से ज़ारी है।

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About the Book

‘सीपी में शंखनाद’ की कविताओं को आधुनिक स्त्री-विमर्श में एक भारतीय हस्तक्षेप की तरह देखा जा सकता है। इन कविताओं में उस स्त्री के दुःख और संघर्ष व्यक्त हुए हैं जो परम्परा से विच्छिन्न होकर नहीं, उसमें परिवर्तन करते हुए आगे बढ़ना चाहती है, पुरुष को एक नए रूप में ढालना चाहती है, एक ऐसी इकाई के रूप में जो स्त्री होने के अर्थ को समझ सके।

अपने समय, समाज और परिवेश की देखी-जानी स्थितियों को नई दृष्टि से देखने की क्षमता प्रदान करने वाली ये कविताएँ उन ​स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो पुरुष द्वारा रचे गए भेद-विभेद को अपने सूक्ष्म प्रयासों से अनहुआ कर देना चाहती हैं।

इन कविताओं से पाँच वर्ष की वह बच्ची भी झाँकती है जिसकी कटोरी में चावल का पानी और उसके भाई के सामने दूध का कटोरा है, वह किशोरी भी जिसकी पढ़ाई छुड़ाकर उसे किसी पुरुष को सौंप दिया जाता है, वह वयस्क स्त्री भी जिसकी कोख को पाँचवीं बेटी को जन्म देते ही कलुषित घोषित कर दिया जाता है, वह पचास वर्षीय प्रौढ़ा भी जिसके बच्चे बूढ़ी कहकर उसका मखौल उड़ाते हैं।

यह काव्य-गाथा पूछती है कि क्या स्त्री होना दोयम दर्जे का मनुष्य होना है? स्त्री-विमर्श इस कविता का आधार है लेकिन थोड़ा भिन्न रूप में। स्त्री यहाँ प्रकृति है जो पुरुष के साथ अभिन्न होकर जुड़ी है।

ये कविताएँ स्त्री की उस सोच को भी स्वर देती हैं जो बदल रही है, जो पुरुष जैसी होकर नहीं बल्कि स्त्री होकर ही उस अन्याय को ग़ैर-ज़रूरी बना देती है जो बरसों से ज़ारी है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2026
Weight
215 grams
ISBN-13
9789360861094
Pages
200
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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