Neend Mein Ek Gharelu Stri
Author:
Ram Kumar AatreyPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 164
₹
200
Available
Poems
ISBN: 9789381923160
Pages: 96
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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इस कविता का केन्द्रीय शब्द है ‘हिंसा’ जैसी रचना हमें दो टूक आगाह करती है कि चन्द्रकान्त का कवि–कर्म क्या है, कवि कविता से कितना–क्या चाहता है और कविता तथा जीवन में काहे से गुरेज़ नहीं करता। ‘कवियों की छुट्टी’, ‘क्षमाप्रार्थी हों कविगण’, ‘तुका और नामदेव’ तथा ‘कविता पर रहम करो’ काव्य–कला पर कविताएँ नहीं हैं बल्कि चन्द्रकान्त के आत्मालोचन और व्यापक रचनाधर्मिता को लेकर उसकी अदम्य प्रतिबद्धता को अभिव्यक्ति देती हैं। जीवन–भर पढ़ने–पढ़ाने तथा साक्षरता एवं पुस्तकालय आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी का असर उसकी करिश्मे भी दिखा सकती हैं अब किताबें और किताबों की दुकान में जैसी रचनाओं में देखा जा सकता है जो पुस्तकों की मात्र उपस्थिति से हर्षित होनेवाली हिन्दी की शायद पहली अशाले कविताएँ हैं वे पुस्तकें जिन्हें आज़ादी के बाद से उत्तरोत्तर हमारे समाज से ग़ायब करने का राष्ट्रीय षड्यंत्र अब भी जारी है। इसी तरह शिक्षकों को लेकर लिखी गई नोटबुक से (एक) तथा (दो) कविताएँ हिन्दी में कदाचित् अपने ढंग की पहली ही होंगी। ये सब चन्द्रकान्त की कविता के नए आयाम हैं।
इस पर पहले भी ध्यान गया है कि चन्द्रकान्त देवताले ने स्त्रियों को लेकर हिन्दी में शायद सबसे ज़्यादा और सबसे अच्छी कविताएँ लिखी हैं लेकिन यहाँ उनकी कुछ ऐसी रचनाएँ हैं जो माँ और आजी की दुनियाओं और स्मृतियों में जाती हैं, किन्तु वहीं तक सीमित नहीं रहतीं—वहाँ एक कैंसर–पीड़ित ज़िलाबदर औरत है, बलात्कार के बाद तीन टुकड़ों में काटकर फेंकी गई युवती है, और चन्द्रकान्त अचानक एक विलक्षण परिहास–भावना का परिचय देते हुए मध्यवर्गीय ‘बहनजी–आंटीजी’ छाप प्यारी–प्यारी महिलाओं पर औसतपन और बुद्धिमत्ता के बीच, हिदायतें देने और निगरानी रखनेवाली बीवियाँ, कन्या महाविद्यालय की मैडमों से एक प्राचार्य की बातचीत, ‘मैं आपके काम का आदमी नहीं’ और ‘नींबू माँगकर’ जैसी अनूठी कविताएँ भी लिख डालते हैं—कवयित्रियों में सिर्फ़ निर्मला गर्ग ने ऐसा किया है। देवी–वध में चन्द्रकान्त ने दुस्साहसिकता से देवी–प्रतिमाओं को डायनों और बाज़ार में बैठनेवाली औरतों में बदलते देखा है जबकि ‘बाई! दरद ले’ जैसी मार्मिक कविता में मानो कवि स्वयं उन औरतों में शामिल हो गया है जो अपनी एक सहकर्मी श्रमजीवी आसन्नप्रसवा बहन से प्रसूति–पीड़ा उपजाने को कह रही हैं।
समाज की हर करवट, उसकी तमाम क्रूरताओं और विडम्बनाओं को पहचानने वाली चन्द्रकान्त देवताले की यह प्रतिबद्ध कविताएँ दरअसल भारतीय इनसान और भारतीय राष्ट्र के प्रति बहुत गहरे, यदि स्वयं विक्षिप्त नहीं तो विक्षिप्त कर देनेवाले प्रेम से विस्फोटित कविताएँ हैं। दरअसल कबीर से लेकर आज के युवतम उल्लेख्य हिन्दी कवि–कवयित्रियों की सर्जना के केन्द्र में यह समाज और यह देश ही रहा है। यह देश को खोकर प्राप्त की गई नकली आधुनिक या उत्तर–आधुनिक कविता नहीं है, एक सार्थक देश को पाने की कोशिश की तकलीफ़देह सच्ची कविता है। चन्द्रकान्त देवताले जैसे सर्जक अपनी कविताओं के ज़रिए वही काम करते नज़र आते हैं जो 1857–1947 के बीच और उसके बाद भी सारे असली वतनपरस्तों ने किया है।
यदि चन्द्रकान्त देवताले अपनी जन्मतिथि प्रकट न करें तो उनके किसी भी नए या पुराने पाठक को उनकी यह कविताएँ पढ़कर ऐसा लगेगा कि वे अधिकतम किसी चालीस–पैंतालीस की उम्र के सर्जक की रचनाएँ हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि (हमारे कुछ दूसरे कथित वरिष्ठ कवियों की तरह) उनका विकास अवरुद्ध हो गया है या वे अपनी श्लथ रचनात्मकता के एक लम्बे हाँफते हुए पठार पर पहुँच गए हैं, बल्कि यह कि अभी भी उनकी दृष्टि, अनुभूति तथा ऊर्जा में कोई कमी या छीजन आना तो दूर, उलटे उनके तज्रिबों और निगाह का दायरा और विस्तार पाता जा रहा है। कई कवि एक ख़ास आयु तक आते–आते सहिष्णु, समझौतावादी और परलोकोन्मुख हो जाते हैं क्योंकि हमारे यहाँ एक समन्वय एवं आशीर्वाद वाली सिद्ध मुद्रा प्रौढ़ता की पराकाष्ठा मानी गई है लेकिन चन्द्रकान्त के पास यह कहने की हिम्मत है : “मैं जानता हूँ कि मर रहा हूँ/फिर भी मुझे ईश्वर की ज़रूरत नहीं/क्योंकि धरती की गन्ध और समुद्र का नमक/हमेशा मेरे साथ हैं.../जब सीढ़ियाँ चढ़ता हूँ सबके सुख–दु:ख में शामिल/तो जीवन का संग्राम मेरी धड़कनों में झपट्टे मारने लगता है/पत्थरों के इसी संगीत में मुझे/कुछ भविष्यवाणियाँ सुनाई दे रही हैं...
—विष्णु खरे
Ayachi
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Kashinath Mishra
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- Description: मनुष्य से याचना करना महापाप है। मनुष्य को केवल ईश्वर से याचना करने का अधिकार है’’ करीब 600 साल पहले मिथिला के इस दर्शन को अपने जीवन में उतारनेवाले महामहोपाध्याय श्री भवनाथ मिश्र प्रसिद्ध ‘अयाची’ के जीवन पर आधारित इस नाटक में मिथिला की ज्ञान परंपरा, सामाजिक इतिहास और भौतिक संतुष्टि के संस्कार को बेहतरीन तरीके से लिपिबद्ध किया गया है। इस नाटक का पहला संस्करण 1961 में प्रकाशित हुआ । दूसरा संस्करण आपके समक्ष है
Paaji Nazmein
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Gulzar
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Description:
ये गुलज़ार की नज़्मों का मजमूआ है जिससे हमें एक थोड़े अलग मिज़ाज के गुलज़ार को जानने का मौ$का मिलता है। बहैसियत गीतकार उन्होंने रूमान और ज़ुबान के जिस जादू से हमें नवाज़ा है, उससे भी अलग। ये नज़्में सीधे सवाल न करते हुए भी हमारे सामने सवाल छोड़ती हैं, ऐसे सवाल जिन्हें कोई ऐसा ही श$ख्स पूछ सकता है जिसे दुनिया का बहुरंगी तिलस्म अपने बस में न कर पाया हो। इन नज़्मों में $गुस्सा भी है, अपने आसपास की दुनिया के मामूलीपन से को$फ्त भी इन्हें होती है, कहीं वे अपने आसपास के लोगों की क्षुद्रताओं पर उन्हें चिकोटी काटकर मुस्कुराने लगती हैं, कहीं हल्का-सा तंज़ करके उन्हें उनकी ओढ़ी हुई ऊँचाइयों में छोटा कर देती हैं। यहाँ तक कि वे ईश्वर को भी नहीं ब$ख्शतीं। उसको कहती हैं कि ये तुम्हारे भक्त तुम्हारे ऊपर तेल भी डालते हैं और शहद भी, कितनी चिपचिपाहट होती होगी! अगर सब कुछ देख रहे तो एक बार घी से उठे धुएँ पर ज़रा छींक कर ही दिखा दो। लेकिन फिर उन्हें महसूस होता है कि दुनिया-भर की नज़्मों को जितनी ज़ुबानें आती हैं, उनमें से कोई भी उस सर्वशक्तिमान की समझ में नहीं अँटती—‘न वो गर्दन हिलाता है, न वो हँकारा भरता है’। इसलिए गुलज़ार चाँद की त$ख्ती पर $गालिब का एक शे’र लिख देते हैं कि शायद वो $फरिश्तों ही से पढ़वा ले, कि इंसान को उसकी इंसानियत में छोटा बनानेवाले वे $खुदा के चहेते ही शायद पढक़र उसे सुना दें, लेकिन अ$फसोस कि बजाय इसके वह उसे या तो धो देता है या कुतर के फाँक जाता है, यानी वो
‘$खुदा अपना’ शायद पढ़ा-लिखा भी नहीं है, अगर होता तो कम-से-कम
चिट्ठी-पत्री तो कुछ करता!
ता$कत के सबसे ऊँचे मचान पर इससे बड़ी चोट और क्या होगी!
गुलज़ार की ये नज़्में बड़बोली नहीं हैं, न अपनी $कद-काठी में और न अपनी ज़ुबान में। लेकिन वे हमें बड़बोलों की एक एंटी-थीसिस देती हैं। वे बड़ी समझदारी के साथ हमें यह हिम्मत जुटाने की दावत देती हैं कि मोबाइल की ठहरी हुई इस दुनिया में ‘पर्तिपाल’ नाम के आदमी की बरतरी को ‘पाली’ नाम के कुत्ते की कमतरी के साथ रखकर तौला जा सकता है।
Kahin Koi Darwaja
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Ashok Vajpeyi
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अशोक वाजपेयी की 2009 से 2012 के दौरान लिखी गई कविताओं का यह संग्रह फिर उनकी अथक जिजीविषा, सयानी और संयत परिवर्तनशीलता, कविता तथा शब्द की सम्भावना और सीमा को स्पष्टता और निर्भीकता से अंकित करने का सशक्त साक्ष्य है। उनका अदम्य जीवनोल्लास और उतना ही उनके अन्तर में बसा अवसाद फिर शब्द-प्रगट है।
वे अपनी लगभग अकेली और अद्वितीय राह नहीं छोड़ते। उस पर आत्मविश्वास से चलते हुए वे कई अप्रत्याशित मानवीय अभिप्राय और दृश्य उकेरते-खोजते हैं। हमारे समय में अन्तःकरण की विफलता, नागरिकों के लहू-रिसते घाव, सदियों से हिलगी हताश प्रार्थनाएँ, अपने निबिड़ शून्य में सिसकता ब्रह्मांड, चकाचौंध के फिसलन-भरे गलियारों में अनसुना विलाप आदि सभी उनकी कविता में दर्ज हैं पर यह उम्मीद भी कि कहीं कोई दरवाज़ा खुलता है। यह कविता नाउम्मीद अँधेरे से इनकार नहीं करती पर उम्मीद का दामन भी नहीं छोड़ती। यह संग्रह एक वरिष्ठ कवि की एक अधसदी से लम्बी कविता-यात्रा का एक नया और भरोसेमन्द मुकाम है।
Mat Kaato Van
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Rameshraaj
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- Description: पर्यावरण सुरक्षा को लेकर एक बेहतरीन चिंतन से युक्त बालगीत संग्रह - मत काटो वन विगत पचास वर्षों से साहित्य की सेवा में लीन सुकवि रमेशराज ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में अनवरत लिखा है। व्यंग्य, लेख, निबंध, लघुकथा, कहानी, गीत, ग़ज़ल से लेकर हाइकु, जनक छंद, रसिया, लांगुरिया, कहमुकरी, चतुष्पदी, कवित्त, घनाक्षरी, दोहे, मुक्तछंद कविताएं, तेवरी, अर्थात् हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर शास्त्रसम्मत तरीके से अपनी क़लम का जादू बिखेरा है। मौलिक प्रयोगों के अंतर्गत अनेक छंदों को तोड़कर अनेक छंदों का निर्माण किया है। लीक से हटकर दो मौलिक छंद -”नव कुंडलिया राज छंद” तथा “सर्प कुंडली राज छंद” भी छंदकाव्य में जोड़े हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी सुकवि रमेशराज ने बच्चों को संस्कारवान बनाने हेतु ढेरों बालगीत भी लिखे हैं। छह बालगीत संग्रहों के उपरांत आपका सातवां बालगीत संग्रह - “मत काटो वन” रचनाएं प्रकाशन बेंगलुरु से प्रकाशित है। इस संग्रह के समस्त बालगीत बच्चों को सामाजिक दायित्वों और पर्यावरण सुरक्षा के लिए प्रेरणा देते हैं। संग्रह के कई गीत कभी कुल्हाड़ी से तो कभी आदमी से 'न काटे जाने के प्रति' निवेदन करते हैं तो कई गीतों में बच्चे बादल का रूप धारण कर मरुथल में बरसकर धरा को हरा-भरा करने को लालायित दिखते हैं। बच्चे कभी दीन-दुखियों के प्रति करुणा का भाव प्रस्तुत करते हैं तो कभी सैरसपाटे के बाद पढ़ाई करने के लिए सजग हो उठते हैं। ये बच्चे रावण को तो जलाना चाहते हैं, किंतु उनकी दृष्टि में वह रावण है विषमता, भूख, गरीबी का रावण। इस रावण को ही वे जलाकर अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करने की ओर अग्रसर होना चाहते हैं। कुल मिलाकर “मत काटो वन” सुकवि रमेशराज के बालगीतों का ऐसा सद्यः प्रकाशित संग्रह है जो बच्चों को सदाचरण, सामाजिक दायित्वों के प्रति प्रेरित करता है। जिसके अंतर्गत बच्चे समझदार बनकर असंगतियों विकृतियों, हिंसा आदि को समाप्त करने की एक जानदार कोशिश करते है। आशा है विगत बालगीत संग्रहों की भांति यह बालगीत संग्रह - “ मत काटो वन” भी साहित्य जगत में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज़ कराएगा।
Noor Ka Dastoor Ho Tum
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description: रमेशराज का ग़ज़ल संग्रह
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