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Tootee Hui Bikharee Hui

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शमशेर के यहाँ कविता मनुष्य की सबसे अनश्वर रचना है : वह समयविद्ध होते हुए भी समयातीत है। न तो इतिहास के सबसे दयनीय शिकार तानाशाह कविता लिख सकते हैं और न ही विचारधारा की जुगाली करते गम्भीर उपदेष्टा ही। ऐतिहासिक राजनीति को परास्त करती हुई कविता भाषा की कालातीत राजनीति है। शमशेर कालातीत के कवि हैं, उनकी काँपती-सी आवाज़ हमारी दुनिया की ऐसी सिम्‍तें दिखाती है जिनके होने का पता जैसे पहली बार उससे ही चलता है पर जिन्हें जाने बिना हमारी दुनिया अधूरी और अधसमझी ही रह जाती। उनकी दुनिया टूटी हुई, बिखरी हुई है, पर अपनी सुन्दरता और अर्थमयता में मुकम्मल। उसमें टूटे-बिखरे हुए से ही अपनी सजग, पर सहज, संयमित, पर तनाव-भरी मानवीयता सहेजने और हम तक पहुँचने की संकोच और सन्देह-भरी चेष्टा है। उसमें होने का, हमारे समय में मनुष्य होने के आश्चर्य और रहस्य का अर्थ और विचार का अद्वितीय संगुम्फन है। उनकी दुनिया हमारी जानी-पहचानी दुनिया से रगड़ खाती दुनिया है, पर ऐसी संरचना भी, जिसे हम शमशेर के बनाए बिना कभी न देख पाते। लगभग आधी सदी से शमशेर अपने ही ढंग की कविता-जद पर, संकोच से, लेकिन अड़े रहे हैं। उन्होंने इस तरह जो जगह बनाई है, वह धड़कती और रौशन है। अलग, पर इतने पास अपने, वह इतिहास में है और सच्ची आत्मविश्वस्त कविता द्वारा किया गया इतिहास का अतिक्रमण भी।

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शमशेर के यहाँ कविता मनुष्य की सबसे अनश्वर रचना है : वह समयविद्ध होते हुए भी समयातीत है। न तो इतिहास के सबसे दयनीय शिकार तानाशाह कविता लिख सकते हैं और न ही विचारधारा की जुगाली करते गम्भीर उपदेष्टा ही। ऐतिहासिक राजनीति को परास्त करती हुई कविता भाषा की कालातीत राजनीति है। शमशेर कालातीत के कवि हैं, उनकी काँपती-सी आवाज़ हमारी दुनिया की ऐसी सिम्‍तें दिखाती है जिनके होने का पता जैसे पहली बार उससे ही चलता है पर जिन्हें जाने बिना हमारी दुनिया अधूरी और अधसमझी ही रह जाती। उनकी दुनिया टूटी हुई, बिखरी हुई है, पर अपनी सुन्दरता और अर्थमयता में मुकम्मल। उसमें टूटे-बिखरे हुए से ही अपनी सजग, पर सहज, संयमित, पर तनाव-भरी मानवीयता सहेजने और हम तक पहुँचने की संकोच और सन्देह-भरी चेष्टा है। उसमें होने का, हमारे समय में मनुष्य होने के आश्चर्य और रहस्य का अर्थ और विचार का अद्वितीय संगुम्फन है। उनकी दुनिया हमारी जानी-पहचानी दुनिया से रगड़ खाती दुनिया है, पर ऐसी संरचना भी, जिसे हम शमशेर के बनाए बिना कभी न देख पाते। लगभग आधी सदी से शमशेर अपने ही ढंग की कविता-जद पर, संकोच से, लेकिन अड़े रहे हैं। उन्होंने इस तरह जो जगह बनाई है, वह धड़कती और रौशन है। अलग, पर इतने पास अपने, वह इतिहास में है और सच्ची आत्मविश्वस्त कविता द्वारा किया गया इतिहास का अतिक्रमण भी।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
1990
Weight
320 grams
ISBN-13
9788171193301
Pages
168
Reading time
~6 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 21.5 cm
Language
Hindi

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