Dakkhin Tola
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अंशु मालवीय की कविताओं का विषय-व्यास अनेक दिशाओं में फैला हुआ है। यूँ तो इस संग्रह का प्राथमिक स्वर राजनैतिक विद्रूपता का है पर दीगर स्वर भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। यहाँ भँवरी देवी, शाहबानो, मिथिलेश, सगुनाबाई आदि की शोषण-गाथाएँ हैं। वे स्त्रियाँ भी हैं जो निर्जला व्रत रखकर पसीना चुआते हुए काम कर रही हैं। शोहदों के कन्धों की रगड़ झेलते हुए काम पर जा रही हैं। वे जलती औरतें हैं जो धर्म के कारखाने में दिहाड़ी मजदूर थीं। अंशु की कविताओं में ‘दक्खिन टोला’ का दैनिक जीवन, वहाँ की संस्कृति, भाषा और सुख-दुख आम जन के दुखों से अलग एक दूसरी दुनिया के लगते हैं। वहाँ से गान नहीं रुदन उठता है। भाषा का अर्थ अपभ्रंश और बोली के माने अभंग है। संस्कारों की वृहद सूची में मेहनत के अलावा कोई संस्कार नहीं है।</p> <p>ये कविताएँ बताती हैं कि साम्प्रदायिकता और राजनीति के सम्बन्ध कितने अन्तर्गुम्फित हैं। ‘कौसर बानो की अजन्मी बिटिया की ओर से’ जैसी अमानुष और कलपाती हुई कविता हो या फिर ‘खून’, ‘गाय’ और ‘यूसुफ भाई’ जैसी कविताएँ। कोई जरूरी नहीं कि हर खेल लपटों की तरह ही दिखे, वह शान्त और अनुत्तेजक भी हो सकता है। ‘न कोई वीभत्स मुखौटा न नाखून, न खून के धब्बे... बस कोई दोस्त आपसे पूछ लेगा, तुम्हारा मजहब क्या है? और आपकी रीढ़ बर्फ की तरह ठंडी हो जाएगी।’ तुलसीदास का अपनी चौपाइयों, दोहों को नारा हो जाते देखना, एक पेड़ का वह एहसास है जो अपनी लकड़ियों से सलीब बनते देख रहा है।</p> <p>प्रेम और पारिवारिकता की इस संग्रह में भरपूर समाई हुई है। असमय चले गए पिता से कविता और राजनीति पर बहस करने की अपूर्ण इच्छा है। माँ-पिता के प्रणय पलों की सात्विकता है। वह गेहुँआ आलस्य है जो माँ बनने की प्रक्रिया में स्त्री देह पर छा जाता है। अंशु की कविता का यह एक छोर है, दूसरे छोर पर हो ची मिन्ह की दाढ़ी है जिसे वे वियतनाम के जंगल कहते हैं जिनमें साम्राज्यवादियों के सपने भटक जाते थे। अंशु मालवीय अपनी कर्मशील रचना-यात्रा में आज एक समादृत कवि के रूप में हमारे सामने हैं। खुशी की बात है कि वर्षों से अनुपलब्ध अंशु का ये चर्चित कविता-संग्रह पाठकों के बीच कविता के उसी तेवर के साथ दोबारा उपस्थित है जिसकी कमी की बात बार-बार की जाती रही है। </p> <p>—हरीश चन्द्र पाण्डे
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अंशु मालवीय की कविताओं का विषय-व्यास अनेक दिशाओं में फैला हुआ है। यूँ तो इस संग्रह का प्राथमिक स्वर राजनैतिक विद्रूपता का है पर दीगर स्वर भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। यहाँ भँवरी देवी, शाहबानो, मिथिलेश, सगुनाबाई आदि की शोषण-गाथाएँ हैं। वे स्त्रियाँ भी हैं जो निर्जला व्रत रखकर पसीना चुआते हुए काम कर रही हैं। शोहदों के कन्धों की रगड़ झेलते हुए काम पर जा रही हैं। वे जलती औरतें हैं जो धर्म के कारखाने में दिहाड़ी मजदूर थीं। अंशु की कविताओं में ‘दक्खिन टोला’ का दैनिक जीवन, वहाँ की संस्कृति, भाषा और सुख-दुख आम जन के दुखों से अलग एक दूसरी दुनिया के लगते हैं। वहाँ से गान नहीं रुदन उठता है। भाषा का अर्थ अपभ्रंश और बोली के माने अभंग है। संस्कारों की वृहद सूची में मेहनत के अलावा कोई संस्कार नहीं है।</p>
<p>ये कविताएँ बताती हैं कि साम्प्रदायिकता और राजनीति के सम्बन्ध कितने अन्तर्गुम्फित हैं। ‘कौसर बानो की अजन्मी बिटिया की ओर से’ जैसी अमानुष और कलपाती हुई कविता हो या फिर ‘खून’, ‘गाय’ और ‘यूसुफ भाई’ जैसी कविताएँ। कोई जरूरी नहीं कि हर खेल लपटों की तरह ही दिखे, वह शान्त और अनुत्तेजक भी हो सकता है। ‘न कोई वीभत्स मुखौटा न नाखून, न खून के धब्बे... बस कोई दोस्त आपसे पूछ लेगा, तुम्हारा मजहब क्या है? और आपकी रीढ़ बर्फ की तरह ठंडी हो जाएगी।’ तुलसीदास का अपनी चौपाइयों, दोहों को नारा हो जाते देखना, एक पेड़ का वह एहसास है जो अपनी लकड़ियों से सलीब बनते देख रहा है।</p>
<p>प्रेम और पारिवारिकता की इस संग्रह में भरपूर समाई हुई है। असमय चले गए पिता से कविता और राजनीति पर बहस करने की अपूर्ण इच्छा है। माँ-पिता के प्रणय पलों की सात्विकता है। वह गेहुँआ आलस्य है जो माँ बनने की प्रक्रिया में स्त्री देह पर छा जाता है। अंशु की कविता का यह एक छोर है, दूसरे छोर पर हो ची मिन्ह की दाढ़ी है जिसे वे वियतनाम के जंगल कहते हैं जिनमें साम्राज्यवादियों के सपने भटक जाते थे। अंशु मालवीय अपनी कर्मशील रचना-यात्रा में आज एक समादृत कवि के रूप में हमारे सामने हैं। खुशी की बात है कि वर्षों से अनुपलब्ध अंशु का ये चर्चित कविता-संग्रह पाठकों के बीच कविता के उसी तेवर के साथ दोबारा उपस्थित है जिसकी कमी की बात बार-बार की जाती रही है। </p>
<p>—हरीश चन्द्र पाण्डे
Book Details
-
ISBN9788119996094
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारतीय कविता के शीर्षस्थ प्रतिनिधि सितांशु यशश्चन्द्र की मूल गुजराती कविताओं को हिन्दी अनुवाद में पढ़ते हुए लगता है कि हमारी कविता वास्तव में विश्व कविता को एक नया आयाम एवं स्वर दे रही है जो अतिआधुनिक भाव-संवेदन का संवहन करती हुई भी ठेठ भारतीय मिथकों और पौराणिक भूमि में मूलबद्ध है। सितांशु यशश्चन्द्र आज के मनुष्य और जीवन का संधान करते हुए सुदूर अतीत में जाते हैं और उन सर्वनिष्ठ तत्त्वों का उत्खनन करते हैं जो जटायु से लेकर इब्राहीम रुगोवा तक व्याप्त है। और ये तत्त्व हैं जिजीविषा, जीने की लालसा और संघर्ष का अपार ताब और सतत प्रतिरोध जिसके दो उज्ज्वल प्रतिनिधि हैं पौराणिक जटायु और समकालीन रुगोवा और इनके मध्य अनेकानेक स्त्री-पुरुष, नदी-पहाड़ और समस्त ब्रह्मांड—‘मगरमच्छों को मरने न देना नदी/तुम्हारे जल को जीवित रखने का अब कोई और उपाय बचा नहीं है’ तथा 'पूस की रात को बिना चुनौती दिये यूँ जीतने नहीं देना है'।
यह एक भयानक लोक है जहाँ ‘नदी के पास पानी भी नहीं जिसे कहा जा सके सचमुच पानी’ और जहाँ बड़वानल के उजियारे में दिखता है पानी, जहाँ ‘हवा को जलाने वाली बिजली गिरती है’। सितांशु जी ने हमारे समय की त्रासदी और विद्रूप को अत्यन्त तीव्र एवं अप्रत्याशित बिम्बों में पुंजीभूत किया है—‘वहाँ उस तरफ पानी में से उठाई गई बगुले की चोंच में/तड़पती मछलियाँ/कुछ ही पलों में बगुलों के पंखों की सफेदी में बदल जाएँगी’। स्थिति की भयावहता का हिला देने वाला बिम्ब है—‘हरे पेड़ को देखकर लगता है/कि यह सूख गया होता तो कुछ ईंधन मिलता/ऐसा समय है यह’। और इस समय की शिनाख्त के लिए कवि पास की मलिन बस्ती से लेकर चे गेवारा, हो ची मिन्ह और यूसुफ मेहरअली तक जाता है। वह एक ऐसा कवि है जो ‘बिना ढक्कन की कलम’ लिए पूरी पृथ्वी पर चलता जा रहा है ताकि तत्काल हर हरकत, हर जुंबिश को दर्ज किया जा सके। यहाँ पूर्वज भी हैं, परदादा, परदादी, पत्नी, बेटा, बेटी विपाशा, गाय, जीव-जन्तु और ‘सारा का सारा ब्रह्मांड एकदम सटा हुआ सा’—‘तारा-पगडंडियाँ’ और ‘ऐसी रोशनी जो अँधेरे की चमड़ी छीलकर रख देती है’। सितांशु यशश्चन्द्र ब्रह्मांड-बोध के कवि हैं जिसकी चरम अभिव्यक्ति ‘महाभोज’, ‘तारे’ और ‘लगभग सटकर’ सरीखी कविताओं में होती है जब लगता है कि ‘इस स्वर लीला में धीरे-धीरे मैं अपनी मानव भाषा भूलता जा रहा हूँ’। इस खगोलीय प्रसार के बावजूद, स्मृति के अर्णव-प्रसार के बावजूद यहाँ हर वस्तु की निजता और विलक्षणता स्थापित और समादृत है जिसका एक उदाहरण ‘हर चीज दो, दो’ है। यह बेहद नाजुक और मसृण संवेदों की कविता है। सितांशु जी सूक्ष्म और विराट दोनों को एक साथ देख सकते हैं यहाँ छोटा से छोटा कम्पन भी समस्त ब्रह्मांड की अभिव्यक्ति है और हर घटना का प्रभाव-प्रसार आकाश-गंगा तक।
यह न तो निचाट वक्तव्यों की कविता है न अवरयथार्थवादी मुद्राओं की। भारतीय काव्य की परम्परा में यह उपमाओं, रूपकों और बिम्बों के माध्यम से हर आम और खास को सम्बोधित है। क्योंकि गांधी जी का आग्रह था कि खेतों में काम करने वाले, कुएँ से पानी खींचने वाले कोशिया मजदूर भी समझ सकें ऐसी कविता लिखनी चाहिए; यह कवि के सौन्दर्यशास्त्र का एक मूल संकल्प है। इसीलिए यह गहरे राजनैतिक आशयों की भी कविता है। पूरे संग्रह में अनवरत बेचैनी और छटपटाहट है और स्वाधीनता के लिए संघर्ष। ये कविताएँ अनुभवों को केवल प्रकाशित ही नहीं करतीं, बल्कि विश्लेषित करते हुए एक तार्किक उपसंहार तक ले जाने का उद्यम करती हैं। सम्भवत: यही कारण है कि इस कविता की गति सर्पिल और कई बार तो वलयाकार है, भावों-विचारों का ऐसा गुम्फन जो पाठक को भी अपने भँवर में खींच लेता है—
मेरी कविता जैसी दूसरी कोई जगह
मेरे पास कहीं बची नहीं रह गई
जहाँ मतभेद या मनमेल को लेकर
खुलकर बात हो सके
सितांशु यशश्चन्द्र की कविता ऐसी ही सार्वजनिक जगह है—उदार, प्रशस्त और निर्बन्ध। और साथ ही नितान्त निजी और एकान्त। शायद इसीलिए ‘मुझे इसके घर में घर जैसा लगता है’।
—अरुण कमल
Dharati Aaba Birsa Munda
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- Description: बिरसा मुंडा का दृष्टांत बना व्यक्तित्व सहज ही प्रेरित और प्रभावित करता है। इस व्यक्तित्व, इसकी क्रांतिधर्मी चेतना और संघर्षों की प्रेरणा नाटक विधा में उतर कर दूरगामी प्रभाव रच सकती है। बिरसा मुंडा के जीवन की प्रमुख घटनाओं पर आधारित रंगकर्मी जयदेव दास द्वारा रचित नाटक ‘धरती आबा-बिरसा मुंडा’ एक ऐतिहासिक क्रांतिकारी चरित्र को उसकी पूरी संघर्षशीलता के साथ सामने लाता है। ‘धरती आबा’ यानी धरती का पिता-बिरसा मुंडा को यह समान सहज ही प्राप्त नहीं हुआ। अंग्रेजों की आदिवासी विरोधी आर्थिक नीतियों के विरुद्ध लामबंद होने और ब्रिटिश साम्राय की सामंतशाही के तमाम उत्पीन झेलने के साथ आदिवासी और स्त्री केंद्रित मुद्दों के प्रति व्यापक समाज में अपनी अस्मिता की लाई को धारदार बनाने का काम बिरसा मुंडा ने किया। जिसके लिए अन्यायी शासन ने उन्हें कैद किया और धोखे से पककर जहर देकर मौत के घाट उतारा। निश्चय ही एक अति पठनीय नाटक।
Main Shayar Badnaam
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- Description: Awating description for this book
Koltar ke Pair
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- Description: कविता सिर्फ बिंबों में नहीं रहती और न ही उस अर्थ में जो अंत में बस एक बात बोलता नज़र आता है। असली कविता तो वही है जो शब्दों के सार्थक समूह की यात्रा में अपने शीतल जल, तरल रंग या गर्म कोलतार की तरह बहती है। यह बहना दरअसल, उन शब्दों के बीच उसका सदा के लिए इस तरह रहना है कि पढ़ती हुई आँखों का स्पर्श उसे जगा दे। पल्लवी शर्मा संग्रह की पहली ही कविता में इस अंतर्धारा की उपस्थिति और इसकी अमोघ प्रभविष्णुता को न्योतती चेतावनी की तरह परोसती हैं, और जब आप आगे बढ़ते हैं तो वह संसार पीछे छूट जाता है जहाँ सामयिक यथार्थ और उसके अखबारी बोल बसते हैं। 'कोलतार के पैर' की कविताएँ आपको क्लोज़ अप के अनोखे चित्रकार जार्जिया ओ कीफ के द्वारा चित्रित कंकाल से सरककर निकलती जीवित जीभ जैसी अनुभूति से आपके आधे-अधूरे मन को मिलवाती हैं। इस संग्रह की कविताओं में यथार्थ तो है मगर उसे खर्चीले विवरणों की जगह उस स्पर्श के रूप में चित्रित किया गया है जो संवेदना को लगभग वह सब बता देता है जो विवरण बताते। लेकिन ऐसा भी नहीं कि पल्लवी में दृश्य नहीं। यहाँ दृश्य भी हैं मगर चित्रों की तरह कभी रूपांतरित तो कभी संघनित और कभी अमूर्त। कवि की चेतना का हाल यह कि 'जैसे एक चित्र खींचा हो किसी ने/और मैं उसका हिस्सा हूँ!' इस संग्रह की कविताएँ आपको रंगों और रेखाओं की दुनिया में ले जाती हैं। तरह-तरह की बातें करते तरह-तरह के रंग! चटख से लेकर मोनोक्रोम और कोलतार और कालिख तक। यह अकारण नहीं कि संग्रह में बिंदियों से चित्र बनाने की अनोखी शैली के लिए प्रसिद्ध यायोई कुसामा की मानसिक रुग्णता को उसी की बिंदियों से चित्रित किया गया है। —विनय कुमार
Muddled Muff's Musings
- Author Name:
D. V. Gundappa +1
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- Description: Mankutimmana Kagga (rendered in English as Muddled Muff's Musings) is a collection of sprightly yet profound verses that explore concepts such as the meaning of life, truth, and beauty. Mankutimmana Kagga, also known in English as Muddled Muff's Musings, is a collection of lively yet profound verses that explore concepts such as the meaning of life, truth, beauty, happiness, and the human experience. This literary classic has gained immense popularity among both scholarly and general audiences. Its gentle, non-preachy, and self-deprecating tone has endeared it to generations of readers since its first publication in 1943. It has rightfully earned the affectionate titles of "Kannada Bhagavad Gita" and "Gundopanishad," presenting happiness, the human experience, and related themes in an intimate and relatable manner. It is a literary classic that has enjoyed immense popularity among both erudite scholars and the general public. Its gentle, non-preachy, and self-deprecatory tone has endeared it to generations of readers since its first publication in 1943. It has deservedly garnered love and regard as "Kannada Bhagavad Gita" and "Gundopanishad."
Sadho ! Jag Baurana
- Author Name:
Mukesh Kumar
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मुकेश कुमार टेलीविज़न की दुनिया का एक जाना-माना नाम है। साहित्य से जुड़े तमाम लोग उन्हें दूरदर्शन पर डॉ. नामवर सिंह के साथ पुस्तक चर्चा के अत्यन्त चर्चित कार्यक्रम ‘सुबह-सवेरे’ के माध्यम से, ‘हंस’ में पिछले आठ सालों से प्रकाशित उनके स्तम्भ ‘कसौटी’ के कारण तथा कई टेलीविज़न चैनलों को शुरू करके उन्हें सफल बनानेवाले एंकर के रूप में भी जानते-समझते रहे हैं। लेकिन उनके बहुविध व्यक्तित्व के बहुत से पहलू लोगों से अभी तक क़रीब-क़रीब छिपे हुए रहे हैं जिनमें उनका व्यंग्यकार, कथाकार तथा कवि रूप भी शामिल है।
टेलीविज़न की दुनिया में रहकर अपने परिवार तक के लिए समय निकाल पाना मुश्किल हो जाता है और हड़बड़ी की इस दुनिया में अपनी संवेदनाएँ बचाना प्राय: असम्भव ही होता है। अत: आश्चर्य होता है कि इस दुनिया में लगातार रहकर ख़ासकर कविता के लिए समय उन्होंने कैसे और कहाँ से निकाल लिया होगा? और यों ही अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए कविता के नाम पर कुछ भी लिख देना तो सम्भव या आसान है मगर कविता के आधुनिक मुहावरे को समझते हुए अपने पेशेवर काम से एक बिलकुल ही अलग दुनिया रच देना अगर असम्भव नहीं तो बेहद मुश्किल और जटिल है।
मुकेश की विशेषता सिर्फ़ यह नहीं है कि वे कविताएँ लिखते हैं, यह भी है जैसा कि ऊपर कहा गया, वे इसमें संवेदनाओं की एक अलग दुनिया रचते हैं। यह दुनिया दैनिक और हर घंटे या हर दस मिनट बाद टीवी के पर्दे पर आनेवाली ज़्यादातर सतही और कामचलाऊ ख़बरों और उनके विश्लेषण की दुनिया से बिलकुल ही अलग है। इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठकों को याद ही नहीं आएगा कि यह वही मुकेश हैं जिन्हें रात के समय समाचारों का कोई कार्यक्रम प्रस्तुत करते हमने-आपने देखा है, हालाँकि वहाँ भी उनका तीखापन कहीं खोता नहीं जैसे कि ‘हंस’ के उनके स्तम्भ में भी यह बेधड़क ढंग से व्यक्त होता है। इन कविताओं में से कम कविताओं में ही आज की राजनीति से सीधे-सीधे रूप से कवि वाबस्ता है। ये कविताएँ उनके कोमल और लड़ाकू दोनों पक्षों को एक साथ उजागर करती हैं। वे चाँद की बात इनमें करते हैं, साथ ही समुद्र की, नदियों की, स्मृतियों की, साँकल की (जो जीवन से प्राय: खो चुकी है), प्यार की, अपने और बच्चों के बचपन की, आत्मनिर्वासन की और ऐसी ही कई-कई बातें करते हैं। वे कई ताज़े टटके बिम्ब रचते हैं। दूज का चाँद उन्हें बिना मूठ का हँसिया नज़र आता है जो तारों की फ़सल काटने के काम आता है। इन कविताओं में नदी अपनी आत्मकथा लिखती पाई जाती है। इनमें कवि स्मृतियों के घर में रहता हुआ पाया जाता है। और मुकेश यह सारा काम टेलीविज़न की अत्यन्त शब्दस्फीत दुनिया से अलग पर्याप्त भाषा संयम से करते हैं।
उनकी कविताएँ छोटी हैं, स्पष्ट हैं और लगभग उतने ही शब्दों का इस्तेमाल करती हैं जितने का प्रयोग करना अनिवार्य है और यह अनुशासन हासिल करना आसान नहीं है। कई नामी कवि बेहद शब्दस्फीत हैं। उनमें कहीं-कहीं एक गहरा आक्रोश भी है तो कहीं एक गहरा आत्मविश्वास भी, इसलिए कितना भी घना क्यों न हो अँधेरा जितना जान पड़ता है उतना घना नहीं होता अँधेरा। और ऐसे आत्मविश्वास का अर्थ तब ज़्यादा है जब कवि को पता है कि—जिन्हें पूजा हो गए पत्थर, पूजते-पूजते लोग भी हो गए पत्थर, देवता भी पत्थर, पुजारी भी पत्थर, सब पत्थर पत्थर ही पत्थर। जब सब तरफ़ पत्थर ही पत्थर हों, हमारे आदर्श देवता और पुजारी तक जब पत्थर हो चुके हों, तब रचने की चुनौती ज़्यादा गम्भीर है क्योंकि रचना के स्रोत भी पथरा चुके हैं। ऐसे कठिन समय में सरल-आत्मीय कविताएँ रचनेवाले मुकेश कुमार के इस संग्रह की तरफ़ आशा है सबका ध्यान जाएगा, हालाँकि स्थितियाँ साहित्य से जुड़े लोगों के भी पथरा जाने की हैं।
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