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आज के दौर में कई रिश्ते बदल गए हैं। मानवीय रिश्ते ही नहीं, रोटी और भूख के रिश्ते भी—तन और वस्त्र के रिश्ते भी—इंसान और समाज के रिश्ते भी। इन रिश्तों में शून्यता का एहसास मानव जीवन के लिए बहुत बड़ी त्रासदी है। इन्हीं शून्यता और सन्नाटे को ही तो कवि शब्द देता है तब काव्य के रूप में वह हमें उन पहलुओं से साक्षात्कार का मौक़ा देता जो हमारी दृष्टि ही नहीं कल्पना से भी ओझल होता है। रश्मि गुप्ता के यहाँ संवेदना का यही रंग हावी है जिसको उन्होंने सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर ढाला है।</p> <p>‘सिर्फ़ तुम’ की कवयित्री का यह पहला काव्य-संग्रह भी इस बात के साक्ष्य के लिए काफ़ी है कि नींद के आलम में अचेतन जिस तरह बिम्बों, इशारों और मवाद का तालमेल से सपने बुनता है रश्मि के यहाँ वही काम रचनात्मक क्रिया के दौरान चेतना अंजाम देती है।
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आज के दौर में कई रिश्ते बदल गए हैं। मानवीय रिश्ते ही नहीं, रोटी और भूख के रिश्ते भी—तन और वस्त्र के रिश्ते भी—इंसान और समाज के रिश्ते भी। इन रिश्तों में शून्यता का एहसास मानव जीवन के लिए बहुत बड़ी त्रासदी है। इन्हीं शून्यता और सन्नाटे को ही तो कवि शब्द देता है तब काव्य के रूप में वह हमें उन पहलुओं से साक्षात्कार का मौक़ा देता जो हमारी दृष्टि ही नहीं कल्पना से भी ओझल होता है। रश्मि गुप्ता के यहाँ संवेदना का यही रंग हावी है जिसको उन्होंने सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर ढाला है।</p>
<p>‘सिर्फ़ तुम’ की कवयित्री का यह पहला काव्य-संग्रह भी इस बात के साक्ष्य के लिए काफ़ी है कि नींद के आलम में अचेतन जिस तरह बिम्बों, इशारों और मवाद का तालमेल से सपने बुनता है रश्मि के यहाँ वही काम रचनात्मक क्रिया के दौरान चेतना अंजाम देती है।
Book Details
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ISBN9788119092116
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Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: पूजी द्वारा विकासक रूप मे प्रतिपादित बाजारवाद, सबकिछु केँ 'पसार' बना देलकए। प्रशासन, न्याय, वित्त, सूचना, स्वास्थ्य, शिक्षा... सबकिछु बाजार नियंत्रित होइत मनुखक विसंगति केँ ओहि स्तर तक ल' गेलए जे सांस्कृतिक परिचिति पर्यंत विलोपित भ' जाए। अही मर्मांतक पीड़ा सँ आप्लावित अछि ई कविता संग्रह 'अथातो काव्य जिज्ञासा'। कविता बिडंबनापूर्ण परिवेशक प्रतिपक्षी अछि, चिंतित अछि आ अस्तित्वक प्रश्न सँ पाठक केँ आविष्ट करै अछि, सोचबाक लेल, सक्रिय हेबाक लेल उत्प्रेरित करै अछि। पूजी, बाजार आ साम्राज्यवादक वर्चस्व हमर भाषा, हमर संस्कृति, हमर सर्वस्व विश्व मानवीय दृष्टिकोणक संग कविता, मनुष्यताक उत्कर्षक लेल प्रतिबद्ध अछि, बिना कोनो संशय-ओझरौनी के बेस स्पष्ट बिम्ब मे मुखर अछि, सत्यक साक्षात्कार लेल तत्पर अछि। ..... लोकक पेट पर मारैत लात नित नव-नव सिद्धांत आ विज्ञापनक भरमार। सामयिक, असत्य आ अन्यायक बलधकेल अधिनायकवादी सत्ताक पिशाची-नर्तनक काल मे, कविता अपन कर्तव्य सँ संपृक्त अछि, आशा आ विश्वासक संग अडिग अछि। मुदा नागरिक वीर देश केर एखनहु बरूदक ढेरी पर कविताक संग विहुँसि खेलाइछ। एक अग्निजीवी कविक लेल इएह ने काव्य-स्वभाव, कविता-प्रवृत्ति छी! —कुणाल (कवि-रंगकर्मी)
Adhoora Koi Nahin
- Author Name:
R. Anuradha
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Description:
यह 1998 का साल था, जब आर. अनुराधा को पता चला कि उन्हें स्तन कैंसर है। उन दिनों कैंसर आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा डरावना था। लेकिन अनुराधा ने बड़े हौसले के साथ इस बीमारी का सामना किया। हँसते हुए, घूमते हुए, दोस्तों से फ़ोन पर बतियाते हुए, पढ़ते हुए, लिखते हुए, इन सबके बीच कीमोथेरेपी के कई यंत्रणादायी दौर झेलते हुए, अपने बाल झड़ते देखते हुए, अपनी कमज़ोर पड़ती प्रतिरोधक क्षमता को महसूस करते हुए। सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के बाद अन्तत: वे इन सबसे उबरीं। लेकिन इस दौर में हासिल अनुभव पर उन्होंने एक किताब लिखी—‘इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी’।
2005 के शुरू में जामिया मिल्लिया के कुछ छात्रों ने अनुराधा पर एक फ़िल्म बनाई—‘भोर’। पूरी फ़िल्म में अनुराधा की आवाज़ के अलावा कोई वायस ओवर नहीं है। फ़िल्म में अनुराधा बताती हैं—कैंसर के ख़िलाफ़ जंग में शरीर एक मैदान होता है, लेकिन यह लड़ाई बहुत सारे लोगों की मदद से जीती जाती है। घर-परिवार, दोस्त-रिश्तेदार इस युद्ध में ज़रूरी रसद पहुँचाने का काम करते हैं। जब यह फ़िल्म बन ही रही थी कि अनुराधा को दुबारा कैंसर ने घेर लिया। फिर वही कीमोथेरेपी, सर्जरी, रेडियोथेरेपी वही सब कुछ और वही हिम्मत—अनुराधा ने इस दौरान भी फ़िल्म शूट करने की इजाज़त दी।
जैसा कि दोस्तों को भरोसा था, अनुराधा यह जंग भी जीतकर निकलीं। इस दौरान उन्होंने कैंसर के डर के ख़िलाफ़ एक पूरी लड़ाई छेड़ी। कैंसर की जद में आई दूसरी महिलाओं से जुड़ीं, यह समझाती रहीं कि कैंसर से लड़ा जा सकता है और बताती रहीं कि कैसे लड़ा जा सकता है.
साल 2012 में अनुराधा को फिर से कैंसर ने घेर लिया। इस बार उसने उनकी हड्डियों पर हमला किया है। हमेशा की तरह अनुराधा लड़ती रहीं. हमेशा की तरह. और इस बार उन्होंने बहुत सारी कविताएँ लिखीं।
मैं क़तई नहीं चाहूँगा कि आप इन कविताओं को किसी सहानुभूति के साथ पढ़ें। अनुराधा को ऐसी सहानुभूति नहीं चाहिए। वह हममें से कई लोगों से ज़्यादा स्वस्थ और मज़बूत बनी रहीं। हाँ, इन कविताओं के आस्वाद के लिए ज़रूरी है कि इन्हें कलावादी आग्रहों के जंजाल से बाहर निकलकर संवेदनशीलता से पढ़ा जाए। वैसे भी ये सिर्फ़ निजी तकलीफ़ की कविताएँ नहीं हैं, ये दर्द और मृत्यु के विरुद्ध मनुष्य के साझा युद्ध की कविताएँ हैं।
—प्रियदर्शन
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