Kavita Ka Amar Phal
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लीलाधर जगूड़ी का मानना है कि कविता ने जैसे पहले अपने लिए गद्य को पद्य का रूप दिया उसी तरह आधुनिक समय में कविता को एक नए गद्य की ज़रूरत है जो पद्य की सरसता को एक नया रूप-विधान दे सके। 'कविता का अमर फल' जगूड़ी का आधुनिक लोकगाथाओं जैसा संग्रह है। समय और स्मृति एक-दूसरे के अविभाज्य रूप बन जाते हैं। लगता है कि स्मृति ही समय है। वही घटनाओं के अंश सँभाले हुए है। ऋतुओं और वनस्पतियों का फिर से आ जाना पृथ्वी और ब्रह्मांड की स्मृति का वार्षिक पुनर्जन्म है। कभी-कभी इनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि नए जितनी पुरानी कोई दूसरी चीज़ नहीं होती। कोई भी आविष्कार अपने स्थापित स्वरूप में परिष्कार का ही काम करता है। इनकी कविता पढ़ते हुए भाषा के अनेक रूपाकार उभारने की रचनात्मक शक्ति पाठक को प्राप्त होती है। भर्तृहरि इन कविताओं की प्रेरणा के मूल में हैं। उस महान कवि ने कविता को कैसे सम्भव किया। बहुत प्रकार के बादल रहते हैं आसमान में, कुछ तो सृष्टि को भिगो देते हैं और कुछ बेकार ही गरजकर चले जाते हैं। इसी तरह काव्यानुभव भी सब एक तरह के नहीं होते। कुछ तो अपना शिल्प और गल्प भी लेकर आते हैं। जगूड़ी की कविताओं को ज़िन्दगी रक्त की भाषा में हवा, पानी और आग के मिट्टी में डाले जानेवाले बीज की तरह समेटे रहती है। वह सपनों के कर्म को शब्दों के मर्म में ढाल देती है। इन कविताओं के हर शब्द में अनुभव का रक्त बजता है जो स्याही से लिखे शब्दों में अपने अर्थ की अरुणाई फैला देते है
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लीलाधर जगूड़ी का मानना है कि कविता ने जैसे पहले अपने लिए गद्य को पद्य का रूप दिया उसी तरह आधुनिक समय में कविता को एक नए गद्य की ज़रूरत है जो पद्य की सरसता को एक नया रूप-विधान दे सके।
'कविता का अमर फल' जगूड़ी का आधुनिक लोकगाथाओं जैसा संग्रह है। समय और स्मृति एक-दूसरे के अविभाज्य रूप बन जाते हैं। लगता है कि स्मृति ही समय है। वही घटनाओं के अंश सँभाले हुए है। ऋतुओं और वनस्पतियों का फिर से आ जाना पृथ्वी और ब्रह्मांड की स्मृति का वार्षिक पुनर्जन्म है। कभी-कभी इनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि नए जितनी पुरानी कोई दूसरी चीज़ नहीं होती। कोई भी आविष्कार अपने स्थापित स्वरूप में परिष्कार का ही काम करता है। इनकी कविता पढ़ते हुए भाषा के अनेक रूपाकार उभारने की रचनात्मक शक्ति पाठक को प्राप्त होती है।
भर्तृहरि इन कविताओं की प्रेरणा के मूल में हैं। उस महान कवि ने कविता को कैसे सम्भव किया। बहुत प्रकार के बादल रहते हैं आसमान में, कुछ तो सृष्टि को भिगो देते हैं और कुछ बेकार ही गरजकर चले जाते हैं। इसी तरह काव्यानुभव भी सब एक तरह के नहीं होते। कुछ तो अपना शिल्प और गल्प भी लेकर आते हैं।
जगूड़ी की कविताओं को ज़िन्दगी रक्त की भाषा में हवा, पानी और आग के मिट्टी में डाले जानेवाले बीज की तरह समेटे रहती है। वह सपनों के कर्म को शब्दों के मर्म में ढाल देती है। इन कविताओं के हर शब्द में अनुभव का रक्त बजता है जो स्याही से लिखे शब्दों में अपने अर्थ की अरुणाई फैला देते है
Book Details
-
ISBN9789389598155
-
Pages150
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रस्तुत पुस्तक पाठकों के सामने है। इसमें सभी तरह की कविताओं का समावेश है; कुछ नवीन प्रयत्न भी। सुविधा के लिए प्रत्येक पद्य के नीचे रचना-काल दे दिया है। यदि 'गुंजन' मेरे पाठकों का मनोरंजन कर सका, तो मुझे प्रसन्नता होगी, न कर सका तो आश्चर्य न होगा, यह मेरे प्राणों की उन्मन गुंजन मात्र है। ‘मेंहदी’ में दूसरे वर्ण पर स्वरपात मधुर लगता है। तब यह शब्द चार ही मात्राओं का रह जाता है, जैसा कि साधारणत: उच्चरित भी होता है। प्रिय प्रियाऽह्लाद से 'प्रिय प्रि'-'आह्लाद' अच्छा लगता है। इस प्रकार की स्वतंत्रता मैंने कहीं-कहीं ली है। ‘अनिर्वचनीय’ के स्थान पर ‘अनिर्वच’, ‘हरसिंगार’ के स्थान पर ‘सिंगार’ आदि। ‘पल्लव’ की कविताओं में मुझे ‘सा’ के बाहुल्य ने लुभाया था। ‘गुंजन’ में ‘र’ की पुनरुक्ति का मोह मैं नहीं छोड़ सका। ‘सा’ से, जो मेरी वाणी का संवादी स्वर एकदम ‘रे’ हो गया है, यह उन्नति का क्रम संगीत-प्रेमी पाठकों को खटकेगा नहीं, ऐसा मुझे विश्वास है।
—सुमित्रानंदन पंत
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Rekhta ke Daag
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- Description: "रेख़्ता क्लासिक्स" सीरीज़ उर्दू के क्लासिकी शायरों के प्रतिनिधि शायरी को नए पाठकों तक पहुँचाने के एक अनूठा प्रयास है। प्रस्तुत किताब में दाग़ देहलवी की प्रतिनिधि शायरी है जिसका संकलन फ़रहत एहसास साहब ने किया है।
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