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इधर दो वर्षों से नवीन तारकों के सदृश जितने कवि हिन्दी के काव्याकाश में चमकते हुए दीख पड़े, सौन्दर्य के सुख-स्पर्श आदी से जिन्होंने मन को वशीभूत कर लिया तथा प्रकाश और दृष्टि दी, श्री गोपाल सिंह नेपाली उन्हीं में से एक हैं। मुझे उनके काव्य में शक्ति, प्रवाह, सौन्दर्य-बोध तथा चारु चित्रण एक विशेषता लिये हुए दीख पड़े।...उनमें साहित्य की एक प्रखर प्यास है, जिसके बुझने पर उनकी जाति तथा साहित्य का कल्याण निर्भर है।</p> <p>—सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’</p> <p>गोपाल सिंह ‘नेपाली’ की सरस्वती स्नेह, सहृदयता और सौन्दर्य की सजीव प्रतिमा है।</p> <p>—सुमित्रानन्दन पन्त</p> <p>श्री गोपाल सिंह नेपाली’ हमारे रस सिद्ध कवि और जनता के हृदयहार।</p> <p>—रामधारी सिंह ‘दिनकर’</p> <p>गोपाल सिंह ‘नेपाली’ ...हिन्दी भारती की वीणा का एक तार...प्रवाह समता, भाषा की सरलता, भावों की रागात्मकता उनकी हर रचना में देखी जा सकती है। हिन्दी कविता को जनमानस तक पहुँचाने में उनका अद्वितीय योगदान है।</p> <p>—हरिवंशराय बच्चन</p> <p>नेपाली जी की रचनाओं में सहजता और व्यंजना का अद्भुत संयोग देखने को मिलता है।</p> <p>—नरेन्द्र शर्मा
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इधर दो वर्षों से नवीन तारकों के सदृश जितने कवि हिन्दी के काव्याकाश में चमकते हुए दीख पड़े, सौन्दर्य के सुख-स्पर्श आदी से जिन्होंने मन को वशीभूत कर लिया तथा प्रकाश और दृष्टि दी, श्री गोपाल सिंह नेपाली उन्हीं में से एक हैं। मुझे उनके काव्य में शक्ति, प्रवाह, सौन्दर्य-बोध तथा चारु चित्रण एक विशेषता लिये हुए दीख पड़े।...उनमें साहित्य की एक प्रखर प्यास है, जिसके बुझने पर उनकी जाति तथा साहित्य का कल्याण निर्भर है।</p>
<p>—सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’</p>
<p>गोपाल सिंह ‘नेपाली’ की सरस्वती स्नेह, सहृदयता और सौन्दर्य की सजीव प्रतिमा है।</p>
<p>—सुमित्रानन्दन पन्त</p>
<p>श्री गोपाल सिंह नेपाली’ हमारे रस सिद्ध कवि और जनता के हृदयहार।</p>
<p>—रामधारी सिंह ‘दिनकर’</p>
<p>गोपाल सिंह ‘नेपाली’ ...हिन्दी भारती की वीणा का एक तार...प्रवाह समता, भाषा की सरलता, भावों की रागात्मकता उनकी हर रचना में देखी जा सकती है। हिन्दी कविता को जनमानस तक पहुँचाने में उनका अद्वितीय योगदान है।</p>
<p>—हरिवंशराय बच्चन</p>
<p>नेपाली जी की रचनाओं में सहजता और व्यंजना का अद्भुत संयोग देखने को मिलता है।</p>
<p>—नरेन्द्र शर्मा
Book Details
-
ISBN9789360864071
-
Pages174
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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वे अल्फ़ाज़ के दो कुनबों को जोड़ के ज़बान का एक नया ख़ानदान बना देते हैं, वे इमेजिन करते हैं तो धरती आसमान के और हवाएँ पानियों के आँगनों से घूम-टहल आते हैं...वे जब मुहब्बत की तरफ़ देखते हैं तो रूह धूप बनकर जिस्म को ढाँप लेती है और जिस्म के खुरदरे कोने पाकीज़ा मुलायमियत में पिघलने लगते हैं और जब समाजी मसायल की तरफ़, मुल्क और मुल्क की ख़लक़त की तरफ़ देखते हैं, रिश्तों और दिलों की कशमकश को, बेचैनी को देखते हैं तो उनके बोल हमारे लिए हमारी अपनी बात बन जाते हैं।
गुलज़ार ने फ़िल्मों के लिए गीत लिखे, अभी भी लिख रहे हैं, लेकिन उनके गीत कभी दी हुई सिचुएशन तक सीमित नहीं रहे, उन्होंने सिचुएशन को एक अलग वुसूअत दी, नये मायने दिये, गहराई दी। उनके गीत, उनके अल्फ़ाज़ चीज़ों को देखने और ज़बान को इस्तेमाल करने की हमारी आदतों को बदल देते हैं, वही हमारे जाने-पहचाने अल्फ़ाज़ जब उनके तख़य्युल में नई तरतीब पाते हैं तो हमारे दिल की पुरानी बोसीदा स्लेटें भी सरककर नए सिरे से ताज़ा हो जाती हैं।
‘गुनगुनाइए...’ उनके गीतों का मजमूआ है। इसमें अलग-अलग मिज़ाज के गीतों को अलग-अलग उनवान के तहत इकट्ठा किया गया है ताकि पढ़नेवाले उनकी पूरी तासीर को महसूस कर सकें। एक बात और, जब हम गीतों को सुनते हैं तो अकसर कई सारे बोलों से महरूम रह जाते हैं; यहाँ वह बात नहीं; यहाँ ये गीत अपनी तमाम पोएटिक ख़ूबियों के साथ आपके सामने हैं।
तो आइए, गुनगुनाइए!
Ek Parityakt Pul Ka Sapna
- Author Name:
Saumya Malviya
- Book Type:

- Description: ये कविताएँ बीते दो-एक दशकों में उपजी बेचैनियों और निराशाओं को स्वर देने का प्रयास करती हैं। वक़्त की चोट को शब्दों में महसूसना चोट पर मरहम का ही काम नहीं करता, बल्कि उसे ज़िन्दा भी रखता है। यह संग्रह अपने ज़ख़्मों के प्रति उत्तरदायी बने रहने की अपील करता हुआ, उनके भरने की उम्मीद की व्यर्थ और अश्लील सकारात्मकता से मुक्त उम्मीद भी करता है। जैसे-जैसे इस दौर की अलामतें हम पर नुमायाँ हुई हैं, कविता, विचार और संवेदना में भ्रम और कुहासा बढ़ा है। दृश्य के धुँधलाने के साथ दृष्टि भी क्षीण होती-सी महसूस हुई है। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ इस सन्दर्भ में दृष्टि की खोज भी हैं और उसके थिर और स्पष्ट बने रहने की टॉर्च भी। हालाँकि इन कविताओं में रोशनी की दिशोन्मुखता नहीं, आग की दहनप्रियता अधिक है और इस जलने में केवल सन्ताप नहीं, प्रतिदिन की, सम्बन्धों की, स्थितियों और संघर्षों की ऊष्मा भी है जो जीवन को ठंडेपन से दूर रखते हुए जीवन्त-जाग्रत बनाए रखती है। शिल्प और भाषा के स्तर पर अपने को परस्पर काटते हुए प्रयोग भी उस विकलता को अपने में विन्यस्त करते हैं जो अन्तर्वस्तु की ज़मीन पर जगह-जगह उद्घाटित हुई है। इन कविताओं में एक कवि की यात्रा भी है जो गणित, विज्ञान, दर्शन और समाजशास्त्र की गलियों में भटकती हुई बार-बार कविता के दयार पर लौटती है। ये लौटना ही उसका अरमान भी है और उसका निकष भी। नतीजन इनमें जो धधक रहा है, कई पाँवों का चक्कर, कई हाथों की दुआ है जो हर बार कविता पर आकर ख़त्म होती है। इसलिए तमाम उत्कंठाओं और व्याकुलताओं के बाद भी इन कविताओं में एक बसेरापन भी है और अपनी जगह की ठसक भी।
Sare-Wadiye-Seena
- Author Name:
Faiz Ahmed 'Faiz'
- Book Type:

- Description: ग़मे-ज़माना के गहरे अहसास से पगी नज़्मों-ग़ज़लों और क़तआत के इस संग्रह में फ़ैज़ की 1965 से 1971 के दौरान लिखी रचनाएँ शामिल हैं। ‘लहू का सुराग़’ और ‘ज़िन्दाँ-ज़िन्दाँ शोरे-अनल-हक़’ शीर्षक वे नज़्में भी इसी संकलन में शामिल हैं जिन्हें फ़ैज़ ने कराची में विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हुई फायरिंग के बाद लिखा था। युद्ध की पृष्ठभूमि में लिखी गई दो प्रसिद्ध नज़्में भी इस किताब का हिस्सा हैं—‘ब्लैक आउट’ और ‘सिपाही का मर्सिया’। शीर्षक कविता ‘सरे-वादिए-सीना’ का विषय तो है ही अरब-इसरायली युद्ध। साल 1967 में पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर लिखी गई उनकी बेहद चर्चित नज़्म ‘दुआ’ इस संकलन को ख़ासतौर पर आकर्षक बनाती है जिसमें फ़ैज़ ने मुल्क के अवाम की पीड़ा और स्वप्नों को शब्द दिए थे—‘जिनके सर मुंतज़िरे-तेग़े-जफ़ा हैं उनको/दस्ते-क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले।’ हार्ट अटैक शीर्षक कविता उन्होंने 1967 में पड़े दिन के दौरे के बाद लिखी थी। रसूल हम्ज़ातोव की कुछ कविताओं के उनके द्वारा किए गए अनुवाद भी इसी संकलन में आप पढ़ेंगे। उनके व्यक्तित्व और रचनाधर्मिता पर लिख गए दो आलेख भी आप यहाँ पाएँगे जिन्हें उनके नज़दीक रहे विदेशी आलिमों ने लिखा है। इनमें से एक आलेख अलेक्जेंडर सरकोफ़ का भी है जो 1962 में फ़ैज़ की कविताओं के रूसी अनुवाद की भूमिका के रूप में छपा था।
Prithavi Ke Liye To Ruko
- Author Name:
Vijayshankar Chaturvedi
- Book Type:

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Description:
विजयशंकर चतुर्वेदी ऐसे कवि हैं जो अपने को आज के सूर्योदय के साथ-साथ उस सुबह से भी जोड़कर देखते हैं जो निर्माणाधीन सृष्टि की पहली सुबह रही होगी। इतने विराट समय में अपनी निरंतरता को देखना कवि की अद्भुत विशेषता है, जो ध्यान खींचे बिना नहीं रहती। प्राकृतिक विपत्तियों से लड़ते, सीखते मनुष्य की कूवत कैसे-कैसे अपने को अभिव्यक्ति के लायक तरासती रही है और कैसे उन सारे द्वंद्वों से मनुष्य ने एक निर्द्वंद्व सभ्यता के लिए अपने को संघर्षरत रखा है; इस तरह के तमाम संधि-समयों से गुजरते हुए कैसे वह मनुष्य आज तक के समय में पहुंचा है—कवि अपनी उस युद्धगाथा को एक बार फिर से कहने की बेचैनी से भरा हुआ दिखता है।
इस सांस्कृतिक यात्रा और यातना में मनुष्य ने कितने असुंदर के बदले कितना सुंदर गंवाया है—उस भूल-चूक भरे अंधकार को कवि ने अपनी अभिव्यक्ति के विस्फोटक उजालों से भर दिया है। सामाजिक दिक् और काल के बीच इस ब्रह्मांड के शंख को सुनने की शक्ति हमें कवि की बिम्बपूर्ण भाषा से मिलती है। कुछ लोगों ने इस पृथ्वी को एक परिवार की जगह सिर्फ़ बाज़ार और कार्यालय की मेज़ बनाकर रख दिया है। कवि इस पृथ्वी पर एक मनुष्योचित सूर्योदय की प्रतीक्षा में है। अपनी सुंदर, प्यारी और वैचारिक पृथ्वी को कवि रसातल में जाने से रोकना चाहता है। यही चिंता और संघर्ष इन कविताओं के केंद्र में है।
विजयशंकर की कविता में माइथोलॉजी और टेक्नॉलॉजी, दोनों का अंगीकार दिखता है। यह बात तब और साफ हो जाती है जब कवि कहता है कि 'शोकाकुल परिजन ले जायें तो ले जायें, मैं जलूंगा नहीं।' पर विज्ञापन का दंश कवि की चेतना का पीछा वहां भी नहीं छोड़ता।
स्त्री के तीन रूप विजय की कविताओं में अक्सर आते हैं—बेटी, स्त्री और मां। स्त्री के तीनों रूप इन कविताओं में ख़तरों से घिरे हुए दिखते हैं।
विजयशंकर को मैं उनके पहले कविता-संग्रह के प्रकाशन के अवसर पर हार्दिक बधाई देता हूं क्योंकि उनकी इन कविताओं को देखकर उनके विकास और बदलाव की प्रबल संभावनाएं अपनी ओर खींचती हैं। विजयशंकर अपने भीतर के संदेहशील कवि को निरंतर खोजते और तराशते जा रहे हैं इसलिए उनकी यात्रा निश्चय ही अर्थपूर्ण और लंबी होगी।
—लीलाधर जगूड़ी
Lal Ribban Ka Fulba
- Author Name:
Sunita Jain
- Book Type:

- Description: Poems
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