Pratinidhi Kavitayen : Vinod Kumar Shukla
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में आज ऐसे कवि के रूप में बहुप्रतिष्ठित हैं जिनकी कविता को बिना उनके नाम के भी जागरूक पाठक पहचान लेते हैं।</p> <p>उनकी कविता, कविता के तुमुल कोलाहल के बीच चुपचाप अपने सृजन में व्यस्त दिखती है। किसी भी तरह के दिखावे, छलावे, भुलावे से दूर अपनी राह का ख़ुद निर्माण करती और उस पर निर्भय अकेले चलने की हिम्मत रखती, वह अपनी मंज़िलें तय करने में संलग्न है।</p> <p>विनोद की काव्य-संवेदना के विस्तार को देखने के लिए उनकी कविताओं की गहराई में उतरना होगा। उनकी काव्यात्मक जटिलता इसीलिए ऊपर से दिखाई पड़ती है क्योंकि उनकी काव्य संवेदना की तहें इकहरी न होकर दुहरी और कहीं तिहरी हैं।</p> <p>देखा जाए तो उनकी काव्योपलब्धि में सिर्फ़ अनोखे काव्य-शिल्प का ही योगदान नहीं है, बल्कि उनकी काव्य-वस्तु में यथार्थ को ‘देखने’ का नज़रिया भी उनके अपने समकालीनों से अलहदा रहा है।</p> <p>कहना चाहिए कि विनोद कुमार शुक्ल की कविता समकालीन कविता के दृश्य पर समकालीन जीवनानुभव को प्राचीनता से, प्रकृति से मनुष्य को जिस तरह उद्घाटित करती है, उससे कविता की एक दूसरी दुनिया की खिड़की खुलती है। इस दुनिया को देखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल जैसी ‘अतिरिक्त’ देखने की दृष्टि और कला चाहिए।
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में आज ऐसे कवि के रूप में बहुप्रतिष्ठित हैं जिनकी कविता को बिना उनके नाम के भी जागरूक पाठक पहचान लेते हैं।</p>
<p>उनकी कविता, कविता के तुमुल कोलाहल के बीच चुपचाप अपने सृजन में व्यस्त दिखती है। किसी भी तरह के दिखावे, छलावे, भुलावे से दूर अपनी राह का ख़ुद निर्माण करती और उस पर निर्भय अकेले चलने की हिम्मत रखती, वह अपनी मंज़िलें तय करने में संलग्न है।</p>
<p>विनोद की काव्य-संवेदना के विस्तार को देखने के लिए उनकी कविताओं की गहराई में उतरना होगा। उनकी काव्यात्मक जटिलता इसीलिए ऊपर से दिखाई पड़ती है क्योंकि उनकी काव्य संवेदना की तहें इकहरी न होकर दुहरी और कहीं तिहरी हैं।</p>
<p>देखा जाए तो उनकी काव्योपलब्धि में सिर्फ़ अनोखे काव्य-शिल्प का ही योगदान नहीं है, बल्कि उनकी काव्य-वस्तु में यथार्थ को ‘देखने’ का नज़रिया भी उनके अपने समकालीनों से अलहदा रहा है।</p>
<p>कहना चाहिए कि विनोद कुमार शुक्ल की कविता समकालीन कविता के दृश्य पर समकालीन जीवनानुभव को प्राचीनता से, प्रकृति से मनुष्य को जिस तरह उद्घाटित करती है, उससे कविता की एक दूसरी दुनिया की खिड़की खुलती है। इस दुनिया को देखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल जैसी ‘अतिरिक्त’ देखने की दृष्टि और कला चाहिए।
Book Details
-
ISBN9788126724116
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अशोक वाजपेयी के इस संग्रह में उनकी गहरी जीवनासक्ति और जिजीविषा ने प्रौढ़ता और नया विस्तार पाया है। समकालीनता की अनेक सीमित और इकहरी धारणाओं से आक्रान्त कविता की आज की दुनिया में ये कविताएँ कुछ अलग और अकेली जान पड़ेंगी। उनमें अक्सर सभी तत्काल है और अभी और अनन्त के बीच, यहाँ और वहाँ के बीच सहज और लगभग अनिवार्य आवाजाही है। वे पड़ोस की संरचना करती कविताएँ हैं जिनमें कई बार अनेक सदियों का, देशकाल और नश्वरता का अतिक्रमण होता है। परिचित और सामान्य को थोड़ा–सा विचलित कर वे अप्रत्याशित को सहज स्वायत्त बनाती हैं। विराट सत्यों से अभिभूत होने या उनसे अपने लिए वैधता जुटाने के बजाय वे नगण्य को खोजती, बीनती और सहेजती कविताएँ हैं—अपने सच पर टिकी और गतिशील। वे बँधे–बँधाये ढर्रों से स्वयं तो मुक्त हैं ही, काव्यभाषा और दृष्टि को भी मुक्त करती हैं और हमें उस मुक्ति के लिए आविष्ट करती हैं।
पहले की ही तरह उनमें वैचारिकता अन्त:सलिल है और गहरी ऐन्द्रिय संहति है। उनका धुँधलका और झुटपुटा, उनमें कभी–कभार कौंधती रोशनी की लकीरें और उनमें हर समय मौजूद तलाश अपने खरेपन और तीखी पारदर्शिता से हमें अपनी दुनिया और अपनी भाषा पहचानने और शब्द और मनुष्य में अपनी पुनरास्था को स्वीकार करने की ओर ले जाती है। वह एक बार फिर ऐसी इन दिनों विरल कविता है जो प्रेम, समय, मृत्यु, नियति जैसे चरम प्रश्नों से जूझने की ओर प्रवृत्त करती है। एक अंगभंग समय में, अशोक वाजपेयी की ये नई कविताएँ, थोड़े से आदमी की पूरी मानवीयता की सम्भावना का सत्यापन हैं।
Pata Hi Nahin Chalta
- Author Name:
Priyadarshi Thakur 'Khayal'
- Book Type:

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इस दौर में जब कविता पर अमूर्तन के आरोप लग रहे हों प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ कविता की बाहरी सरहद पर हमला कर अमूर्त को मूर्तित करने के दुष्कर से काम में लगे हैं। पहले तो उन्होंने आलोचकों के उस बने-बनाए तर्क को ध्वस्त किया है कि अब कविता को छन्द की ज़रूरत नहीं और दूसरे, विजातीय समझे जानेवाले रूपाकारों को स्वीकृति देकर ग़ज़ल और आज़ाद नज़्मों को हिन्दी की मुख्यधारा के समानान्तर ला खड़ा किया है। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों का प्रस्तुत संचयन कम-से-कम यह दिलासा तो देता है कि भारी तादाद में लिखी जा रहीं ग़ज़लें हिन्दी की ही हैं। खाँटी हिन्दी की। इसलिए भी कि उर्दू और हिन्दी में अगर कोई फ़र्क़ है तो वह इतना ही है कि उन्हें दो लिपियों में लिखा जा सकता है। और उनकी ख़ूबी यह है कि वे जब चाहे अतीत के ख़ज़ाने से शब्द ले सकनेवाली आधुनिक भाषाएँ हैं जिनके पास मिली-जुली विरासत के रूप में दूसरी ज़बानों की सम्पदा भी है।
कविता का सामान्य गुण है कि आप उन्हें किसी भी प्रयोजन के लिए दुहरा सकते हैं। और जहाँ तक असामान्य गुणों की बात है तो कविता जहाँ एक ओर मर्मभेदी है, वहीं दूसरी तरफ़ वह उत्सवधर्मी प्रमोदन और प्रबोधन से भी जुड़ी है। ग़रज़ यह कि कविता भितरघात भी करती है और वह उदार सीमान्तों का निर्माण भी करती है। प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ अपनी ग़ज़लों और नज़्मों से एक अभूतपूर्व प्रयोग यह भी कर रहे हैं कि वे सादा से सादा शब्दावली द्वारा गहन, अगोचर अनुभवों को वाणी देने के लिए आसान भाषा का अन्वेषण करने में जुटे हैं। और यही एक बड़ा कारण है कि वे मुक्त छन्द से ग़ज़ल तक में प्रयोगरत हैं।
‘पता ही नहीं चलता’ का मूल सरोकार सांस्कृतिक विराटता को शब्दांकित करना तो है ही, गहरे अर्थ में उदारता, स्वतंत्रता और स्वाधीनचेता असहमति की पक्षधरता को रेखांकित करना भी है।
Dharm Wah Naav Nahin
- Author Name:
Shirish Kumar Mourya
- Book Type:

- Description: ये कविताएँ इस कदर अच्छी हैं कि आन्तरिक सन्ताप, जीवन की व्याकुलता, महत्त्वाकांक्षी धार्मिकता की निस्सारता और साधारणता की महत्ता को नयी तरह से और कई कोणों से पुनर्परिभाषित करते हुए एक अलग काव्यात्मक ऊँचाई पर नजर आती हैं। परम्परा का यह एक नया और विकल कर देनेवाला पुनर्पाठ है। —कुमार अम्बुज वरिष्ठ कवि भद्रक के लिए बुद्ध के आख्यान में करुणा के अलावा कुछ भी वरेण्य नहीं है। उसका यह शिष्ट प्रतिवाद अलक्षित नहीं जाना चाहिए। वह जान चुका है कि बुद्ध के जिस धर्म को निर्दोष और सर्वोत्तम कह कर महिमा-मंडित किया गया है, वह कुलीनों और वर्चस्ववादी शक्तियों का एक पैंतरा भर है वरना थेरगाथा के वधित थेरीगाथा के वधिक नहीं हो सकते। यह भी अलग से चिह्नित किया जाना चाहिए कि भद्रक बुद्ध के नाम से विज्ञापित युटोपिया का प्रतिवाद उसके ऐतिहासिक-सामाजिक फलितार्थों के आधार पर कर रहा है। भद्रक उन लोगों और स्थितियों के नाम-पते दर्ज़ करता है जिन्हें सत्ता ने कभी दरवाज़े से अन्दर नहीं आने दिया। आज हम इतिहास के जिस छोर पर खड़े हैं, वहाँ से साफ़ दिखता है कि मैत्रेय बुद्ध अभी तक महज़ एक सम्भावना ही बने हुए हैं, लेकिन मैत्रेय भद्रक पिछले चौदह सौ बरसों से उस आदमी के लिए चिन्तित है, जिसके लिए धर्म का हर यूटोपिया अन्तत: डिस्टोपिया साबित हुआ है। शिरीष की इन कविताओं को इसलिए याद रखा जाएगा कि उनमें संवेदना को प्रलाप और वैचारिकता को नारा नहीं बनने दिया गया। —नरेश गोस्वामी आलोचक
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