Bela
(0)
Author:
Suryakant Tripathi 'Nirala'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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‘बेला' और ‘नए पत्ते' के साथ निराला-काव्य का मध्यवर्ती चरण समाप्त होता है। 'बेला' उनका एक विशिष्ट संग्रह है, क्योंकि इसमें सर्वाधिक ताज़गी है। अफ़सोस कि निराला-काव्य के प्रेमियों ने भी इसे लक्ष्य नहीं किया, इसे उनकी एक गौण कृति मान लिया है। ‘नए पत्ते' में छायावादी सौन्दर्य-लोक का सायास किया गया ध्वंस तो है ही, यथार्थवाद की अत्यन्त स्पष्ट चेतना भी है। ‘बेला' की रचनाओं की अभिव्यक्तिगत विशेषता यह है कि वे समस्त पदावली में नहीं रची गईं, इसलिए ‘ठूँठ' होने से बच गई हैं।</p> <p>इस संग्रह में बराबर-बराबर गीत और ग़ज़लें हैं। दोनों में भरपूर विषय-वैविध्य है, यथा—रहस्य, प्रेम, प्रकृति, दार्शनिकता, राष्ट्रीयता आदि। इसकी कुछ ही रचनाओं पर दृष्टिपात करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। ‘रूप की धारा के उस पार/कभी धँसने भी दोगे मुझे?', ‘बातें चलीं सारी रात तुम्हारी; आँखें नहीं खुलीं तुम्हारी।', ‘लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो/भरा दौंगरा उन्हीं पर गिरा।' बाहर मैं कर दिया गया हूँ। भीतर, पर, भर दिया गया हूँ।' आदि। राष्ट्रीयता ज़्यादातर उनकी ग़ज़लों में देखने को मिलती है।</p> <p>निराला की ग़ज़लें एक प्रयोग के तहत लिखी गई हैं। उर्दू शायरी की एक चीज़ उन्हें बहुत आकर्षित करती थी। वह भी उसमें पूरे वाक्यों का प्रयोग। उन्होंने हिन्दी में भी ग़ज़लें लिखकर उसे हिन्दी कविता में लाने का प्रयास किया। लेकिन निराला-प्रेमियों ने उसे एक नक़ल-भर मान उन्हें असफल ग़ज़लकार घोषित कर दिया। सच्चाई यह कि आज हिन्दी में जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, उनके पुरस्कर्ता भी निराला ही हैं। ये ग़ज़लें मुसलसल ग़ज़लें हैं। मैं स्थानाभाव में उनकी एक ग़ज़ल का एक शे’र ही उद्धृत कर रहा हूँ :</p> <p>तितलियाँ नाचती उड़ाती रंगों से मुग्ध कर-करके,</p> <p>प्रसूनों पर लचककर बैठती हैं, मन लुभाया है।
Read moreAbout the Book
‘बेला' और ‘नए पत्ते' के साथ निराला-काव्य का मध्यवर्ती चरण समाप्त होता है। 'बेला' उनका एक विशिष्ट संग्रह है, क्योंकि इसमें सर्वाधिक ताज़गी है। अफ़सोस कि निराला-काव्य के प्रेमियों ने भी इसे लक्ष्य नहीं किया, इसे उनकी एक गौण कृति मान लिया है। ‘नए पत्ते' में छायावादी सौन्दर्य-लोक का सायास किया गया ध्वंस तो है ही, यथार्थवाद की अत्यन्त स्पष्ट चेतना भी है। ‘बेला' की रचनाओं की अभिव्यक्तिगत विशेषता यह है कि वे समस्त पदावली में नहीं रची गईं, इसलिए ‘ठूँठ' होने से बच गई हैं।</p>
<p>इस संग्रह में बराबर-बराबर गीत और ग़ज़लें हैं। दोनों में भरपूर विषय-वैविध्य है, यथा—रहस्य, प्रेम, प्रकृति, दार्शनिकता, राष्ट्रीयता आदि। इसकी कुछ ही रचनाओं पर दृष्टिपात करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। ‘रूप की धारा के उस पार/कभी धँसने भी दोगे मुझे?', ‘बातें चलीं सारी रात तुम्हारी; आँखें नहीं खुलीं तुम्हारी।', ‘लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो/भरा दौंगरा उन्हीं पर गिरा।' बाहर मैं कर दिया गया हूँ। भीतर, पर, भर दिया गया हूँ।' आदि। राष्ट्रीयता ज़्यादातर उनकी ग़ज़लों में देखने को मिलती है।</p>
<p>निराला की ग़ज़लें एक प्रयोग के तहत लिखी गई हैं। उर्दू शायरी की एक चीज़ उन्हें बहुत आकर्षित करती थी। वह भी उसमें पूरे वाक्यों का प्रयोग। उन्होंने हिन्दी में भी ग़ज़लें लिखकर उसे हिन्दी कविता में लाने का प्रयास किया। लेकिन निराला-प्रेमियों ने उसे एक नक़ल-भर मान उन्हें असफल ग़ज़लकार घोषित कर दिया। सच्चाई यह कि आज हिन्दी में जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, उनके पुरस्कर्ता भी निराला ही हैं। ये ग़ज़लें मुसलसल ग़ज़लें हैं। मैं स्थानाभाव में उनकी एक ग़ज़ल का एक शे’र ही उद्धृत कर रहा हूँ :</p>
<p>तितलियाँ नाचती उड़ाती रंगों से मुग्ध कर-करके,</p>
<p>प्रसूनों पर लचककर बैठती हैं, मन लुभाया है।
Book Details
-
ISBN9788180319983
-
Pages111
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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तुलसीदास जी केवल द्रष्टा ही नहीं कर्मजयी स्रष्टा भी हैं और उनकी जीवन-गति में जो अवरोध समाज के सम्मुख आते हैं, उनसे संघर्षकर्ता तथा अजेय योद्धा के रूप में भी ‘कवितावली’ में अपने को प्रकट करते हैं। जाति-पाति के बन्धन से मनुष्य के व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने का आह्वान भी ‘कवितावली’ में है। ‘कवितावली’ के भीतर उनकी उन मान्यताओं की भी प्रभा है, जिनके कारण उन्हें लोग समवन्यवादी मानते हैं। लोक में प्रचलित और प्रिय कवित्त, सवैया और छप्पय की पद्धति अपनाकर तुलसी ने राम के विभिन्न रूपों की राममय रचना की है। उनके आदर्श राम थे और उनका सम्पूर्ण कृतित्व राममय था। उन्होंने मुक्तक मणि के रूप में इसे प्रचारित किया। ‘कवितावली’ में रामचरित के स्फुट मुक्तक संगृहीत हैं। इनका संयोजन और सम्पादन तुलसी के समय में ही हो चुका था। बालकांड से लेकर उत्तरकांड तक के रामचरितमानस के अनुरूप सातों कांड कवितावली में भी हैं। इन चार सौ पचीस पदों की विशेषता और रामचरितमानस से इनकी विभिन्नता यही है कि ये सभी मूलक छन्द हैं। कवितावली में ‘हनुमान बाहुक’ स्वतंत्र रूट-रचना है। तुलसी के जीवन से सम्बद्ध अनेक रचनाएँ भी कवितावली में हैं। उन्होंने हनुमान की अपनी आराधना को भी इस रचना में स्थान दिया है।
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एक बेगाने और असन्तुलित दौर में मंगलेश डबराल अपनी नई कविताओं के साथ प्रस्तुत हैं—अपने शत्रु को साथ लिए। बारह साल के अन्तराल से आए इस संग्रह का शीर्षक चार ही लफ़्ज़ों में सब कुछ बता देता है : उनकी कला-दृष्टि, उनका राजनीतिक पता-ठिकाना, उनके अन्तःकरण का आयतन।
यह इस समय हिन्दी की सर्वाधिक समकालीन और विश्वसनीय कविता है। भारतीय समाज में पिछले दो-ढाई दशक के फासिस्ट उभार, साम्प्रदायिक राजनीति और पूँजी के नृशंस आक्रमण से जर्जर हो चुके लोकतंत्र के अहवाल यहाँ मौजूद हैं और इसके बरक्स एक सौन्दर्य-चेतस कलाकार की उधेड़बुन का पारदर्शी आकलन भी। ये इक्कीसवीं सदी से आँख मिलाती हुई वे कविताएँ हैं जिन्होंने बीसवीं सदी को देखा है। ये नए में मुखरित नए को भी परखती हैं और उसमें बदस्तूर जारी पुरातन को भी जानती हैं। हिन्दी कविता में वर्तमान सदी की शुरुआत ही ‘गुजरात के मृतक का बयान’ से होती है।
ऊपर से शान्त, संयमित और कोमल दिखनेवाली, लगभग आधी सदी से पकती हुई मंगलेश की कविता हमेशा सख्तजान रही है—किसी भी चीज़ के लिए तैयार। इतिहास ने जो ज़ख़्म दिए हैं उन्हें दर्ज करने, मानवीय यातना को सोखने और प्रतिरोध में ही उम्मीद का कारनामा लिखने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध। यह हाहाकार की ज़बान में नहीं लिखी गई है; वाष्पिभूत और जल्दी ही बदरंग हो जानेवाली भावुकता से बचती है। इसकी मार्मिकता स्फटिक जैसी कठोरता लिए हुए है। इस मामले में मंगलेश ‘क्लासिसिस्ट’ मिज़ाज के कवि हैं—सबसे ज़्यादा तैयार, मँजी हुई और तहदार ज़बान लिखनेवाले।
मंगलेश असाधारण सन्तुलन के कवि हैं—उनकी कविता ने न यथार्थ-बोध को खोया है, न अपने निजी संगीत को। वे अपने समय में कविता की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारियों को अच्छे से सँभाले हुए हैं और इस कार्यभार से दबे नहीं हैं। मंगलेश के लहज़े की नर्म-रवी और आहिस्तगी शुरू से उनके अकीदे की पुख़्तगी और आत्मविश्वास की निशानी रही है। हमेशा की तरह जानी-पहचानी मंगलेशियत इसमें नुमायाँ है।
और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो सकती है कि इन कविताओं में वह साजे-हस्ती बे-सदा नहीं हुआ है जो ‘पहाड़ पर लालटेन’ से लेकर उनके पिछले संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ में सुनाई देता रहा था। ‘नए युग में शत्रु’ में उसकी सदा पूरी आबो-ताब से मौजूद है।
—असद ज़ैदी।
Bakhtiyarpur
- Author Name:
Vinay Saurabh
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कुछ चीज़ें होती हैं जो हम से छूट जाती हैं, कभी हमारे हाथ से फिसल जाती हैं, कभी उन्हें हमसे छीन लिया जाता है; कुछ चीज़ें होती हैं जो हमारे पास रह जाती हैं और छूटी हुई, जा चुकी चीज़ों, लोगों, जगहों की याद हमें दिलाती रहती हैं। कुछ सपने होते हैं हमारे, कुछ इच्छाएँ होती हैं, कुछ नहीं किए जा सके काम होते हैं, जो हमें अकसर बुलाते रहते हैं। प्रेम होता है, जिसके दोनों तरफ़ पीड़ा होती है—पा लेने की अपनी, न पाने की अपनी।
ऐसी ही चीज़ों से हम बनते हैं, हमारी दुनिया बनती है। विनय सौरभ का कवि जैसे इस दुनिया की हर खुली-अधखुली खिड़की में झाँकता-देखता फिरता रहता है। हर किसी के अनुभवों का उदास-सा विस्तार मालूम होतीं इस संग्रह की कविताएँ जीवन के अधूरेपन की तरफ़ इतने अनायास ढंग से इशारा करती हैं कि हम अपनी तथाकथित पूर्णताओं को लेकर सन्देह से भर उठते हैं।
स्मृतियों, विडम्बनाओं और मध्यवर्गीय जीवन की साँवली उदासियों में अपनी कविता को आकार देनेवाले विनय सौरभ के इस संग्रह में वे कविताएँ भी हैं जो राजनीति, सत्ता और बाजार की आक्रामकताओं की आलोचना करती हैं; और उनके जादू को समझने, उनके तिलिस्म को तोड़ने की कोशिश भी करती हैं।
कविता-प्रेमी पाठक को इस किताब में ऐसे अनेक स्थल मिलते हैं जहाँ वह ठहरकर अपने आप और अपनी दुनिया को दुबारा से देखना चाहता है।
Ye Kisase Bolata Hoon
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Lakshman Prasad Gupta
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- Description: लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता की ग़ज़लों में न तो अतिशय भावुकता है और न ही अतिरंजित क्रांतिकारिता। वे सहज अभिव्यक्ति के शाइर हैं। उनकी शाइरी में जीवनानुभवों की विविधता भी है और संवेदना की गम्भीरता भी। वे अपने इर्द-गिर्द के जीवन को देखते हैं और उसे शेर में ढालते हैं। इसीलिए इस सवाल का जवाब ढूँढ़ना लाजिमी है कि आख़िर उनकी ये ग़ज़लें किसकी ख़ातिर है? जाहिर है कि लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता की ग़ज़लें न तो विशुद्ध बुद्धिजीवियों के लिए हैं और न ही बगैर कुछ समझे-बूझे 'वाह-वाह' करने वाले मजमे के लिए। उनकी ग़ज़लें तो ऐसे लोगों के लिए हैं जो अपने समय और समाज की हक़ीक़त से वाक़िफ़ हों। न सिर्फ़ वाक़िफ़ हों बल्कि उद्वेलित भी। - अब्दुल बिस्मिल्लाह लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता की ग़ज़लों की आर्ट गैलरी से गुज़रते हुए बड़ी शिद्दत से ये एहसास होता है कि उन्होंने अपनी ग़ज़लों को पहले पूरी ईमानदारी से जिया है फिर उन्हें कैनवस पर उतारा है, साथ ही अपने अनुभव की तूलिका से ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं को उकेरने की कामयाब कोशिश की है। लक्ष्मण की ग़ज़लों की लय मध्यम, गुफ़्तगू का अन्दाज़ नर्म और सोच में पवित्रता है। उनकी ग़ज़लों में पामाल होते इंसानी रिश्तों का दर्द, एक-दूसरे के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता का दुख, तथाकथित तरक्की के पीछे अंधाधुंध भागने के क्रम में आपसी प्रेम, सौहार्द, भाईचारा से दूर होते जाने का ग़म, सर से पाँव तक स्वार्थ में डूबी राजनीति के प्रति मन में क्षोभ तथा सारे संसार को प्रेम के सूत्र में बाँध देने की छटपटाहट भी है। - हातिम जावेद
Mera Safar Taweel Hai
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- Description: Awating description for this book
Sahar Ke Khwab
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प्रेम की गहरी व्यंजना, नज़दीकियों और दूरियों की हस्सास अक्कासी, देश और समाज की तल्ख़ हक़ीक़तों से ज़ख़्मी मिसरों और शे’रों की गहरी बुनावट—इन सबसे मिलकर बनती हैं मोनिका सिंह की ग़ज़लें और इस नए ग़ज़ल-संग्रह के ख़्वाब।
कहते हैं सहर यानी सुबह के वक़्त देखे गए ख़्वाब सच हो जाते हैं। इस संग्रह की ग़ज़लों में ऐसे अनेक ख़्वाब सँजोए गए हैं, जिन्हें सच होना ही चाहिए। ख़ुशियों के, प्यार के, मिलन के, समाजी एकता और क़ौमी मुहब्बत के ख़्वाब के साथ मोनिका सिंह अपने वक़्त को भी बहुत गहराई से देखती है; और अपने मन को भी। यही वजह है कि उनके अहसास का सन्तुलन कहीं भी गड़बड़ाता नहीं है।
‘यकायक नींद में आँसू निकल आए; वो ख़्वाबों में मुझे तड़पा गया शायद।’ एक ग़ज़ल का यह शे’र जहाँ इश्क़ की गहरी संवेदना को रौशन करता है, वहीं हमें ऐसे शे’र भी पढ़ने को मिलते हैं: ‘दूरियाँ दो मज़हबों में की जिन्होंने, कह रहे वो/फ़ासले होते नहीं कम, बात इतनी सी नहीं है/ फेंककर स्याही बने हैं देशभक्ति के पुजारी/बँट गए मुद्दों में यूँ हम, बात इतनी सी नहीं है।’
देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली ग़ज़लों ने धीरे-धीरे उर्दू अल्फ़ाज़ से अपनी नज़दीकी बढ़ाई है, आमफ़हम होने के नाम पर सपाट होने की आशंका को उसने काफ़ी कम किया है, और उर्दू ग़ज़ल की बहुस्तरीय अर्थगर्भिता के नज़दीक गई है। यह बात इस संग्रह में भी देखने को मिलती है।
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