Danuphak Phool Jakan
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देसक इतिहास आइ अपन निर्दयतम दौर सँ गुजरि रहल अछि जखन भाषा मे अपन अन्त:करणक रक्षा क' सकब एक कठिन चुनौती बनल अछि। मैथिलीक बहुलांश कवि-समुदाय केँ हमरा लोकनि आइ जत' रौरव के उत्सव मनबैत देखबा लेल अभिशप्त छी, विद्यानंद ने तँ अपन जनानुभव सँ एकात भेला अछि आ ने अभिव्यक्तिक जरब उठेबा मे कनियो थकमकाइत छथि। देसवासीक नियति केँ प्रभावित केनिहार हरेक प्रपंच पर हुनका लग अपन कविता छनि। नाना प्रकारक मानवीय आ प्राकृतिक उत्पातक बीच ओ साधारण जन पर पड़ैत एकर प्रभावे केँ उचित-अनुचितक दिशानिर्देशक मानैत रहला अछि। स्मृति सेहो कोना उपस्थित होइत छैक, से हम सब एत' बारंबार देखि सकै छी। हुनक काव्यानुभवक अनुरूपे हुनकर ई संग्रह सेहो विविधता आ व्यापकता सँ भरल अछि। समकालीन कविताक लेल अवश्ये ई एक महत्त्वपूर्ण बात थिक जे हमर ई कवि अपन हरेक नव संग्रह मे पछिला संग्रह सँ आगू बढ़ल देखाइत छथि। हुनकर पाठक लोकनि से एहू संग्रह मे देखि सकता। —तारानंद वियोगी # विद्यानंदक कविता मे आत्म निरीक्षणक एक टा अद्भुत पद्धति छनि। अस्तित्ववादक आधुनिक परम्पराक देशज आ लौकिक सहज विमर्श सँ जेना बियाह होइत हो। जतबे भावोत्तेजित ततबे निरीह, शांत, आ प्रतीतिकर। खेतिहर, गामक लोक, ऑरवेल, अम्बेडकर आ महात्मा गांधी—एहन अनेक पात्र हिनक काव्य मे सजीव भ'क' संवाद करैत अछि। कवि केँ धन्यवाद जे ओ अपन काव्य रचना मे सतत सत्यपरक, तथ्यपरक आ साहित्यिक सौन्दर्यपरक संतुलनक संग समुचित संसार गढ़ैत रहलाह अछि। —देव नाथ पाठक
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देसक इतिहास आइ अपन निर्दयतम दौर सँ गुजरि रहल अछि जखन भाषा मे अपन अन्त:करणक रक्षा क' सकब एक कठिन चुनौती बनल अछि। मैथिलीक बहुलांश कवि-समुदाय केँ हमरा लोकनि आइ जत' रौरव के उत्सव मनबैत देखबा लेल अभिशप्त छी, विद्यानंद ने तँ अपन जनानुभव सँ एकात भेला अछि आ ने अभिव्यक्तिक जरब उठेबा मे कनियो थकमकाइत छथि। देसवासीक नियति केँ प्रभावित केनिहार हरेक प्रपंच पर हुनका लग अपन कविता छनि। नाना प्रकारक मानवीय आ प्राकृतिक उत्पातक बीच ओ साधारण जन पर पड़ैत एकर प्रभावे केँ उचित-अनुचितक दिशानिर्देशक मानैत रहला अछि। स्मृति सेहो कोना उपस्थित होइत छैक, से हम सब एत' बारंबार देखि सकै छी। हुनक काव्यानुभवक अनुरूपे हुनकर ई संग्रह सेहो विविधता आ व्यापकता सँ भरल अछि। समकालीन कविताक लेल अवश्ये ई एक महत्त्वपूर्ण बात थिक जे हमर ई कवि अपन हरेक नव संग्रह मे पछिला संग्रह सँ आगू बढ़ल देखाइत छथि। हुनकर पाठक लोकनि से एहू संग्रह मे देखि सकता। —तारानंद वियोगी # विद्यानंदक कविता मे आत्म निरीक्षणक एक टा अद्भुत पद्धति छनि। अस्तित्ववादक आधुनिक परम्पराक देशज आ लौकिक सहज विमर्श सँ जेना बियाह होइत हो। जतबे भावोत्तेजित ततबे निरीह, शांत, आ प्रतीतिकर। खेतिहर, गामक लोक, ऑरवेल, अम्बेडकर आ महात्मा गांधी—एहन अनेक पात्र हिनक काव्य मे सजीव भ'क' संवाद करैत अछि। कवि केँ धन्यवाद जे ओ अपन काव्य रचना मे सतत सत्यपरक, तथ्यपरक आ साहित्यिक सौन्दर्यपरक संतुलनक संग समुचित संसार गढ़ैत रहलाह अछि। —देव नाथ पाठक
Book Details
-
ISBN9789388799881
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Book Type:

- Description: लता और वृक्ष “कहो न मिनी, इसका क्या अर्थ है?” “मन तौ शुदम का अर्थ होता है—मैं तेरा हो गया।” शब्द और अर्थ पर वार्त्तालाप होते देख इंदरानी खिसक ली, नहीं तो देखती अपार प्रेम भरा आलिंगन कैसे हुआ करता है। सुखबीर ने बहुत ही कोमलता से पूछा, “इसके आगे भी कुछ होगा, मिनी? आज इसी क्षण सुनने का मन हो रहा है।” संसार की सबसे सुखी नारी के स्वर में मिनी ने कहना आरंभ किया—“फारसी का यह पूरा छंद है— मन तौ शुदम, तौ मन शुदी। मन तम शुदी, तौ जाँ शुदी। ता कथाम गीयंद वाद अजी। मन दीगरम व तौ दीगरी।” “अब अर्थ भी बता दो, यह तुमने कहाँ पढ़ा था?” “मरियम अम्मा की नोट-बुक में था। मुझे अच्छा लगा तो रट लिया। इसका अर्थ है— मैं तेरा हो गया, तू मेरा हो गया। मैं शरीर बन गया, तू प्राण बन गया। कभी कोई यह कह न सके मैं और तू और तू और मैं हैं।
Karigar Ke Hath Sone Ke Nahi Hote
- Author Name:
Kamleshwar Sahu
- Book Type:

- Description: Collection of Poems
Man Ke : Soor Ke
- Author Name:
Keshavchandra Verma
- Book Type:

-
Description:
केशव जी की संगीत विषयक अन्य कृतियाँ—‘कोशिश : संगीत समझने की’ तथा ‘राग और रस के बहाने’ एवं ‘शब्द की साख’ (रेडियो शिल्प)। उन्होंने कितना शोध किया होगा—पुराणों का अध्ययन, संगीतशास्त्र के दुर्लभ ग्रन्थों का पारायण, भारतीय इतिहास के विभिन्न कालों में से संगीतज्ञों के बारे में यदा-कदा मिलनेवाले सन्दर्भों का संकलन और कभी लोक प्रचलित किन्तु अब धीरे-धीरे विस्मृत होती जाती किंवदन्तियों का पुनरुद्धार—वास्तव में उनका यह कृतित्व आश्चर्यचकित कर देता है। इतना ही होता तो वह बड़ी उपलब्धि होती, पर इस बड़ी उपलब्धि का अनूठापन यह है कि इन कथाओं की शैली न तो कहीं बोझिल है और न कहीं शास्त्रज्ञान का आत्मप्रदर्शन। रचनाकार सहज, सरल रसमय विषय की अन्तर्निहित-रसधारा में स्वयं सहज भाव से बहता जाता है और अपने पाठक को भी अपने साथ बहा ले जाता है...
—धर्मवीर भारती (इस पुस्तक के ‘आमुख’ से)
Vah Yani Mohan Swarup
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description: रमेशराज की मुक्तछंद तेवरियाँ
Samvedana Ke Swar
- Author Name:
Dinesh Adhikari
- Book Type:

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Description:
दिनेश अधिकारी नेपाली कवि हैं। हिन्दी में यह उनका पहला काव्य-संग्रह है। बहैसियत कवि अपने काव्य-कर्म के बारे में उनका कहना है कि आदमी और आदमी से जुड़े तमाम सन्दर्भ ही उनके लेखन की ऊर्जा बनते हैं। मौलिकता की उनकी अवधारणा ठीक उतनी ही विनम्र है जितनी ये कविताएँ। विनम्र लेकिन तत्वतः ठोस और अपने पैरों के नीचे की ज़मीं को भरी-पूरी नज़रों से देखती-आँकती हुई। वे कहते हैं कि एक ही विश्व के निवासी होने के कारण विषयवस्तु में समानता की सम्भावना प्रबल होती है। सो सृष्टा की मौलिकता को उसके प्रस्तुति-क्रम में खोजना चाहिए। लेकिन मौलिकता की एक कसौटी और भी है, वह है दृष्टि, जिसके दर्शन इस संग्रह की कविताओं में होते हैं। उनकी कविता पूछती है : ‘प्रदर्शन मात्र ही शक्ति है क्या?’ उनकी कविता बताती है : ‘कपड़ा फट जाता है, चमड़ी नहीं।’ उनकी कविता उद्घाटित करती है : ‘तर्क वास्तव में बेशर्म ही होता है...शासक की तरह बेहया।’ उनकी कविता स्वीकार करती है : ‘अकेले चलने का आनन्द तुम्हारे साथ चलते नहीं आता।’ ये कुछ पंक्तियाँ यद्यपि उनकी मौलिकता को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन इस
संग्रह की कविताओं की अर्थ और सन्दर्भ-व्याप्ति कहीं अधिक है।
बीच-बीच में नेपाली अभिव्यक्तियों के साथ ये कविताएँ अखिल मानवता को सम्बोधित करती हैं। ‘हर्क बहादुर’, ‘कहाँ रखें अब पैदा होनेवाले पुत्र को’, ‘मच्छरदानी के भीतर आदमी’, ‘आदमी का क़द’ और ‘विकासोन्मुख देश का आदमी’ जैसी अनेक कविताएँ कवि के आन्तरिक विस्तार का परिचय देती हैं।
संग्रह में प्रकाशित ‘गाँव की एक कविता’ बार-बार पढ़ने लायक़ कविता है जिसमें प्रस्तुत गाँव की तस्वीर भारत में भी जहाँ चाहे वहाँ देखी जा सकती है। हस्तक्षेप के रूप में देखें तो यह विचारणीय है जो यह कविता कहती
है : ‘गोद के शिशु को पीठ पर बाँधकर मज़े से निकल जाती है कोई भी माँ अपनी सन्तान पर भी बोझ बन सकती है—उसे पता नहीं।’ हिन्दी कविता के परिदृश्य में हमारे प्रिय पड़ोसी देश से आई यह दस्तक स्वागत योग्य है, पर उससे पहले ध्यान से पढ़ने योग्य।
Kuchh Kavitayen Va Kuchh Aur Kavitayen
- Author Name:
Shamsher Bahadur Singh
- Book Type:

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Description:
शमशेर जी का पहला कविता-संग्रह ‘कुछ कविताएँ’ 1959 में आया था और दूसरा ‘कुछ और कविताएँ’ 1961 में—यानी उस समय जब वे पचास वर्ष के थे। और ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने कविताएँ तभी लिखना प्रारम्भ किया था—इन दोनों संग्रहों की कविताएँ पिछले बीसेक वर्षों में लिखी गई थीं।
अधिकांश कवि पचास तक पहुँचते-पहुँचते अपने उतार पर होते हैं, लेकिन शमशेर के बारे में यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि निराला के बाद और ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ के पहले किसी भी एक कवि के दो ऐसे छोटे-छोटे अत्यन्त संकोची एवं विनम्र, संग्रहों ने हिन्दी कविता और उसकी आलोचना पर इतना गहरा और दूरगामी असर नहीं डाला।
शमशेर के अनेक कट्टर प्रशंसक अब भी यह मानते पाए जा सकते हैं कि उनकी अधिकांश कालजयी कविताएँ इन्हीं में हैं।...इसमें सन्देह नहीं कि ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में शमशेरियत के सारे मौलिक रंग मौजूद हैं—स्वस्थ-वयस्क रूमान, सारे सौन्दर्य में ऐसी सूक्ष्म-ऐन्द्रिक दृष्टि जो सिर्फ़ उन्हीं की है, शिल्प के प्रतिबद्ध और नाजुक प्रयोग जिनमें प्रगल्भता और प्रदर्शन का नितान्त अभाव है, ‘उर्दू’ और ‘हिन्दी’ का कारगर मेल, छन्दों, ग़ज़लों और नज़्मों से बेपरहेज़गी, कई सांस्कृतिक परम्पराओं का अपनी रक्त-मज्जा में अहसास, ‘परम्परा’ और ‘आधुनिकता’ का सहज मेल और इस सबके साथ और सबके ऊपर सर्वहारा—भारतीय सर्वहारा—के साथ तादात्म्य।
शमशेर ने छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, भारतीय-अरबी-फ़ारसी, परम्परा, आधुनिकतावाद, सौन्दर्यानुभूति, संगीत, चित्रकला, विश्व-समाज तथा राजनीति और प्रतिबद्धता के सर्वश्रेष्ठ पहलुओं को अपनी अद्वितीय प्रतिभा में ढालकर जो अपना—केवल शमशेर का—काव्य, काव्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र गढ़ा है वह ‘कुछ कविताएँ’ तथा ‘कुछ और कविताएँ’ में अपने पूरे टटकेपन और उत्कर्ष के साथ उपस्थित है—मूल्यांकन के सारे ‘शुद्ध’, ‘शाश्वत’, कूढ़मग्ज़ और संकीर्ण सिद्धान्तों को विकलांग बनाता हुआ और एक बिलकुल अलग, पूर्णतर और बलिष्ठ सौन्दर्यशास्त्र तथा समीक्षा की माँग करता हुआ।
—विष्णु खरे
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