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अंजानी और अपरिचित गन्धों से भरा हुआ है दृश्य से अदृश्य की यात्रा का यह मार्ग। फिर बँध ही जाते हैं पैरों में अनगिनत घूँघर किन्हीं सूक्ष्म रूपों में कि फिर जल उठते हैं चराग़ और प्रकाशित हो उठते हैं मार्ग उसी के परम आलोकों से। तब उस असीम से मिलन की चाह में उठते हैं हृदय में प्रार्थनाओं के तीक्ष्ण वेग और डूब जाती हैं आँखें आनंद के आँसुओं में। उसी अतिरेक और अहोभावों की असहाय-सी स्थितियों में तत्क्षण उतरने लगते हैं अस्तित्व के संगीत; उठते हैं जीवन के महाशिखर और उतरता है कोई काव्य अपनी त्वरा में रात-रानियों की सी गन्ध लिए।
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अंजानी और अपरिचित गन्धों से भरा हुआ है दृश्य से अदृश्य की यात्रा का यह मार्ग। फिर बँध ही जाते हैं पैरों में अनगिनत घूँघर किन्हीं सूक्ष्म रूपों में कि फिर जल उठते हैं चराग़ और प्रकाशित हो उठते हैं मार्ग उसी के परम आलोकों से। तब उस असीम से मिलन की चाह में उठते हैं हृदय में प्रार्थनाओं के तीक्ष्ण वेग और डूब जाती हैं आँखें आनंद के आँसुओं में। उसी अतिरेक और अहोभावों की असहाय-सी स्थितियों में तत्क्षण उतरने लगते हैं अस्तित्व के संगीत; उठते हैं जीवन के महाशिखर और उतरता है कोई काव्य अपनी त्वरा में रात-रानियों की सी गन्ध लिए।
Book Details
-
ISBN9789388211093
-
Pages150
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सरोकार तो हैं ही, पेड़, पगडंडी, पतंग, पानी, रास्ते, रातें, सूर्यास्त, हवाएँ, बिकरियाँ, पक्षी, समुद्र, तारे, चाँद भी हैं। वे पगडंडी, चौक, रेल जंक्शन से निजी और सार्वजनिक दुनिया में पहुँचते हैं, थियेटर, मैटिनी शो और पहली फ़िल्म की रोशनी में स्मृतियों में जाकर अपनी संवेदना तथा सृजनशीलता के स्रोत खोजते-पाते हैं और समुद्र की आवाज़ उनके लिए किसी रहस्यमय अनादि-अनन्त की नहीं, आन्दोलन और गहराई की है। अति-मुखरता के लिए तो इसमें अवकाश ही नहीं है, आविष्ट भावातिरेक से भी वे अपनी ऐसी कविताओं में बचे हैं। आलोकधन्वा ने एक ऐसी भाषा और ऐसी तराशी हुई अभिव्यक्ति हासिल की है जिनमें सभी अतिरिक्त और अनावश्यक छीलकर अलग कर दिया गया है और तब ‘शरद की रातें/इतनी हलकी और खुली/जैसे पूरी की पूरी शामें हों सुबह तक/जैसे इन शामों की रातें होंगी/किसी और मौसम में’ या ‘समुद्र मुझे ले चला उस दोपहर में/जब पुकारना भी नहीं आता था/जब रोना ही पुकारना था’ सरीखी क्लासिकी रंगत की पंक्तियाँ प्राप्त होती हैं। यह अकारण नहीं है कि कवि मीर का ज़िक्र करता है। आलोकधन्वा ‘जो घट रहा है’ उसके कवि थे और रहेंगे लेकिन अब उसके भी प्रवक्ता हैं जिसका ‘होना’ सामान्यतः नहीं माना-पहचाना जाता। उन्हें उम्मीद है कि ‘कभी लिखेंगे कवि इसी देश में/इन्हें भी घटनाओं की तरह’ जबकि सच यह है कि वे स्वयं उस सबको घटना बनाने की क्षमता प्राप्त कर चुके हैं जो निश्चेष्ट, अमूर्त तथा अचल लगता है। चेतन में चेतना तो सभी देख लेते हैं, उसके साथ जड़ में चैतन्य को स्थापित कर पाना आलोकधन्वा जैसे अनन्य, दुस्साहसी सर्जक के बूते की ही बात है जो इस प्रक्रिया में अपनी प्रतिबद्धता को सम्पूर्ण बनाने की राह पर अग्रगामी नज़र आता है। —विष्णु खरे
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- Book Type:

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Description:
इक़बाल की फ़ारसी मसनवी ‘अस् रारे ख़ुदी’ (ख़ुदी या अहम् के रहस्य) एक दार्शनिक कविता है, जिसे ख़ुदी या अहम् (Ego) अथवा आत्मन् (Self) के अर्थ, उसकी यथार्थता, अभिपुष्टि एवं स्थिरता का एक प्रकार का उपनिषद् कहा जा सकता है। यह कविता जगत् विषयक संकल्पना से प्रेरित होती है तथा अस्तित्व के महानाटक में मानवीय अहम् (Human Ego) या मानवीय आत्मशक्ति तथा उससे उद्भूत चारित्रिक एवं नैतिक गुणों की भूमिका का निरूपण करती है। कवि की भावप्रवणता तथा उस भावप्रवणता की सशक्त और प्रभावकारी अभिव्यक्ति की शैली इस दार्शनिक एवं तत्त्वमीमांसीय कविता को उच्चतर कविता के अवस्थान का अधिकारी बना देती है। स्पष्टतया यह एक विचार-प्रधान कविता है और कवि के विचार हृदयानुभूत हैं तथा उनकी अभिव्यक्ति प्रांजल एवं वाग्मितापूर्ण भाषा तथा उदात्त एवं मनोरम शैली में हुई है। प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ होने के एक वर्ष बाद 1915 में इसका प्रकाशन विश्व-साहित्य की एक अभूतपूर्व घटना थी, क्योंकि इसके पूर्व इस विषय को एक अनूठे अन्दाज़ में उदात्त काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करने का उदाहरण विश्व-साहित्य में नहीं मिलता। प्रकाशित होते ही यह कविता फ़ारसी में क्लासिक बन गई तथा 1920 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध प्राच्यविद् प्रो. निकल्सन के अंग्रेज़ी अनुवाद के फलस्वरूप यह यूरोप व अमेरिका के पाठकों की पहुँच में आ गई। इसे विश्व-साहित्य की एक महान उपलब्धि क़रार देते हुए प्रसिद्ध अमेरिकी कवि, समालोचक तथा आधुनिक कला के दार्शनिक हर्बट रीड (Herbert Read) ने टिप्पणी की कि यह कविता ‘‘धारणाओं के नानात्व में से आस्था के एकत्व तथा विचारधाराओं के गुह्य तर्क में से एक वैश्विक स्फूर्ति का सृजन करती हुई अपनी सुन्दरता में आधुनिक दर्शन की आधारभूत अवस्थाओं को प्रतिबिम्बित करती है।’’ आख्यानों का प्रयोग वृत्तान्त में पाठकों की दिलचस्पी बनाए रखता है तथा कविता को सजीवता प्रदान करता है। ‘अस् रारे ख़ुदी’ की रचना के साथ फ़ारसी शाइरी में इक़बाल ने एक नए दबिस्तान (School) और तर्ज़ की नींव डाली, जिसे आजकल ईरानी विद्वान ‘सब्के इक़बाल’ अर्थात् ‘इक़बालीय शैली’ (Iqbalian Style) कहते हैं।
इक़बाल के काव्य और चिन्तन के अनुशीलन के लिए ‘अस् रारे ख़ुदी’ मूलाधारात्मक है।
Araj-Nihora
- Author Name:
Prakash Uday
- Book Type:

- Description: अगर आप भोजपुरी की मौजूदा सांस्कृतिक मुख्यधारा के साथ आलोचनात्मक सम्बन्ध विकसित करते हुए भोजपुरी जातीयता की पुनर्खोज करना चाहते हैं, अगर आप जीवन-संघर्षों के रस में सनी-पगी भोजपुरी की दूसरी परम्परा से अपने को जोड़ते हैं, अगर आप दया और घृणा के ध्रुवों के बीच विकसित होते इस इलाक़े के जीवन से कोई साबक़ा रखते हैं, तब यह संग्रह आपके ही लिए है।
Chand Ki Vartani
- Author Name:
Rajesh Joshi
- Book Type:

- Description: राजेश जोशी का यह कविता-संग्रह हिन्दी कविता का एक नया शिखर है। तीन दशकों से भी अधिक की काव्य-साधना एवं जीवन के लगभग साठ वसन्तों की हरीतिमा से दीप्त यह संग्रह अनेक स्वरों का विलक्षण पुंज है। राजेश ने न केवल अपने को बदला है, बल्कि अपने को बदलते हुए समस्त समकालीन काव्य में सर्वथा नए घूर्ण उत्पन्न कर दिए हैं। वे सारे गुण और स्वाद जिनके लिए राजेश जोशी जाने और माने जाते हैं, यहाँ अपनी पूर्णता एवं सौष्ठव के साथ उपस्थित हैं, साथ ही बहुत कुछ ऐसा भी है जो नितान्त अप्रत्याशित पर आह्लादकारी है और वह है जीवन को उसकी जटिलता में जाकर देखने का उपक्रम, सभी तहों-परतों को उलट-पुलट अनुभव के नामिक तक उत्खनन का धैर्य—‘दिखने में जो अक्सर आसान से दिखते हैं एक कवि को करने होते हैं ऐसे कई पेचीदा काम’। और इसके लिए राजेश तदनुरूप भाषा की खोज भी करते हैं, बनी-बनाई भाषिक आदतों को छोड़ते हुए वह अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाते हैं—‘ताप से भरे शब्दों’ को ढूँढ़ते दूर बीहड़ में जाते हैं और ‘आँसुओं के लिए’ भी ढूँढ़ लाते हैं वैसे ही ‘पारदर्शी शब्द’। राजेश की कविता हमारे समय का ऐसा संघनित दस्तावेज़ है कि केवल उसके आधार पर हम समकालीन भारत का एक दृश्य-लेख बना सकते हैं। इतने तात्कालिक ब्योरे हैं यहाँ, इतने प्रसंग, पात्र और राजनीतिक-सामाजिक उद्वेलन। साथ ही उनकी कविता जीवन के उन तन्तुओं की खोज करती है जहाँ उन उद्वेलनों का कम्प सबसे तीव्र है, और उन लोगों का यशोगान करती है जो निरन्तर संघर्ष करते हुए जीवन को बदलने का ताब रखते हैं। उनकी कविता साहस के साथ सत्ता के सभी पायदानों पर वार करती है, एक विराट सत्ता जो अर्थव्यवस्था से लेकर हमारी रसोई तक व्याप्त है। नागार्जुन और धूमिल के बाद सत्ता के तिलिस्म को उघाड़नेवाले सर्वाधिक सशक्त कवि राजेशी जोशी हैं। आख्यान, कथोपकथन, लोक-कथाओं के स्वप्न-वृत्तान्त, जातीय मिथक, अतियथार्थ के खम, सपाटबयानी, शब्दों के खेल और कल्पना-क्रीड़ा, फंतासी सब कुछ मिलकर एक नया रसायन बनाते हैं जो अन्यत्र दुलर्भ है। राजेश की कविता अब भाषा के नए उपकरणों एवं आयुधों का व्यवहार करती है तथा कविता को वहाँ ले जाती है जहाँ भाषा ‘अर्थ से अधिक अभिप्रायों में निवास करती है’। यह ठोस जगत् की, ठोस जीवन की कविता है उर्फ़ चाँद की वर्तनी नीले नभ पर। — अरुण कमल
Pani Ki Prarthana : Paryavaran Vishayak Kavitayen
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

- Description: ारनाथ सिंह के कविता-कर्म में प्रकृति और पर्यावरण की उपस्थिति बरगद की जड़ों की तरह इतनी गहरी और विस्तीर्ण है कि उनकी कुछेक कविताओं को पर्यावरण-केन्द्रित कहना अन्याय होगा। उनकी कई ऐसी कविताएँ जो आपाततः प्रकृति और पर्यावरण की परिधि से बाहर दिखती हैं, लोक और प्रकृति के ताने-बाने को अन्तःसलिला की तरह समेटकर रखती हैं। उनकी पर्यावरण सम्बन्धी कविताओं का चयन दुष्कर तो है ही, कइयों को ग़ैरज़रूरी भी लग सकता है। यह भी हो सकता है कि इस तरह के चयन में ऐसी कई कविताएँ छूट जाएँ जिनमें प्रकृति और पर्यावरण की चिन्ता थोड़े भिन्न स्वरूप में मौजूद है। इस चयन का उद्देश्य केदारनाथ सिंह की ऐसी कविताओं को एक स्थान पर दर्ज करना है, जिनमें प्रकृति और पर्यावरण या तो चरित्र-नायक की तरह या स्थापत्य के स्तर पर अधिक प्रदीप्त हैं। आज पूरा विश्व जिस तरह से पर्यावरण संकट से गुज़र रहा है, यह चिन्ता का विषय है। यह चिन्ता जब कवि की चिन्ता बन जाती है तो जीवन के संकट का प्रश्न बन जाती है क्योंकि कवि पूरी पृथ्वी का नागरिक होता है। पृथ्वी की सभी आहटें उसकी बंसी के सुर बन जाती हैं। ऐसे विषय जब लेखन में आते हैं तो अक्सर बेसुरे हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में कविताएँ सुरसाधक-शब्दसाधक की तरह आपका सन्तुलन बनाए रखती हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से केदारनाथ सिंह की कविताओं के चयन का यह सम्भवत: पहला प्रयास है। इससे कवि के दृष्टि-विस्तार को समझने और ऐसे विषयों को भाषा में बरतते हुए ज़रूरी संवेदनशील बिन्दुओं को उजागर करने में कुछ सहायता अवश्य मिलेगी, ऐसी उम्मीद है। साथ ही, कवि के कुछ अनचीन्हे बिन्दुओं को भी रेखांकित किया जा सक
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