Bagh Duhne Ka Kaushal
Author:
Raman Kumar SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 236
₹
295
Available
हिन्दी की समकालीन कविता में कुछ समय से आए बदलाव अभी ठीक से परिभाषित नहीं किए गए हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि वह काव्य-पीढ़ियों से आगे की, जीवन के ज़्यादा विस्तारों को देखती-पहचानती हुई कविता है। अपने पूर्वज कवियों का विवेक उसके अनुभव-संसार में उपस्थित है लेकिन उसकी संवेदना बिलकुल नई और अपनी है। इस संवेदना में यह जानने की बेचैनी है कि समाज, मानव-सम्बन्ध और राजनीति में हमने क्या-क्या खोया है, कौन-सी दुनियाएँ हमसे छूट गई हैं और हमारी मूलभूमि का, हमारी स्थानीयता का क्या हाल है। आश्चर्य नहीं कि रमण कुमार सिंह अपने पहले कविता-संग्रह ‘बाघ दुहने का कौशल’ की ज़्यादातर कविताओं में बार-बार उस जीवन को जाँचते-परखते लौटते हैं जो हमारे पीछे रह गया है और जिसकी जर्जरता और उदासी हमारा पीछा करती रहती है। एक सहज, गँवई यथार्थ और उसका जादू जो अब हमारा अतीत है और हमारे सामने फैले शहरी निम्न-मध्यवर्गीय यथार्थ के आपसी तनाव भी इन कविताओं की अन्तर्वस्तु बनाते हैं और उस ‘लुटेरे समय’ की छवियाँ उभारते हैं जो ‘दादी की लोरियों’ और ‘बुजुर्गों की लाठी’ से लेकर ‘आकाश की नीलिमा’ तक को छीन रहा है और जिसके प्रति विरोध दर्ज करना जरूरी है, अन्यथा वह हमारी अभिव्यक्ति को भी नष्ट कर दे सकता है।
रमण कुमार सिंह की कविताओं में हमारे लोकजीवन का जर्जरित होता स्वरूप बहुत शिद्दत से व्यक्त हुआ है। वे एक तरफ उस संसार की बची-खुची चीजों, परम्पराओं और सम्बन्धों को कविता की स्थायी स्मृति की तरह बचा लेना चाहते हैं तो दूसरी तरफ उस युवक की बेचैनी के पास भी जाते हैं जो लोक में प्रवेश करते बाजार, टूटती चौपाल और डरावने हो रहे पनघट और राजनीति के सत्ता-समीकरणों का साक्षी है और इस यथार्थ को बदल पाने में असमर्थ है। ‘गुजरे हुए बाबा से संवाद’ इसी तरह की एक मार्मिक कविता है जिसमें आज की पीढ़ी का एक प्रतिनिधि अपने पूर्वज को ग्रामीण संस्कृति का मौजूदा हाल सुनाते हुए उस सपने के बारे में पूछता है जिसे देखते-देखते वे अन्ततः सो गए थे। गौरतलब यह है कि यथार्थ बदल रहा है लेकिन स्वप्न भी जीवित है। दरअसल रमण की कविता उम्मीद और नाउम्मीद के बीच कई तरह के रिश्तों की पहचान की दस्तावेज है और कई बार वे ‘देश-परदेस’ को भी इसी रूप में पहचानते हैं।
‘बाघ दुहने का कौशल’ की रचनाएँ हमें उस सरल और मासूम संसार में ले जाती हैं जो वास्तविकता में टूट रहा है, लेकिन हमारे स्वप्नों में साबुत है। भाषा की ताज़गी और शिल्प की लोक-लय के साथ गँवई-शहरी जीवन के विकल रूप रमण की कविताओं के केन्द्रीय बयान हैं जिनमें संवेदना की स्थानिकता का संगीत भी सुनाई देता है।
मंगलेश डबराल
ISBN: 9788126710485
Pages: 107
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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प्रतापराव कदम की कविता, आज के अराजक समय और अख़बारी सतहीपन के दौर में प्रतिकार की कविता है। ज़ाहिर है यह प्रतिकार कवि किसी हथियार से न लेकर अपने वैचारिक परिष्कार एवं परिपक्व भावनात्मक बेध्यता से लेता है। दरअसल यह कविताएँ छोटे शहरों के मनोभावों को केन्द्र में रखते हुए व्यापक स्तर की अराजकता के प्रतिरोध में रची गई हैं। इसी कारण इनका मानस और विस्तार महानगरों की वर्चस्वशाली शक्तियों तक पसरा हुआ है। यह कविताएँ कुछ हद तक अपनी मान्यताओं एवं वैचारिक आग्रह के चलते ऐसा जनतांत्रिक परिदृश्य रचती हैं, जिसमें एक साधारण इनसान की पीड़ा, अवसाद, संघर्ष एवं यातनाएँ एक ऐसे सीमान्त पर खड़ी नज़र आती हैं, जहाँ से लौटकर आना सम्भव नहीं रहता। फिर वह धरातल हितैषियों की चर्चा में मुब्तिला हो या कि एक गर्भवती स्त्री की आशंका और ख़ुशियों का मिला-जुला फ़र्क़—सभी जगह लौटना या कि कुछ सार्थक बचाए रखने की खीज और खरोंचे ही हाथ लगते हैं। कवि का यह सूक्ष्म निरीक्षण देखने लायक है—‘एक आदमी एक जगह से हटता है/हवा तुरन्त ख़ाली जगह भर देती है (हितैषी कहाँ सब्र करते हैं)।’
यह तल्ख़ सच्चाई हमारे समाज और जीवन को आज बुरी तरह कँपा रही है कि एक दिन बाज़ार हम सबको लील जाएगा और हम अपनी सीमाओं और अपेक्षाओं के साथ उन सपनों को भी पूरी तरह गँवा चुके होंगे, जो कभी अपने लिए सोच रखे थे। प्रतापराव कदम यह बख़ूबी जानते हैं कि यहाँ तो एक आदमी के अपने ही धुरी से हटने पर कोई दूसरा उसकी जगह ले लेता है। अपने बचाव के लिए प्रतिहिंसा के स्तर पर उतरा हुआ आदमी अगर कहीं से ख़ुद को बचा भी लेता है, तो बाज़ार का सत्य उसके सच को कहीं पीछे छोड़ देता है। ‘बाज़ार सत्य है कविता नहीं/मैंने जोड़ा उसमें/मृत्यु सत्य है विचार नहीं/ दोनों सत्य को जोड़ो तो/बाज़ार ही सत्य है मृत्यु की तरह (बाज़ार ही सत्य मृत्यु की तरह)।’
जिस कवि को यह सत्य मृत्यु की तरह दिख रहा हो, आप अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि जीवन की तल्ख़ बयानियाँ, समाज का निर्मम विद्रूप एवं हमारे समकालीन समय की उपभोक्तावादी संस्कृति की कितनी सार्थक छवियाँ उसकी कविता में अपना उत्कर्ष पा रही होंगी। यह अकारण नहीं है कि ऐसा कवि इबादत के लिए हाथ उठाए पेड़ पर ‘आसमान ही टूट पड़ेगा’, वसीयत लिखे जाने के कटु यथार्थ पर ‘लोटा’, फल बेचने के सार्थक उद्यम पर ‘डांगरियाँ’ और चाटुकारिता के फूहड़ प्रहसन पर ‘दुम’ जैसी सार्थक और विचारवान कविता लिख रहा है।
ये कविताएँ जीवन के खुरदुरे स्पर्श और उनमें मौजूद उसके सहज सौन्दर्य के सन्तुलन की कविताएँ हैं, जिसमें एक-दूसरे का निषेध नहीं बल्कि उनमें गहरी मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्ति मिली है। यह देखना भी ख़ासा दिलचस्प और क़ाबिलेग़ौर है कि प्रतापराव कदम की निगाह समाज की तमाम उन विद्रूप ख़बरों की गहरी शिनाख़्त में भी शामिल रही है, जिसे कई बार धूर्त इरादों और नृशंसता से इधर-उधर कर दिया जाता है। वे इस अर्थ में राजनीतिक आशयों का भंडाफोड़ करनेवाले कवि भी ठहरते हैं। हैदराबाद में तसलीमा नसरीन पर हुए हमले की बात हो या फिर निठारी का जघन्य हत्याकांड—सभी जगह यह कवि अपनी कलम के नेज़े पर एक प्रश्नवाची राजनीतिक कविता को सम्भव बना रहा है।
एक हद तक इस संग्रह की कविताएँ, प्रश्न करती हुई कविताएँ भी हैं। यह देखना भी प्रासंगिक है कि ये अनगिन प्रश्न ढेरों तरीक़ों से कई दिशाओं में सम्भव हुए हैं। फिर वह कोसी नदी हो, शवयात्रा के आगे बाजा बजाने वाले लोग हों, विष्णु गणपत चौधुले के मार्फत पुलिस विभाग हो, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी हो, फ़ज़र की नमाज़ हो, कबड्डी का खेल हो या फिर नदी की मछली—कवि हर जगह गया है और अद्भुत रूप से अपनी काव्य भंगिमाओं को एक सार्थक संवाद दे पाया है।
भारतीय समाज के मध्यवर्ग के तमाम आख्यानों, इतिहास, स्मृति और राजनीति का अचूक इस्तेमाल करते हुए, साथ ही उसे बाज़ार की भाषा से दूर ले जाकर हर दिन दुःसाध्य होती जाती दुनिया और जीवन को खोजने-नबेरने का साहस दिखाती हुई इन कविताओं में मनुष्य की चिन्ताओं को बड़े फ़लक पर विमर्श का मौक़ा मिला है। इसी कारण इन कविताओं में ऐसे चरित्रा औ गतिविधियाँ सहज ही अपनी भागीदारी बना पाए हैं, जो एक साथ पढ़े जाने पर अपने समवेत प्रतिरोध का शोर रचते हैं।
प्रतापराव कदम, इन कविताओं के बहाने—राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक प्रपंचों पर ऐसा तीक्ष्ण प्रहार करते हैं कि यह देख पाना सम्भव लगता है कि मनुष्य की आकांक्षाओं और सपनों के समर्थन में कभी शब्द या भाषा भी खड़ी हो सकती है। यह इन कविताओं के माध्यम से बख़ूबी सम्भव हो सका है और शोर-शराबे वाले ऐसे कृतघ्न समय में अगर कोई कवि अपने भ्रम के सहारे जीवन की सहजता को बचाए रखता है, तो वह कोशिश कम नहीं मानी जा सकती—‘दूर से, अछड़ते जैसे कोई है झोपड़ी में/जैसे कोई फ़सल निहारते खड़ा बीच खेत/यही भरम बनाए-बचाए रखता है। (भरम)’
इसी भरम को पोसते हुए स्वयं कवि, उसकी कविता या पाठक ही नहीं, बल्कि वे तमाम लोग भी समृद्ध होते हैं, जिनके जीवन में इस तरह का कोई भरम या विश्वास बचा हुआ है।
—यतीन्द्र मिश्र
Swapn Samay
- Author Name:
Savita Singh
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Description:
‘स्वप्न समय’ सविता सिंह की महत्त्वपूर्ण कविताओं का संग्रह है। इस संग्रह में सविता अपने चिन्तन, सरोकारों, सौन्दर्यबोध व भाषा के विशिष्ट उपकरणों के साथ नए इलाक़ों का सन्धान करती हैं, जोखिम उठाती हैं और आख़िरकार जो मुमकिन करती हैं, वह दुर्लभ है। इन कविताओं की विरलता उस धरातल पर है जहाँ अतीत कवयित्री के अनुभव और अभिप्राय में एक जीवित कारक सरीखा प्रकट होता है; स्मृति एक उद्द्दाम प्रवाह की तरह गहरे अन्तर्संघर्षों से संपृक्त है और सारे रूपाकारों और बिम्बों को सहेजकर एक अनूठी वसुधा को सिरजती है। इन कविताओं में वास्तव-वर्तमान स्वप्न के जिन धागों, रंगों व रंगतों से आच्छादित है वे हिन्दी के सांस्कृतिक बोध को निश्चय ही सम्पन्नतर बनानेवाले हैं।
‘स्वप्न समय’ में हिंसा और करुणा, यथार्थ और कल्पना तथा सार्वजनिक और एकान्तिक की अन्तर्क्रिया का एक द्वन्द्वात्मक रचाव है जो कभी एक प्रगाढ़ और अर्थ-गम्भीर मौन रचता है तो कभी एक संश्लिष्ट निनाद जिसके आशय में स्थायी अनुगूँजों का वास है। यह स्त्री के अस्तित्व और यथार्थबोध की ऐसी समग्र दुनिया है जहाँ यातना, पीड़ा तथा अवसाद के बरक्स आशा-आकांक्षा, स्वप्न और नई निर्मितियों की तृप्ति और उल्लास भी सहज सहजीविता में उपस्थित है। अस्मिताओं की मुक्ति की छटपटाहट और अभिव्यक्ति की उत्कट आकांक्षा के बीच स्त्री-मुक्ति की सार्वभौम आवाज़ ने समाजों और संस्कृतियों में जो जगह बनाई है वह हिन्दी कविता में भी महसूस की जा सकती है। सविता सिंह ने इस नई ज़मीन पर सर्वाधिक सामर्थ्य के साथ अपने काव्य व्यक्तित्व को निर्मित किया है।
‘अपने जैसा जीवन’ और ‘नींद थी और रात थी’ के बाद ‘स्वप्न समय अब उनकी नैसर्गिक शक्तिमत्ता के विलक्षण आख्यान के समान हमारे सम्मुख है। इस संग्रह की कविताओं में अनेक ऐसी कविताएँ हैं जिनमें स्त्री के चेतन, उप-चेतन या अवचेतन की वह अप्रकाशित और नीम-अँधेरी दुनिया है जो ‘प्रकट होकर विकट हो’ जाने को आतुर है। यह दीगर है कि सविता ने इस दुनिया को असीम स्वप्नों में ढालकर स्त्री के कई-कई जन्मों और पुनर्जन्मों की वाहिका, भोक्ता और साक्षी बनने का अभूतपूर्व और सफल उद्यम किया है। स्वप्न समय की कवयित्री का यह काव्य उद्यम इस अर्थ में अप्रतिम है कि यहाँ स्वप्नमयता, फन्तासी और सघन बिम्ब मालाएँ, सब उसी यथार्थ का विस्तार हैं जिसमें ‘अपने जैसा जीवन’ जीते हुए रचना की नवोन्मेष-भरी समृद्धि उपलब्ध की गई है। यही वह कारण है जिससे ‘स्वप्न समय’ की ऊर्जस्वित प्राणवत्ता नितान्त मौलिक है—कालातीत गरिमा से दीप्त और अक्षुण्ण।
Yakshini
- Author Name:
Vinay Kumar
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ऐसा कहते हैं हठयोगी और युंग भी कि आदमी का वजूद, उसकी स्मृतियाँ, खासकर जातीय स्मृतियाँ, एक परतदार शिला की तरह उसके अवचेतन के मुँह पर सदियों पड़ी रहती हैं। फिर अचानक कोई ऐसा क्षण आता है कि शिला दरकती है, हहाता हुआ कुछ उमड़ आता है बाहर और कूल-कछार तोड़ता हुआ सारा आगत-विगत बहा ले जाता है। शेष रहता है एक संदीप्त वर्तमान और उस पर पाँव और चित्त टिकाकर कोई खड़ा रह गया तो उसकी बूँद समुद्र हो जाती है यानी अगाध हो जाती है उसकी चेतना ।
ऐसा लगता है कि अपने डॉ. विनय सचमुच ही प्रत्यभिज्ञा के किसी विराट एहसास से गुजरे हैं। जिन बारह आर्किटाइपों की बात युग कहते हैं-योद्धा, प्रेमी, संन्यासी, सेवा-निपुण, अभियानी, जादूगर, विदूषक, नियोजक, द्रष्टा, भोला-भंडारी, विद्रोही वगैरह, उनमें इनका वाला आर्किटाइप प्रेमी-संन्यासी विद्रोही तीनों की मिट्टी मिलाकर बना होगा जैसा कि सर्जकों का अक्सर होता है।
एक क्षीण कथा-वृत्त के सहारे तीन मुख्य किरदार कौंधते हैं-रानी, उसकी अनुचरी यक्षी और वह शिल्पी जो आया तो था रानी का उद्यान तरह-तरह की मूर्तियों से सजाने पर यक्षी की छवि उसके भीतर के पानियों में उसके जाने-अनजाने, चाहे अनचाहे ऐसी उतरी कि सबसे बड़ी शिला पर उसी की मूर्ति उत्कीर्ण हो गई। ईर्ष्या-दग्ध रानी की तलवार उसका एक हाथ काट तो गई पर फिर सदियों बाद जब भग्न मूर्ति के आश्रय उसकी स्मृतियाँ जगीं तो उमड़ पड़ा पचासी बन्दों का सजग आत्म-निवेदन इसकी सान्द्रता, त्वरा और चित्रात्मकता डी.एच. लॉरेन्स के मैन-वुमन-कॉस्मॉस वाले उस अभंग गुरुत्वाकर्षण की याद दिला देती है जिसका आवेग हिन्दी की कुछ और लम्बी कविताओं में कल-कल छल-छल करके बहता दिखाई देता है (जैसे कि उर्वशी, कनुप्रिया, मगध, बाघ आदि में)।
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