Aatmadroh
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‘आत्मद्रोह’आर. चेतनक्रान्ति का आत्मवान संग्रह है, इस अर्थ में कि जो शक्तियाँ नागरिकता और राष्ट्र की आत्मा को नष्ट करना चाहती हैं, वे उनकी गहरी पहचान करते हैं और इस तरह सामूहिक आत्मा के पुनर्वास की युक्तियाँ तलाशते हैं। उन्हें इस बात का पूरा अभिज्ञान है कि समुदायों का नैतिक बल घटा है। वह अफ़वाह, असत्य और घृणा का शिकार हुआ है। वह गहरे अफ़सोस के साथ देखते हैं इस परिघटना को जो उनकी कविता में तंज़ और आत्मावगाहन में बदलती जाती है। सामाजिक और राजनीतिक अधःपतन को वह व्यंग्यार्थ और कई बार गहरे कटाक्ष के साथ कहते हैं। उनकी नागरिक सजगता भाषिक सजगता में संक्रमित होती है जो अन्तत: विरल काव्यात्मक उठान में परिलक्षित होती है। शमशेर बहादुर सिंह की परम्परा में चेतन हिन्दी के उन गिने-चुने विशिष्ट कवियों में हैं जो उर्दू ग़ज़लें और नज़्म, जो इस संग्रह का भी हिस्सा हैं, कहते हुए अविलेय आपसदारी का पुनर्स्मरण कराना नहीं भूलते। इस संग्रह में यदि कवि का स्वर बदला हुआ है, वह अधिक तल्ख़ और तेज़ाबी हुआ है तो इसलिए कि समय बदला है और सामाजिक विषाक्तता बहुत तेज़ी के साथ बढ़ी है। कोमलता और पारस्परिकता के इस संहार के सामने न तो निरुपाय हुआ जा सकता है और न ही तटस्थ। चेतन इस अवस्थिति के लिए विडम्बना और आत्म-धिक्कारवाले स्वर और संरचना को उन्मोचित करते हैं। शोकनाच’ (2004) और ‘वीरता पर विचलित’ (2017) के बाद ‘आत्मद्रोह’ आर. चेतनक्रान्ति का तीसरा कविता-संग्रह है। सांस्कृतिक कूद-फाँद वाले इस अवसरवादी माहौल में चेतन ने आत्म-निर्वासन और सन्त जैसे काव्य-व्यक्तित्व की जो विलक्षणता अर्जित की है, वह हिन्दी की बड़ी उपलब्धियों में एक है। —देवी प्रसाद मिश्र
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‘आत्मद्रोह’आर. चेतनक्रान्ति का आत्मवान संग्रह है, इस अर्थ में कि जो शक्तियाँ नागरिकता और राष्ट्र की आत्मा को नष्ट करना चाहती हैं, वे उनकी गहरी पहचान करते हैं और इस तरह सामूहिक आत्मा के पुनर्वास की युक्तियाँ तलाशते हैं। उन्हें इस बात का पूरा अभिज्ञान है कि समुदायों का नैतिक बल घटा है। वह अफ़वाह, असत्य और घृणा का शिकार हुआ है। वह गहरे अफ़सोस के साथ देखते हैं इस परिघटना को जो उनकी कविता में तंज़ और आत्मावगाहन में बदलती जाती है। सामाजिक और राजनीतिक अधःपतन को वह व्यंग्यार्थ और कई बार गहरे कटाक्ष के साथ कहते हैं। उनकी नागरिक सजगता भाषिक सजगता में संक्रमित होती है जो अन्तत: विरल काव्यात्मक उठान में परिलक्षित होती है।
शमशेर बहादुर सिंह की परम्परा में चेतन हिन्दी के उन गिने-चुने विशिष्ट कवियों में हैं जो उर्दू ग़ज़लें और नज़्म, जो इस संग्रह का भी हिस्सा हैं, कहते हुए अविलेय आपसदारी का पुनर्स्मरण कराना नहीं भूलते। इस संग्रह में यदि कवि का स्वर बदला हुआ है, वह अधिक तल्ख़ और तेज़ाबी हुआ है तो इसलिए कि समय बदला है और सामाजिक विषाक्तता बहुत तेज़ी के साथ बढ़ी है। कोमलता और पारस्परिकता के इस संहार के सामने न तो निरुपाय हुआ जा सकता है और न ही तटस्थ। चेतन इस अवस्थिति के लिए विडम्बना और आत्म-धिक्कारवाले स्वर और संरचना को उन्मोचित करते हैं।
शोकनाच’ (2004) और ‘वीरता पर विचलित’ (2017) के बाद ‘आत्मद्रोह’ आर. चेतनक्रान्ति का तीसरा कविता-संग्रह है। सांस्कृतिक कूद-फाँद वाले इस अवसरवादी माहौल में चेतन ने आत्म-निर्वासन और सन्त जैसे काव्य-व्यक्तित्व की जो विलक्षणता अर्जित की है, वह हिन्दी की बड़ी उपलब्धियों में एक है।
—देवी प्रसाद मिश्र
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2023
- Weight
- 130 grams
- ISBN-13
- 9788119159406
- Pages
- 136
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 13 × 20 cm
- Language
- Hindi
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बिगड़ते पर्यावरण की समस्या आज मनुष्य के लिए भूख के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। भूख जिस तरह एक देह के अस्तित्व के लिए आसन्न ख़तरा होती है, उसी तरह पर्यावरण-विनाश सृष्टि के अस्तित्व के लिए होता है। एक-एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हम लोगों की आँखों से वह ख़तरा भले ही इतने स्पष्ट और ठोस रूप में न दिखाई देता हो, और भले ही हम बीच-बीच में प्रकृति द्वारा दी जानेवाली चेतावनियों को नज़रअन्दाज़ करने की ढीठता भी जुटा लेते हों, लेकिन जल, ज़मीन, हवा और हरियाली का सतत क्षरित होता जीवन उन निगाहों से अनचीन्हा नहीं रह जाता जो प्रस्तुत उल्लास की झीनी चदरिया के पार दूर क्षितिज के धुँधलके में लिखी जा रही नाश-विनाश की पटकथाओं की पंक्तियाँ पढ़ लेती हैं, यानी कवियों और रचनाशील हृदयों की निगाहें। यह पुस्तक प्रकृति और कवि के इसी अपने, और समाज की रिश्तेदारियों के धोखादेह प्रपंच से परे, उनके निहायत पवित्र और निजी रिश्ते का दस्तावेज़ है। पाठकगण इस किताब को सरकारों और संस्थाओं के रस्मी पर्यावरण-प्रेम और शुष्क रुदन के काव्यानुवाद के रूप में न लें। यह समष्टि-मन के रचनाकुल और ईमानदार स्नायुओं की पीड़ाजनित प्रतिक्रियाओं का संकलन है जिसमें हिन्दी के नए-पुराने, वरिष्ठ, श्रेष्ठ और सजग रचनाकारों ने प्रकृति के साथ अपनी सम्बन्ध-यात्रा के सबसे चिन्तित क्षणों को वाणी दी है। संग्रह में एक सौ एक समकालीन कविताएँ और पैंतालीस कवि शामिल हैं। कौन छोटा है, कौन बड़ा है, यह सवाल अप्रासंगिक है। क्योंकि कविता का विषय महत्त्वपूर्ण है, समस्याओं की भयंकरता प्रासंगिक है। एक ही त्रासदपूर्ण मुद्दा सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। सब में आशंकाएँ हैं तो साथ ही आशाएँ भी हैं। प्रकृति की आसन्न मृत्यु पर चीख़ने के बजाय प्रतिरोध खड़ा करना ये रचनाकार अपना दायित्व समझते हैं।
Nihshabd Noopur : Rumi Ki 100 Gazalein
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Rumi +1
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रूमी ईरान के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी ग़ज़लें ऊर्जस्वी काव्य के दुर्लभ उदाहरणों में से हैं। रूमी की ग़ज़लें सामान्य कविताओं की तुलना में अलग हैं। इनकी प्रत्येक ग़ज़ल का हर शे’र आत्म-अनुभूति की परिपूर्णता से उच्छलित है। इनकी कविता केवल काव्यात्मक चमत्कारों को प्रदर्शित कर पाठकों को लुब्ध करने में पर्यवसित नहीं होती, बल्कि दिल से निकलकर मस्तिष्क और हृदय को भिगोती हुई आत्मा तक का स्पर्श कर लेती है। प्रस्तुत पुस्तक उनकी चुनिन्दा 100 ग़ज़लों का अनुवाद है। इस पुस्तक के माध्यम से रूमी पहली बार सीधे फ़ारसी से हिन्दी में अनूदित हुए हैं। इसमें सबसे पहले फ़ारसी ग़ज़लों का देवनागरी में लिप्यन्तरण प्रस्तुत किया गया है, फिर साथ में ही उनका हिन्दी अनुवाद दिया गया है। अन्त में मूल ग़ज़लें फ़ारसी लिपि में भी रखी गई हैं। पुस्तक के अन्त में दिए गए अनेक परिशिष्टों के माध्यम से फ़ारसी काव्य-भाषा को समझने के महत्त्वपूर्ण उपकरण जुटाए गए हैं। ग़ज़लों में प्रयुक्त सभी छन्दों को ईरानी तथा भारतीय काव्यशास्त्रीय रीति से समझाया गया है। क्लासिकल फ़ारसी कविता के सम्यक् परिचय के लिए आवश्यक संक्षिप्त फ़ारसी व्याकरण जोड़ा गया है। अन्त में प्रत्येक शब्द का अर्थ भी दिया गया है। इस प्रकार मूल से जुड़े रसपूर्ण अनुवाद की प्रस्तुति के साथ ही यह पुस्तक रूमी-रीडर के तौर पर भी उपयोग में आने योग्य है।
Kavi Man Jani Man :Aadivasi Stri Kavitayen
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Vandana Tete
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आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।
Aatishdan
- Author Name:
Azm Shakri
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अज़्म शाकिरी की ये किताब अपनी जज़्बाती गहराई और असरदार अंदाज़ के कारण दिलों को छूती है। उनके अशआर ज़िंदगी, मोहब्बत और वुजूद के गहरे मायनों को बड़ी खूबसूरती से बयान करते हैं। उनकी ये किताब इस बात की मिसाल है कि वो पारम्परिक ग़ज़ल के ढाँचे को मौजूदा दौर के एहसासात से जोड़ने में माहिर हैं। अज़्म शाकिरी (मोहम्मद मियाँ ) 23 फ़रवरी 1972 को गंजडुंडवारा, ज़िला कासगंज, उत्तर प्रदेश में पैदा हुए और वहीं शिक्षा प्राप्त की। बाद में मौलाना आज़ाद विश्वविद्यालय से उर्दू में एम. ए. किया। 1987 में शायरी शुरू की। 2003 में पहली किताब “बर्फ़” के नाम से आई। दूसरी किताब 2008 में “सुर्ख़ाब” के नाम से आई। तीसरी किताब 2014 में “मेहराब-ए-इश्क़” और चौथी किताब 2019 में “क्या पत्थर के हो गए हम” के नाम से आई। अज़्म शाकिरी मुशायरों और कवि सम्मेलनों में काफ़ी प्रसिद्ध हुए। ग़ज़ल उनकी ख़ास पहचान बनी। भारत से बाहर भी कई दूसरे देशों में गए और यह सिलसिला आज भी जारी है।
Ek Charwahe Ka Geet
- Author Name:
Ketan Yadav
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वे न मनु थे न आदम/ग्रन्थों की गढ़ी हुई छवियों के बाहर/वे केवल और केवल चरवाहे थे। यह एक चरवाहे का गीत है जो सभ्यता के समानान्तर बजते हुए एक अपनी दुनिया का दावा पेश कर रहा है—उस सभ्यता के बरक्स जिसमें चारागाह दफ़्न होते जा रहे हैं। यह सभ्यता की आलोचना नहीं बल्कि प्रकृति के साहचर्य में जीती उस दुनिया का स्मरण है जो अगर अपने ही रास्ते आगे बढ़ती तो वैसी न होती जैसी आज हमारी यह दुनिया है। इन कविताओं को पढ़ते हुए अग्रगामिता की किसी वैकल्पिक सरणि का अभाव हमें लगातार विचलित करता है। हिंसा के नवीनतम दृश्यों की आदी होती आँखें जो कुछ भी देखने की तैयारी कर चुकी हैं, हमारे वर्तमान की आँखें हैं, जिनके लिए अद्यतित होने का अर्थ है और अधिक संवेदनशून्य होना, और भी भीषण को पचा लेने को प्रस्तुत रहना। ये कविताएँ इस प्रक्रिया को अलग-अलग कोणों से देखती हैं, और कहीं अपनी सावधानी को ढीला नहीं होने देतीं। तकनीक के आधुनिक युवा संसार की सत्ता को लेकर भी ये कविताएँ कम सजग नहीं हैं— मेरे मनुष्य के सामने तुमसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, पुरखा कवियो!/यहाँ मनुष्य बनाम मनुष्य नहीं, मशीन है। ऐन्द्रीय स्पर्श के दिन-ब-दिन संकीर्ण और सपाट होते जाने के मुकाबले प्रेम यहाँ एक उम्मीद की तरह आता है, लेकिन क्या वह भी हमारी पहुँच में है, मशीनों की इस्पाती निस्पन्द धवल चौंध को चीरकर क्या उस तक हमारा वह आर्त स्वर पहुँच पाता है जिसके सामने ‘कभी सूर्योदय न होनेवाली रात’ किसी भी दिन आ खड़ी होगी! आशंका जो मौजूदा समय की निर्मिति के अभिन्न हिस्से के रूप में हमारे चारों ओर उपस्थित है, इन कविताओं में बार-बार लौटती है। यह इस युवा कवि की सूक्ष्म संवेदना का प्रमाण है और सामाजिक-राजनीतिक बोध का भी जिसका एक सिरा जरूरी तौर पर तकनीक के आतंक से जा जुड़ता है जो अब मनुष्य को सामने से नहीं, ऊपर से देख रही है—देवता की तरह। पेड़ों, पशुओं और पत्तियों की भाषा से लेकर मशीनों की चीख तक को सुनतीं ये कविताएँ पाठक को निःसन्देह एक भिन्न धरातल पर ले जाएँगी।
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है। काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है। उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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Book
Tokri Mein Digant
- Author Name:
Anamika
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अनामिका के नए संग्रह ‘टोकरी में दिगन्त—थेरी गाथा : 2014’ को पूरा पढ़ जाने के बाद मेरे मन पर जो पहला प्रभाव पड़ा, वो यह कि यह पूरी काव्य-कृति एक लम्बी कविता है, जिसमें अनेक छोटे-छोटे दृश्य, प्रसंग और थेरियों के रूपक में लिपटी हुई हमारे समय की सामान्य स्त्रियाँ आती हैं। संग्रह के नाम में 2014 का जो तिथि-संकेत दिया गया है, मुझे लगता है कि पूरे संग्रह का बलाघात थेरी गाथा के बजाय इस समय-सन्दर्भ पर ही है। संग्रह के शुरू में एक छोटी-सी भूमिका है, जिसे कविताओं के साथ जोड़कर देखना चाहिए। बुद्ध अनेक कविताओं के केन्द्र में हैं, जो बार-बार प्रश्नांकित भी होते हैं और बेशक एक रोशनी के रूप में स्वीकार्य भी। इस नए संकलन में अनेक उद्धरणीय काव्यांश या पंक्तियाँ मिल सकती हैं, जो पाठक के मन में टिकी रह जाती हैं। बिना किसी तार्किक संयोजन के यह पूरा संग्रह एक ऐसे काव्य-फलक की तरह है, जिसके अन्त को खुला छोड़ दिया गया है। स्वयं इसकी रचयिता के अनुसार “वर्तमान और अतीत, इतिहास और किंवदन्तियाँ, कल्पना और यथार्थ यहाँ साथ-साथ घुमरी परैया-सा नाचते दीख सकते हैं।” आज के स्त्री-लेखन की सुपरिचित धारा से अलग यह एक नई कल्पनात्मक सृष्टि है, जो अपनी पंक्तियों को पाठक पर बलात् थोपने के बजाय उससे बोलती-बतियाती है, और ऐसा करते हुए वह चुपके से अपना आशय भी उसकी स्मृति में दर्ज करा देती है। शायद यह एक नई काव्य-विधा है, जिसकी ओर काव्य-प्रेमियों का ध्यान जाएगा। समकालीन कविता के एक पाठक के रूप में मुझे लगा कि यह काव्य-कृति एक नई काव्य-भाषा की प्रस्तावना है, जो व्यंजना के कई बन्द पड़े दरवाज़ों को खोलती है और यह सब कुछ घटित होता है एक स्थानीय केन्द्र के चारों ओर। कविता की जानी-पहचानी दुनिया में यह सबाल्टर्न भावबोध का हस्तक्षेप है, जो अलक्षित नहीं जाएगा। —केदारनाथ सिंह
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