Hajra Ka Burqa Dheela Hai
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हाजरा का बुर्का ढीला है', डॉ. तबस्सुम जहान की एक आकर्षक हिंदी साहित्यिक कृति है। इस सोच-समझकर तैयार की गई किताब में एक कलात्मक आवरण है, जो शरद ऋतु के रंगों की एक गर्म, अलौकिक पृष्ठभूमि के खिलाफ एक सुंदर सिल्हूट को दर्शाता है। सुंदर हिंदी टाइपोग्राफी और सौंदर्यपूर्ण डिजाइन तत्व कथा विषयों के साथ सहजता से मिश्रित होते हैं। साहित्य के प्रति उत्साही और कविता प्रेमियों के लिए बिल्कुल सही, यह पुस्तक आपके संग्रह में एक सार्थक वृद्धि का वादा करती है।
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हाजरा का बुर्का ढीला है', डॉ. तबस्सुम जहान की एक आकर्षक हिंदी साहित्यिक कृति है। इस सोच-समझकर तैयार की गई किताब में एक कलात्मक आवरण है, जो शरद ऋतु के रंगों की एक गर्म, अलौकिक पृष्ठभूमि के खिलाफ एक सुंदर सिल्हूट को दर्शाता है। सुंदर हिंदी टाइपोग्राफी और सौंदर्यपूर्ण डिजाइन तत्व कथा विषयों के साथ सहजता से मिश्रित होते हैं। साहित्य के प्रति उत्साही और कविता प्रेमियों के लिए बिल्कुल सही, यह पुस्तक आपके संग्रह में एक सार्थक वृद्धि का वादा करती है।
Book Details
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ISBNB0DWT227FW
-
Pages94
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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कविता अपने विचार बाहर से उधार नहीं लेती, बल्कि ख़ुद सोचती है, अपनी ही सहज-कठिन प्रक्रिया से अपना विचार अर्जित करती है—रघुवीर सहाय की कविताएँ कविता की वैचारिक सत्ता का बहुत सीधा और अकाट्य साक्ष्य हैं। हिन्दी के विचार-प्रमुख दौर में इस कविता-वैचारिकता का ऐतिहासिक महत्त्व है।
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- Description: मुकेश निर्विकार की कविताओं में एक जागृत प्रतिरोध के साथ-साथ असीम जिजीविषा प्रतिबिम्बित होती है जो कवि और उसकी कविताओं की शक्ति है। —अश्वघोष, ('निकट' पत्रिका से) मुकेश निर्विकार की कविताओं की विशेषता है कि वह दार्शनिक धरातल पर चीज़ों को देखते हैं, मगर उससे कविता में कहीं भी उलझाव नहीं आने देते। बल्कि, दर्शन विसंगतियों को संघनित कर देखने के काम आता है। उनकी कविताएँ गूढ़ यथार्थ को बहुत पारदर्शी ढंग से सामने लाती हैं। कविताएँ कभी सृष्टि के रहस्यों पर बातें करती हैं तो कभी रोटी की मुश्किलों पर। कवि पूरे जीवन-जगत का सीधा मुकाबला करता है। —मनोज कुमार झा, ('पाखी' पत्रिका से) 'हत्यारी सदी में जीवन की खोज' की कविताओं के ज़रिए कवि ने अंधेरों की पुनर्रचना करते हुए निरन्तर अराजक हो रहे समय के क्रूर-यथार्थ को उजागर किया है। समग्र रूप में सभी कविताएँ जीवन के उजास की कविताएँ हैं। इनमें सर्वत्र एक गहरी आशावादिता के युगबोध का 'अंडर-करेन्ट' है। कई कविताओं का कथ्य तो विचलित कर देने वाला है। विलक्षण काव्य-भाषा के ज़रिए कवि ने ढेरों मौलिक बिम्ब रचे हैं, जिनकी सतरंगी छवियाँ किसी पाठक को सहज ही सम्मोहित कर देती है। मानवीय सरोकारों से जुड़ी और उनके कोमल भावों को दीमक की तरह चाटती क्रूर विसंगतियों का कवि ने सहज ही चित्रण किया है। रोज़ी-रोटी की तलाश में भटकता कामगार हो या महानगरीय जीवन के संत्रास को भोगता आम आदमी, कवि की नज़र हर तरफ है। जनसत्ता कुछ लोग कविता में जीवन की तलाश करते हैं। कुछ लोग कविता में जीवन को ढूँढ़ लेते हैं। मुकेश निर्विकार ने जि़न्दगी को कविता में इस तरह उतारा है कि उनकी कविताएँ दोनों तरह के लोगों के काम आती है। सरल और सहज शब्दों के ज़रिये भी उनकी कविताओं में कटाक्ष का स्वर बुलन्द है। अमर उजाला
Pakistani Urdu Shayari - Vol. 5
- Author Name:
Narendra Nath
- Book Type:

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Description:
साहित्य सरहदों से ऊपर होता है, कविता सीमाओं की नहीं, इनसानियत के समूचे वजूद की बात करती है, जो तमाम बँटवारों के ऊपर है और एक है।
‘पाकिस्तानी उर्दू शायरी’ शीर्षक यह शृंखला भारत और पाकिस्तान के उस साझा दिल को रौशन करती है जो लहूलुहान सरहदों के बावजूद दोनों तरफ़ एक साथ, एक ही तरह धड़कता है, उन गलियों, मुहल्लों, खेतों और पगडंडियों का नक़्शा दिखाती है जिनके रंग-ढंग को बँटवारा नहीं बदल सका, उस विरसे की याद दिलाती है, जो तमाम राजनीतिक हठधर्मियों के बावजूद अब भी एक है।
इस शृंखला का उद्देश्य पाकिस्तान के उन अनेक शायरों से हिन्दी पाठक का परिचय कराना भी है जिन्हें हम नहीं जानते। वे लोग जो इंडो-पाक मुशायरों और कल्चरल डेलीगेशनों का हिस्सा नहीं होते, लेकिन जिन्होंने कहने के फ़न को तराशा है और तमाम ख़तरों के सामने अपनी बात कहने की हिम्मत दिखाई है।
इन शायरों और उनके कलाम को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाने के लिए सम्पादकों ने न सिर्फ़ वहाँ के पुस्तकालयों और किताबघरों की ख़ाक छानी है, बल्कि नए-पुराने रिसालों और अख़बारों की फ़ाइलें भी पलटी हैं, और शायरों से ख़तो-किताबत भी की है।
‘पाकिस्तानी उर्दू शायरी’ का यह पाँचवाँ खंड इस शृंखला की नई कड़ी है, जिसमें बारह शायरों की रचनाएँ परिचय के साथ शामिल हैं।
Niyati Ka Yayawar
- Author Name:
Harish Anand
- Book Type:

- Description: कोई भी रचनाकार अन्ततः अपने समय को समझने और उसे व्याख्यायित करने का शब्दयोग ही तो साधता है। ‘अपने समय’ की परिभाषा हर रचनाकार के लिए अलग-अलग होती है। ...यही ‘समय’ कवि हरीश आनंद की रचनाओं का बीज शब्द है। ‘नियति का यायावर’ संग्रह की कविताओं में समय के अनेक आयामों से साक्षात्कार किया गया है। इस प्रक्रिया में कवि व्यक्ति और समाज के बीच मंडित विखंडित सभ्यता के प्रारूपों का विश्लेषण करता रहता है। ‘यायावर’ अज्ञेय का प्रिय शब्द है।...और हरीश आनंद का भी। उन्हें क्षण की चेतावनी याद रहती है ‘अरे यायावर, रहेगा याद!’ हरीश की कविताएँ वस्तुतः वे सघन अन्तःयात्राएँ हैं जिनकी कुछ स्मृतियाँ शब्दों में समा गई हैं। यही कारण है कि ये कविताएँ विवरणों के अरण्य में भटकती नहीं हैं। संकेतों, बिम्बों, अनुभूतियों व व्यंजनाओं से समृद्ध ये कविताएँ आत्म से आत्मीय संवाद स्थापित करती हैं। इनमें विषय-वैविध्य है। जीवन-दर्शन की अबूझ सच्चाइयों से लेकर उत्तर-आधुनिकता की सभ्यता-समीक्षा तक हरीश आनंद की कविताओं की आवाजाही है। हरीश आनंद का कवि स्वभाव है कि वे शब्दों को उनके प्रचलित अर्थों से विचलित करते हुए नए निहितार्थों का उत्खनन करते हैं। ‘अर्थ’ कविता में वे शब्दों की ओर से एक गुहार लगाते हैं कि ‘हम तुम्हारी कुंठाओं की/परिभाषाएँ नहीं हैं।’ कवि के स्वभाव में दार्शनिकता सहज रूप से समाविष्ट है, अमूर्तन और पारिभाषिक पुनर्कथन वाले अर्थ में नहीं। हरीश आनंद की दार्शनिकता जीवन की सार्थकता का अनुसंधान करती है। ‘नियति का यायावर’ इसलिए भी एक महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह है क्योंकि इसमें संवेदनाओं के कई मन्द्र स्वर सुनने को मिलते हैं। कवि ने रंगमंचीय सन्दर्भों का भी अच्छा उपयोग किया है। यह सब सम्भव हुआ है एक प्राणवान, अर्थसम्पन्न और अनवरुद्ध भाषा में। हरीश आनंद शब्दों में निहित गतिशीलता व अर्थसम्भावना के पारखी रचनाकार हैं। स्वाभाविक रूप से यह संग्रह किसी भी पाठक का सहचर बन सकता है।
Man Akela Ho Gaya Hai
- Author Name:
Vijay Joshi
- Book Type:

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Description:
भावनाओं से भरा इनसान शायरी न करे तो क्या करे। विजय जोशी बड़े जज़्बाती इनसान हैं। हर बात उन्हें छू जाती है, रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में, सुबह की हवा और सूरज की पहली किरन से लेकर, दिन डूबने और चाँद निकलने तक, हर लम्हे से भिड़ते हुए गुज़रते हैं। उन्हें सचमुच जीना आता है। इसीलिए जज़्बात पल-पल बुलबुलों की तरह उठते हैं और वह उन्हें टूट जाने से पहले पकड़ लेना चाहते हैं। कविता के कटोरे में आ जाएँ तो बच जाते हैं, वरना बह जाते हैं और फिर अगला दिन...
‘‘दोस्त
उस दिन तीस साल बाद
तुम्हारे सफ़ेद हो रहे बालों ने कही
समय के थपेड़ों की कई कहानियाँ
और मेरे चश्मे के नम्बर में छुपी थीं
गुज़रे पलों की निशानियाँ।’’
क्योंकि विजय बाक़ायदा शायरी नहीं करते, यानी मेरी तरह यह उनके लिए ज़रिया-ए-रोज़गार नहीं है। लेकिन ग़मे-रोज़गार के लिए बाक़ायदा लिखते रहते हैं अख़बारों में, रिसालों में और ख़तों में। मैं उनके शायराना ख़ुतूत हासिल कर चुका हूँ। उनकी नज़्में निजी लगती हैं लेकिन वह इतनी निजी हैं नहीं। एक जागी हुई चेतना और मुकम्मिल Social consciousness का एहसास देती हैं। वह अपना चौगिर्द लफ़्ज़ों से पेंट करते हैं, लेकिन लफ़्ज़़ों के वक़्फ़ों में इतना कुछ लिख देते हैं कि उसमें इतिहास नज़र आने लगता है। एक कोताहिये ‘ज़मीर’—
‘‘कल रात मेरा ज़मीर मर गया—
मर तो शायद काफ़ी पहले गया था...
मैंने इस एहसास को,
आत्मा तक उतरने नहीं दिया।
आख़िर अपनों की मौत से कौन समझौता कर पाया है!’’
वह अपना माज़ी और वरसे में मिली धरती और उसकी सुन्दरता बयान करते हैं और उनमें छोटे-छोटे चित्र भी उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा रहे हैं। स्कूल के पीछे इमली का पेड़ खेतों की कोरों पर मिट्टी की मेंड़ सब गुम हो गया मेरे बच्चो, मैं तुमसे शर्मिन्दा हूँ—विरासत के नाम पर छोड़कर जाऊँगा उजड़ी-सी धरती, स्याह आसमान। विजय जितनी CASUALLY लिखते हैं, उतने ही ग़ौर से पढ़ने के क़ाबिल हैं, क्योंकि इस सादगी के पीछे एक निहायत ज़िम्मेदार की आत्मा जाग रही है।
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