Aapai Aapan Paar
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हूँ न मैं हूँ धीरे-से इतना बस / थकी हुई चिड़िया से कहता है / पानी में फूला हुआ दाना।अनुभूति के बहुस्तरीय सच को कविता में पूरा-पूरा कह सकने वाली, हमारे समय की समर्थ कवि अनामिका की प्रेम कविताओं का यह संग्रह ‘आपै आपन पार’ प्रेम का जैसे एक सम्पूर्ण पाठ है। ‘लरिकाई को प्रेम’ से चलकर ‘वार्धक्य में प्रेम की दस्तक’ और घनानंद से लेकर आज के तकनीक-समृद्ध समय तक फैला प्रेम का यह आख्यान प्रेम के अनेक पड़ावों से गुज़रता है और जीवन के इस आधारभूत तत्त्व को हिंसाओं और अतिक्रमणों की दलदल से निथारकर हमारे सामने मूर्त करता है, जिस दलदल और जिस शोर को हमने शायद प्रेम की चुनौती से भागने के लिए ही रचा है। प्रेम जो अगर बुलाता है, तो परीक्षा भी लेता है, कसौटी भी बनता है प्रेमी के समर्पण की, उसकी; सीमाओं को बताते हुए, कहते हुए कि और बड़े होकर आओ; और परिष्कृत, और ज्यादा मनुष्य। वह चाहता है कि मनुष्य विभाजनों से ऊपर उठे, समाज के भी और मन के भी। इन कविताओं में प्रेम की पीड़ा भी है, आकांक्षा भी है, लोक और साहित्य में रची-बसी प्रेम की छवियाँ भी हैं, परम्परा और आधुनिकता के बीच जो पुल प्रेम बनाता है, वह भी है। कहना अतिशयोक्ति न होगी कि ‘आपै आपन पार’ से गुज़रना प्रेम के एक समूचे अनुभव से गुज़रना है और उसके विमर्श से भी। कविताओं के साथ इस पुस्तक में प्रेम-कविता को लेकर एक ‘उपरान्त कथन’ भी है जो हिन्दी और विश्व-साहित्य में प्रेम की अभिव्यक्ति पर विहगावलोकन करते हुए प्रेम के सूक्ष्म का अन्वेषण समय और भूगोल के एक बड़े वृत्त में करता है|
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हूँ न मैं हूँ धीरे-से इतना बस / थकी हुई चिड़िया से कहता है / पानी में फूला हुआ दाना।अनुभूति के बहुस्तरीय सच को कविता में पूरा-पूरा कह सकने वाली, हमारे समय की समर्थ कवि अनामिका की प्रेम कविताओं का यह संग्रह ‘आपै आपन पार’ प्रेम का जैसे एक सम्पूर्ण पाठ है।
‘लरिकाई को प्रेम’ से चलकर ‘वार्धक्य में प्रेम की दस्तक’ और घनानंद से लेकर आज के तकनीक-समृद्ध समय तक फैला प्रेम का यह आख्यान प्रेम के अनेक पड़ावों से गुज़रता है और जीवन के इस आधारभूत तत्त्व को हिंसाओं और अतिक्रमणों की दलदल से निथारकर हमारे सामने मूर्त करता है, जिस दलदल और जिस शोर को हमने शायद प्रेम की चुनौती से भागने के लिए ही रचा है। प्रेम जो अगर बुलाता है, तो परीक्षा भी लेता है, कसौटी भी बनता है प्रेमी के समर्पण की, उसकी; सीमाओं को बताते हुए, कहते हुए कि और बड़े होकर आओ; और परिष्कृत, और ज्यादा मनुष्य। वह चाहता है कि मनुष्य विभाजनों से ऊपर उठे, समाज के भी और मन के भी।
इन कविताओं में प्रेम की पीड़ा भी है, आकांक्षा भी है, लोक और साहित्य में रची-बसी प्रेम की छवियाँ भी हैं, परम्परा और आधुनिकता के बीच जो पुल प्रेम बनाता है, वह भी है। कहना अतिशयोक्ति न होगी कि ‘आपै आपन पार’ से गुज़रना प्रेम के एक समूचे अनुभव से गुज़रना है और उसके विमर्श से भी। कविताओं के साथ इस पुस्तक में प्रेम-कविता को लेकर एक ‘उपरान्त कथन’ भी है जो हिन्दी और विश्व-साहित्य में प्रेम की अभिव्यक्ति पर विहगावलोकन करते हुए प्रेम के सूक्ष्म का अन्वेषण समय और भूगोल के एक बड़े वृत्त में करता है|
Book Details
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ISBN9789360863388
-
Pages280
-
Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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“Zindagi Kya Cheez Hai” is an important collection of selected and representative poetry by the renowned Urdu poet Nida Fazli, beautifully published by Rekhta Publications. The ghazals, nazms, dohas, and couplets included in this volume give voice to those emotions and experiences that ordinary people feel every day but often cannot express. Nida Fazli’s language carries the sweetness of folk songs, the simplicity of saint poets, and the pain of the modern human condition all at once. He brought Urdu poetry out of closed rooms and away from difficult symbolism, connecting it instead to streets, homes, relationships, and the everyday lives of common people.
Mohabbat Na Samaj Hoti Hai
- Author Name:
Wasim Barelvi
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This book (Mohabbat Naa Samajh Hotii Hai) brings together such works, where on one hand the hardships of our times are depicted, and on the other, glimpses of the unspoken aspects of Wasim Barelvi’s life can also be found. Wasim Barelvi was born on February 8, 1940, in Bareilly, Uttar Pradesh. He is considered one of the most renowned and admired poets of the present time. His poetry reflects deep emotions and feelings. In his verses, one can see both the pain of clashing Eastern and Western cultures as well as respect for traditions. His poetry also highlights the bitterness of life’s struggles and expresses an inner sorrow over today’s political attitudes.
Hum Jo Nadiyon Ka Sangam Hein
- Author Name:
Bodhisatwa
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यह संग्रह अपनी कविताओं के तीव्र आवेग, भाव–विविधता एवं वस्तु–बहुलता के कारण महत्त्वपूर्ण माना जाएगा। बोधिसत्व की कविताएँ मानो अनेक नदियों का संगम हैं। लोकगीतों की ऊष्मा तथा रागात्मकता, वर्तमान जीवन के ‘दुख–तंत्र’ की कठोर प्रतीति और वैचारिक दृढ़ता एवं प्रतिरोध—इन सबके संयोग से ये कविताएँ हमारे लिए एक वैकल्पिक पाठ की सृष्टि करती हैं। ‘हाहाकार के बीच से गुज़रती’ इन कविताओं में दर्ज हैं ‘बेनूर आँखों के ख़्वाब’, ‘सिले होंठों की मुस्कुराहट’ और ‘बँधे हाथों की छटपटाहट’। लोकगीत और बोलियों की शक्ति का उपयोग, जिसके लिए बोधिसत्व की आरम्भिक कविताएँ चिह्नित की गई थीं, उनका अद्यतन रूप यहाँ मिलता है, कुछ ज्वाया और सख़्त।
इनमें बेचैन कर देनेवाली ऐन्द्रिकता है—‘ताज़े आटे की गर्मी थी उसकी ख़ुशी/वसन्त उसके लिए अब उखड़े नाखून की तरह है’। एक विरल करुणा और क्रोध। इनमें जीवन के प्रति समर्थन और लालसा है जैसे कि ‘ऐसा ही होता है’ कविता में, जो साधारण मनुष्य के दैनंदिन प्रेम को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। ‘गंध’ शीर्षक कविता स्वयं बोधिसत्व की कविताओं में अलग से उल्लेखनीय है। यह एक बड़ी कविता है, हमारे जीवन की दारुण विपत्ति, विडम्बना एवं निजी और सामाजिक के सीमा–प्रदेश पर निरन्तर विद्यमान द्वन्द्व की कविता।
एक बात और—ये कविताएँ गहरे राजनैतिक आशय एवं नैतिक संकल्प की कविताएँ हैं। बोधिसत्व का ही शब्द लेकर कहें तो यह वह कविता है ‘जो समाज के हारे–गाढ़े काम दे’।
—अरुण कमल
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
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Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Kavya Chayanika
- Author Name:
Pramod Kovaprath
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बिगड़ते पर्यावरण की समस्या आज मनुष्य के लिए भूख के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। भूख जिस तरह एक देह के अस्तित्व के लिए आसन्न ख़तरा होती है, उसी तरह पर्यावरण-विनाश सृष्टि के अस्तित्व के लिए होता है। एक-एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हम लोगों की आँखों से वह ख़तरा भले ही इतने स्पष्ट और ठोस रूप में न दिखाई देता हो, और भले ही हम बीच-बीच में प्रकृति द्वारा दी जानेवाली चेतावनियों को नज़रअन्दाज़ करने की ढीठता भी जुटा लेते हों, लेकिन जल, ज़मीन, हवा और हरियाली का सतत क्षरित होता जीवन उन निगाहों से अनचीन्हा नहीं रह जाता जो प्रस्तुत उल्लास की झीनी चदरिया के पार दूर क्षितिज के धुँधलके में लिखी जा रही नाश-विनाश की पटकथाओं की पंक्तियाँ पढ़ लेती हैं, यानी कवियों और रचनाशील हृदयों की निगाहें। यह पुस्तक प्रकृति और कवि के इसी अपने, और समाज की रिश्तेदारियों के धोखादेह प्रपंच से परे, उनके निहायत पवित्र और निजी रिश्ते का दस्तावेज़ है। पाठकगण इस किताब को सरकारों और संस्थाओं के रस्मी पर्यावरण-प्रेम और शुष्क रुदन के काव्यानुवाद के रूप में न लें। यह समष्टि-मन के रचनाकुल और ईमानदार स्नायुओं की पीड़ाजनित प्रतिक्रियाओं का संकलन है जिसमें हिन्दी के नए-पुराने, वरिष्ठ, श्रेष्ठ और सजग रचनाकारों ने प्रकृति के साथ अपनी सम्बन्ध-यात्रा के सबसे चिन्तित क्षणों को वाणी दी है। संग्रह में एक सौ एक समकालीन कविताएँ और पैंतालीस कवि शामिल हैं। कौन छोटा है, कौन बड़ा है, यह सवाल अप्रासंगिक है। क्योंकि कविता का विषय महत्त्वपूर्ण है, समस्याओं की भयंकरता प्रासंगिक है। एक ही त्रासदपूर्ण मुद्दा सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। सब में आशंकाएँ हैं तो साथ ही आशाएँ भी हैं। प्रकृति की आसन्न मृत्यु पर चीख़ने के बजाय प्रतिरोध खड़ा करना ये रचनाकार अपना दायित्व समझते हैं।
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