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‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ और ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित डॉ. सी. नारायण रेड्डी तेलुगू के प्रसिद्ध लेखक हैं। यों कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तेलुगू साहित्य की प्रत्येक विधा को डॉ. रेड्डी ने अपने अमृत-स्पर्श से जीवन्त बना दिया। साहित्य स्रष्टा होने के साथ-साथ वे कुशल प्रशासक भी थे। अपने दैनिक जीवन में अपनी हास्यप्रियता और वाक्चातुर्य के कारण वे अपने परिवेश को सदा जीवन्त बनाए रखते थे। ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘विश्वम्भरा’ आदि काव्यों में मानव के विकास के इतिहास को सुगम रूप से प्रस्तुत करने के बाद उन्होंने अनेक छोटी-मोटी कविताएँ लिखते हुए भी एक विनूतन शैली में 108 प्रपंच-पदियों की रचना की। ये प्रपंच-पदी उर्दू की रुबाई शैली में लिखे गए हैं। रुबाई में चार चरण होते हैं, जिनमें पहले, दूसरे और चौथे में तुक मिलाया जाता है। रेड्डी जी ने रुबाई में एक और चरण जोड़कर उसे पंच-पदी (पाँच चरणोंवाला) बनाया और संसार की रीति-नीतियों के चित्रण के कारण इन्हें ‘प्रपंच-पदी’ कहा है। प्रपंच-पदियों की रचना में डॉ. रेड्डी ने तेलुगू भाषा में प्रचलित चतुरश्र और मिश्र गतियों का प्रयोग किया है। इनके प्रयोग से काव्य-रचना प्रभावशाली बन गई है। प्रपंच-पदियों की फलश्रुति में डॉ. रेड्डी ने इन पदों के उद्देश्य को स्पष्ट किया है। ये टूटे जन-मन में उत्साह भरनेवाले, सुप्त नीतियों को प्रकाश में लानेवाले, निद्रित चरणों को जागृत करनेवाले और वर्तमान में परिवर्तन लाने के प्रयास के परिणाम हैं। जीवन में कड़वे और मीठे सत्यों को मथकर डॉ. रेड्डी ने इन 108 प्रपंच-पदियों की रचना की। तेलुगू में लब्धप्रतिष्ठ डॉ. नारायण रेड्डी हिन्दी और उर्दू में भी मौलिक रूप से ग़ज़लों की रचना करते रहे। उनकी इस विशिष्ट रचना-प्रक्रिया और ‘प्रपंच-पदियों’ का हिन्दी जगत् में काफ़ी चर्चा रही है।
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‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ और ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित डॉ. सी. नारायण रेड्डी तेलुगू के प्रसिद्ध लेखक हैं। यों कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तेलुगू साहित्य की प्रत्येक विधा को डॉ. रेड्डी ने अपने अमृत-स्पर्श से जीवन्त बना दिया।
साहित्य स्रष्टा होने के साथ-साथ वे कुशल प्रशासक भी थे। अपने दैनिक जीवन में अपनी हास्यप्रियता और वाक्चातुर्य के कारण वे अपने परिवेश को सदा जीवन्त बनाए रखते थे।
‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘विश्वम्भरा’ आदि काव्यों में मानव के विकास के इतिहास को सुगम रूप से प्रस्तुत करने के बाद उन्होंने अनेक छोटी-मोटी कविताएँ लिखते हुए भी एक विनूतन शैली में 108 प्रपंच-पदियों की रचना की। ये प्रपंच-पदी उर्दू की रुबाई शैली में लिखे गए हैं। रुबाई में चार चरण होते हैं, जिनमें पहले, दूसरे और चौथे में तुक मिलाया जाता है। रेड्डी जी ने रुबाई में एक और चरण जोड़कर उसे पंच-पदी (पाँच चरणोंवाला) बनाया और संसार की रीति-नीतियों के चित्रण के कारण इन्हें ‘प्रपंच-पदी’ कहा है।
प्रपंच-पदियों की रचना में डॉ. रेड्डी ने तेलुगू भाषा में प्रचलित चतुरश्र और मिश्र गतियों का प्रयोग किया है। इनके प्रयोग से काव्य-रचना प्रभावशाली बन गई है।
प्रपंच-पदियों की फलश्रुति में डॉ. रेड्डी ने इन पदों के उद्देश्य को स्पष्ट किया है। ये टूटे जन-मन में उत्साह भरनेवाले, सुप्त नीतियों को प्रकाश में लानेवाले, निद्रित चरणों को जागृत करनेवाले और वर्तमान में परिवर्तन लाने के प्रयास के परिणाम हैं। जीवन में कड़वे और मीठे सत्यों को मथकर डॉ. रेड्डी ने इन 108 प्रपंच-पदियों की रचना की।
तेलुगू में लब्धप्रतिष्ठ डॉ. नारायण रेड्डी हिन्दी और उर्दू में भी मौलिक रूप से ग़ज़लों की रचना करते रहे। उनकी इस विशिष्ट रचना-प्रक्रिया और ‘प्रपंच-पदियों’ का हिन्दी जगत् में काफ़ी चर्चा रही है।
Book Details
-
ISBN9788180311567
-
Pages108
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
पेट भरने के प्रबन्ध के बाद जो समस्या सामने आती है, वह है—सम्भोग की। यह समस्या उदित होती है किशोरावस्था में, और यौवन से प्रौढ़ावस्था के ढल जाने तक चलती है। इस समस्या के समाधान के लिए क्या किया जाए? जब तक सम्पन्नता एवं स्वस्थ मनोवृत्ति निर्मित नहीं होती है और सबका एक निवास-स्थल और पति-पत्नी के अलग नीड़ का प्रबन्ध नहीं होता है तब तक सरकार के नियंत्रण में स्त्री-पुरुषों की ऐसी संस्थाओं की स्थापना करना अनुचित न माना जाए, जहाँ प्रेम-प्रधान मनोविनोद एवं कलात्मक वातावरण रहे, ताकि सम्भोग की मूल प्रवृत्ति का मार्गान्तरीकरण हो सके। तब भी बलात्कार की घटनाएँ होती हों तो फिर दंड-विधान प्रभावी हो सकता है अन्यथा हर क्षण, हर एकान्त स्थली और हर व्यक्ति बलात्कार की सृष्टि के साधक हो सकते हैं। 'अहल्या’ में यही दिखाया गया है। स्त्री-पुरुष के मिलन की घटनाओं को राजकुमार राम की तरह अधिक तूल न देकर सहानुभूति से जाँचने की आवश्यकता है। किसी भी कारण सर्वसम्पन्न इन्द्र और कुलीन अहल्या का संयोग-वृत्त उन्हें अक्षम्य शाप-दंड की परिधि के अन्दर नहीं ले जाता है। राम के आदेश पर शाप-दंड दाता गौतम सबको क्षमा करता है। ठीक है, थाली में रखे भोजन को खाने से जूठा हो जाने की तरह नारी जूठी नहीं हो जाती है, वह केवल सम्भोग-सामग्री नहीं, पूज्य माँ है। राम अपने मुँह से 'माँ! उठो’, कहकर ही सबकी दृष्टि में उसका उद्धार करते हैं और गौतम उसे पाकर अपने को धन्य समझता है। अहल्या, जो कि इस काव्य की नायिका है, उसके माध्यम से नारी के पुरुष-सम्पर्क से उद्भूत समस्याओं का आकलन करना तथा उनका समाधान ढूँढ़कर उसे एक दिशा दिखाना मेरे इस काव्य का प्रमुख उद्देश्य है। काव्य-कर्ता को वस्तु की प्रबन्धात्मकता के औचित्य के अन्दर समाहित करने में काव्यशास्त्र का सहारा लेना पड़ता है। फलत: वस्तुगत सत्य और साहित्यिक सत्य में कुछ भिन्नता आ जाती है, अत: विद्वज्जन को मेरे काव्य में भिन्नता दिखाई देगी, हालाँकि मैंने अपनी ओर से विभिन्न स्रोतों में समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया है।
—'प्रस्तावना’ से
Vachanas of Sarvajna
- Author Name:
Rajendra Chenni
- Book Type:

- Description: Sarvajna is a saint peot of medieval Kannada. In spirit he was a global citizen of the time. For poets like him, the life is greater than poetry or literature. This great message upholding universal human values and the dignity of mankind was through compassion and serving the fellow beings. Sarvajna's rich and practical wisdom portrayed in his Vachanas (triplets) may guide the readers across the world.
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