Dhoomketu Dhoomil Aur Sathottari Kavita

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कविता जीवन की अभिव्यक्ति है, परन्तु उसकी सार्थकता जीवन से जुड़े रहने पर ही निर्भर है। यदि उसमें जीवन की सौन्दर्यमूलक और संवेदनशील अभिव्यक्ति नहीं है, मात्र काल्पनिकता है तो उसकी सार्थकता सन्दिग्ध हो जाती है। काव्य के माध्यम से सहृदय साहित्यकार अपनी अनुभूतियों को कुशलतापूर्वक अभिव्यक्त करते रहे हैं और पाठकों ने भी ऐसी अभिव्यक्तियों को सहर्ष स्वीकार किया है। साहित्य की विविध विधाओं में काव्य ही एक ऐसी विधा है, जो आदिकाल से लेकर आज तक सहज और स्वाभाविक रूप में निरन्तर प्रवहमान है। कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक अभिव्यक्ति की क्षमता काव्य में होती है। इसीलिए महाकवि कालरिज ने कहा था—कविता श्रेष्ठतम शब्दों का श्रेष्ठतम क्रम में संयोजन है। दोहा, छन्द इसका सशक्त प्रमाण हैं। समय के साथ-साथ काव्य के भाव-बोध, वस्तु और शिल्प में भी परिवर्तन हुए हैं। आधुनिक हिन्दी काव्य में यह परिवर्तन छायावाद से ही परिलक्षित होने लगा था। छायावादी कवियों ने अनुभूतियों की गहराई के साथ ही अभिव्यक्ति को भी प्रांजलता प्रदान की। तदनन्तर प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता का दौर आया। स्वाधीनता के बाद हिन्दी कविता विभिन्न आन्दोलनों के दौर से गुज़रती रही। इन सब आन्दोलनों में साठोत्तरी काव्य के नाम से अभिहित कविता अपने बेबाक चित्रण के कारण आधुनिक हिन्दी काव्य में अपनी एक अलग पहचान बनाने में पूर्णतः सफल हुई है।</p> <p>साठोत्तरी कविता में धूमिल की रचनाधर्मिता एक अहम् भूमिका रखती है। इनकी कविताओं में कथ्य का ही ठोस धरातल नहीं है, अपितु शिल्प की भी एक नई भंगिमा है। कथ्य, भाषा एवं संरचना की दृष्टि से उन्होंने परम्परागत प्रतिमानों को तोड़कर नए प्रतिमानों की रचना की। उनकी कविताएँ संसद से लेकर सड़क तक बिखरी हैं। भ्रष्ट राजनीति और सामाजिक दिशाहीनता को उन्होंने व्यंग्य और वक्तव्य के माध्यम से अत्यन्त सपाट लहज़े में व्यक्त किया है।

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कविता जीवन की अभिव्यक्ति है, परन्तु उसकी सार्थकता जीवन से जुड़े रहने पर ही निर्भर है। यदि उसमें जीवन की सौन्दर्यमूलक और संवेदनशील अभिव्यक्ति नहीं है, मात्र काल्पनिकता है तो उसकी सार्थकता सन्दिग्ध हो जाती है। काव्य के माध्यम से सहृदय साहित्यकार अपनी अनुभूतियों को कुशलतापूर्वक अभिव्यक्त करते रहे हैं और पाठकों ने भी ऐसी अभिव्यक्तियों को सहर्ष स्वीकार किया है। साहित्य की विविध विधाओं में काव्य ही एक ऐसी विधा है, जो आदिकाल से लेकर आज तक सहज और स्वाभाविक रूप में निरन्तर प्रवहमान है। कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक अभिव्यक्ति की क्षमता काव्य में होती है। इसीलिए महाकवि कालरिज ने कहा था—कविता श्रेष्ठतम शब्दों का श्रेष्ठतम क्रम में संयोजन है। दोहा, छन्द इसका सशक्त प्रमाण हैं। समय के साथ-साथ काव्य के भाव-बोध, वस्तु और शिल्प में भी परिवर्तन हुए हैं। आधुनिक हिन्दी काव्य में यह परिवर्तन छायावाद से ही परिलक्षित होने लगा था। छायावादी कवियों ने अनुभूतियों की गहराई के साथ ही अभिव्यक्ति को भी प्रांजलता प्रदान की। तदनन्तर प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता का दौर आया। स्वाधीनता के बाद हिन्दी कविता विभिन्न आन्दोलनों के दौर से गुज़रती रही। इन सब आन्दोलनों में साठोत्तरी काव्य के नाम से अभिहित कविता अपने बेबाक चित्रण के कारण आधुनिक हिन्दी काव्य में अपनी एक अलग पहचान बनाने में पूर्णतः सफल हुई है।</p>
<p>साठोत्तरी कविता में धूमिल की रचनाधर्मिता एक अहम् भूमिका रखती है। इनकी कविताओं में कथ्य का ही ठोस धरातल नहीं है, अपितु शिल्प की भी एक नई भंगिमा है। कथ्य, भाषा एवं संरचना की दृष्टि से उन्होंने परम्परागत प्रतिमानों को तोड़कर नए प्रतिमानों की रचना की। उनकी कविताएँ संसद से लेकर सड़क तक बिखरी हैं। भ्रष्ट राजनीति और सामाजिक दिशाहीनता को उन्होंने व्यंग्य और वक्तव्य के माध्यम से अत्यन्त सपाट लहज़े में व्यक्त किया है।

Book Details

  • ISBN
    9788183613552
  • Pages
    244
  • Avg Reading Time
    8 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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