Akaal Mein Saaras
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केदारनाथ सिंह की कविताओं का संग्रह ‘अकाल में सारस’ आज की हिन्दी कविता को एक सर्वथा नया मोड़ देने की सार्थक कोशिश है। इस संग्रह के साथ यह उम्मीद बनी रहेगी कि कविता अपनी जड़ों में ही फैलती है और उसी से प्राप्त ऊर्जा के बल पर वह अपने समय, परिवेश, आदमी के संघर्ष, प्रकृति में धडक़ती हुई जिजीविषा को उपयुक्त शब्द देने में कामयाब होती है। ‘अकाल में सारस’ में जनपदीय चेतना में रची-बसी भाषा की ऐन्द्रिकता, अर्थध्वनि, मूर्तता, गूँज और व्याप्ति को पहचानना उतना ही सहज है जितना साँस लेना। पर इस सहज पहचान में बहुत कुछ है जो उसी के ज़रिए जीवन की छिपी हुई या अधिक गहरी सच्चाइयों के प्रति उत्सुक बनाता है। एक तरह से देखें तो इन कविताओं की सरलता उस विडम्बनापूर्ण सरलता का उदाहरण है जो वस्तुओं में छिपे जीवन-मर्म को भेदकर देखने की अनोखी हिकमत कही जा सकती है।</p> <p>‘अकाल में सारस’ में भाषा के प्रति अत्यन्त संवेदनशील तथा सक्रिय काव्यात्मक लगाव एक नए काव्य-प्रस्थान की सूचना देता है। भाषा के सार्थक और सशक्त उपयोग की सम्भावनाएँ खोजने और चरितार्थ करने की कोशिश केदार की कविता की ख़ास अपनी और नई पहचान है। प्रगीतों की आत्मीयता, लोक-कथाओं की-सी सरलता और मुक्त छन्द के भीतर बातचीत की अर्थसघन लयात्मकता का सचेत इस्तेमाल करते हुए केदार ने अपने समय के धडक़ते हुए सच को जो भाषा दी है, वह यथार्थ की तीखी समझ और संवेदना के बग़ैर अकल्पनीय है। केदार के यहाँ ऐसे शब्द कम नहीं हैं जो कविता के इतिहास में और जीवन के इस्तेमाल में लगभग भुला दिए गए हैं, पर जिन्हें कविता में रख-भर देने से सुदूर स्मृतियाँ जीवित वर्तमान में मूर्त हो उठती हैं। परती-पराठ, गली-चौराहे, देहरी-चौखट, नदी-रेत, दूब, सारस जैसे बोलते-बतियाते केदार के शब्द उदाहरण हैं कि उनकी पकड़ जितनी जीवन पर है उतनी ही कविता पर भी। ‘अकाल में सारस’ एक कठिन समय की त्रासदी के भीतर लगभग बेदम पड़ी जीवनाशक्ति को फिर से उपलब्ध और प्रगाढ़ बनाने के निरन्तर संघर्ष का फल है।
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केदारनाथ सिंह की कविताओं का संग्रह ‘अकाल में सारस’ आज की हिन्दी कविता को एक सर्वथा नया मोड़ देने की सार्थक कोशिश है। इस संग्रह के साथ यह उम्मीद बनी रहेगी कि कविता अपनी जड़ों में ही फैलती है और उसी से प्राप्त ऊर्जा के बल पर वह अपने समय, परिवेश, आदमी के संघर्ष, प्रकृति में धडक़ती हुई जिजीविषा को उपयुक्त शब्द देने में कामयाब होती है। ‘अकाल में सारस’ में जनपदीय चेतना में रची-बसी भाषा की ऐन्द्रिकता, अर्थध्वनि, मूर्तता, गूँज और व्याप्ति को पहचानना उतना ही सहज है जितना साँस लेना। पर इस सहज पहचान में बहुत कुछ है जो उसी के ज़रिए जीवन की छिपी हुई या अधिक गहरी सच्चाइयों के प्रति उत्सुक बनाता है। एक तरह से देखें तो इन कविताओं की सरलता उस विडम्बनापूर्ण सरलता का उदाहरण है जो वस्तुओं में छिपे जीवन-मर्म को भेदकर देखने की अनोखी हिकमत कही जा सकती है।</p>
<p>‘अकाल में सारस’ में भाषा के प्रति अत्यन्त संवेदनशील तथा सक्रिय काव्यात्मक लगाव एक नए काव्य-प्रस्थान की सूचना देता है। भाषा के सार्थक और सशक्त उपयोग की सम्भावनाएँ खोजने और चरितार्थ करने की कोशिश केदार की कविता की ख़ास अपनी और नई पहचान है। प्रगीतों की आत्मीयता, लोक-कथाओं की-सी सरलता और मुक्त छन्द के भीतर बातचीत की अर्थसघन लयात्मकता का सचेत इस्तेमाल करते हुए केदार ने अपने समय के धडक़ते हुए सच को जो भाषा दी है, वह यथार्थ की तीखी समझ और संवेदना के बग़ैर अकल्पनीय है। केदार के यहाँ ऐसे शब्द कम नहीं हैं जो कविता के इतिहास में और जीवन के इस्तेमाल में लगभग भुला दिए गए हैं, पर जिन्हें कविता में रख-भर देने से सुदूर स्मृतियाँ जीवित वर्तमान में मूर्त हो उठती हैं। परती-पराठ, गली-चौराहे, देहरी-चौखट, नदी-रेत, दूब, सारस जैसे बोलते-बतियाते केदार के शब्द उदाहरण हैं कि उनकी पकड़ जितनी जीवन पर है उतनी ही कविता पर भी। ‘अकाल में सारस’ एक कठिन समय की त्रासदी के भीतर लगभग बेदम पड़ी जीवनाशक्ति को फिर से उपलब्ध और प्रगाढ़ बनाने के निरन्तर संघर्ष का फल है।
Book Details
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ISBN9788126707331
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Pages110
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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नीलेश के यहाँ वाक्यांश मुहावरों में ढलते नज़र आते हैं। ‘जिन आँखों में काजल लगाया मैंने (कैसे) देख सकूँ उसमें दुख को’ कहते हुए कवि को लगता है—‘चट्टानों के बीच से/कोंपल की तरह फूटता है/दुख’। यहाँ मुहावरा उलट गया है। चट्टानों में कोंपल का फूटना अदम्य जिजीविषा का द्योतक है पर यहाँ हमारे सामाजिक यथार्थ की क्रूर चट्टानों से तो केवल दुख ही उपजता है। बदलते वक्त के साथ सामाजिक यथार्थ कितना उलट गया है, कवि इस स्थिति को ‘नागरिकता की मृत्यु’ की तरह देखने को विवश है।
ट्रैफिक के लिए सड़क किनारे के बोर्ड की चेतावनी को इस तरह पढ़ा जाना कि ‘सावधान! आगे अंधा मोड़ है/कहती हैं सड़कें/हमारे जीवन की कहानी’। सिर्फ कविता में ही सम्भव हो सकता है जीवन के इस कटु यथार्थ को एक साधारण-सी बात में इस तरह गुम्फित करना और नीलेश इसे बहुत सलीके से करती हैं। इसमें राजनीतिक हालात का दर्शन भी किया जा सकता है। ‘भला मानुष’ पद कभी निष्कपट, सच्चे और किसी कदर भोले-भाले व्यक्ति के लिए प्रयोग में आने लगा था लेकिन नीलेश उसी के अभिधार्थ में कहती हैं—‘जब मानुष भला मानुष हो जाएगा/तो बन्दर भी भले बन्दर हो जाएँगे’। पाठक के लिए यहाँ भी राजनीतिक अर्थ खोजने की गुंजाइश बनती है।
अपने आसपास उपस्थित परिवेश के आमफहम बिम्बों में जीवन के शाश्वत प्रश्नों की तरफ संकेत करना नीलेश की कविता की भी विशेषता रही है और गद्य की भी। उनका यह नया कविता-संग्रह निश्चय ही उनके कवि-मानस के अन्य विस्तारों से हमारा परिचय कराएगा।
Bhay Bhi Shakti Deta Hai
- Author Name:
Leeladhar Jagudi
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Description:
लीलाधर जगूड़ी की कविता यथार्थ को आंशिकता में नहीं बल्कि उसकी पूरी जटिलता और बारीकियों में खोजती आई है। इसी खोज ने उन्हें एक समर्थ कवि की पहचान दी है। लगभग इकहरी और एकआयामी हो रही कविता के मौजूदा दौर में जगूड़ी की ये कविताएँ अनुभव के अनेक आयामों के साथ कुछ चकित करती हैं, कुछ रोमांच से भर देती हैं और अन्ततः इस तरह विचलित करती हैं कि पाठक के भीतर भी एक प्रक्रिया शुरू हो सके।
इन कविताओं में न तो यथार्थ का उत्सव है और न विलाप : इनमें यथार्थ की ऐसी आलोचना है जिसमें वे नए और अनजाने पहलू भी प्रकट होते चलते हैं, जो इससे पहले काव्य-अनुभव नहीं बन पाए थे। यहाँ देखने, जानने और जाँचने के इतने तरीक़े हैं, भाषा और शिल्प की इतनी विविधता है और इसके बावजूद अनुभवों की खोज के अनेक नए या अज्ञात रास्तों की सम्भावनाओं के संकेत भी हैं। यह शायद इसलिए सम्भव हुआ है कि जगूड़ी के लिए जीवन, कविता और भाषा में से कोई भी चीज़ आसान नहीं हैं; कहीं सरल रेखाएँ नहीं हैं; इसके बरक्स उलझे हुए रास्ते और तीखे मोड़ हैं जिन पर चलते हुए आगे नए रास्ते और नए मोड़ ही दिखते हैं। इस मानी में यह संग्रह जगूड़ी की काव्य-यात्रा में एक बड़े मोड़ की तरह है जो आगे की यात्रा को आसान नहीं बना देता, बल्कि नए रचनात्मक जोखिमों की ओर ले जाता है।
भय भी शक्ति देता है की कविताओं के सरोकार बहुत विस्तृत हैं जिन्हें मोटे तौर पर छह हिस्सों में बाँटा गया है। जगूड़ी की आलोचनात्मक दृष्टि लोकगीतों और मिथकों के मनुष्य से लेकर आज के आर्थिक मनुष्य तक के संकटों से जूझती है; वह एक पहाड़ी बैल के सपने और दादी की आदिम दुनिया में भी जाती है और आधुनिक टेक्नोलॉजी या युद्धतंत्र की भी जाँच-परख करती है।
इस तरह लीलाधर जगूड़ी अपने समय के भौतिक और नैतिक संकटों को कविता में दर्ज़ करते हैं और सवाल उठाते चलते हैं। लेकिन वे महज़ यथार्थ का लेखा-जोखा या अनुकृति नहीं करते, बल्कि उसकी पुनर्रचना करते हैं। अपने समय से जूझते हुए वे कविता में एक और या समान्तर समय की रचना करते हैं, जो ख़ास तौर से इस संग्रह की और आधुनिक हिन्दी कविता की भी एक उपलब्धि है।
Khul Gaya Hai Dwar Ek
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

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Description:
अशोक वाजपेयी को पहले ‘देह और गेह का कवि’ कहा गया था। यह कहना निराधार नहीं था, लेकिन शनै:-शनै: उनकी दैहिक और गैहिक भावना का ऐसा विस्तार हुआ कि उसमें प्रकृति ही नहीं, सम्पूर्ण पृथ्वी सिमट आई। वे नई कविता के आख़िरी दौर के कवि हैं। उसके बाद से हिन्दी कविता में कई प्रकार के बदलाव हुए, पर उन्होंने अपना मार्ग कभी नहीं बदला। कारण यह कि उनकी कविता में स्वयं ऐसे आयाम प्रकट होते गए कि उन्हें कभी उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। उनकी काव्य-यात्रा एक लम्बी काव्य-यात्रा है, जिसमें कवि ने कई मंज़िलें पार की हैं। आज उनकी कविता के बारे में दिनकर के शब्दों में यही कहा जा सकता है कि ‘वर्षा का मौसम गया, बाढ़ भी साथ गई, जो बचा आज वह स्वच्छ नीर का सोता है...।’
अशोक जी हमेशा ऊँचे सरकारी पदों पर रहे, लेकिन यह प्रीतिकर आश्चर्य की बात है कि उनकी कविता का नायक अभिजन न होकर साधारण जन है। इस साधारण जन को वे नज़दीक से जानते हैं और उसकी समस्त पीड़ाओं के साथ उसकी इतिहास-निर्मात्री शक्ति से भी परिचित हैं। स्वभावत: उनमें नक़ली क्रान्ति के लिए कोई बेचैनी नहीं है, जैसी कथित प्रगतिशीलों और जनवादियों में देखी जाती है। उनकी तरह वे समाज को साहित्य के ऊपर नहीं रखते, बल्कि साहित्य के अनुशासन में ही समाज और इसके अन्य पक्षों को स्वीकार करते हैं। साधारण जन का शत्रु कौन है? यह कवि से छिपा नहीं है, इसलिए बिना कविता को छोड़े वह उससे उसे आगाह करता है। आशा है, यह चयन हिन्दी के बृहत्तर पाठक-समुदाय को पसन्द आएगा, क्योंकि यह उसी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह उसे समकालीन हिन्दी कविता का एक ऐसा दृश्य भी दिखलाएगा, जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता।
Jeewan Bhi Kavita Ho Sakta Hai
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Vishnu Nagar
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Pinjar Prem Prakasiya : Kabir Par AAdharit Prabandh Kavya
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अष्टभुजा शुक्ल वर्तमान हिन्दी कविता के पेन्टहाउस से बाहर के कवि हैं जिनकी कविता का सीत-घाम देस के अन्दर के अहोरात्र से निर्धारित होता है, उस अहोरात्र के प्रतिपक्ष में तैयार किए गए उपकरणों से नहीं। उनका प्रकाश्यमान संग्रह ‘रस की लाठी’ भी उनके पूर्व प्रकाशित चार संग्रहों की तरह ही ऐसी ‘छोटी-छोटी बातों’ का बयान है जिनसे चाहे ‘अमेरिका के तलवों में गुदगुदी भी न हो किन्तु जो समूचे हिन्दुस्तान को रुलाने के लिए काफ़ी है।’ रस की इस लाठी में चोट और मिठास एक दूसरे से कोई मुरव्वत नहीं करते, किन्तु इस बेमुरव्वत वर्तमान में भी एक सुरंग मौजूद है जिसका मुहाना भूत और भविष्य को संज्ञाओं के एक दूसरे में मिथुनीकृत हो जाने से बताए जानेवाले कालखंड की ओर खुलता है जिसमें वसन्त अभियोग नहीं है और पंचम स्वर में मंगलगान की छूट होगी।
इस कालखंड की काव्य-सृष्टि में भूत का ठोस भरोसा सरसों और गेहूँ की उस पुष्टि-प्रक्रिया पर टिका है जिसे सारी यांत्रिकता के बाबजूद मिटूटी, पानी और वसन्त की उतनी ही ज़रूरत है जितनी हमेशा से रही है, और भविष्य का तरल आश्वासन उतना ही मुखर है जितनी स्कूल जाती हुई लड़की को साइकिल की घंटी या गोद में सो रहे बच्चे के सपने में किलकती हँसी होती है। ये कविताएँ उन आँखों की आँखनदेखी हैं जिनसे टपकते लहू ने उन्हें इतना नहीं धुँधलाया कि वे सूरज की ललाई न पहचान सकें। लेकिन भले ही कविता में इतनी ऊर्जा बचा रखने की दृढ़ता हो कि वह बुरे वक़्त की शबीह-साज़ी तक अपनी तूलिका को न समेट ले, डिस्टोपिया की ठिठुरन से सामना करने के लिए उँगलियों की लचक को कुछ अतिरिक्त ऊष्मा का ताप दिखाना ही पड़ता है। अष्टभुजा जी के पाठकों से यह बात छिपी न रहेगी कि उनकी कविता के जो अलंकार कभी दूर से झलक जाया करते थे, वे अब रीति बनकर उसकी धमनियों में दिपदिपा रहे हैं और उसकी कमनीयता अपनी काव्य-सृष्टि की ‘फ़लानी’ की उस ‘असेवित देहयष्टि’ की कमनीयता है जिसकी गढ़न में अगली पीढ़ी की जवानी तक पहुँचनेवाली प्रौढ़ता भी शामिल है।
अष्टभुजा जी की कविता का मुहावरा समय के साथ उस बढ़ते हुए बोझ को सँभालने की ताक़त और पुख़्तगी अपने भीतर सहेजता रहा है जिसके तले आज की हिन्दी कविता के अधिकतर ढाँचे उठने के पहले ही भरभरा पड़ते हैं। जो लोग उनकी कविता से पहली बार इस संग्रह के नाते ही दो-चार होंगे, उन्हें भी उसकी उस रमणीयता का आभास होगा जो अपने को निरन्तर पुनर्नवीकृत करती रहती है और जिसके नाते उसके अस्वादकों को उसका प्रत्येक साक्षात्कार एक आविष्कार लगता है।
—वागीश शुक्ल
Yeh Bhumandal Ki Raat Hai
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Pankaj Raag
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Description:
कविता की यात्रा में अकसर ही कुछ ऐसा होता है जो छूटता जाता है, उसी को समेटते-सहेजते हुए फिर एक और कवि आता है, और समकालीन रचनात्मकता के अधूरे परिदृश्य को पूरा करता है।
पंकज राग का यह संग्रह और उनकी कविताएँ यही काम करती दिखती हैं। न सिर्फ़ विषयों और शीर्षकों में, बल्कि भाषा के प्रयोग और बिम्बों-प्रतीकों के मुखौटों में भी वे उन चीज़ों और भंगिमाओं को पकड़ने की कोशिश करते हैं जो सिर्फ़ उनकी अपनी खोज हैं। “दिन बड़ा अजीब-सा गुज़रे/शाम बड़ी थकी-थकी-सी हो/भूख हो पर लगे नहीं/हरारत हो पर दिखे नहीं/बातें सतरंगी करो/यह भूमंडल की रात है।” संग्रह की पहली और शीर्षक-कविता की शुरुआती ये पंक्तियाँ कवि की विशिष्टता की भूमिका की तरह पाठक के मन में गड़ जाती हैं, जिसका निर्वाह यह संग्रह अन्त तक करता है।
पंकज राग की ये कविताएँ उन चिन्ताओं को तो देखती ही हैं जो आज हम सबके लिए निर्णायक विषय बनी हुई हैं, साथ ही वे उन पीड़ाओं को भी अनदेखा नहीं करतीं जो हमारे अतीत में गुज़री हैं और आज हमारी स्मृतियों में कसकती हैं। ‘दिल्ली : शहर-दर-शहर’ जो इस संग्रह की सबसे लम्बी कविता है, वर्तमान और अतीत का ऐसा ही महाआख्यान बुनती है, जिसमें कवि एक शहर की नियति के बहाने मनुष्य की ही नियति से दो-चार होता है। “तुम मुझे फ़ीरोज़ी बना दो/दिल्ली की उस मध्यवर्गीय लड़की ने अपने पास बैठे लड़के से कहा/कोटला फ़ीरोज़शाह के स्लेटी खँडहरों के बीच/उस लड़के का उत्तर फँस-सा गया/फिर इन दोनों की कहानी का कुछ नहीं हुआ/वैसे ही जैसे फ़ीरोज़ाबाद का भी कुछ न हो सका।”
अतीत से वर्तमान तक व्याप्त मनुष्य के अधूरेपन की निशानदेही करती ये कविताएँ निश्चित रूप से पाठकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव साबित होंगी।
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