Toofan
(0)
Author:
Upendra, William ShakespearePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays₹
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‘तूफ़ान’ (टेम्पेस्ट) शेक्सपियर का महान सुखान्त नाटक है। 1611-12 में रचित यह उनकी अन्तिम प्रौढ़ रचना मानी गई है। शेक्सपियर की मृत्यु सन् 1616 में हुई थी। इस नाटक की रूमानी भाव-भूमि इसके रचयिता की असाधारण कल्पना-शक्ति और चमत्कारी सृजन-सामर्थ्य के अनेक स्मृति-चिह्न लिए हैं। हैज़लिट के शब्दों में ‘यह शेक्सपियर की सर्वाधिक मौलिक व पूर्ण कृतियों में से एक है और इसमें उन्होंने अपनी सभी प्रकार की शक्तियों का प्रदर्शन कर दिया है।’</p> <p>इसमें शेक्सपियर के कवि और नाटककार—दोनों ही रूप एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते दिखाई पड़ते हैं। प्रास्पेरो, एरियल और मिरैन्डा की गणना उनके अमर चरित्रों में की जाती है और केलिबान तो साहित्य-समीक्षा के पृष्ठों में सम्भवत: हैमलेट के बाद दूसरा सर्वाधिक चर्चित पात्र है।</p> <p>नाटक की लीला-भूमि के रूप में शेक्सपियर ने एक कल्पित द्वीप का जो सजीव, विवरणपूर्ण और कमनीय चित्र शब्दों में अंकित किया है, वह बड़े से बड़े कलाकार के लिए एक चुनौती है। इसके अतिरिक्त, प्रास्पेरो के व्यक्तित्व और परिस्थितियों, विशेष रूप से अपनी जादुई कला से सदा के लिए विदा लेकर चिर विश्राम करने की इच्छा में कवि का अपना जो मानस-चित्र उपस्थित हो गया है, उसने भी इस नाटक के महत्त्व को कई गुना बढ़ा दिया है।</p> <p>कर्त्तव्य एवं सेवा-भावना के आदर्श की प्रतिष्ठा, क्रोध और प्रतिहिंसा पर क्षमा व करुणा की विजय, एरियल और केलिबान के चरित्रों में क्रमश: आकाश व पृथ्वी तत्त्वों का प्रतीकार्थ, सौन्दर्य और प्रेम की मधुर कोमल अनुभूतियाँ, प्रेतों-परियों के अद्भुत कार्य-कलाप और उन्हें वश में करनेवाली प्रचंड मानव-शक्ति, समुद्र में पोत-ध्वंस का लोमहर्षक दृश्य, व्यंग्य और विनोद के चटखारे, ‘रोमांटिक’ और ‘क्लासिक’ का विलक्षण संगम इत्यादि कितने ही अन्य आकर्षण भी आपको इस कालजयी कृति में देखने को मिलेंगे।
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‘तूफ़ान’ (टेम्पेस्ट) शेक्सपियर का महान सुखान्त नाटक है। 1611-12 में रचित यह उनकी अन्तिम प्रौढ़ रचना मानी गई है। शेक्सपियर की मृत्यु सन् 1616 में हुई थी। इस नाटक की रूमानी भाव-भूमि इसके रचयिता की असाधारण कल्पना-शक्ति और चमत्कारी सृजन-सामर्थ्य के अनेक स्मृति-चिह्न लिए हैं। हैज़लिट के शब्दों में ‘यह शेक्सपियर की सर्वाधिक मौलिक व पूर्ण कृतियों में से एक है और इसमें उन्होंने अपनी सभी प्रकार की शक्तियों का प्रदर्शन कर दिया है।’</p>
<p>इसमें शेक्सपियर के कवि और नाटककार—दोनों ही रूप एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते दिखाई पड़ते हैं। प्रास्पेरो, एरियल और मिरैन्डा की गणना उनके अमर चरित्रों में की जाती है और केलिबान तो साहित्य-समीक्षा के पृष्ठों में सम्भवत: हैमलेट के बाद दूसरा सर्वाधिक चर्चित पात्र है।</p>
<p>नाटक की लीला-भूमि के रूप में शेक्सपियर ने एक कल्पित द्वीप का जो सजीव, विवरणपूर्ण और कमनीय चित्र शब्दों में अंकित किया है, वह बड़े से बड़े कलाकार के लिए एक चुनौती है। इसके अतिरिक्त, प्रास्पेरो के व्यक्तित्व और परिस्थितियों, विशेष रूप से अपनी जादुई कला से सदा के लिए विदा लेकर चिर विश्राम करने की इच्छा में कवि का अपना जो मानस-चित्र उपस्थित हो गया है, उसने भी इस नाटक के महत्त्व को कई गुना बढ़ा दिया है।</p>
<p>कर्त्तव्य एवं सेवा-भावना के आदर्श की प्रतिष्ठा, क्रोध और प्रतिहिंसा पर क्षमा व करुणा की विजय, एरियल और केलिबान के चरित्रों में क्रमश: आकाश व पृथ्वी तत्त्वों का प्रतीकार्थ, सौन्दर्य और प्रेम की मधुर कोमल अनुभूतियाँ, प्रेतों-परियों के अद्भुत कार्य-कलाप और उन्हें वश में करनेवाली प्रचंड मानव-शक्ति, समुद्र में पोत-ध्वंस का लोमहर्षक दृश्य, व्यंग्य और विनोद के चटखारे, ‘रोमांटिक’ और ‘क्लासिक’ का विलक्षण संगम इत्यादि कितने ही अन्य आकर्षण भी आपको इस कालजयी कृति में देखने को मिलेंगे।
Book Details
-
ISBN9788171194346
-
Pages103
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रख्यात लेखक भीष्म साहनी का यह तीसरा नाटक ‘माधवी’ महाभारत की एक कथा पर आधारित है। ऋषि विश्वामित्र का शिष्य गालव अपनी शिक्षा समाप्ति के समय गुरु-दक्षिणा देने की हठ करता है और विश्वामित्र उसके हठी स्वभाव से क्रुद्ध होकर आठ सौ अश्वमेधी घोड़े माँग लेते हैं। अश्वमेधी घोड़ों की खोज में भटकता हुआ गालव अन्त में दानवीर राजा ययाति के आश्रम में पहुँचता है। राज-पाट से निवृत्त राजा ययाति गालव की प्रतिज्ञा सुनकर असमंजस में पड़ जाते हैं, किन्तु वे दैवी गुणों से युक्त अपनी एकमात्र पुत्री माधवी को, यह कहकर उसे सौंप देते हैं कि जहाँ कहीं किसी भी राजा के पास आठ सौ अश्वमेधी घोड़े मिलें, उनके बदले वह माधवी को राजा के पास छोड़ दें। माधवी के बारे में कहा गया है कि उसके गर्भ से उत्पन्न बालक चक्रवर्ती राजा बनेगा।
यहीं से माधवी की कथा आरम्भ होती है। अनूठे और मर्मस्पर्शी घटना-चक्र में गुज़रते हुए, इस नाटक के प्रधान पात्र—माधवी, गालव, ययाति, विश्वामित्र और अनेक राजागण अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं, और एक विकट, हृदयग्राही मानवीय स्थिति के परिप्रेक्ष्य में, ये चरित्र नए-नए आयाम ग्रहण करते हैं। इनके केन्द्र में ययाति-कन्या माधवी है, जो लगभग एक अलौकिक मिथकीय परिवेश में रहते-बसते हुए भी अत्यधिक सजीव, सर्वथा प्रासंगिक और आकर्षक बनकर उभरती है।
Barff
- Author Name:
Saurabh Shukla
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सही और ग़लत के बीच किसी राह की तलाश की तरह है–सौरभ शुक्ला का ‘बर्फ़’।
–‘द हिन्दू’
‘बर्फ़’ नाटक जैसा देखने में है, जितना दिखता है, उससे कहीं ज़्यादा अनुभव के स्तर पर नाटक है।
–‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’
सच की बेहतरीन नाट्य-प्रस्तुति।
–‘सन्डे गार्डियन’
‘बर्फ़’ जितना भयानक है उतना ही मानवीय भी है। सौरभ ने एक पतली रस्सी पर चलने जैसा ख़तरनाक काम किया है, जिसमे वे पूरी तरह सफल हुए हैं। रंगमंच की दुनिया का यह चकित करनेवाला काम है।
–सुधीर मिश्रा
Chaturbhani
- Author Name:
Motichandra +2
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'चतुर्भाणी’ एक विलक्षण क्लैसिक है : मूल में बोलचाल की संस्कृत और लोक-जीवन की छटाओं का रोचक और नाटकीय इज़हार है और अनुवाद में बनारसी बोली का चटपटा रस-भाव। बरसों पहले ब.व. कारन्त ने उज्जैन के कालिदास समारोह के लिए 'चतुर्भाणी’ की रंग-प्रस्तुति की थी। डॉ. मोतीचन्द्र द्वारा अनूदित और डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा विस्तार से समझाई गई इस कृति को नए संस्करण में प्रस्तुत करते हुए हमें गहरा सन्तोष है। भारतीय परम्परा की दुर्व्याख्या के इस अभागे समय में यह कृति याद दिलाती है कि हमारी परम्परा में कैसी रसिकता और लोक-जीवन का उन्मुक्त रचाव रहा है जो कहीं से भी किसी संकीर्णता में बाँधा नहीं जा सकता।
—अशोक वाजपेयी
Agni Aur Barkha
- Author Name:
Girish Karnad +1
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इतिहास, पुराण, जातक और लोकथाएँ गिरीश कारनाड के लिए सर्वाधिक समृद्ध उत्प्रेरक और आकर्षक कथा-बीज स्रोत रहे हैं। नई दृष्टि एवं संवेदना के वहन के लिए वे अपनी रचना का शरीर अतीत से चुनते हैं। उनकी विशिष्टता यह है कि वे मिथकीय कथानकों से आधुनिक और सामयिक समस्याओं के सम्प्रेषण का काम लेते हैं। अग्नि और बरखा के लिए कारनाड पुनः अतीत की ओर लौटे हैं, इसके केन्द्र में है–महाभारत का वन पर्व। अपने वनवास काल में देशाटन में पांडव इधर-उधर भटक रहे हैं। सन्त लोमष इन्हें यवक्री अर्थात् यवक्रत की गाथा सुनाते हैं। महाभारत जैसी महागाथा का पटल इतना जटिल है कि ऐसे छोटे वृत्तान्त पर ध्यान न जाना स्वाभाविक था, लेकिन कारनाड को इस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया। इस कथा के भीतर कई गम्भीर अर्थ विद्यमान हैं, नाटककार इस नाट्य-रूपान्तर में इसके निहित अर्थों व अभिप्रायों को स्पष्ट करता है। अतीत के प्रकाश में वर्तमान धुँधलके को साफ़ और उजला करने की यह रचनात्मक कोशिश निःसन्देह पठनीय और दर्शनीय है, इसका एक प्रमाण यह भी है कि अब तक इस नाटक के दर्जनों सफल मंचन हो चुके हैं।
Katha Shakuntala Ki
- Author Name:
Radhavallabh Tripathi
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शकुंतला-दुष्षंत की कथा की इस नाट्य-प्रस्तुति को जो चीज़ विशिष्ट बनाती है, वह है इसका काल-बोध और तत्कालीन परिवेश का तथ्यपरक निरूपण। ‘महाभारत’ में किंचित् परिष्कृत रूप में सबसे पहले आनेवाली यह कथा वास्तव में वैदिक काल की है। इसके पात्र वेदों के समय से सम्बन्ध रखते हैं। दुष्यंत के पुत्र भरत का ज़िक्र भी वेदों में मिलता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ‘महाभारत’ में यह कथा जिस रूप में आई, उसके बजाय यह नाटक इस कथा के उस रूप को आधार बनाता है जो वैदिक काल में रहा होगा। ‘महाभारत’ में, और उसके बाद हम जिस भी रूप में इस कथा को देखते हैं, उसकी जड़ें सामन्ती मूल्य-संरचना में हैं। वैदिक संस्करण निश्चय ही कुछ भिन्न रहा होगा और उसका परिप्रेक्ष्य आदिम मूल्यबोध से रहा होगा। इस नाटक में कथा के उसी रूप को पकड़ने का प्रयास किया गया है। इसीलिए यहाँ ‘दुष्यंत’ को ‘दुष्षंत’ कहा गया है जो ‘महाभारत’ तथा वैदिक साहित्य में आता है। यह प्रचलित कथा मूलत: मातृसत्तात्मक समाज से ताल्लुक़ रखती है जहाँ लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की पूरी छूट है, जैसाकि शकुंतला भी करती है। नाटक में भूख और अकाल की भी चर्चा है जिन्हें वेदों के ही कुछ प्रसंगों के आधार पर पुन:सृजित किया गया है। भाषा, संवाद-रचना और प्रसंगानुकूल दृश्य-रचना के चलते यह नाटक शकुंतला की जानी-पहचानी कथा को हमारे सामने नए और भावप्रवण रूप में प्रस्तुत करता है; जो मंच के लिए जितना अनुकूल है, साधारण पाठ के लिए भी उतना ही रुचिकर है।
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