Toofan
Author:
William ShakespearePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 316
₹
395
Available
‘तूफ़ान’ (टेम्पेस्ट) शेक्सपियर का महान सुखान्त नाटक है। 1611-12 में रचित यह उनकी अन्तिम प्रौढ़ रचना मानी गई है। शेक्सपियर की मृत्यु सन् 1616 में हुई थी। इस नाटक की रूमानी भाव-भूमि इसके रचयिता की असाधारण कल्पना-शक्ति और चमत्कारी सृजन-सामर्थ्य के अनेक स्मृति-चिह्न लिए हैं। हैज़लिट के शब्दों में ‘यह शेक्सपियर की सर्वाधिक मौलिक व पूर्ण कृतियों में से एक है और इसमें उन्होंने अपनी सभी प्रकार की शक्तियों का प्रदर्शन कर दिया है।’</p>
<p>इसमें शेक्सपियर के कवि और नाटककार—दोनों ही रूप एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते दिखाई पड़ते हैं। प्रास्पेरो, एरियल और मिरैन्डा की गणना उनके अमर चरित्रों में की जाती है और केलिबान तो साहित्य-समीक्षा के पृष्ठों में सम्भवत: हैमलेट के बाद दूसरा सर्वाधिक चर्चित पात्र है।</p>
<p>नाटक की लीला-भूमि के रूप में शेक्सपियर ने एक कल्पित द्वीप का जो सजीव, विवरणपूर्ण और कमनीय चित्र शब्दों में अंकित किया है, वह बड़े से बड़े कलाकार के लिए एक चुनौती है। इसके अतिरिक्त, प्रास्पेरो के व्यक्तित्व और परिस्थितियों, विशेष रूप से अपनी जादुई कला से सदा के लिए विदा लेकर चिर विश्राम करने की इच्छा में कवि का अपना जो मानस-चित्र उपस्थित हो गया है, उसने भी इस नाटक के महत्त्व को कई गुना बढ़ा दिया है।</p>
<p>कर्त्तव्य एवं सेवा-भावना के आदर्श की प्रतिष्ठा, क्रोध और प्रतिहिंसा पर क्षमा व करुणा की विजय, एरियल और केलिबान के चरित्रों में क्रमश: आकाश व पृथ्वी तत्त्वों का प्रतीकार्थ, सौन्दर्य और प्रेम की मधुर कोमल अनुभूतियाँ, प्रेतों-परियों के अद्भुत कार्य-कलाप और उन्हें वश में करनेवाली प्रचंड मानव-शक्ति, समुद्र में पोत-ध्वंस का लोमहर्षक दृश्य, व्यंग्य और विनोद के चटखारे, ‘रोमांटिक’ और ‘क्लासिक’ का विलक्षण संगम इत्यादि कितने ही अन्य आकर्षण भी आपको इस कालजयी कृति में देखने को मिलेंगे।
ISBN: 9788171194346
Pages: 103
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
बिहार की बिदेसिया शैली में लिखित ‘अमली’ नाटक आधुनिक भी है और अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ भी। नाटक में प्रचुर पारम्परिक गीतों एवं नृत्यों का समन्वय किया गया है जो नाटक के कथ्य एवं बिदेसिया शैली दोनों के अभिन्न अंग हैं। सूत्रधार और गड़बड़िया जैसे पात्र ‘अमली’ को एक ओर संस्कृत परम्परा से जोड़ते हैं तो दूसरी ओर लोक परम्परा से। नाटक रोचक होने के साथ ही हमें सोचने को मजबूर करता है और कहीं वर्तमान परिस्थिति से मुक्ति पाने-दिलाने के लिए उन्मुख करता है। टोटल थिएटर को रूपायित करनेवाली हृषीकेश सुलभ की यह कृति हिन्दी नाट्य-साहित्य एवं रंगमंच की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
—प्रतिभा अग्रवाल
दरअसल ‘अमली’ भारत के किसी भी पिछड़े प्रान्त के किसी भी ज़िले के किसी भी गाँव में मिल जाएगी। इस मायने में ‘अमली’ समकालीन समाज की जीवन्त पुनर्रचना है। अमानवीय अर्थतंत्र और सामन्ती समाज की विद्रूपताओं में पिसते व्यापक समाज की दारुण स्थितियाँ ‘अमली’ को एक समकालीन रचना बनाती हैं। सूत्रधार, विदूषक और समाजी ब्रेख़्त के थियेटर की शैली में यातना और बेचैनी के आवेगों में बहते नाट्य-दर्शकों की चेतना को झकझोरते हैं और उन्हें नाटक के बजाय समाज की विराट सच्चाइयों से जोड़ते हैं।
—उर्मिलेश; ‘नवभारत टाइम्स’, पटना, 1 जनवरी, 1988
स्वाधीनता प्राप्ति के बाद हिन्दी रंगमंच का नवोन्मेष तो हुआ, पर उसमें भारतीय रंग- परम्परा विलुप्त-सी रही। पिछले दो-तीन दशकों से भारतीय रंगदृष्टि की तलाश चल रही है। इस दिशा में एक सार्थक क़दम है बिदेसिया शैली में हृषीकेश सुलभ लिखित ‘अमली’ नाटक का मंचन।
—श्रीप्रकाश; दैनिक ‘हिन्दुस्तान’, पटना, जुलाई, 1988
‘अमली’ उस पीड़ित समाज की प्रतिनिधि है जिसे सत्ता, सम्पत्ति और षड्यंत्र ने सदा लूटा है।
—‘जनसत्ता’, कोलकाता, 26 दिसम्बर, 1991
हृषीकेश सुलभ द्वारा लिखित इस नाटक का मंचन वर्तमान में राँची रंगमंच के ठहरी हुई झील में एक बड़ा पत्थर था। यह बहुख्यात नाटक भिखारी ठाकुर के बिदेसिया से उद्भूत शैली पर आधारित प्रयोग है। सीधे-सादे कथ्य के साथ जुड़ा शिल्प इस नाटक की मूल ताक़त है।
—प्रियदर्शन; ‘राँची एक्सप्रेस’, राँची, 25 जून, 1992
‘अमली’ में बिदेसिया शैली की सार्थक रंगयुक्तियों का नए तरीक़े से कुशलता के साथ इस्तेमाल किया गया। राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी रंगमंच के भीतर यह एक नया प्रयोग था। इस प्रयोग ने पटना रंगमंच को नया आकाश दिया।
—चंद्रेश्वर; दैनिक ‘हिन्दुस्तान’, पटना, 17 मार्च, 1993
Fuziyama
- Author Name:
Bhisham Sahni
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फ़ूज़ीयामा रूसी लेखक चिंगेज़ आइतमातोव तथा कलताई मोहम्मेजानोव की रोचक नाट्य-कृति है।
अनुवादक के शब्दों में "चिंगेज़ आइतमातोव मुख्यतः एक कथाकार के रूप में ही जाने जाते थे। इतना ही नहीं, 1960 से ही वह एक नई विधा अपना रहे थे–वह अपनी कृतियों में मिथकों और गाथाओं का प्रयोग करने लगे थे। यह, समाजवादी यथार्थवाद की सपाट सीधी लीक से हटकर नया रुख अपनाने का प्रयास था; साथ ही साथ अपने सांस्कृतिक विरसे के प्रति पाई जाने वाली दृष्टि पर पुनर्विचार करने का प्रयास भी। इतना ही नहीं, ब्रेजनेव के शासनकाल में सेंसर की कैंची से बचने के लिए, सांकेतिक प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग बुद्धिजीवियों के लिए नितांत आवश्यक होता जा रहा था। जमाना बदल गया था, ख्रुश्चेव-शासन का वह छोटा-सा कालखंड, जब लिखने-बोलने की कुछ आजादी मिलने लगी थी, अब खत्म हो चुका था। फिर से दमन का दौर आ गया था और मतभेद रखनेवालों को जेलखानों और पागलखानों में ठूँसा जाने लगा था...‘‘फ़ूज़ीयामा उन समस्याओं से साक्षात् करता है, जिनका संबंध विशेष रूप से सोवियत इतिहास से है; साथ ही वह ऐसे सवाल भी उठाता है जो विश्वव्यापी स्तर पर मानव स्वभाव से जुड़े हैं–चाहे वह बुद्धिजीवियों की विकट स्थिति रही हो, या मनुष्य के अंतःकरण से सम्बद्ध प्रश्न।’’
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