Swatantroyottar Hindi Natak : Mulya-Sankraman
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स्वाधीनता प्राप्ति के बाद हमारे देश में उपजी एक ज्वलन्त समस्या है मानवमूल्य-संक्रमण। डॉ. ज्योतीश्वर मिश्र ने स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों में दर्शित इस मूल्य-संक्रमण का गम्भीर और प्रामाणिक विवेचन ग्रन्थ में किया है। इसमें स्वतंत्रता के बाद लिखे गए लगभग सौ नाटकों को उपयुक्त उद्धरणों सहित सन्दर्भित किया गया है। स्पष्ट है कि अध्ययन कुछ इने-गिने चर्चित नाटकों तक ही सीमित नहीं रहा। यह लेखक की श्रमशीलता का तथा ग्रंथ की विवेचन-पद्धति उसकी प्रौढ़ दृष्टि का स्पष्ट परिचय देती है। नाटकों के कथ्य तथा शिल्प पर लेखक द्वारा की गई टिप्पणियाँ बहुत ही सार्थक एवं व्यंजक हैं। ग्रंथ की भाषा विषयवस्तु के सर्वथा अनुरूप, प्रभावशाली तथा प्रवाहपूर्ण है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि साहित्य और समाजशास्त्र दोनों विषयों के अध्येता इस ग्रंथ से बहुत लाभान्वित होंगे।</p> <p>—प्रोफ़ेसर मोहन अवस्थी
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स्वाधीनता प्राप्ति के बाद हमारे देश में उपजी एक ज्वलन्त समस्या है मानवमूल्य-संक्रमण। डॉ. ज्योतीश्वर मिश्र ने स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटकों में दर्शित इस मूल्य-संक्रमण का गम्भीर और प्रामाणिक विवेचन ग्रन्थ में किया है। इसमें स्वतंत्रता के बाद लिखे गए लगभग सौ नाटकों को उपयुक्त उद्धरणों सहित सन्दर्भित किया गया है। स्पष्ट है कि अध्ययन कुछ इने-गिने चर्चित नाटकों तक ही सीमित नहीं रहा। यह लेखक की श्रमशीलता का तथा ग्रंथ की विवेचन-पद्धति उसकी प्रौढ़ दृष्टि का स्पष्ट परिचय देती है। नाटकों के कथ्य तथा शिल्प पर लेखक द्वारा की गई टिप्पणियाँ बहुत ही सार्थक एवं व्यंजक हैं। ग्रंथ की भाषा विषयवस्तु के सर्वथा अनुरूप, प्रभावशाली तथा प्रवाहपूर्ण है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि साहित्य और समाजशास्त्र दोनों विषयों के अध्येता इस ग्रंथ से बहुत लाभान्वित होंगे।</p>
<p>—प्रोफ़ेसर मोहन अवस्थी
Book Details
-
ISBN9788180311130
-
Pages228
-
Avg Reading Time8 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रख्यात नाटककार बर्टोल्ट ब्रेष्ट के बहुचर्चित नाटक ‘कॉकेशियन चाक सर्किल’ का हिन्दी अनुवाद है : ‘खड़िया का घेरा’। अनुवादक हैं हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर।
प्रस्तुत नाटक जिस तरह की, और जिस संक्रान्ति की दुनिया हमारे सामने पेश करता है, उसकी अनुगूँज हमें अपने इतिहास और वर्तमान में मिलने लगती है। इस नाटक में वे सामन्त हैं जो सर्वहारा की क्रान्ति को कुचल देना चाहते हैं...हमारे यहाँ सत्ताधारी राजनीतिज्ञों का वर्ग है, जो जनता के नाम पर अपनी सत्ता को स्थापित कर रहा है। इस नाटक के काज़बेकी, काज़बेकी का भतीजा, डॉक्टर, किसान और स्वयं अजूदक—कहीं-न-कहीं हमें और हमारी स्थितियों को मूर्तिमान करते दिखाई देते हैं।
भ्रष्टाचार, पतन, मूल्यहीनता, अवसरवादिता, पदलोलुपता, जनता के नाम पर जनता का शोषण, न्यायहीनता और अन्धापन—जो इस नाटक में व्याप्त हैं, वे भारतीय प्रजातंत्र के संत्रास को भी उजागर कर रहे हैं। संस्थाओं, वर्गों और व्यक्तियों के नाम दूसरे हैं पर जनता एक ही तरह से अभिशप्त और संत्रस्त है। संक्रान्ति और सन्ताप का जो अनुभव यह नाटक देता है, वही आज के भारतीय का जीवन-अनुभव भी है। अनेक देशों में सदियों से चली आती एक लोककथा को आधुनिक सन्दर्भ दिया है ब्रेष्ट ने। कई भाषाओं में अनूदित और मंचित एक पठनीय नाट्य-कृति!
Shreshth Bharatiya Ekanki : Vol. 1
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

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Description:
आज रंगमंच के उपयुक्त सशक्त नाटकों की शायद सबसे अधिक आवश्यकता है। क्योंकि टी.वी. और फ़िल्मों द्वारा फैलाए गए प्रदूषण को सशक्त नाटक ही सही चुनौती दे सकते हैं, परन्तु इस दृष्टि से वर्तमान परिदृश्य बहुत आशाजनक दिखाई नहीं पड़ता। विभिन्न भारतीय भाषाओं में अच्छे नाटकों का लगातार अभाव होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में यह बहुत आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं में रंगमंच के योग्य उत्कृष्ट नाटकों का परस्पर आदान-प्रदान हो। इसी उद्देश्य से इस पुस्तक के रूप में एक प्रयत्न भारतीय भाषा परिषद् द्वारा किया गया।
दो खंडों में प्रकाशित ‘श्रेष्ठ भारतीय एकांकी : खंड एक’ में ओड़िया, बांग्ला, कन्नड़, मराठी और हिन्दी के श्रेष्ठ एकांकी संकलित हैं। इसमें रंगमंच के उपयुक्त एकांकी ही प्रायः चुने गए
हैं। विभिन्न विभागों का सम्पादन सम्बन्धित भाषाओं के अधिकारी विद्वानों द्वारा किया गया है। उन्होंने भूमिकाओं में अपनी-अपनी भाषा के नाटक और एकांकी साहित्य के विकास और विशिष्टताओं का गहरा विवेचन किया है। इनसे पाठकों को सम्बन्धित भाषाओं के अवदान की पर्याप्त जानकारी मिल सकेगी। एकांकियों के हिन्दी अनुवाद अत्यन्त प्रामाणिक अनुवादकों द्वारा करवाए गए हैं, ताकि नाटक के कथ्य और नाट्य-भाषा दोनों की रक्षा की जा सके।
‘एकांकी’ विधा एक तरह से वर्तमान युग का अवदान और आन्दोलन है। अपने समय की ज्वलन्त समस्याएँ और चिन्ताएँ इनके मूल में होती हैं। ऐसी कृतियाँ एक बड़े पाठक और दर्शक समाज के सम्मुख प्रस्तुत करना आज हमारे समय की माँग है।
आशा है, यह संकलन इस अर्थ में भी उपादेय होगा।
Amanat Ki Inder Sabha
- Author Name:
Sayyid Agha Hasan Amanat
- Book Type:

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Description:
आज से लगभग दो सौ साल पहले लिखा और खेला गया नाटक ‘इंदर सभा' आधुनिक युग शुरू होने के आसपास लिखा गया दूसरा महत्वपूर्ण नाटक है। पहला नाटक वाजिद अली शाह द्वारा रचित ‘किस्सा राधा कन्हैया’ (1843) माना जाता है। ‘इंदर सभा’ ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया था जो सम्भवत: हिन्दुस्तानी में लिखे नाटकों के इतिहास में कोई दूसरा नाटक नहीं कर सका। इसके प्रभाव का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसका अनुकरण करते हुए लगभग दो दर्जन नाटक और लिखे गए थे। यह नाटक न केवल एक अत्यंत लोकप्रिय नाटक था बल्कि भारतीय संस्कृति के उस स्वरूप का बेहतरीन उदाहरण भी है जिसे हम साझा संस्कृति का नाम देते हैं। नाटक में उस समय का समाज और लोगों की सांस्कृतिक अभिरुचियों का भी दर्शन होता है। लोक चेतना के साथ-साथ फारसी काव्य परम्परा का सम्मिश्रण यह दर्शाता है कि इस युग में समन्वय और सहयोग की क्या स्थिति थी। फारसी और उर्दू के साथ-साथ खड़ी बोली के लोकगीतों की चाशनी एक अद्भुत प्रभाव उत्पन्न करती है।
मूल नाटक ओपेरा शैली में लिखा गया है लेकिन यह माना जाता है कि उसका प्रेरणा सूत्र ओपेरा शैली नहीं बल्कि रासलीला का बुनियादी ढाँचा था जिसमें संवादों से अधिक कविता का महत्त्व दिखाई पड़ता है। कविता और संगीत के प्रति उसे समय दर्शकों के अन्दर जितना उत्साह और लगन रही होगी इतनी शायद आज नहीं है। दूसरी बात यह है कि नाटक में नाटकीयता के तत्वों पर अधिक बल नहीं दिया गया है।
नाटक का पुनर्पाठ तैयार करते समय आज के रंगमंच और नाटक प्रेमियों को ध्यान में रखा गया है। इस प्रक्रिया में नाटक का आकार छोटा किया गया है और पात्रों के चरित्र चित्रण पर कुछ अधिक ध्यान दिया गया है। नाटकीयता को बढ़ाने की कोशिश की गई है। कुछ संवाद और कुछ पद जोड़े गए हैं लेकिन यह ध्यान रखा गया है की नाटक की मूल आत्मा बनी रहे। पुनर्पाठ निर्देशकों को कल्पनाशील बने रहने की बने रहने की सम्भावनाएँ भी प्रस्तुत करता है। इंदर सभा को आजादी के बाद कई निर्देशकों ने मंच पर अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत किया है। यह इस बात का प्रमाण है की नाटक आज भी दर्शकों को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। आशा है कि नाटक का पुनर्पाठ इस दिशा में एक सार्थक प्रयास माना जाएगा।
Aap Na Badlenge
- Author Name:
Mamta Kaliya
- Book Type:

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मैंने तुम्हारा नाटक पढ़ लिया था। सबसे पहली बात तो यह कि इसमें एक बहुत ही सामयिक और महत्त्वपूर्ण थीम को उठाया गया है। दहेज के सवाल पर हर स्तर पर कुछ न कुछ लिखा जाना चाहिए और मुझे ख़ुशी है कि तुमने इस समस्या पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए नाटक का सहारा लिया। दूसरे तुम्हारी भाषा में बहुत कसावट है और नाटकीयता भी है। प्रारम्भिक दृश्य बड़े सघन लगते हैं और कार्य-व्यापार में भी एक तरह की नाटकीय क्रूरता का अहसास होता है जो ज़रूरी है।
—नेमिचन्द्र जैन, प्रख्यात रंग-आलोचक
इधर मैंने अपने विद्यार्थियों को 'यहाँ रोना मना है' एकांकी पढ़ाया। एकांकी सबको बहुत अच्छा लगा।
—के.एम. मालती; अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, गवर्नमेंट आर्ट्स एवं साइंस कॉलेज, कालीकट, केरल
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