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‘संध्या-छाया’ और ‘पुरुष’ जैसे चर्चित नाटकों के रचयिता जयवन्त दलवी का यह नाटक भी, न सिर्फ़ मराठी में, बल्कि हिन्दी में भी बहुत पसन्द किया जाता रहा है। मराठी रंगमंच पर इसकी लगभग एक हज़ार से ज़्यादा प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं, और अब भी जब कोई रंगमंडल इसे खेलता है, दर्शकों की भीड़ लग जाती है। अनेक ख्यातनामा निर्देशक और अभिनेता इससे जुड़े रहे हैं।</p> <p>नाटक का मुख्य पात्र, कहें तो, वह मानव-मन है जो कभी-कभी भावनाओं के महासागर का रूप ले लेता है और उसकी उत्ताल तरंगों पर समाज द्वारा बनाई संस्थाएँ, उदाहरण के लिए परिवार, टूटे झोंपड़े की तरह तैरने लगती हैं। नाटक में दिगम्बर और सुमी दो मित्र हैं जो अपने-अपने परिवार में प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं। सुमी का पति घनश्याम है और दिगम्बर की पत्नी चम्पू है। चम्पू दिगम्बर के छोटे भाई वसन्त को लेकर असहज है क्योंकि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, और सुमी अपने बॉस रहमान के प्यार में पड़ जाती है। इस सबका परिणाम भावोद्रेकपूर्ण नाटकीय स्थितियों में होता है, और दर्शक मनुष्य के चरित्र की अनेक परतों को अपने सामने से गुज़रते देखता है।</p> <p>नाटक में सुदीर्घ और स्पष्ट लेखकीय निर्देश इसे न केवल भावी निर्देशकों-अभिनेताओं के लिए ग्राह्य बनाते हैं, बल्कि पुस्तक रूप में पढ़नेवाले पाठक भी नाटक के पात्रों और परिस्थितियों से ज़्यादा तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं।</p> <p><strong> </strong>
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‘संध्या-छाया’ और ‘पुरुष’ जैसे चर्चित नाटकों के रचयिता जयवन्त दलवी का यह नाटक भी, न सिर्फ़ मराठी में, बल्कि हिन्दी में भी बहुत पसन्द किया जाता रहा है। मराठी रंगमंच पर इसकी लगभग एक हज़ार से ज़्यादा प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं, और अब भी जब कोई रंगमंडल इसे खेलता है, दर्शकों की भीड़ लग जाती है। अनेक ख्यातनामा निर्देशक और अभिनेता इससे जुड़े रहे हैं।</p>
<p>नाटक का मुख्य पात्र, कहें तो, वह मानव-मन है जो कभी-कभी भावनाओं के महासागर का रूप ले लेता है और उसकी उत्ताल तरंगों पर समाज द्वारा बनाई संस्थाएँ, उदाहरण के लिए परिवार, टूटे झोंपड़े की तरह तैरने लगती हैं। नाटक में दिगम्बर और सुमी दो मित्र हैं जो अपने-अपने परिवार में प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं। सुमी का पति घनश्याम है और दिगम्बर की पत्नी चम्पू है। चम्पू दिगम्बर के छोटे भाई वसन्त को लेकर असहज है क्योंकि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, और सुमी अपने बॉस रहमान के प्यार में पड़ जाती है। इस सबका परिणाम भावोद्रेकपूर्ण नाटकीय स्थितियों में होता है, और दर्शक मनुष्य के चरित्र की अनेक परतों को अपने सामने से गुज़रते देखता है।</p>
<p>नाटक में सुदीर्घ और स्पष्ट लेखकीय निर्देश इसे न केवल भावी निर्देशकों-अभिनेताओं के लिए ग्राह्य बनाते हैं, बल्कि पुस्तक रूप में पढ़नेवाले पाठक भी नाटक के पात्रों और परिस्थितियों से ज़्यादा तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं।</p>
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Book Details
-
ISBN9788180311802
-
Pages148
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
(खंड - 1) भीष्म साहनी का रंगमंच से रिश्ता सिर्फ़ नाटककार का नहीं था। वे उसके हर पहलू से जुड़े थे। उन्होंने अभिनय भी किया, निर्देशन में भी हाथ आज़माया और लगभग आधा दर्जन मौलिक नाटकों की रचना करके नाटककार के रूप में प्रतिष्ठित तो हुए ही।
इस पुस्तक में भीष्म जी के उन्हीं नाटकों को रखा गया है। मंचानुकूल शिल्प व सम्प्रेषणीयता से समृद्ध ये नाटक अपने कथ्य में भी रचनात्मक और हस्तक्षेपकारी रहे हैं। ‘हानूश’ जिसका मूल मंतव्य सत्ता के दमनकारी चरित्र को रेखांकित करना और रचनाकार की स्वाधीनता का आह्वान करना है, उस वक़्त सामने आया जब देश इमरजेंसी के दौर से गुज़र रहा था। ‘मुआवज़े’ की कहानी साम्प्रदायिक दंगे से ग्रस्त शहर के सामाजिक और प्रशासनिक विद्रूप को दिखाती है। ‘कबिरा खड़ा बजार में’, ‘आलमगीर’, ‘रंग दे बसन्ती चोला’ और महाभारत की एक कथा पर आधारित ‘माधवी’ में भी भीष्म जी ने अपने समय की ज़रूरतों और चुनौतियों को नज़रअन्दाज़ नहीं किया है।
इस संकलन में शामिल सभी नाटक सार्थकता और मंचीयता, दोनों का सन्तुलन साधते हुए समकालीन नाटककार के सामने एक मानक प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक में शामिल भीष्म जी का प्रसिद्ध आलेख ‘रंगमंच और मैं’ इस पुस्तक का विशेष आकर्षण है।
(खंड - 2) ‘दावत’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘ख़ून का रिश्ता’ और ‘साग-मीट’—ऐसी अनेक कहानियाँ हैं जो हिन्दी कथा-साहित्य को भीष्म साहनी की अप्रतिम देन हैं। मध्यवर्गीय जीवन और मानसिकता की विडम्बनाओं पर तीखी प्रगतिशील दृष्टि से लिखी गई उनकी कहानियों ने अपना एक अलग संवेदना-संसार निर्मित किया।
भीष्म साहनी के सम्पूर्ण नाटकों के इस आयोजन में यह दूसरा खंड उनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियों के नाट्य-रूपान्तरणों पर केन्द्रित है। ये रूपान्तरण उन्होंने स्वयं ही रेडियो के लिए किए थे। कुछ टीवी के लिए भी। रेडियो के लिए किए गए कुछ रूपान्तरण बाद में टीवी पर भी प्रसारित किए गए।
आज जब ‘कहानी का रंगमंच’ समकालीन हिन्दी थिएटर की अहम गतिविधि बन चुका है, इन रूपान्तरणों को मंच की दृष्टि से पढ़ना एक अलग अनुभव है। कहानी में निहित नाटकीयता को किस कोण पर कैसे पकड़ा जाए और कैसे उसको एक जीते-जागते नाटक में तब्दील कर दिया जाए, यह कथाकार-नाटककार भीष्म साहनी ने स्वयं ही इन रूपान्तरणों में स्पष्ट कर दिया है।
जिन कहानियों के नाट्य-रूपान्तरण इस खंड में शामिल हैं, वे हैं—‘दावत’, ‘साग-मीट’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘निमित्त’, ‘खिलौने’, ‘आवाज़ें’, ‘झूमर’, ‘झुटपुटा’, ‘मक़बरा शाह शेर अली’, ‘गंगो का जाया’, ‘ख़ून का रिश्ता’, ‘समाधि भाई रामसिंह’, ‘तद्गति’ और ‘कंठहार’।
उम्मीद है कि अपनी परिचित कहानियों का स्वयं कथाकार द्वारा प्रस्तुत यह नाट्य-रूप पाठकों को उपयोगी और उत्कृष्ट लगेगा।
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