Mahasagar
(0)
Author:
Sarojini Verma, Jaywant DalviPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays₹
50
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Unavailable
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‘संध्या-छाया’ और ‘पुरुष’ जैसे चर्चित नाटकों के रचयिता जयवन्त दलवी का यह नाटक भी, न सिर्फ़ मराठी में, बल्कि हिन्दी में भी बहुत पसन्द किया जाता रहा है। मराठी रंगमंच पर इसकी लगभग एक हज़ार से ज़्यादा प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं, और अब भी जब कोई रंगमंडल इसे खेलता है, दर्शकों की भीड़ लग जाती है। अनेक ख्यातनामा निर्देशक और अभिनेता इससे जुड़े रहे हैं।</p> <p>नाटक का मुख्य पात्र, कहें तो, वह मानव-मन है जो कभी-कभी भावनाओं के महासागर का रूप ले लेता है और उसकी उत्ताल तरंगों पर समाज द्वारा बनाई संस्थाएँ, उदाहरण के लिए परिवार, टूटे झोंपड़े की तरह तैरने लगती हैं। नाटक में दिगम्बर और सुमी दो मित्र हैं जो अपने-अपने परिवार में प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं। सुमी का पति घनश्याम है और दिगम्बर की पत्नी चम्पू है। चम्पू दिगम्बर के छोटे भाई वसन्त को लेकर असहज है क्योंकि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, और सुमी अपने बॉस रहमान के प्यार में पड़ जाती है। इस सबका परिणाम भावोद्रेकपूर्ण नाटकीय स्थितियों में होता है, और दर्शक मनुष्य के चरित्र की अनेक परतों को अपने सामने से गुज़रते देखता है।</p> <p>नाटक में सुदीर्घ और स्पष्ट लेखकीय निर्देश इसे न केवल भावी निर्देशकों-अभिनेताओं के लिए ग्राह्य बनाते हैं, बल्कि पुस्तक रूप में पढ़नेवाले पाठक भी नाटक के पात्रों और परिस्थितियों से ज़्यादा तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं।</p> <p><strong> </strong>
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‘संध्या-छाया’ और ‘पुरुष’ जैसे चर्चित नाटकों के रचयिता जयवन्त दलवी का यह नाटक भी, न सिर्फ़ मराठी में, बल्कि हिन्दी में भी बहुत पसन्द किया जाता रहा है। मराठी रंगमंच पर इसकी लगभग एक हज़ार से ज़्यादा प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं, और अब भी जब कोई रंगमंडल इसे खेलता है, दर्शकों की भीड़ लग जाती है। अनेक ख्यातनामा निर्देशक और अभिनेता इससे जुड़े रहे हैं।</p>
<p>नाटक का मुख्य पात्र, कहें तो, वह मानव-मन है जो कभी-कभी भावनाओं के महासागर का रूप ले लेता है और उसकी उत्ताल तरंगों पर समाज द्वारा बनाई संस्थाएँ, उदाहरण के लिए परिवार, टूटे झोंपड़े की तरह तैरने लगती हैं। नाटक में दिगम्बर और सुमी दो मित्र हैं जो अपने-अपने परिवार में प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं। सुमी का पति घनश्याम है और दिगम्बर की पत्नी चम्पू है। चम्पू दिगम्बर के छोटे भाई वसन्त को लेकर असहज है क्योंकि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, और सुमी अपने बॉस रहमान के प्यार में पड़ जाती है। इस सबका परिणाम भावोद्रेकपूर्ण नाटकीय स्थितियों में होता है, और दर्शक मनुष्य के चरित्र की अनेक परतों को अपने सामने से गुज़रते देखता है।</p>
<p>नाटक में सुदीर्घ और स्पष्ट लेखकीय निर्देश इसे न केवल भावी निर्देशकों-अभिनेताओं के लिए ग्राह्य बनाते हैं, बल्कि पुस्तक रूप में पढ़नेवाले पाठक भी नाटक के पात्रों और परिस्थितियों से ज़्यादा तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं।</p>
<p><strong> </strong>
Book Details
-
ISBN9788180311802
-
Pages148
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रस्तुत पुस्तक 'अंधेर नगरी' भारतेन्दु ने बनारस में नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में सन् 1881 में लिखा था जो काशी के दशाश्वमेघ घाट पर उसी दिन अभिनीत भी हुआ था। 'अंधेर नगरी' को रोचक विनोदपूर्ण बनाने के लिए उसका कथात्मक ढाँचा सादा सामान्य रखा है, पर व्यंग्य को तीव्रतर बनाने के लिए ज़रूरी संकेत पहले दृश्य से ही दिए गए हैं। 'अंधेर नगरी' अंग्रेज़ राज्य का ही दूसरा नाम है। संवाद व्यंग्यपूर्ण अभिप्रायमूलक है। समूचा प्रकरण तमाशा जैसा ही है। क्योंकि 'अंधेर नगरी' की अंधेरगर्दी जिस हास्यास्पद परिणति तक दिखाई गई है, वह अकल्पनीय या अविश्वसनीय होते हुए भी यथार्थ के निकट है।
Woh Ab Bhi Pukarata Hai
- Author Name:
Piyush Mishra
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Awating description for this book
Chaturbhani
- Author Name:
Motichandra +2
- Book Type:

- Description:
'चतुर्भाणी’ एक विलक्षण क्लैसिक है : मूल में बोलचाल की संस्कृत और लोक-जीवन की छटाओं का रोचक और नाटकीय इज़हार है और अनुवाद में बनारसी बोली का चटपटा रस-भाव। बरसों पहले ब.व. कारन्त ने उज्जैन के कालिदास समारोह के लिए 'चतुर्भाणी’ की रंग-प्रस्तुति की थी। डॉ. मोतीचन्द्र द्वारा अनूदित और डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा विस्तार से समझाई गई इस कृति को नए संस्करण में प्रस्तुत करते हुए हमें गहरा सन्तोष है। भारतीय परम्परा की दुर्व्याख्या के इस अभागे समय में यह कृति याद दिलाती है कि हमारी परम्परा में कैसी रसिकता और लोक-जीवन का उन्मुक्त रचाव रहा है जो कहीं से भी किसी संकीर्णता में बाँधा नहीं जा सकता।
—अशोक वाजपेयी
Aadhe-Adhoore
- Author Name:
Mohan Rakesh
- Book Type:

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‘आधे-अधूरे’ आज के जीवन के एक गहन अनुभव–खंड को मूर्त करता है। इसके लिए हिन्दी के जीवन्त मुहावरे को पकड़ने की सार्थक, प्रभावशाली कोशिश की गई है।
...इस नाटक की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी भाषा है। इसमें वह सामर्थ्य है जो समकालीन जीवन के तनाव को पकड़ सके। शब्दों का चयन, उनका क्रम, उनका संयोजन—सबकुछ ऐसा है जो बहुत सम्पूर्णता से अभिप्रेत को अभिव्यक्त करता है। लिखित शब्द की यही शक्ति और उच्चारित ध्वनि–समूह का यही बल है, जिसके कारण यह नाट्य–रचना बन्द और खुले, दोनों प्रकार के मंचों पर अपना सम्मोहन बनाए रख सकी।
...यह नाट्यलेख, एक स्तर पर स्त्री–पुरुष के बीच के लगाव और तनाव का दस्तावेज़ है...दूसरे स्तर पर पारिवारिक विघटन की गाथा है। एक अन्य स्तर पर यह नाट्य–रचना मानवीय संतोष के अधूरेपन का रेखांकन है। जो लोग ज़िन्दगी से बहुत कुछ चाहते हैं, उनकी तृप्ति अधूरी ही रहती है।
एक ही अभिनेता द्वारा पाँच पृथक् भूमिकाएँ निभाए जाने की दिलचस्प रंगयुक्ति का सहारा इस नाटक की एक और विशेषता है।
संक्षेप में कहें तो ‘आधे–अधूरे’ समकालीन ज़िन्दगी का पहला सार्थक हिन्दी नाटक है। इसका गठन सुदृढ़ एवं रंगोपयुक्त है। पूरे नाटक की अवधारणा के पीछे सूक्ष्म रंगचेतना निहित है।
Barff
- Author Name:
Saurabh Shukla
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सही और ग़लत के बीच किसी राह की तलाश की तरह है–सौरभ शुक्ला का ‘बर्फ़’।
–‘द हिन्दू’
‘बर्फ़’ नाटक जैसा देखने में है, जितना दिखता है, उससे कहीं ज़्यादा अनुभव के स्तर पर नाटक है।
–‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’
सच की बेहतरीन नाट्य-प्रस्तुति।
–‘सन्डे गार्डियन’
‘बर्फ़’ जितना भयानक है उतना ही मानवीय भी है। सौरभ ने एक पतली रस्सी पर चलने जैसा ख़तरनाक काम किया है, जिसमे वे पूरी तरह सफल हुए हैं। रंगमंच की दुनिया का यह चकित करनेवाला काम है।
–सुधीर मिश्रा
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