Caligula
(0)
Author:
Albert Camus, Sharad ChandraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays₹
199
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‘कालिगुला’ रोमन साम्राज्य के निरंकुश तानाशाह की मर्मांतक कहानी है जो अपने मारे जाने के षड्यंत्रों के बीच भी 'निर्भय' है। उसकी तानाशाही ने सदाचार को, ईमानदार आदमी को चाबुक पर नचाया है। उसे उन लोगों के चेहरों की मलिनता और गंध बड़ी निकृष्ट लगती है, जिन्होंने न दुःख भोगे न जोखिम उठाए, जो सद्गुणों की जैसे दुकान लगाते हैं, सुरक्षा का स्वप्न ऐसे देखते हैं जैसे कोई युवती प्रेम का। शायद ये इसी भय में अन्ततः मर भी जाएँगे बिना यह जाने कि उन्होंने जिन्दगी भर झूठ बोला है। ये लोग न्यायकर्ता कैसे हो सकते हैं?</p> <p>ऐसी तमाम बातें, तमाम चीजें बेबाकी से सोचनेवाले निरंकुश, क्रूर और अनिष्टकारी कालिगुला को सारी वर्जनाओं के बावजूद किसी महानायक की तरह स्थापित करती चली जाती हैं। कालिगुला की मुक्ति की छटपटाहट और मनुष्य के मनोभावों पर निरपेक्ष पकड़ से ही उसके लिए चाँद जरूरी हो जाता है।</p> <p>वह खुद से कहता है, ‘कालिगुला, तुम भी, तुम भी दंड के भागी हो। किसी से कुछ कम, किसी से कुछ ज्यादा लेकिन इस न्यायाधीशविहीन संसार में जहाँ कोई भी निर्दोष नहीं, कौन हिम्मत करेगा कि मुझे दोषी ठहराए?’
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‘कालिगुला’ रोमन साम्राज्य के निरंकुश तानाशाह की मर्मांतक कहानी है जो अपने मारे जाने के षड्यंत्रों के बीच भी 'निर्भय' है। उसकी तानाशाही ने सदाचार को, ईमानदार आदमी को चाबुक पर नचाया है। उसे उन लोगों के चेहरों की मलिनता और गंध बड़ी निकृष्ट लगती है, जिन्होंने न दुःख भोगे न जोखिम उठाए, जो सद्गुणों की जैसे दुकान लगाते हैं, सुरक्षा का स्वप्न ऐसे देखते हैं जैसे कोई युवती प्रेम का। शायद ये इसी भय में अन्ततः मर भी जाएँगे बिना यह जाने कि उन्होंने जिन्दगी भर झूठ बोला है। ये लोग न्यायकर्ता कैसे हो सकते हैं?</p>
<p>ऐसी तमाम बातें, तमाम चीजें बेबाकी से सोचनेवाले निरंकुश, क्रूर और अनिष्टकारी कालिगुला को सारी वर्जनाओं के बावजूद किसी महानायक की तरह स्थापित करती चली जाती हैं। कालिगुला की मुक्ति की छटपटाहट और मनुष्य के मनोभावों पर निरपेक्ष पकड़ से ही उसके लिए चाँद जरूरी हो जाता है।</p>
<p>वह खुद से कहता है, ‘कालिगुला, तुम भी, तुम भी दंड के भागी हो। किसी से कुछ कम, किसी से कुछ ज्यादा लेकिन इस न्यायाधीशविहीन संसार में जहाँ कोई भी निर्दोष नहीं, कौन हिम्मत करेगा कि मुझे दोषी ठहराए?’
Book Details
-
ISBN9788119835034
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सुप्रसिद्ध नाटककार बादल सरकार की यह कृति बांग्ला और हिन्दी दोनों भाषाओं में अनेक बार मंचस्थ हो चुकी हैं। बांग्ला में शम्भू मित्र (‘बहुरूपी’, कलकत्ता) और हिन्दी में श्यामानन्द जालान (‘अनामिका’, कलकत्ता), सत्यदेव दुबे (‘थियेटर यूनिट’, बम्बई) तथा टी.पी. जैन (‘अभियान’, दिल्ली) ने इसे प्रस्तुत किया। गाँव का निर्जन श्मशान, कुत्ते के रोने की आवाज़, धू-धू करती चिता और शव को जलाने के लिए आए चार व्यक्ति—इन्हें लेकर नाटक का प्रारम्भ होता है। हठात् एक पाँचवाँ व्यक्ति भी उपस्थित हो जाता है—जलती हुई चिता से उठकर आई लड़की, जिसने किसी का प्रेम न पाने की व्यथा को सहने में असमर्थ होकर आत्महत्या कर ली थी और जिसके शव को जलाने के लिए मोहल्ले के ये चार व्यक्ति उदारतापूर्वक राजी हो गए थे। आत्महत्या करनेवाली लड़की के जीवन की घटनाओं की चर्चा करते हुए एक-एक करके चारों अपने अतीत की घटनाओं की ओर उन्मुख होते हैं, उन लड़कियों के, उप-घटनाओं के बारे में सोचने को बाध्य होते हैं जो उनके जीवन में आई थीं और जिनका दुखद अवसान उनके ही अन्याय-अविचार के कारण हुआ था । किन्तु ‘पगला घोड़ा’ में नाटककार का उद्देश्य न तो शमशान की बीभत्सता के चित्रण द्वारा बीभत्स रस की सृष्टि करना है और न ही अपराध-बोध का चित्रण। बादल बाबू के शब्दों में यह ‘मिष्टि प्रेमेर गल्प’ अर्थात् ‘मधुर प्रेम-कहानी’ है।
Muaawze
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
- Book Type:

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‘मुआवज़े’ भीष्म साहनी के पहले तीन नाटकों से इस अर्थ में अलग है कि इसकी पृष्ठभूमि वर्तमान में स्थित है और इसका मिज़ाज व्यंग्य तथा हास्यप्रधान है। हालाँकि इसकी विषयवस्तु में भी समाज और व्यवस्था के वे सब स्याह पक्ष शामिल हैं जिनको अक्सर भीष्म साहनी ने अपने उपन्यासों, कहानियों और नाटकों में उघाड़ा है। साम्प्रदायिक दंगों और उसमें शिकार लोगों को मिलनेवाले मुआवज़े को लेकर बुना गया इस नाटक का कथानक पुलिस, प्रशासन, राजनेताओं और व्यावसायिक तबके के स्वार्थी और संवेदनहीन रवैये को दर्शाता है। साथ ही मुआवज़े के लिए ग़रीब श्रमिक वर्ग के लोगों की हताश कोशिशों की विडम्बना को भी इसमें पकड़ा गया है। नाटक की विशेषता यह है कि व्यंग्य के लिहाज़ से इतने संवेदनशील विषय और लगभग पैंतीस पात्रों और अनेक समूह-दृश्यों के बावजूद नाटक की गति कहीं शिथिल होती नहीं दिखती, और न ही कहीं नाटककार के सरोकार हँसी के तूफ़ान में ग़ायब होते हैं। शायद यही कारण है कि देश के कितने ही रंग-समूह, निर्देशक और रंगकर्मी इस नाटक को खेलते रहे हैं और दर्शक आज भी इसके मंचन की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
Andher Nagari
- Author Name:
Bhartendu Harishchandra +1
- Book Type:

- Description:
प्रस्तुत पुस्तक 'अंधेर नगरी' भारतेन्दु ने बनारस में नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में सन् 1881 में लिखा था जो काशी के दशाश्वमेघ घाट पर उसी दिन अभिनीत भी हुआ था। 'अंधेर नगरी' को रोचक विनोदपूर्ण बनाने के लिए उसका कथात्मक ढाँचा सादा सामान्य रखा है, पर व्यंग्य को तीव्रतर बनाने के लिए ज़रूरी संकेत पहले दृश्य से ही दिए गए हैं। 'अंधेर नगरी' अंग्रेज़ राज्य का ही दूसरा नाम है। संवाद व्यंग्यपूर्ण अभिप्रायमूलक है। समूचा प्रकरण तमाशा जैसा ही है। क्योंकि 'अंधेर नगरी' की अंधेरगर्दी जिस हास्यास्पद परिणति तक दिखाई गई है, वह अकल्पनीय या अविश्वसनीय होते हुए भी यथार्थ के निकट है।
Evam Indrajit
- Author Name:
Badal Sarkar +1
- Book Type:

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बादल सरकार के नाटक ‘एवम् इन्द्रजित्’ का भारतीय रंगकर्म में एक विशिष्ट स्थान है। मूलतः बांग्ला में लिखे इस नाटक का अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। विभिन्न भाषाओं के रंगकर्म में इस नाटक ने बार-बार मंचित होकर प्रशंसा और प्रसिद्धि पर्याप्त बटोरी है। इस नाटक की लोकप्रियता का कारण इसके कथा व शिल्प में निहित है। युवा वर्ग की महत्त्वाकांक्षा, परवर्ती कुंठा व निराशा का यथार्थपरक चित्रण इसमें किया गया है। नाटक अपनी निष्पत्ति में रेखांकित करता है कि मृत्यु का वरण समस्या का समाधान नहीं है। यह जानते हुए भी कि हमारे पास कोई सम्बल नहीं, हमें जीना है। नाटक का कथ्य अत्यन्त यथार्थवादी होते हुए भी शिल्प प्रतीकात्मक है। जीवन के दस-पन्द्रह वर्षों की अवधि को समेटे हुए यह नाटक जीने की ज़िद का तर्क है।
बादल सरकार की काव्यात्मक भाषा सम्प्रेषण और अर्थ दोनों को समृद्ध करती है। नए कलेवर में प्रस्तुत यह प्रसिद्ध नाटक पाठकों व रंगकर्मियों को ख़ूब भाएगा, ऐसा विश्वास किया जा सकता है ।
प्रसिद्ध रंगकर्मी डॉ. प्रतिभा अग्रवाल ने ‘एवम् इन्द्रजीत्’ का मनोयोगपूर्वक अनुवाद किया है। उनके अनुसार, ‘...मेरे द्वारा किए गए अनुवादों में यह सर्वश्रेष्ठ है।’
Hansini
- Author Name:
Anton Chekhav +2
- Book Type:

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हंसनी मुख्य रूप से कलाकारों के अपने रचनात्मक और व्यक्तिगत जीवन के बीच तालमेल न बैठा पाने की पीढ़ी का लेखा-जोखा है। प्रतिष्ठित अभिनेत्री आर्कदीना स्थापित और लोकप्रिय लेखक त्रिगोरिन के प्रेम के बिना ज़िन्दा नहीं रह सकती। त्रिगोरिन रचना-कर्म को बेहद नीरस पाता है, मगर लिखने के लिए अभिशप्त है। उसे अपनी जड़ता तोड़ने के लिए हर बार नई उत्तेजना कि तलाश है और इसकी शिकार होती है—नीना अर्थात् आर्कदीना के पुत्र तेपलेव की प्रेमिका। दोनों को नाटक और लेखन की यानी जीवन के नए मुहावरों की तलाश है।
इस जटिल और उलझी हुई थीम को जिस ख़ूबसूरती से चेख़व ने नाटक का रूप दिया है, वह पूरी दुनिया के नाटकों के इतिहास में अभूतपूर्व है।
इस सन्दर्भ में अनुवादक राजेन्द्र यादव का कथन है : चेख़व की रचनाओं की आत्मीयता, करुणा और ख़ास क़िस्म की निराश उदासी (लगभग आत्मदया जैसी) मुझे बहुत छूती है। मैं उसके प्रभाव से लगभग मोहाच्छन्न था। उसी श्रद्धा से मैंने इन नाटकों को हाथ लगाया था। रूसी भाषा नहीं जनता था, मगर अधिक से अधिक ईमानदारी से उसके नाटकों की मौलिक शक्ति तक पहुँचाना चाहता था। इसलिए तीन अंग्रेज़ी अनुवादों को सामने रखकर एक-एक वाक्य पढ़ता और मूल को पकड़ने कि कोशिश करता। आधार बनाया मॉस्को के अनुवाद को। बाद में सुना, अनुवादों को पाठकों ने पसन्द किया, अनेक रंग-संस्थानों और रेडियो इत्यादि ने इन्हें अपनाया, पाठ्यक्रम में भी उन्हें लिया गया।
Woh Ab Bhi Pukarata Hai
- Author Name:
Piyush Mishra
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Awating description for this book
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