Tajmahal Ka Udghatan
Author:
Ajay ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
ताजमहल का टेंडर तो जारी हो चुका था। चीफ़ इंजीनियर गुप्ता जी की देखरेख में उनके विश्वस्त ठेकेदार भइया जी को ठेका मिलना ही था। ठेका मिला भी और घोटाले के आरोपों के बीच काम भी शुरू हो गया। किन्तु मुग़ल शासन की समस्या का अन्त नहीं। इधर औरंगजेब ने सत्ता सँभाली और उधर दारा शिकोह उसके पीछे पड़ गया। अदालत ने हस्तक्षेप किया तो औरंगजेब की ताजपोशी ही ख़तरे में पड़ गई। अब क्या औरंगजेब को भी चुनाव लड़ना पड़ेगा? ऐसी परिस्थिति में ताजमहल का उद्घाटन कैसे होगा?
ISBN: 9788126729180
Pages: 96
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
...“इतने दिन बीत गए और मैं आज तक मुंडाओं को उनका राज नहीं दिला सका। गुलामी का अँधेरा उनके ऊपर पहले की तरह ही छाया हुआ है। ...पर कुछ दरवाज़े तो खुले हैं।...थोड़ी उजास तो आ रही है। मैंने उनके कई बन्धनों को खोल दिया है। अब वे असुरों की पूजा नहीं करते। अब वे प्रेतों से नहीं डरते। अब उन्होंने पहानों-ओझाओं को भेंट चढ़ाना बन्द कर दिया है।...पर मैंने यह कैसी राह चुन ली। इतनी कठिन राह! क्या वे सब इस राह पर चल सकेंगे? जानता हूँ मैं, यह एक कठिन राह है। जब पैर बढ़ाओ, तब काँटे। पर यही एक राह है जिस पर चलकर मुंडा गोरे साहबों के डर और पकड़ से आज़ाद हो सकते हैं। यह जो कुछ हो रहा है, क्या यह सब मैं कर रहा हूँ? नहीं, मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता।...मैं तो बस उनकी साँसों में...उनके मन में,...उनकी आत्माओं में...उनकी नसों में एक तेज़ तूफ़ान की तरह रहना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे अपना पिता कहा और मैंने उनका पिता बनना स्वीकार किया। वे ग़ुलामी के बन्धन से छूटना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें भरोसा चाहिए, और उन्होंने उस भरोसे को मेरे भीतर पाया।...उन्हें एक भगवान चाहिए, वे धर्म के बिना न तो जी सकते हैं और न ही मर सकते हैं। जनम-जनम से वे सिंबोङा को पूजते रहे, पर सिंबोङा ने उनकी सुधि नहीं ली। मेरे ऊपर उनके भरोसे ने उन्हें मेरे भीतर भगवान दिखाया। उन्होंने मुझे अपना भगवान माना और मुझे उनका भगवान बनना पड़ा। क्या करता मैं? उनके भरोसे को कैसे तोड़ता? मैं जानता हूँ दिकुओं, ज़मींदारों, साहेबों की ताक़त को। पर बिना लड़े कुछ नहीं हो सकता। हार के डर से लड़ने को रोका नहीं जा सकता। मैं जानता हूँ बन्दूक की ताक़त। मालूम है मुझे कि संथाल हूल में हारे, कोल, खरुआ और सरदार हारे, पर लड़ाई सिर्फ़ हार-जीत नहीं होती।...मुझे अपना अन्त मालूम है, पर मैं जानता हूँ कि उनकी जीत उनके भरोसे में ही छिपी है।...हाँ मैं आबा हूँ इस धरती का...भगवान हूँ मुंडाओं का...। मैंने मिशन में प्रभु यीशु की प्रशंसा में सुना था कि एक रोटी में उन्होंने हज़ारों-हज़ार लोगों की भूख मिटाई थी। आनन्द पांडे के घर सुना था कि भक्त प्रह्लाद के लिए भगवान ने सिंह का रूप धरा और खम्भा से निकलकर उसके मामा को मार डाला। मैं भी उन्हीं की तरह हूँ। लँगोटी पहने, तीर-धनुही लिये, भूखे पेट मुंडाओं को मैंने निडर किया है। आज हर मुंडा निडर है और दुनिया पर राज करनेवाले साहेबों के सामने छाती ताने खड़ा है।”
—इसी पुस्तक से
Agni Aur Barkha
- Author Name:
Girish Karnad
- Book Type:

- Description: इतिहास, पुराण, जातक और लोकथाएँ गिरीश कारनाड के लिए सर्वाधिक समृद्ध उत्प्रेरक और आकर्षक कथा-बीज स्रोत रहे हैं। नई दृष्टि एवं संवेदना के वहन के लिए वे अपनी रचना का शरीर अतीत से चुनते हैं। उनकी विशिष्टता यह है कि वे मिथकीय कथानकों से आधुनिक और सामयिक समस्याओं के सम्प्रेषण का काम लेते हैं। अग्नि और बरखा के लिए कारनाड पुनः अतीत की ओर लौटे हैं, इसके केन्द्र में है–महाभारत का वन पर्व। अपने वनवास काल में देशाटन में पांडव इधर-उधर भटक रहे हैं। सन्त लोमष इन्हें यवक्री अर्थात् यवक्रत की गाथा सुनाते हैं। महाभारत जैसी महागाथा का पटल इतना जटिल है कि ऐसे छोटे वृत्तान्त पर ध्यान न जाना स्वाभाविक था, लेकिन कारनाड को इस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया। इस कथा के भीतर कई गम्भीर अर्थ विद्यमान हैं, नाटककार इस नाट्य-रूपान्तर में इसके निहित अर्थों व अभिप्रायों को स्पष्ट करता है। अतीत के प्रकाश में वर्तमान धुँधलके को साफ़ और उजला करने की यह रचनात्मक कोशिश निःसन्देह पठनीय और दर्शनीय है, इसका एक प्रमाण यह भी है कि अब तक इस नाटक के दर्जनों सफल मंचन हो चुके हैं।
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