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यह सुखद है कि राजेश जोशी के लगभग सभी नाटक, लिखने के साथ ही मंचित हुए और मंचीय प्रदर्शनों की सफलता के बाद प्रकाशित हुए। निश्चित रूप से इनकी रचना प्रदर्शन की अपेक्षाओं के अनुरूप हुई है इसलिए इनका पहना प्रभाव तो मंचीयता का ही पड़ता है। नाटक पढ़ते समय पाठक, दर्शक की भूमिका में चला जाता है और भले ही वह सिर्फ पाठ से गुजरता हो, प्रस्तुति का अन्तर्भूत प्रभाव उसे बाँधे रहता है। नाटक की आलोचना की भाषा में कहें तो यह विशेषता ‘चाक्षुषता के साथ-साथ दृश्यात्मकता’ की है। राजेश जोशी के लगभग सभी नाटकों में 'भाषा की पूरी शक्ति, उसकी पूरी अर्थवत्ता काव्यात्मकता' तक पहुँचने में है जिसे विख्यात नाट्य चिन्तक नेमिचन्द्र जैन एक सफल नाट्यालेख का सबसे बड़ा गुण या उसकी बड़ी चुनौती स्वीकार करते हैं। कहना न होगा कि नेमि जी नाटक को मूलतः काव्य का एक प्रकार ही मानते थे और एक नाट्यालेख में वे ‘सार्थक और महत्वपूर्ण अनुभूति की सूक्ष्म, संवेदनशील और गहन अभिव्यक्ति' का होना आवश्यक मानते थे।</p> <p>इस दृष्टि से देखें तो राजेश जोशी के अधिकांश नाटक नाट्यालेख की अनिवार्य अर्हताएँ पूरी करते हैं और सम्बद्ध विषय की सूक्ष्मतम अनुभूति तथा संवेदनशील और गहन अभिव्यक्ति संभव करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनका जोर ‘संवाद’ और ‘दृश्यात्मकता’ को उभारने में रहा है जो पाठ को तो अर्थगर्भी बनाते ही हैं, मंचन को उसके पूरे वितान में खुलने का अवसर देते हैं।</p> <p>—ज्योतिष जोशी
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यह सुखद है कि राजेश जोशी के लगभग सभी नाटक, लिखने के साथ ही मंचित हुए और मंचीय प्रदर्शनों की सफलता के बाद प्रकाशित हुए। निश्चित रूप से इनकी रचना प्रदर्शन की अपेक्षाओं के अनुरूप हुई है इसलिए इनका पहना प्रभाव तो मंचीयता का ही पड़ता है। नाटक पढ़ते समय पाठक, दर्शक की भूमिका में चला जाता है और भले ही वह सिर्फ पाठ से गुजरता हो, प्रस्तुति का अन्तर्भूत प्रभाव उसे बाँधे रहता है। नाटक की आलोचना की भाषा में कहें तो यह विशेषता ‘चाक्षुषता के साथ-साथ दृश्यात्मकता’ की है। राजेश जोशी के लगभग सभी नाटकों में 'भाषा की पूरी शक्ति, उसकी पूरी अर्थवत्ता काव्यात्मकता' तक पहुँचने में है जिसे विख्यात नाट्य चिन्तक नेमिचन्द्र जैन एक सफल नाट्यालेख का सबसे बड़ा गुण या उसकी बड़ी चुनौती स्वीकार करते हैं। कहना न होगा कि नेमि जी नाटक को मूलतः काव्य का एक प्रकार ही मानते थे और एक नाट्यालेख में वे ‘सार्थक और महत्वपूर्ण अनुभूति की सूक्ष्म, संवेदनशील और गहन अभिव्यक्ति' का होना आवश्यक मानते थे।</p>
<p>इस दृष्टि से देखें तो राजेश जोशी के अधिकांश नाटक नाट्यालेख की अनिवार्य अर्हताएँ पूरी करते हैं और सम्बद्ध विषय की सूक्ष्मतम अनुभूति तथा संवेदनशील और गहन अभिव्यक्ति संभव करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनका जोर ‘संवाद’ और ‘दृश्यात्मकता’ को उभारने में रहा है जो पाठ को तो अर्थगर्भी बनाते ही हैं, मंचन को उसके पूरे वितान में खुलने का अवसर देते हैं।</p>
<p>—ज्योतिष जोशी
Book Details
-
ISBN9789393768247
-
Pages384
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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(नरेश सक्सेना की एक टिप्पणी से कुछ पंक्तियाँ।)
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छोटे शहरों के रचनाकारों के बड़े केन्द्रों में उत्प्रवास और उनके मनोजगत में केन्द्र के सर्वग्रासी प्रसार और आधिपत्य के इस भयावह दौर में बद्री नारायण की कविता गुलाब के बरक्स कुकुरमुत्ते के बिम्ब को रचने वाली काव्य-परम्परा का विस्तार है। यह एक ऐसा समय है जब केन्द्र अपने अभिमत का उत्पादन ही नहीं कर रहा है, उसका प्रसार भी कर रहा है। वह कुछ हद तक अपनी मान्यताओं से अलग दिखती धारणाओं और काव्य-भंगिमाओं को भी लील जाने को आतुर है। इसलिए कोई भी अन्य काव्य-भंगिमा उसके लिए असहनीय हो गई है। वह तर्क से या कुतर्क से उसे ख़ारिज कर देने पर आमादा है। यह समय कविता-परिदृश्य के आन्तरिक जनतंत्र को बचाने के कठिन संघर्ष का समय है। बद्री की कविता वस्तुतः जनतांत्रिक समय में एक संवादी नागरिक होने की इच्छा की कविता है।
उनकी कविता भारतीय समाज के निम्नवर्ग के ऐसे मिथकों, आख्यानों और इतिहास के अलक्षित सन्दर्भों के पास जाती है जिनमें उनकी पीड़ाएँ, अवसाद और संघर्ष की अदीठ रह गई गाथाएँ छिपी हैं। बद्री की कविता में वर्चस्वशाली शक्तियों द्वारा स्वीकृति प्राप्त कर चुके प्रचलित मिथक लगभग नहीं हैं। अप्रचलित मिथकीय आख्यानों का पुनर्पाठ करने की कोशिश भी यहाँ नहीं है। इन कविताओं में तो ऐसी जातियों और मानव समूहों के अपने आख्यानों और जन-इतिहासों के चरित्र और गाथाएँ हैं जो उत्पादन की गतिविधियों से जुड़े होने के बावजूद समाज की परिधि पर नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं। बद्री की कविता उन बहुसंख्य मानव समूहों के सपनों, आकांक्षाओं, उनकी कमज़ोरियों और उनकी शक्ति का भाष्य तैयार करती है। वस्तुतः कवि का काव्य-व्यवहार ही इस कविता की राजनीति का साक्ष्य है ।
—राजेश जोशी
Nirmala : Patkatha
- Author Name:
Mannu Bhandari
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‘निर्मला' प्रेमचन्द का सुपरिचित उपन्यास है जिस पर एकाधिक बार टीवी धारावाहिक और फ़िल्मों का निर्माण हो चुका है। मन्नू भंडारी लिखित इस उपन्यास की यह पटकथा हिन्दी टेलीविज़न के दर्शकों को दूरदर्शन के उन दिनों में वापस ले जाएगी जब इस सरकारी चैनल ने एक से एक क्लासिक धारावाहिक प्रस्तुत किए थे। यह वह दौर था जब हिन्दी के नामचीन लेखकों ने दूरदर्शन के स्तरीय धारावाहिकों के लेखन में बड़ा योगदान दिया और हमारे सामने ‘तमस’, ‘मालगुडी डेज़’, ‘कक्काजी कहिन’, ‘राग दरबारी’ और ‘निर्मला’ जैसे धारावाहिक आए। यह दूरदर्शन और भारतीय टेलीविज़न का मनोरंजन के क्षेत्र में स्वर्णकाल था। ‘निर्मला’ उसी समय का धारावाहिक है जिसका स्क्रीनप्ले हिन्दी की लोकप्रिय और बहुपठित कहानीकार मन्नू भंडारी ने लिखा। ‘निर्मला' एक मध्यवर्गीय युवती की कथा है जो दुर्दैव के चलते आजीवन कष्ट में रही और अन्ततः कष्ट के अतिरेक में ही इस दुनिया को विदा कह गई। लेकिन उसके जीवन की दारुण यात्रा का आरम्भ और अन्त पारम्परिक भारतीय समाज में प्रचलित स्त्री-जीवन के प्रति नज़रिए में है, जहाँ माना जाता रहा है कि लड़की सयानी हो गई है तो उसका समय रहते विवाह सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्य है जिसे हर हाल में हो जाना है। इसी के चलते निर्मला को पहले दहेज का और फिर बेमेल विवाह का शिकार होना पड़ता है। विवाह उससे कहीं बड़ी आयु के जिस व्यक्ति से होता है, उसके तीन बच्चे हैं। परिणाम क़िस्म-क़िस्म की मानसिक जटिलताएँ और संघर्ष पैदा होते हैं और अन्ततः पूरा परिवार बिखर जाता है। बचे रह जाते हैं विधुर तोताराम। मन्नू जी ने एक स्त्री की निगाह से देखते हुए जिस तरह इस कहानी को कहा, उसने उनके नज़रिए को अत्यन्त परिपक्व रूप में परदे पर रूपायित किया था। मन्नू जी उन चुनिन्दा लेखकों में रही हैं जिन्हें शब्दों के साथ दृश्यों में भी अपनी बात कहने का हुनर आता है। ‘निर्मला’ उसका बेजोड़ उदाहरण है। यहाँ बता दें कि मन्नू जी ने इसके अलावा भी बड़े और छोटे पर्दे के लिए लेखन किया और उनकी कहानियों और उपन्यासों पर भी फ़िल्में और टी.वी. फ़िल्में बनती रही हैं।
Arthdosh
- Author Name:
Albert Camus +1
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विश्वविख्यात फ्रेंच लेखक अल्बैर कामू की यह नाट्यकृति मनुष्य की अछोर, लेकिन अपूर्ण सुखाकांक्षाओं से उपजी क्रूरता का ऐसा दृश्यालेख है, जो हमें हतप्रभ कर देता है।
नाटक की नायिका मार्था अपनी बूढ़ी माँ के साथ एक सराय में एक छोटा होटल चलाती है। लेकिन उस स्थान की अनाकर्षक और असुविधाजनक स्थिति उसे पसन्द नहीं। वह कहीं सुदूर समुद्र तट पर जाकर रहना और जीवन के तमाम सुख पाना चाहती है—उबरना चाहती है अपने चुकते हुए उबाऊ और नीरस जीवन से। किन्तु इसके लिए बहुत-सा धन चाहिए, इसलिए वह अपने यहाँ कभी-कभार ठहरनेवाले मुसाफिरों को जहर देकर मार डालती है। इस काम में वह अपनी बूढ़ी माँ को भी साथ रखती है। एक दिन जब बीस साल पहले घर से गया उसका भाई, जॉन, एक मुसाफिर की ही तरह आकर वहाँ ठहरता है, तो माँ के साथ मिलकर वह उसकी भी हत्या कर देती है। सचाई सामने आने पर माँ की व्यथा, विलाप और पश्चात्ताप का उसे कोई मूल्य नहीं दिखता, क्योंकि सिर्फ अपने बेटे की हत्या पर सदय और मानवीय हो उठना दूसरी तमाम हत्याओं के अपराध को कम नहीं कर सकता।
यही वह कठोर जीवन-यथार्थ है, जिसे झेलने के लिए वह जॉन की पत्नी मारिया को पत्थर हो जाने की सलाह देती है, ताकि इस अमानवीय समाज का सामना किया जा सके।
कहने की जरूरत नहीं कि अपने ही सुख की तलाश और परिस्थितिवश उसमें असफल रहने के कारण हद दर्जे तक क्रूर हो चुकी मार्था जैसी स्त्री भी अर्थदोष से ग्रस्त इस पत्थरदिल समाज पर एक तीखा व्यंग्य बनकर उभरती है।
Hanoosh
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
- Book Type:

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‘हानूश’ भीष्म साहनी का एक ऐसा नाटक है जिसमें कलाकार की सृजन की अदम्य अकुलाहट और उसकी निरीहता को रूपायित किया गया है। धर्म और सत्ता के गठबन्धन के साथ सामाजिक शक्तियों के संघर्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति भी है यह अनमोल नाटक ‘हानूश’। कलाकार के पारिवारिक तनावों का अनूठा अंकन हुआ है ‘हानूश’ में। इस नाटक में एक ऐसे कलकार को केन्द्रीय भूमिका मिली है जो शुरू में ताला बनानेवाला एक सामान्य मिस्त्री है, बाद में उसके दिमाग़ में घड़ी बनाने का विचार उत्पन्न होता है और वह घड़ी बनाने में लग जाता है। विषम परिस्थितियों से जूझता हुआ वह घड़ी बनाने के काम में लगातार सत्रह साल गुज़ार देता है और अन्ततः इस लगन और कड़ी मेहनत के परिणामस्वरूप वह चेकोस्लोवाकिया की पहली घड़ी बनाने में कामयाब होता है। उसकी बनाई गई घड़ी नगरपालिका की मीनार पर लगाई जाती है, लेकिन इतनी बड़ी सफलता के बाद कलाकार को क्या मिलता है? बादशाह कलाकार की आँखें निकलवा लेता है, ताकि वह उस तरह की दूसरी घड़ी नहीं बना सके। चेक-इतिहास की इस छोटी-सी घटना से भीष्म साहनी ने हिन्दी को यह यादगार नाटक सौंपा है जो आज छह दशक बाद भी रंग-प्रेमियों के लिए यथार्थ और आश्चर्य का एक सामंजस्य-सा प्रतीत होता है।
Kabira Khada Bazaar Mein
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
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बेपरवाह, दृढ़ और उग्र—संक्षेप में मस्तमौला—कबीर का व्यक्तित्व सदियों से भारत मन और मनीषा को प्रभावित करता रहा है। यही कारण है कि पाँच सौ वर्षों से कबीर के पद भारतीयों की ज़बान पर हैं और उनके विषय में कितनी ही कहानियाँ लोकविश्रुत हैं। अपने युग की तानाशाही, धर्मान्धता, बाह्याचार और मिथ्या धारणाओं के विरुद्ध अनथक संघर्ष करनेवाला यह व्यक्ति हमारे बीच आज भी एक स्थायी और प्रेरक मूल्य की तरह स्थापित है। ‘कबिरा खड़ा बज़ार में’ कबीर के ऐसे ही मूल्यवान व्यक्तित्व को प्रस्तुत करनेवाली बहुमंचित और चर्चित नाट्यकृति है। सुविख्यात प्रगतिशील कथाकार भीष्म साहनी की ‘हानूश’ के बाद यह दूसरी नाट्य-रचना थी, जिसे हिन्दी रंगमंच पर व्यापक प्रशंसा प्राप्त हुई है। कबीर की फक्कड़ाना मस्ती, निर्मम अक्खड़ता और युगप्रवर्तक सोच इस कृति में पूरी जीवन्तता के साथ मौजूद है। साथ ही इसमें यह भी उजागर हुआ है कि कबीर की साहित्यिकता सामाजिक जड़ता को तोड़ने का ही एक माध्यम थी, जिसके सहारे उन्होंने अनेकानेक मोर्चों पर संघर्ष किया। कृति से गुजरते हुए पाठक कबीर के इस संघर्ष को उसकी तमाम तत्कालीन सामाजिकता के बावजूद समकालीन भारतीय समाज की विभिन्न विकृतियों से सहज ही जोड़ पाता है। संक्षेप में कहें तो भीष्म साहनी की यह नाट्यकृति मध्ययुगीन वातावरण में संघर्ष कर रहे कबीर को—उनके पारिवारिक और सामाजिक सन्दर्भों सहित—आज भी प्रासंगिक बनाती है।
Andher Nagari
- Author Name:
Bhartendu Harishchandra +1
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प्रस्तुत पुस्तक 'अंधेर नगरी' भारतेन्दु ने बनारस में नेशनल थियेटर के लिए एक दिन में सन् 1881 में लिखा था जो काशी के दशाश्वमेघ घाट पर उसी दिन अभिनीत भी हुआ था। 'अंधेर नगरी' को रोचक विनोदपूर्ण बनाने के लिए उसका कथात्मक ढाँचा सादा सामान्य रखा है, पर व्यंग्य को तीव्रतर बनाने के लिए ज़रूरी संकेत पहले दृश्य से ही दिए गए हैं। 'अंधेर नगरी' अंग्रेज़ राज्य का ही दूसरा नाम है। संवाद व्यंग्यपूर्ण अभिप्रायमूलक है। समूचा प्रकरण तमाशा जैसा ही है। क्योंकि 'अंधेर नगरी' की अंधेरगर्दी जिस हास्यास्पद परिणति तक दिखाई गई है, वह अकल्पनीय या अविश्वसनीय होते हुए भी यथार्थ के निकट है।
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