Arey...O’Henry
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आकार में छोटी लेकिन असर में गहरी ओ’ हेनरी की कहानियों में हमें वे ही लोग मिलते हैं, जिन्हें हम रोज़ अपने आसपास देखते हैं; अपनी उम्मीदों, नाउम्मीदियों, सपनों, हादसों और रहस्यों की पोटलियों को सँभाले फिरते आम लोग। लेकिन उनकी जिन्दगी में भी कुछ होता है जो कहानी बन जाता है; कुछ हैरान करनेवाला, कुछ ऐसा जो हमें गुदगुदा देता है, कुछ सिखा जाता है। अमेरिकी पृष्ठभूमि में लिखी ओ’ हेनरी की ऐसी ही कुछ कहानियों को चुनकर गुलज़ार ने ड्रामों की शक्ल दी और जब ये ड्रामे मंच पर आए तो देखनेवालों ने कुछ नया-सा महसूस किया। नाटक में ढालते हुए उन्होंने कहानी को नहीं बदला, सिर्फ़ परिवेश को बदला, पात्रों को हिन्दुस्तानी पहचान दी; और उन्हें हमारे भारतीय ईथॉस से जोड़ा। नतीजा ये कि ‘अरे ओ’ हेनरी’ पुस्तक के इन छोटे-छोटे ड्रामों में जितने ओ’ हेनरी हैं, उतने ही गुलज़ार भी हैं, जितनी कहानी है, उतना ड्रामा भी है, लेकिन जितना हिन्दुस्तान है, उतना अमेरिका नहीं, यह कमाल गुलज़ार का है जिसे देखनेवालों ने जितना जाना, उतना पढ़नेवाले भी महसूस करेंगे।
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आकार में छोटी लेकिन असर में गहरी ओ’ हेनरी की कहानियों में हमें वे ही लोग मिलते हैं, जिन्हें हम रोज़ अपने आसपास देखते हैं; अपनी उम्मीदों, नाउम्मीदियों, सपनों, हादसों और रहस्यों की पोटलियों को सँभाले फिरते आम लोग। लेकिन उनकी जिन्दगी में भी कुछ होता है जो कहानी बन जाता है; कुछ हैरान करनेवाला, कुछ ऐसा जो हमें गुदगुदा देता है, कुछ सिखा जाता है।
अमेरिकी पृष्ठभूमि में लिखी ओ’ हेनरी की ऐसी ही कुछ कहानियों को चुनकर गुलज़ार ने ड्रामों की शक्ल दी और जब ये ड्रामे मंच पर आए तो देखनेवालों ने कुछ नया-सा महसूस किया। नाटक में ढालते हुए उन्होंने कहानी को नहीं बदला, सिर्फ़ परिवेश को बदला, पात्रों को हिन्दुस्तानी पहचान दी; और उन्हें हमारे भारतीय ईथॉस से जोड़ा।
नतीजा ये कि ‘अरे ओ’ हेनरी’ पुस्तक के इन छोटे-छोटे ड्रामों में जितने ओ’ हेनरी हैं, उतने ही गुलज़ार भी हैं, जितनी कहानी है, उतना ड्रामा भी है, लेकिन जितना हिन्दुस्तान है, उतना अमेरिका नहीं, यह कमाल गुलज़ार का है जिसे देखनेवालों ने जितना जाना, उतना पढ़नेवाले भी महसूस करेंगे।
Book Details
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ISBN9789348157423
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Pages192
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Description:
आज से लगभग दो सौ साल पहले लिखा और खेला गया नाटक ‘इंदर सभा' आधुनिक युग शुरू होने के आसपास लिखा गया दूसरा महत्वपूर्ण नाटक है। पहला नाटक वाजिद अली शाह द्वारा रचित ‘किस्सा राधा कन्हैया’ (1843) माना जाता है। ‘इंदर सभा’ ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया था जो सम्भवत: हिन्दुस्तानी में लिखे नाटकों के इतिहास में कोई दूसरा नाटक नहीं कर सका। इसके प्रभाव का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसका अनुकरण करते हुए लगभग दो दर्जन नाटक और लिखे गए थे। यह नाटक न केवल एक अत्यंत लोकप्रिय नाटक था बल्कि भारतीय संस्कृति के उस स्वरूप का बेहतरीन उदाहरण भी है जिसे हम साझा संस्कृति का नाम देते हैं। नाटक में उस समय का समाज और लोगों की सांस्कृतिक अभिरुचियों का भी दर्शन होता है। लोक चेतना के साथ-साथ फारसी काव्य परम्परा का सम्मिश्रण यह दर्शाता है कि इस युग में समन्वय और सहयोग की क्या स्थिति थी। फारसी और उर्दू के साथ-साथ खड़ी बोली के लोकगीतों की चाशनी एक अद्भुत प्रभाव उत्पन्न करती है।
मूल नाटक ओपेरा शैली में लिखा गया है लेकिन यह माना जाता है कि उसका प्रेरणा सूत्र ओपेरा शैली नहीं बल्कि रासलीला का बुनियादी ढाँचा था जिसमें संवादों से अधिक कविता का महत्त्व दिखाई पड़ता है। कविता और संगीत के प्रति उसे समय दर्शकों के अन्दर जितना उत्साह और लगन रही होगी इतनी शायद आज नहीं है। दूसरी बात यह है कि नाटक में नाटकीयता के तत्वों पर अधिक बल नहीं दिया गया है।
नाटक का पुनर्पाठ तैयार करते समय आज के रंगमंच और नाटक प्रेमियों को ध्यान में रखा गया है। इस प्रक्रिया में नाटक का आकार छोटा किया गया है और पात्रों के चरित्र चित्रण पर कुछ अधिक ध्यान दिया गया है। नाटकीयता को बढ़ाने की कोशिश की गई है। कुछ संवाद और कुछ पद जोड़े गए हैं लेकिन यह ध्यान रखा गया है की नाटक की मूल आत्मा बनी रहे। पुनर्पाठ निर्देशकों को कल्पनाशील बने रहने की बने रहने की सम्भावनाएँ भी प्रस्तुत करता है। इंदर सभा को आजादी के बाद कई निर्देशकों ने मंच पर अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत किया है। यह इस बात का प्रमाण है की नाटक आज भी दर्शकों को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। आशा है कि नाटक का पुनर्पाठ इस दिशा में एक सार्थक प्रयास माना जाएगा।
Agni Aur Barkha
- Author Name:
Girish Karnad
- Book Type:

- Description: इतिहास, पुराण, जातक और लोकथाएँ गिरीश कारनाड के लिए सर्वाधिक समृद्ध उत्प्रेरक और आकर्षक कथा-बीज स्रोत रहे हैं। नई दृष्टि एवं संवेदना के वहन के लिए वे अपनी रचना का शरीर अतीत से चुनते हैं। उनकी विशिष्टता यह है कि वे मिथकीय कथानकों से आधुनिक और सामयिक समस्याओं के सम्प्रेषण का काम लेते हैं। अग्नि और बरखा के लिए कारनाड पुनः अतीत की ओर लौटे हैं, इसके केन्द्र में है–महाभारत का वन पर्व। अपने वनवास काल में देशाटन में पांडव इधर-उधर भटक रहे हैं। सन्त लोमष इन्हें यवक्री अर्थात् यवक्रत की गाथा सुनाते हैं। महाभारत जैसी महागाथा का पटल इतना जटिल है कि ऐसे छोटे वृत्तान्त पर ध्यान न जाना स्वाभाविक था, लेकिन कारनाड को इस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया। इस कथा के भीतर कई गम्भीर अर्थ विद्यमान हैं, नाटककार इस नाट्य-रूपान्तर में इसके निहित अर्थों व अभिप्रायों को स्पष्ट करता है। अतीत के प्रकाश में वर्तमान धुँधलके को साफ़ और उजला करने की यह रचनात्मक कोशिश निःसन्देह पठनीय और दर्शनीय है, इसका एक प्रमाण यह भी है कि अब तक इस नाटक के दर्जनों सफल मंचन हो चुके हैं।
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