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‘पाँसा’ जो इस किताब का पहला नाटक है, युधिष्ठिर और द्रौपदी के पेचीदा रिश्ते को लेकर लिखा गया है। एक भाई ने जीती, और पाँच भाइयों में बँटी द्रौपदी स्वयंवर जीतने वाले अर्जुन को नहीं, बड़ा होने के नाते युधिष्ठिर को पहले मिली; युधिष्ठिर जिसने उसे फिर जुए में दाँव पर भी लगाया, और हारा भी। आज भी, जब हम वक़्त में इतना आगे आ चुके हैं, इस रिश्ते को छूना आग को छूना है; इसके लिए गहरी ज़िम्मेदारी और समझदारी की दरकार है। यह नाटक जिसे पहले मशहूर समाज-चिन्तक और राजनयिक पवन कुमार वर्मा ने एक लम्बी कविता के तौर पर लिखा था, कविता के रूप में और ड्रामे के रूप में भी इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाता है; बिना उस तनाव को खोए जो इस कथा का अहम और ज़रूरी हिस्सा है। पवन कुमार वर्मा जैसे अपनी कविता में, वैसे ही गुलज़ार इस नाटक में वह करने में सफल रहे हैं जो सम्बन्धों के इस दुर्लभ समीकरण को लेकर किया जा सकता है। यानी वे द्रौपदी के यक्ष-प्रश्न को हमारे सामने खड़ा कर देते हैं और हम उसकी विडम्बना को लेकर नए सिरे से सोचना शुरू करते हैं। इसके साथ इस किताब में चार छोटे नाटक और हैं जिनमें टैगोर की कहानी ‘स्त्रीर पत्र’ पर आधारित ‘सुनते हो’ और अहमद नदीम क़ासमी की तीन कहानियों के आधार पर बुने हुए तीन ड्रामे ‘बाबा नूर’, ‘मुख़बिर’ और ‘आलाँ’ शामिल हैं। इन तीनों ही नाटकों में विभाजन से पहले का पंजाब नज़र आता है, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है।
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‘पाँसा’ जो इस किताब का पहला नाटक है, युधिष्ठिर और द्रौपदी के पेचीदा रिश्ते को लेकर लिखा गया है। एक भाई ने जीती, और पाँच भाइयों में बँटी द्रौपदी स्वयंवर जीतने वाले अर्जुन को नहीं, बड़ा होने के नाते युधिष्ठिर को पहले मिली; युधिष्ठिर जिसने उसे फिर जुए में दाँव पर भी लगाया, और हारा भी।
आज भी, जब हम वक़्त में इतना आगे आ चुके हैं, इस रिश्ते को छूना आग को छूना है; इसके लिए गहरी ज़िम्मेदारी और समझदारी की दरकार है। यह नाटक जिसे पहले मशहूर समाज-चिन्तक और राजनयिक पवन कुमार वर्मा ने एक लम्बी कविता के तौर पर लिखा था, कविता के रूप में और ड्रामे के रूप में भी इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाता है; बिना उस तनाव को खोए जो इस कथा का अहम और ज़रूरी हिस्सा है। पवन कुमार वर्मा जैसे अपनी कविता में, वैसे ही गुलज़ार इस नाटक में वह करने में सफल रहे हैं जो सम्बन्धों के इस दुर्लभ समीकरण को लेकर किया जा सकता है। यानी वे द्रौपदी के यक्ष-प्रश्न को हमारे सामने खड़ा कर देते हैं और हम उसकी विडम्बना को लेकर नए सिरे से सोचना शुरू करते हैं।
इसके साथ इस किताब में चार छोटे नाटक और हैं जिनमें टैगोर की कहानी ‘स्त्रीर पत्र’ पर आधारित ‘सुनते हो’ और अहमद नदीम क़ासमी की तीन कहानियों के आधार पर बुने हुए तीन ड्रामे ‘बाबा नूर’, ‘मुख़बिर’ और ‘आलाँ’ शामिल हैं। इन तीनों ही नाटकों में विभाजन से पहले का पंजाब नज़र आता है, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है।
Book Details
-
ISBN9789348157195
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ज़िन्दगी के कुछ आधारभूत मूल्य होते हैं जिन पर इंसानियत की आख़िरी उम्मीद टिकी होती है। वे हर दौर, हर मुश्किल में साधनों और सुखों से वंचित, हारे हुए लोगों का भरोसा बनते हैं, उन्हें दिलासा और हौसला देते हैं। ग़लत और सही का फ़र्क़, रिश्ते-नाते-दोस्ती, हमदर्दी, यक़ीन, एक-दूसरे की मदद करने का जज़्बा और आख़िरी साँस तक लड़ने को कटिबद्ध जिजीविषा, ये मनुष्य की आन्तरिक दुनिया के कुछ ऐसे पाए हैं जो हमारे लालच और हैवानियत के घुन से जर्जर हो चुके संसार को हर हाल में थामे रहते हैं।
सागर सरहदी के इन एकांकी नाटकों की भीतरी तहों में यही क़द्रें बहती हैं और ज़िन्दगी की तमाम विपरीत परिस्थितियों में कुछ ज़्यादा रोशन होकर हमें अपनी मौजूदगी का अहसास कराती हैं। समाज के वास्तविक हालात को सागर साहब बिना किसी लाग-लपेट के देखते और अंकित करते हैं। ग़रीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी, अपने मन का काम न कर पाने की पीड़ा, पछतावा, अकेलापन, सब कुछ को लेकर गहरा व्यर्थता-बोध—यानी डरावने वक़्तों की कोई भी शक्ल उनकी निगाह से नहीं छूटती। वे पूरी शिद्दत और सचाई से उनके ख़ाके खींचते हैं, और उतनी ही शिद्दत से उनके लाचार, समाज के हाशिये पर पहुँच चुके, परेशानहाल किरदार उन चीज़ों से लोहा लेते हैं, उन्हें सीधे अपनी रूह पर झेलते हैं।
'एक शाम और गुज़र गई' के हताश, तंगहाल लेकिन ज़िन्दादिल, सपनों को सच की तरह जीने वाले अदाकार-कलाकार हों, 'एहसास की चुभन' में अधूरे प्यार की विडम्बना हो, महानगरों में घर की समस्या पर फ़लसफ़ियों की तरह बतियाता 'एक बँगला बने न्यारा' हो या अभाव, लाचारी और इनसे पैदा होने वाली चारित्रिक कमज़ोरी को बयान करनेवाला 'दायरा', सागर सरहदी हर एकांकी में सामाजिक-आर्थिक विडम्बनाओं को उनके क्रूरतम रूप में पकड़ते हैं।
इस संग्रह में शामिल सभी एकांकी न सिर्फ़ कंटेंट और शिल्प के लिहाज़ से, बल्कि मंच-तकनीक के लिहाज़ से भी जितने पठनीय हैं, उतना ही सहज इनको मंच पर उतारना भी है। कम पात्रों के साथ, चुस्त संवादों से जटिल और दिलचस्प जीवन-दृश्यों को साकार करने में सक्षम ये छोटे-छोटे नाटक आज़ादी बाद के कुछ दशकों के समाज-मनोविज्ञान का पता भी देते हैं, रूमान और बदलाव की कामना जिसका अभिन्न हिस्सा थे।
Kutte
- Author Name:
Vijay Tendulkar
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- Description: से दूर पिछड़े क्षेत्र में नियुक्त एक सेल्समैन, उसका एक बेहद चतुर-दुनियादार सहायक, घोडके, एक प्रौढ़वय स्त्री और उसके कुत्ते। इस नाटक की कथा इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। अपने घर-परिवार से दूर अकेलेपन और अनिद्रा से त्रस्त नायक घोडके की मार्फ़त उस रहस्यमयी स्त्री की कोठी में जा पहुँचता है जहाँ वह अपने सात पालतू कुत्तों के साथ रहती है। उसका विश्वास है कि इनमें से किसी एक कुत्ते के रूप में उसके दिवंगत पति ने पुनर्जन्म लिया है। स्त्री का दिव्य रूप, अभिजात संयम और आध्यात्मिक वलय नायक को पूरी तरह अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। और, एक अभागी रात वह कुछ ऐसा कर गुज़रता है जो उसके भीतरी-बाहरी संसार को पूरी तरह बदल डालता है। विजय तेन्दुलकर के अन्य नाटकों की तरह यह नाटक भी मानव-जीवन की विडम्बनाओं और विद्रूपताओं को बड़े कौशल से खोलता है और दर्शक को सोच के एक नए धरातल पर ले जाता है। रंगशिल्प और मंचीय भाषा के लिहाज़ से भी यह नाटक विशिष्ट है। अपनी नाट्य-विधियों और गतिमयता के कारण यह पाठक और दर्शक, दोनों के लिए एक चिरस्मरणीय अनुभव होने की क्षमता रखता है।
Badi Buajee
- Author Name:
Badal Sarkar
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Description:
इस नाटक की मुख्य शक्ति इसके चुटीले और व्यंग्य सिद्ध संवाद हैं। कथा का विकास और प्रवाह संवादों के जरिए होता रहता है। एक उदाहरण, बूआजी के व्यक्तित्व को व्यंजित करता शशांक नामक पात्र का यह कथन, ‘कोन्नगर से बूआजी को प्रमीला कैसे खींचकर यहाँ ला रही है, यह या तो भगवान जाने या तुम...यह खबर सुनने के बाद से मेरे तो होश फाख्ता हो रहे हैं। गोली खाकर मरने के समय आँखों के सामने अँधेरा आने के बजाय बूआजी आ खड़ी होती हैं।’ यही कारण है कि सारे प्रमुख पात्र पाठकों और दर्शकों की स्मृति में टिक जाते हैं।
सुप्रसिद्ध रंगकर्मी डॉ. प्रतिभा अग्रवाल द्वारा अनूदित यह प्रहसन नई साज-सज्जा में पाठकों व रंगकर्मियों को भाएगा, ऐसा विश्वास है।
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