Lakshagrih Evam Anya Natak
(0)
Author:
Vratya Basu, Soma BandyopadhyayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays₹
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बांग्ला के प्रख्यात नाटककार और रंगकर्मी व्रात्य बसु से हिन्दी के पाठक अपरिचित नहीं हैं। वर्षों पहले ‘चतुष्कोण' शीर्षक से उनके चार नाटकों का संग्रह हिन्दी में अनूदित होकर आ चुका है, जिसे नाटक-प्रेमी पाठकों के साथ-साथ रंगकर्मियों ने भी बहुत उत्साह के साथ स्वीकार किया।</p> <p>इस संग्रह में उनके तीन नाटक संकलित हैं—‘लाक्षागृह’, ‘संध्या की आरजू में भोर का सरसों फूल’ और ‘बम’ (बोमा)। व्रात्य बसु का नाटककार अपने समय को लक्षित होता है लेकिन जहाँ से वे अपने वर्तमान को देखते हैं, वह एक वृहत् दृष्टि-बिन्दु है। इस संग्रह में शामिल नाटक भी इसके अपवाद नहीं हैं। ‘लाक्षागृह’ में यदि वे महाभारत की एक घटना को आधार बनाकर मनुष्य की चिरन्तन प्रवृत्तियों की पड़ताल करते हैं तो, ‘संध्या की आरजू...’ के अपने पात्रों को आज के कॉरपोरेट तंत्र में स्थित करते हैं और इधर उभरी नई विडम्बनाओं पर प्रकाश डालते हैं। समय के इस बड़े अन्तराल के बीच ‘बम' की पृष्ठभूमि आज़़ादी के पहले का अविभाजित बंगाल है जिसमें हमें अरविन्द घोष मिलेंगे—ऋषि के रूप में नहीं, क्रन्तिकारी के रूप में...!</p> <p>इसके अलावा इन नाटकों का सबसे बड़ा आकर्षण इनका भाषा-सौष्ठव और मंचीयता है जो इन्हें एक तरफ़ अभिनेय बनाती है तो दूसरी तरफ़ पठनीय भी। कथ्य स्वयं एक तत्त्व है जिसके लिए इन्हें पढ़ा ही जाना चाहिए।
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About the Book
बांग्ला के प्रख्यात नाटककार और रंगकर्मी व्रात्य बसु से हिन्दी के पाठक अपरिचित नहीं हैं। वर्षों पहले ‘चतुष्कोण' शीर्षक से उनके चार नाटकों का संग्रह हिन्दी में अनूदित होकर आ चुका है, जिसे नाटक-प्रेमी पाठकों के साथ-साथ रंगकर्मियों ने भी बहुत उत्साह के साथ स्वीकार किया।</p>
<p>इस संग्रह में उनके तीन नाटक संकलित हैं—‘लाक्षागृह’, ‘संध्या की आरजू में भोर का सरसों फूल’ और ‘बम’ (बोमा)। व्रात्य बसु का नाटककार अपने समय को लक्षित होता है लेकिन जहाँ से वे अपने वर्तमान को देखते हैं, वह एक वृहत् दृष्टि-बिन्दु है। इस संग्रह में शामिल नाटक भी इसके अपवाद नहीं हैं। ‘लाक्षागृह’ में यदि वे महाभारत की एक घटना को आधार बनाकर मनुष्य की चिरन्तन प्रवृत्तियों की पड़ताल करते हैं तो, ‘संध्या की आरजू...’ के अपने पात्रों को आज के कॉरपोरेट तंत्र में स्थित करते हैं और इधर उभरी नई विडम्बनाओं पर प्रकाश डालते हैं। समय के इस बड़े अन्तराल के बीच ‘बम' की पृष्ठभूमि आज़़ादी के पहले का अविभाजित बंगाल है जिसमें हमें अरविन्द घोष मिलेंगे—ऋषि के रूप में नहीं, क्रन्तिकारी के रूप में...!</p>
<p>इसके अलावा इन नाटकों का सबसे बड़ा आकर्षण इनका भाषा-सौष्ठव और मंचीयता है जो इन्हें एक तरफ़ अभिनेय बनाती है तो दूसरी तरफ़ पठनीय भी। कथ्य स्वयं एक तत्त्व है जिसके लिए इन्हें पढ़ा ही जाना चाहिए।
Book Details
-
ISBN9788126729470
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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सुप्रसिद्ध नाटककार बादल सरकार की यह कृति बांग्ला और हिन्दी दोनों भाषाओं में अनेक बार मंचस्थ हो चुकी हैं। बांग्ला में शम्भू मित्र (‘बहुरूपी’, कलकत्ता) और हिन्दी में श्यामानन्द जालान (‘अनामिका’, कलकत्ता), सत्यदेव दुबे (‘थियेटर यूनिट’, बम्बई) तथा टी.पी. जैन (‘अभियान’, दिल्ली) ने इसे प्रस्तुत किया। गाँव का निर्जन श्मशान, कुत्ते के रोने की आवाज़, धू-धू करती चिता और शव को जलाने के लिए आए चार व्यक्ति—इन्हें लेकर नाटक का प्रारम्भ होता है। हठात् एक पाँचवाँ व्यक्ति भी उपस्थित हो जाता है—जलती हुई चिता से उठकर आई लड़की, जिसने किसी का प्रेम न पाने की व्यथा को सहने में असमर्थ होकर आत्महत्या कर ली थी और जिसके शव को जलाने के लिए मोहल्ले के ये चार व्यक्ति उदारतापूर्वक राजी हो गए थे। आत्महत्या करनेवाली लड़की के जीवन की घटनाओं की चर्चा करते हुए एक-एक करके चारों अपने अतीत की घटनाओं की ओर उन्मुख होते हैं, उन लड़कियों के, उप-घटनाओं के बारे में सोचने को बाध्य होते हैं जो उनके जीवन में आई थीं और जिनका दुखद अवसान उनके ही अन्याय-अविचार के कारण हुआ था । किन्तु ‘पगला घोड़ा’ में नाटककार का उद्देश्य न तो शमशान की बीभत्सता के चित्रण द्वारा बीभत्स रस की सृष्टि करना है और न ही अपराध-बोध का चित्रण। बादल बाबू के शब्दों में यह ‘मिष्टि प्रेमेर गल्प’ अर्थात् ‘मधुर प्रेम-कहानी’ है।
Muaawze
- Author Name:
Bhisham Sahni +1
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‘मुआवज़े’ भीष्म साहनी के पहले तीन नाटकों से इस अर्थ में अलग है कि इसकी पृष्ठभूमि वर्तमान में स्थित है और इसका मिज़ाज व्यंग्य तथा हास्यप्रधान है। हालाँकि इसकी विषयवस्तु में भी समाज और व्यवस्था के वे सब स्याह पक्ष शामिल हैं जिनको अक्सर भीष्म साहनी ने अपने उपन्यासों, कहानियों और नाटकों में उघाड़ा है। साम्प्रदायिक दंगों और उसमें शिकार लोगों को मिलनेवाले मुआवज़े को लेकर बुना गया इस नाटक का कथानक पुलिस, प्रशासन, राजनेताओं और व्यावसायिक तबके के स्वार्थी और संवेदनहीन रवैये को दर्शाता है। साथ ही मुआवज़े के लिए ग़रीब श्रमिक वर्ग के लोगों की हताश कोशिशों की विडम्बना को भी इसमें पकड़ा गया है। नाटक की विशेषता यह है कि व्यंग्य के लिहाज़ से इतने संवेदनशील विषय और लगभग पैंतीस पात्रों और अनेक समूह-दृश्यों के बावजूद नाटक की गति कहीं शिथिल होती नहीं दिखती, और न ही कहीं नाटककार के सरोकार हँसी के तूफ़ान में ग़ायब होते हैं। शायद यही कारण है कि देश के कितने ही रंग-समूह, निर्देशक और रंगकर्मी इस नाटक को खेलते रहे हैं और दर्शक आज भी इसके मंचन की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
Barff
- Author Name:
Saurabh Shukla
- Book Type:

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सही और ग़लत के बीच किसी राह की तलाश की तरह है–सौरभ शुक्ला का ‘बर्फ़’।
–‘द हिन्दू’
‘बर्फ़’ नाटक जैसा देखने में है, जितना दिखता है, उससे कहीं ज़्यादा अनुभव के स्तर पर नाटक है।
–‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’
सच की बेहतरीन नाट्य-प्रस्तुति।
–‘सन्डे गार्डियन’
‘बर्फ़’ जितना भयानक है उतना ही मानवीय भी है। सौरभ ने एक पतली रस्सी पर चलने जैसा ख़तरनाक काम किया है, जिसमे वे पूरी तरह सफल हुए हैं। रंगमंच की दुनिया का यह चकित करनेवाला काम है।
–सुधीर मिश्रा
Chaturbhani
- Author Name:
Motichandra +2
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'चतुर्भाणी’ एक विलक्षण क्लैसिक है : मूल में बोलचाल की संस्कृत और लोक-जीवन की छटाओं का रोचक और नाटकीय इज़हार है और अनुवाद में बनारसी बोली का चटपटा रस-भाव। बरसों पहले ब.व. कारन्त ने उज्जैन के कालिदास समारोह के लिए 'चतुर्भाणी’ की रंग-प्रस्तुति की थी। डॉ. मोतीचन्द्र द्वारा अनूदित और डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा विस्तार से समझाई गई इस कृति को नए संस्करण में प्रस्तुत करते हुए हमें गहरा सन्तोष है। भारतीय परम्परा की दुर्व्याख्या के इस अभागे समय में यह कृति याद दिलाती है कि हमारी परम्परा में कैसी रसिकता और लोक-जीवन का उन्मुक्त रचाव रहा है जो कहीं से भी किसी संकीर्णता में बाँधा नहीं जा सकता।
—अशोक वाजपेयी
Agni Aur Barkha
- Author Name:
Girish Karnad +1
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इतिहास, पुराण, जातक और लोकथाएँ गिरीश कारनाड के लिए सर्वाधिक समृद्ध उत्प्रेरक और आकर्षक कथा-बीज स्रोत रहे हैं। नई दृष्टि एवं संवेदना के वहन के लिए वे अपनी रचना का शरीर अतीत से चुनते हैं। उनकी विशिष्टता यह है कि वे मिथकीय कथानकों से आधुनिक और सामयिक समस्याओं के सम्प्रेषण का काम लेते हैं। अग्नि और बरखा के लिए कारनाड पुनः अतीत की ओर लौटे हैं, इसके केन्द्र में है–महाभारत का वन पर्व। अपने वनवास काल में देशाटन में पांडव इधर-उधर भटक रहे हैं। सन्त लोमष इन्हें यवक्री अर्थात् यवक्रत की गाथा सुनाते हैं। महाभारत जैसी महागाथा का पटल इतना जटिल है कि ऐसे छोटे वृत्तान्त पर ध्यान न जाना स्वाभाविक था, लेकिन कारनाड को इस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया। इस कथा के भीतर कई गम्भीर अर्थ विद्यमान हैं, नाटककार इस नाट्य-रूपान्तर में इसके निहित अर्थों व अभिप्रायों को स्पष्ट करता है। अतीत के प्रकाश में वर्तमान धुँधलके को साफ़ और उजला करने की यह रचनात्मक कोशिश निःसन्देह पठनीय और दर्शनीय है, इसका एक प्रमाण यह भी है कि अब तक इस नाटक के दर्जनों सफल मंचन हो चुके हैं।
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